भारतीय काव्य में छायावाद का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। द्विवेदी युगीन रचनाकारों ने यद्यपि काव्य को श्रंगार और भक्ति की सीमा से निकाल कर सामान्य जीवन के करीब लाने का महत्वपूर्ण कार्य किया परंतु इस क्रम में वे अत्यधिक वर्णनात्मक होते चले गये। यही कारण है कि उनकी कविता का कलापक्ष अपेक्षाकृत कमजोर रह गया। इस कमी को दूर करने का कार्य छायावाद ने किया और खड़ी बोली की कविता ब्रजभाषा या अवधी जैसी चिरस्थापित काव्यभाषाओं का सही मायने में स्थान ले सकी।

20वीं सदी के आरम्भ के जिन चार कवियों को छायावादी काव्यांदोलन के स्तंभ माना जाता है, उनमें जयशंकर प्रसाद का प्रथम स्थान है। 30 जनवरी, 1889 (माघ शुक्ल 10, संवत्‌ 1946 वि.) को काशी के सरायगोवर्धन मोहल्ले में प्रसाद जी का जन्म हुआ। इनके दादा श्री शिवरत्न साहू (सुंघनी साहू) व दादा श्री देवीप्रसाद साहू काशीनरेश के बाद पूरे काशी के सबसे सम्माननीय व्यक्तियों में थे। प्रसाद जी की प्रारंभिक शिक्षा अपने मोहल्ले की ही एक पाठशाला में हुई जहाँ इनके शिक्षक प्रसिद्ध कवि “रससिद्ध” थे। बाद में काशी मे क्वींस कालेज में इन्होंने कुछ समय पढ़ाई की तदुपरांत घर पर ही इनकी शिक्षा का व्यापक प्रबंध किया गया, जहाँ संस्कृत, हिंदी, उर्दू, तथा फारसी का अध्ययन इन्होंने किया। घर के वातावरण के कारण साहित्य से इनका लगाव बचपन से ही था। कहते हैं कि मात्र नौ वर्ष की अदस्था में “रससिद्ध” जी द्वारा दी समस्यापूर्ति के क्रम में इन्होंने उन्हें एक सवैया सुनाकर प्रसन्न कर दिया था।

अजय यादवरचनाकार परिचय:-



अजय यादव अंतर्जाल पर सक्रिय हैं तथा इनकी रचनायें कई प्रमुख अंतर्जाल पत्रिकाओं पर प्रकाशित हैं।
ये साहित्य शिल्पी के संचालक सदस्यों में हैं।

किशोरावस्था में ही एक-एक करके इनके पिता, माता और बड़े भाई के स्वर्गवास ने इन्हें मात्र सत्रह वर्ष की अवस्था में ही परिवार और व्यवसाय संभालने का गुरुकर्तव्यभार अपने ऊपर लेना पड़ा। लगभग इसी समय, इनकी पहली रचना “भारतेन्दु” में प्रकाशित हुई। तत्पश्चात पूरा जीवन ही व्यवसाय और साहित्य-साधना साथ-साथ चलते रहे। अपनों की असमय मृत्यु का यह सिलसिला यहीं नहीं रुका वरन एक-एक कर प्रसाद जी की दो पत्नियों का स्वर्गवास भी अल्पायु में ही हुआ। इन्हीं परिस्थितियों के चलते, कुछ तीर्थयात्राओं के अतिरिक्त अधिक यात्रा करने का अवसर इन्हें नहीं मिल सका। परंतु दुकान पर बैठे-बैठे ही आने-जाने वाले लोगों, साधु-सन्यासियों आदि के माध्यम से जीवन के विविध पहलुओं का विषद अध्ययन इन्होंने किया। ’गुण्डा’, ’दासी’, ’ममता’ जैसी कहानियों के पात्र शायद यहीं से जन्मे। साधुओं आदि से इन्होंने वेद, पुराण, इतिहास आदि का भी ग्यान भी प्राप्त किया जो इनके कई नाटक, कहानियों व काव्य-कृतियों का आधार बना। प्रसाद जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। इन्होंने एक साथ कविता, कहानी, नाटक, निबंध आदि कई विधाओं में उच्च कोटि का साहित्य-सृजन किया। कविताओं में जहाँ इनकी ’कामायनी’ खड़ी बोली का सर्वश्रेष्ठ और ’रामचरितमानस’ के बाद हिन्दी का दूसरा महानतम महाकाव्य मानी जाती है, वहीं नाटकों में “भारतेन्दु” के बाद प्रसाद जी के नाटकों ने हिन्दी में नाटक विधा को एक नई ऊँचाई और एक नया कलेवर प्रदान किया। भारतीय इतिहास और संस्कृति के उच्चतम बिन्दुओं को पहचान कर, उन्हें पूरी मार्मिकता से अभिव्यक्त करना, इनकी विशेषता थी। अपने नाटकों में काव्यत्वपूर्ण सरस गीतों का भी इन्होंने स्थान-स्थान पर प्रयोग किया है। इनमें से कई गीत तो नाटक से अलग भी अत्यंत प्रसिद्ध हुए हैं।

इनकी प्रमुख रचनायें प्राय: 1917 के बाद प्रकाशित हुईं। इनमें ’आँसू’, ’लहर’, ’झरना’ और कामायनी जैसी काव्य-कृतियाँ, ’छाया’, ’प्रतिध्वनि’, ’आंधी’ और ’इन्द्रजाल’ जैसे कहानी-संग्रह,”कंकाल’ और ’तितली’ जैसे उपन्यास तथा ’स्कन्दगुप्त’, ’चन्द्रगुप्त’ और ’ध्रुवस्वामिनी’ जैसे नाटक शामिल हैं। 1936 में ’कामायनी’ के लिये उन्हें ’मंगलाप्रसाद पारितोषिक’ से सम्मानित किया गया। 14 जनवरी, 1937 को मात्र 48 वर्ष की अल्पायु में क्षय रोग (टी०बी०) से हिन्दी साहित्य के इस महान रचनाकार की मृत्यु हो गई। उस वक़्त वे एक उपन्यास ’इरावती’ लिख रहे थे जो अपूर्ण रह जाने पर भी ऐतिहासिक उपन्यासों में सम्मान्य स्थान रखता है।

प्रसाद जी ने अपने नाटकों के माध्यम से भारतीय इतिहास के गौरवपूर्ण चरित्रों को सामने लाते रहे। ’चन्द्रगुप्त’ इनका ऐसा ही एक नाटक है। इस नाटक में भी इन्होंने अपने स्वाभावानुसार सुंदर गीतों का समावेश किया है। इन्हीं में से एक गीत ’हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती’ में वे बड़े सुंदर और ओजस्वी ढंग से भारत के वीरों का आह्वान करते हैं। गणतंत्र दिवस के इस सुअवसर पर आइये पढ़ें, यही गीत:

हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती
स्वयं प्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती
'अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़- प्रतिज्ञ सोच लो,
प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो, बढ़े चलो!'

असंख्य कीर्ति-रश्मियाँ विकीर्ण दिव्य दाह-सी
सपूत मातृभूमि के, रुको न शूर साहसी!
अराति सैन्य सिंधु में, सुवाड़वाग्नि से जलो,
प्रवीर हो, जयी बनो - बढ़े चलो, बढ़े चलो!
प्रसाद जी का ही एक अन्य गीत (’कामायनी’ के ’निर्वेद’ सर्ग से) आप नीचे लगाये गये प्लेयर पर सुन सकते हैं। सुप्रसिद्ध संगीतकार जयदेव जी के संगीतबद्ध इस गीत को गाया है आशा भोंसले जी ने:

’कामायनी’ प्रसाद जी की अन्यतम कृति है। प्राय: नौ वर्षों में रचित यह महाकाव्य, उनकी काव्य-साधना और दर्शन का सर्वोत्कृष्ट बिन्दु है। यह आज तक छायावाद और खड़ी बोली की काव्यगरिमा का सर्वोच्च उदाहरण है। मनु, श्रद्धा और इड़ा के मिथक के आधार पर रचे गये इस महाकाव्य में मिथकीय इतिहास, मनोविग्यान, आध्यात्म और दर्शन के रूपक एक साथ बुने हुए हैं जो कहीं भी एक दूसरे को काटते नहीं अपितु मिलकर एक ऐसा काव्यालोक उत्पन्न करते हैं जो विश्व-काव्य में भी अप्रतिम है। कामायनी के ’आशा’ सर्ग से एक संक्षिप्त अंश प्रस्तुत है:

ऊषा सुनहले तीर बरसती
जयलक्ष्मी-सी उदित हुई,
उधर पराजित काल रात्रि भी
जल में अतंर्निहित हुई।

वह विवर्ण मुख त्रस्त प्रकृति का
आज लगा हँसने फिर से,
वर्षा बीती, हुआ सृष्टि में
शरद-विकास नये सिर से।

नव कोमल आलोक बिखरता
हिम-संसृति पर भर अनुराग,
सित सरोज पर क्रीड़ा करता
जैसे मधुमय पिंग पराग।

धीरे-धीरे हिम-आच्छादन
हटने लगा धरातल से,
जगीं वनस्पतियाँ अलसाई
मुख धोती शीतल जल से।

नेत्र निमीलन करती मानो
प्रकृति प्रबुद्ध लगी होने,
जलधि लहरियों की अँगड़ाई
बार-बार जाती सोने।

सिंधुसेज पर धरा वधू अब
तनिक संकुचित बैठी-सी,
प्रलय निशा की हलचल स्मृति में
मान किये सी ऐठीं-सी।

देखा मनु ने वह अतिरंजित
विजन का नव एकांत,
जैसे कोलाहल सोया हो
हिम-शीतल-जड़ेता-सा श्रांत।

इंद्रनीलमणि महा चषक था
सोम-रहित उलटा लटका,
आज पवन मृदु साँस ले रहा
जैसे बीत गया खटका।
प्रसाद जी की और रचनाएं आप कविताकोश या गद्यकोश पर पढ़ सकते हैं। ’कामायनी’ पर आधारित कुछ प्रस्तुतियों को आप यहाँ देख भी सकते हैं:


प्रसाद जी पर आधारित एक डाक्यूमेन्ट्री आप यहाँ देख सकते हैं:

2 comments:

  1. जय शंकर प्रसाद जी के बारे मे जितना पढो और पढने का दिल करता है...

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