हिन्दी के लेखक से यह प्रश्न हमेशा किया जाता है कि काम क्या करते हो?; मात्र लेखक होना उसकी सम्पूर्ण सम्प्रति होती नहीं है। हिन्दी के लेखक को भारत में न तो अंग्रेजी के दोयम दर्जे के लेखकों जितना भी नाम या सम्मान हासिल हो सका है, न ही इसके लिये वे प्रयासरत होते हैं। कुछ विचारधाराओं के खेमे हैं तो कुछ व्यक्तिवादी संस्थान और बस उन्हीं के इर्दगिर्द हिन्दी साहित्य की दुनियाँ परिक्रमा करती दीखती है। कुछ पत्रिकायें और प्रकाशन हैं जिनमें छपने वालों को ही हिन्दी का लेखक माना और कतिपय लेखक संघों में चिपके व्यक्तियों को ही साहित्यकार जाना जाता है। कूपमण्डूकता की अवस्थिति यहाँ तक है कि अपने अपने दायरों से इतर सबकुछ वृथा मान लिया गया है और इसी के तहत कृतियों, लेखकों, आयोजनों आदि आदि को खारिज करने की कोशिशें आरंभ हो जाती है। हिन्दी का लेखक मेरी दूकान में ही सबसे मीठा पकवान वाली मानसिकता से जब तक बाहर नही आयेगा उसे दूसरे की दही खट्टी ही प्रतीत होगी। हिन्दी की दुर्दशा के इन कारणों की पड़ताल रायपुर साहित्य महोत्सव के आईने में करनी आवश्यक है।

Rajeev Ranjan Prasadरचनाकार परिचय:-



सुप्रसिद्ध लेखक राजीव रंजन प्रसाद का जन्म बिहार के सुल्तानगंज में २७.०५.१९७२ में हुआ, किन्तु उनका बचपन व उनकी प्रारंभिक शिक्षा छत्तीसगढ़ राज्य के जिला बस्तर (बचेली-दंतेवाडा) में हुई। आप सूदूर संवेदन तकनीक में बरकतुल्ला विश्वविद्यालय भोपाल से एम. टेक हैं।

विद्यालय के दिनों में ही आपनें एक पत्रिका "प्रतिध्वनि" का संपादन भी किया। ईप्टा से जुड कर उनकी नाटक के क्षेत्र में रुचि बढी और नाटक लेखन व निर्देशन उनके स्नातक काल से ही अभिरुचि व जीवन का हिस्सा बने। आकाशवाणी जगदलपुर से नियमित उनकी कवितायें प्रसारित होती रही थी तथा वे समय-समय पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हुईं। 

उनकी अब तक प्रकाशित पुस्तकों "आमचो बस्तर", "मौन मगध में", "ढोलकल" आदि को पाठकों का अपार स्नेह प्राप्त हुआ है। "मौन मगध में" के लिये आपको महामहिम राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय राजभाषा पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है

वर्तमान में आप सरकारी उपक्रम "राष्ट्रीय जलविद्युत निगम" में कार्यरत हैं। आप साहित्य शिल्पी के संचालक सदस्यों में हैं।

हिन्दी साहित्य को ले कर भारत में कोई बहुत अच्छे आयोजन नहीं होते। नेशनल बुक ट्रस्ट के तत्वाधान में प्रतिवर्ष विश्व पुस्तक मेला लगाया जाता है जो मूलरूप से प्रकाशक केन्दित कार्यकम है। इस आयोजन में कुछ हिन्दी के भी स्टॉल होते हैं किंतु बडा हिस्सा यहाँ पर अंग्रेजी ही है। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल तो अंग्रेजी साहित्य को समर्पित कार्यक्रम है जिसमें हिन्दी के कुछ ही लेखक यदा कदा प्रतिभागिता करते दिखाई पड़ते हैं। विज्ञान, कला, संगीत, खेल, चिकित्सा, योग यहाँ तक कि जाति और धर्म आधारित आयोजनों की देश भर में कोई कमी नहीं है लेकिन हिन्दी साहित्य के लिये मंच कहाँ हैं? ऐसे में रायपुर साहित्य महोत्सव की संकल्पना ने बडी दस्तक दी थी तथा हिन्दी को मंच प्रदान करने की एक कोशिश छत्तीसगढ राज्य सरकार द्वारा की गयी। रायपुर साहित्य महोत्सव के सूत्रधार श्री रजत कुमार ने समापन समारोह में बताया कि इस आयोजन की संकल्पना राज्य के मुख्यमंत्री श्री रमण सिंह की थी, जिसे जनसंपर्क विभाग ने मूर्त रूप दिया।

जो सबसे पहली आलोचना इस आयोजन की हुई है वह राज्य द्वारा प्रायोजित किये जाने की है। प्रश्न यह है कि क्या इस आयोजन के विषय ऐसे थे जिसमें आमंत्रित साहित्यकारों से वस्तुत: राज्य वंदना करायी जानी अपेक्षित थी? क्या भारत के विभिन्न राज्यों द्वारा आयोजित कराये जाने वाले कतिपय साहित्य सम्बन्धी कार्यक्रमों में साहित्यकार सम्मिलित नहीं होते आये हैं? रायपुर आने में साहित्यकारों को बुनियादी समस्या क्या है? इस बात की पडताल करने पर विचारधारा का पहलू सामने आता है। अधिकतम स्वर वामपंथी हैं जिन्होंने इस आयोजन का मुखर विरोध किया था। बिलासपुर में चिकित्सा लापरवाही के कारण अनेक महिलाओं की मृत्यु ने स्वाभाविक रूप से परिवेश को गमगीन बनाया हुआ है इसके पश्चात दक्षिण बस्तर में नक्सली वारदात हो गयी और अनेक जवाओं को जीवन से हाथ दोना पड़ा। देश भर से इन घटनाओं पर साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से तल्ख प्रतिक्रिया दी और चिकित्सकीय लापरवाही के मामले में सरकार को कटघरे में खड़ा किया। लेखक का पक्ष जनपक्ष ही होता है और इसके लिये उस पर वामपंथी होने का लेबल चिपका होना कत्तई आवश्यक नहीं। इन घटनाओं से बहुत पहले ही रायपुर साहित्य महोत्सव की संकल्पना हो गयी थी। राज्य में हुई घटनाओं की संवेदनशीलता को देखते हुए कुछ कार्यक्रम जिनका सम्बन्ध मनोरंजन से है, जिसमें कैलाश खेर की संगीत संध्या भी सम्मिलित है उसे स्थगित कर दिया गया था।

विरोध के आरम्भ का प्रकरण था मंगलेश डबराल का एक अखबार को दिया बयान जिसमें उन्होंने छत्तीसगढ को सांस्कृतिक रूप से विपन्न कहा था। डबराल के लिये रायपुर साहित्य महोत्सव एक दक्षिण पंथी मंच था इसलिये वे इसमें सहभागिता नहीं कर रहे थे। सहभागिता उनका अपना निर्णय है लेकिन छत्तीसगढ की संस्कृति पर अनावश्यक बयान किस लिये? ऐसा नहीं कि मंगलेश डबराल पहले किसी दक्षिण पंथी माने जाने वाले मंच पर गये नहीं हैं। हाल की ही एक घटना है जब भारत नीति प्रतिष्ठानने समांतर सिनेमा का सामाजिक प्रभावविषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया था जिसकी अध्यक्षता मंगलेश डबराल ने ही की थी। इस आयोजन का विषय न तो साम्प्रदायिक था न ही असामाजिक; यह अवश्य था कि आयोजनकर्ताओं का सम्बन्ध दक्षिणपंथी विचारों के साथ रहा है। मंगलेश डबराल के पास यह विकल्प अवश्य रहा होगा कि वे अध्यक्षता स्वीकार ही नहीं करते यदि वे वैचारिक अस्पृश्यता को इतना अधिक मानते हैं। उनके पास यह विकल्प भी था कि मंच से खुल कर अपनी बात कहते चाहे वह आयोजक अथवा आयोजन की भावना के विरुद्ध जाती…..लेकिन काली बिल्ली तो रास्ता काट गयी थी सो उनका जमकर विरोध वाम-कट्टरपंथियों ने किया जिसके बाद मंगलेश डबराल ने अपनी उपस्थिति को एक चूक निरूपित कर दिया और गृह-शांति करवा ली। यह इस बात पर मुहर था कि हर कोई अपने अपने खेमे में बोलेगा और अपने अपने लोगों से ही ताली बजवायेगा; खबरदार जो एसी बहसों में विमुख विचारों से साथ संलिप्तता भी हुई। इसी की अगली कडी में अब दूध को फूंक फूंक कर पीने की कोशिश करने वाले मंगलेश डबराल ने रायपुर साहित्य महोत्सव को कोसने और उससे दूरी बनाने को शांति से नहीं अपितु पूरे प्रोपगेंडा के साथ अंजाम दिया। यह एक अच्छी बात हुई कि उनके सांस्कृतिक विपन्न वाले बयान ने तूल पकडा और फिर वे बगले झांकते ही नजर आये।
     

यह सिलसिला यहीं नहीं रुका। प्रसिद्ध वामपंथी लेखक प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी ने उजागर किया कि उन पर मंगलेश डबराल एवं अन्य वामपंथी साहित्यकार निरंतर दबाव डाल रहे थे कि वे इस आयोजन में नहीं जायें। यह स्थिति इतनी विकराल थी कि अभद्र भाषा में प्रोफेसर चतुर्वेदी को फेसबुक पर सार्वजनिक रूप से खरी खोटी सुनायी गयी। हिन्दी साहित्य के खेमे इतने ताकतवर हैं कि उनसे जुडा व्यक्ति अपने निर्णयों के लिये भी स्वतंत्र प्रतीत नहीं होता। किस लेखक यूनियन का व्यक्ति किस आयोजन में जायेगा ये पैमाने तय हैं तथा इसका उलंघन करने पर कतिपय पत्रिकायें छापना बंद कर सहती हैं या कि साहित्यिक खाप से आपको समूह बहिष्कार झेलना पड सकता है। इन सभी समस्याओं के बाद भी देश के अनेक बडे साहित्यकारों ने आयोजन में रायपुर आना स्वीकार किया और इसे सफल बनाने में उनका महति योगदान कहा जा सकता है। अपने सफल आयोजन के पश्चात रायपुर साहित्य महोत्सव यह बहस तो निश्चित रूप से खडी करता है कि खेमेबाजियाँ अब बहुत हो चुकीं। रचनाकार को उसकी पुस्तकों एवं कृतियों से पहचाना जाना चाहिये न कि इस आधार पर कि वह किन कार्यक्रमों में शामिल होता है और किन लोगों के साथ उठता बैठता है।
लाला जगदलपुरी को शानी और डॉ. धनंजय वर्मा जैसे साहित्यकारों की प्रेरणा के रूप में जाना जाता है। उन्होंने बस्तर नहीं छोडा इसी लिये गुमनाम जिये और गुमनाम इस दुनिया से चले गये। इसी के दृष्टिगत रायपुर साहित्य महोत्सव जैसे मंच छत्तीसगढ के साहित्यकार और मुख्यधारा के साहित्यकारों के बीच विमर्श का बहुत सार्थक माध्यम थे, इसकी सराहना होनी चाहिये। रायपुर साहित्य महोत्सव केवल इसलिये विरोध का कारण नहीं बन सकता कि इसके लिये सत्ता प्रतिष्ठान ने धन, स्थान और मंच उपलब्ध कराया अपितु देखा जाये तो केन्द्र मे भी इस समय भाजपा की ही सरकार है। देश भर में होने वाले पुस्तक मेले तथा साहित्यिक आयोजन सरकारी धन और विजन से ही आयोजित हो रहे हैं। मूल बात है कि आपमें अपनी बात कहने का गूदा कितना है? रायपुर में कई साहित्यकारों ने मंच से राज्य सरकार की नीतियों की क्रूरतम आलोचना की। नरेश सक्सेना जी जैसे वरिष्ठ सहित्यकारों ने अच्छे दिनपर जबरदस्त कटाक्ष किया। नक्सलवाद पर अनेक बहसों ने पक्ष विपक्ष पर उत्तेजना की सीमायें छुवीं और श्रोता भी कडुवे सवाल लिये उपस्थित थे।
कार्यक्रम के आरंभ में छत्तीसगढ के मुख्यमंत्री डॉ. रमण सिंह ने मंच पर बैठने के स्थान पर साहित्यकारों के बीच नीचे ही स्थान ग्रहण किया। वे कार्यक्रम में अधिक देर नहीं रुके और केवल उस पण्डाल में कुछ देर के लिये गये जहाँ बस्तर की भाषा-बोली पर आंचलिक साहित्यकार परिचर्चा कर रहे थे। समारोह का समापन डॉ. मृदुला सिन्हा के हाथों सम्पन्न हुआ जो स्वयं भी एक साहित्यकार हैं साथ ही गोवा राज्य की राज्यपाल हैं। इसके अतिरिक्त किसी अन्य तरह का राजनैतिक दखल पूरे कार्यक्रम के दौरान कहीं दिखाई नहीं पड़ा। एक दृष्टि इसी संदर्भ में कार्यक्रम की रूप रेखा पर भी डाली जा सकती है। कार्यक्रम में वे साहित्यकार भी थे जिन्हे वामपंथी तो वे भी थे जिन्हें दक्षिणपंथी माना जाता है; कार्यक्रम में इतिहासकार, फिल्मकार और लोककलाकार की भी बडी संख्या थी जिन्होंने विभिन्न विषयों पर अपनी बात रखी। विनोद कुमार शुक्ल, नरेश सक्सेना, लीलाधर मण्डलोई. डॉ. सियाराम शर्मा, रमणिका गुप्ता, डॉ. कमल किशोर गोयंका, डॉ. दया प्रकाश सिन्हा, नादिरा बब्बर, अशोक बाजपेयी, ऋषिकेश सुलभ, प्रयाग शुक्ल, पुरुषोत्तम आग्रवाल, मैत्रेयी पुष्पा, रणेन्द्र, एकांत श्रीवास्तव, अश्विनी कुमार पंकज, नंद किशोर आचार्य, प्रभाकर श्रोत्रिय, बवानी बशीर यासिर, मालती जोशी, क्षमा कौल, इस्माईल लहरी आदि एक लम्बी सूची है जो लेखक इस कार्यक्रम में उपस्थित हुए, उन्होंने विभिन्न बहसों में हिस्सा लिया और अपनी बात रखी।
कार्यक्रम में आयोजित विमर्शों के शीर्षक भी बहुत ही सार्थक और सराहनीय थे। तीन दिवसीय इस आयोजन का बडा हिस्सा छत्तीसगढ के साहित्य, कला, संस्कृति को समर्पित था। छत्तीसगढ का लोक साहित्य, बस्तर की बोलियाँ और साहित्य, छत्तीसगढ सिनेमा और लोकरंग, गुरतुर छत्तीसगढी, छत्तीसगढ का नयापरिवेश – सहूलियतें और चुनौतियाँ, छत्तीसगढ के आधुनिक साहित्य में नया भावबोध, छत्तीसगढ का रंगमंच, छत्तीसगढ की लोक कथाओं का कथा कथन, सरगुजा अंचल का लोक साहित्य, छत्तीसगढ का लोक संगीत, छत्तीसगढ की लोक कलायें, छत्तीसगढ का इतिहास, पुरातत्व एवं संस्कृति, हबीब तनवीर का रंगलोक, आदि ऐसे विषय थे जिन पर अच्छी बहस एवं प्रस्तुतिकरण हुए। सबसे बडी बात कि बस्तर और सरगुजा अंचल के अनेक साहित्यकार रायपुर साहित्य महोत्सव में मुखर दिखे एवं अपने मुद्दों और रचनाओं के साथ मंच पर उपस्थित हुए। आंचलिक साहित्यकारों ने अपनी उपेक्षा के दर्द को भी प्रस्तुत किया और अपनी उत्कृष्ट रचनाओं को सामने रख कर श्रोताओं को अभिभूत भी किया। बस्तर और सरगुजा अंचल की अनेक अनसुनी कहानियाँ आयोजन पटल पर प्रस्तुत हुई। बस्तर का धनकुल जैसा वाद्ययंत्र यहाँ प्रस्तुत किया गया था जिसकी प्रस्तुतियाँ बहुत चाव से देखी सुनी गयीं। छत्तीसगढी सिनेमा पर चर्चा बहुत ही रुचिकर थी तथा बस्तर और सरगुजा की लोकबोलियों में भी फिल्म बनाये जाने पर विचार सामने रखे गये।
चर्चायें उन पर भी हुई जिन्हे मुख्यधारा के विषय कहा जाता है। कुछ प्रमुख विषय थे - अंधेरे में अर्धसदी, बदलते परिवेश में व्यंग्य, प्रतिरोध का साहित्य, कविता की नयी ज़ुबान, सत्ता साहित्य और संस्कृति, साहित्य और कलाओं की आत्मनिर्भरता, भक्ति काव्य, समकालीन पाठ की तलाश, उपन्यास और नया जीवन यथार्थ, बदलते परिवेश में हिन्दी कहानी, साहित्य की बीसवी सदी, आभासी संसार में शब्द सर्जना, लोकतंत्र और साहित्य, क्या लुप्त हो जायेगा लोक, भारतीय भाषायें और भारतीयता, नये दौर में पत्रकारिता, साहित्य में लोकप्रियता की खोज, कथा-कथन, असहमतियों के बीच साहित्य, साहित्य में शुचिता, रचनाकार और उनके रचनात्मक अनुभव आदि। इसके साथ ही सिनेमा और टेलिविजन माध्यमों पर भी बात हुई तथा सुभाष घई, मनोज मिश्र, चन्द्रप्रकाश द्विवेदी आदि ने साहित्य और सिनेमा, आज का सिनेमा और गीत रचना, रंगमंच की चौनौतियाँ, बचपन – टीवी सिनेमा और किताबें आदि विषयों पर अपनी बात रखी। इस आयोजन के आकर्षणों में फोटोग्राफी पर कार्यशाला तथा कार्टूनिंग पर कार्यशाला भी थी।
रायपुर के पुरखौती मुक्तांगन में आयोजित साहित्य महोत्सव में कई अन्य बातें भी उल्लेखनीय थी। यहाँ आयोजित पुस्तक मेले में अनेक बडे छोटे प्रकाशक सम्मिलित हुए थे और सभी ने छत्तीसगढ के जिन रचनाकारों की पुस्तकें प्रकाशित की उन्हें प्रमुखता से अपने स्टॉलों पर रखा था। प्रकाशकों का अनुभव था कि न केवल मेले को अच्छा प्रतिसार मिला साथ की किताबों का विक्रय भी खूब हुआ। मुक्तांगन में स्थान स्थान पर छत्तीसगढी लोक रंग बिखेरे गये थे तथा लोक कलाकारों को अपनी प्रस्तुतियाँ देने के लिये आमंत्रित किया गया था। सभी विमर्श चार अलग अलग पण्डालों में समानांतर रूप से चल रहे थे किंतु सभी जगह श्रोताओं की बडी भीड देखी गयी। शहर से दूर आयोजन स्थल होने के बाद भी पुरखौती मुक्तांगन में लोगों का तांता बना रहा और सभी ने पहली बार प्रदेश में आयोजित हुए साहित्यिक कार्यक्रम में भरपूर सहभागिता की। यह भी एक अनूठी बात है कि दिल्ली में  आयोजित होने वाले साहित्यिक कार्यक्रम में आयोजकों को भीड जुटाने में पसीने आने लगते हैं वहीं रायपुर इस मामले में अधिक साहित्य सुधी सिद्ध हुआ है।
अंगूर खट्टे होने की कई शिकायतों के बीच भी रायपुर साहित्य महोत्सव की सफलता से यह संभावना बनी है कि आयोजन प्रतिवर्ष हों जिससे हिन्दी तथा छत्तीसगढी साहित्य पर बातचीत करने का एक स्थाई मंच उपलब्ध हो सके।
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2 comments:

  1. इस प्रकार के कार्यक्रम सभी राज्यों में आयोजित होने चाहिये। इससे न केवल साहित्यिक विचार विनिमय को निरंतरता प्राप्त होगी अपितु जनसामान्य में भी साहित्य को लेकर उत्सुकता बढ़ेगी। विभिन्न साहित्यिक गुटबंदियों को ध्वस्त करनें में भी ऐसे आयोजन उपयोगी होंगे।

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