शहर की पहुँच से पचास किलोमीटर दूर बसा गाँव घाटमपुर। विधायक निधि से बना ग्राम्य संपर्क मार्ग। जो बारिश के संपर्क में आते ही स्खलन का शिकार हो जाता है। यह सड़क घाटमपुर के लिए सहूलियत तो नहीं बन पायी पर पंद्रह सालों से चुनावी मुद्दा ज़रूर बन रही है। उसी सड़क के अंतिम छोर पर हर सप्ताह ग्राम समाज की जमीन पर लगने वाली बुध बाजार। दायीं और रोहू मछलियों की दूकान उसके ठीक बगल में छुट्टन कसाई का बाड़ा,जहाँ बकरे और मुर्गे हलाल किये जा रहे थे जिनका खून बाल्टी में भरा जा रहा था,इसके पीछे छुट्टन का खून लेकर आज़ादी देने का कांसेप्ट था। दूसरी और खटिक सब्जियां बेच रहे थे। महंगाई गुलज़ार थी। आस पास की गावों के लोग मोल भाव करके एक आध रुपया छुडवा रहे थे। इन सबसे बेखबर ग्राम समाज का बछड़ा बाज़ार में कुलाचें भर रहा था। कभी भिन्डी पर मुंह मारता था तो कभी पालक पर। हरी सब्जी खाने को अरसे से तरस रहा बुद्धन उस बछड़े की किस्मत पर गर्व कर रहा था। मन मसोस कर आधा किलो आलू में अठन्नी छुडवाने के लिए बीस मिनट से बिंदादीन खटिक से भिड़ा पड़ा था।

पंकज प्रसूनरचनाकार परिचय:-



लेखक का संक्षिप्त परिचय................।

वहीं बाज़ार का एक पीछे वाला छोर भी था। जहाँ खुल्लम खुल्ला कच्ची शराब बेची जा रही थी, पक्के इरादों के साथ। महंगाई का यहाँ कोइ असर नहीं। बाल्टी और टीन के डिब्बों में भरा घरेलू किस्म का सोमरस। जिसे बेचने वाली घूंघट के अन्दर से झांकती सुहागिनें। घाटमपुर में आम और नीम तो कब के पार उतर गए। यह शराब ही है जिसने महुआ को आज तक जीवंत बनाए रखा है। यूँ तो यहाँ एक सरकारी मधुशाला भी है पर यहाँ ४५ का पउआ और ९० का अद्धा मिलता है। यह दूकान लाखैरों की उस बिरादरी का प्रतिनिधित्व करती है जो जो गरीबी रेखा से थोड़ा ऊपर हैं,पीले कार्ड वाले। ये मेज के ऊपर बैठ चने नमकीन के साथ दारू हलक से नीचे उतारते हैं। सफ़ेद कार्ड वाले पारंपरिक पियक्कड़ होते हैं। ये सरकारी दारू में विशवास नहीं करते बिलकुल सरकारी योजनाओं की तरह। यह गृह उद्योग के तहत विशुद्ध देशी विधि से निर्मित कच्ची शराब का एक लोटा पीकर लोट जाते हैं। खडंजे के किनारे, खेतों की मेढ, सूख चुकी नहर की पुलिया इनके पसंदीदा विश्राम स्थल होते है। हाँ, जो लोग राशन कार्ड बनवाते हैं ईश्वर उनको ऐसी बरक्कत देता है कि घाटमपुर अड्डे में आने की नौबत नहीं आती। उनका ठिकाना तो घाटमपुर से दस किलोमीटर दूर स्थित लालगंज क़स्बे का बियर बार होता है।
घाटमपुर बाज़ार से सटी हुयी अमरु पंसारी की मढैया। जहाँ आस–पास के गावो के ठेलुहे दो चार गिलास गटकाकर एक दुसरे की माँ बहनों को खुले आम न्योता देते पाए जाते हैं। जातिवाचक और सम्बन्ध सूचक इन गालियों की भी अपनी एक मिठास होती है और कडवाहट भी। बस ख़याल ऊंच-नीच का रखना पड़ता है।
दारू की दुर्गन्ध और बीडी के उड़ते धुएं के छल्लों के बीच गाडी के हार्न की आवाज आती है। सामने एक बोलेरो आकर रुकती है जिसमें आगे की ड्राइवर सीट के बगल बैठे चार लोग। और पीछे पूरी गाडी खाली। इसके पीछे सामान बिरादरी और सामान प्रभुत्व की भावना है। ‘हम उनसे कमजोर हैं का जो पीछे बैठेंगे’ गाडी अब भी हार्न बजा रही थी, हार्न उनकी सम्पन्नता और शान का सूचक होता है। जिस हार्न की जितनी आवाज समझो वह उतना संपन्न। और यह हार्न तब तक बजाते हैं जब तक की कोइ विपन्न आकर गाडी का गेट न खोले। ये बबलू पांडे की गाडी थी। अमरु पंसारी जान बूझकर गाडी के पास नहीं जा रहा था। अमरु तो गाली खाने का आदी था ही वह यह समझ गया की जरूर ससुरे की गाडी फंसी है। तभी वह भागता हुआ बाहर आता है और तपाक से गाडी का गेट खोलता है,
“अरे साहब, देर के लिए माफी, भाग जागे हमरी मढैया के जउन आप पधारे, बताओ मालिक का सेवा करी आपके खातिर।’
“परधानी का इलेक्शन आने वाला है, और इस बार सामान्य सीट आने वाली नहीं। हरिजन सीट आ रही है। कुछ सोचा है। पिछली बार तो तुम खा के डकार गए थे पांच हज़ार और जितवा दिए थे रज्जन सिंह को।”
“पर मालिक ई काहे भूली जात हव की रज्जन सिंह दस दस हज़ार बांटे रहय। ई महंगाई के दौर मा वोटर के दाम बढ़ी गें हैं।"
“साले,दाम नहीं भाव बढ़ गए हैं इन वोटरों के।”
“हम तो आपके गुलाम हैं, मदद के लिए तैयार हैं मालिक, लेकिन हरिजन सीट है तो आप नाहक परेशान हो रहे हैं।“ अमरु उनको सिगरेट पीने को देता है और खुद बीडी का सुट्टा लगाता है।
“परेशानी की बात तो है ही। मैं मद्दे पासी को चुनाव में खडा करना चाहता हूँ।”
“अच्छा, जिसकी तीन पीढ़ियाँ आपका कर्जा उतारते उतारते संसार के पार उतर चुकी हैं।”
“साले, कर्जा लेकर दारू पियेंगे तो होगा क्या, बाप मर जाता है तो उसके गम में लड़का शराबी हो जाता है। ये चार पैसे कमाने के लिए जालंधर में जाकर भट्ठा झोंकते हैं। साले जन्मजात टीबी के मरीज होते हैं, रही सही कसर ये भट्ठा पूरी कर देता है।”
“पुत्तन जरा खैनी बना,” बबलू पांडे और उनके दोनों पटीदार होठों और दाँतों के बीच की जगह को भरने की कोशिश करते हैं।
इधर अमरु दूसरी बीडी सुलगा चुका होता है।
“हाँ, तो मालिक दिक्कत का है, मद्दे पासी तो आप ही की जमीन पर हगता मूतता है, आप जब कहेंगे खडा हो जाएगा, जब कहेंगे बैठ जाएगा।”
“दिक्कत मद्दे पासी नहीं बल्कि दिक्कत तो रघ्घू चमार है, सुना है उसने रज्जन सिंह का सारा कर्ज उतार दिया है। आजकल साले के पाँव जमीन पर नहीं पड़ते। इतना दरूहल है फिर भी बिटिया को पढ़ा डाला और सुना है अब वो ट्यूशन भी पढ़ाने लगी है।”
“हाँ साहेब। ऊ लालगंज मा ट्यूशन पढ़ाती है, और उसने अपनी अम्मा के साथ मिलकर सारा कर्जा उतार दिया है। बड़ी चकड़ है उनकी अम्मा फूलमतिया, यहीं दारू बेच रही होगी।”
“माँ बाप दरूहल और बिटिया संस्कारी, वाह रे पंसारी। सुना है वो परधानी के लिए हाथ पाँव मार रहा है। और काफी जनाधार इकठ्ठा कर लिया है।”
“हाँ कुछ तो वहिके बिटिया के आशिक हैं और कुछ वहिके मेहरारू के।”
“और कुछ वहिके मेहरारू के दारू के”
पुत्तन बीच में बोलता है बब्लू और राघव ताली पीट पीट कर ठहाके लगाते हैं, अमरु भी हँसता है पर कट्टी साधकर।
“अबे अमरु, सुना है कि रघ्घू और परधान रज्जन पांडे में छत्तीस का आंकड़ा है।”
“अरे साहब, जब गरीब बहत्तर कमाए लागी तो अमीरन से छत्तीस का आंकड़ा तो होइबे करी। और ऊपर से रज्जन सिंह का सारा कर्जा उतार दिया सो अलग। वहिके बिटिया हिसाब मा अव्वल है, रज्जन ब्याज मा ज्यादा बेईमानी नहीं कर पाया। फिर भी भरा बैठा है रज्जन के खिलाफ। और चुनाव मा रज्जन के कंडीडेट पियारे लोध के खिलाफ ताल ठोंकेक तैयारी मा हय।”
“सुन पंसारी, कुछ ऐसा कर कि रज्जन सिंह और रघ्घू चमार दोनों का आत्मविश्वास कमजोर हो।”
“वो तो ठीक है सरकार, लेकिन पहिले कुछ हमरे झोली मा डाल दीजिये जहिसे हमार आतम विशवास मजबूत होवे।” अमरु बबलू पांडे का पांव दबाते हुए बोला।
“उतर आया न कमीनापन्थी पर। ये ले हज़ार रुपये और काम पर लग जा।”
अमरु नोट पे टार्च मारता है, गांधी जी और आरबीआई साफ़ साफ़ नज़र आते हैं, फिर बबलू पांडे के पाँव पकड़ते हुए बोलता है, ”वो क्या है न साहिब, काम भले ही गन्दा हो पर गांधी साफ़ सुथरे दिखने चाहिए नोट में।“
शाम ढल चुकी थी, बाज़ार लगभग ख़त्म हो चुकी थी। ग्राम समाज का सांड और कुछ बकरियां गोभी, मूली, सड़े टमाटर के सफाई में जुटे गए थे। रघ्घू कसाई की दूकान के पास कुत्तों में हड्डियाँ नोचने की होड़ लग चुकी थी, कुछ कमजोर किस्म के कुत्ते छलकी हुयी शराब को सूंघ कर बलशाली कुत्तों के ऊपर भोंक रहे थे। बबलू पांडे की बोलेरो जा चुकी थी। अमरु ने सारे ठेलुहों से दस दस रुपये लेकर उनको चलता कर दिया था। वे सब खडंजे पर एक दुसरे को गिरते गिराते और गरियाते हुए अपने घरों की ओर जा रहे थे। अमरु की मडैया में अब जमुनिया आ चुकी थी, और शराब से भी कम कीमत अदा कर अमरु शबाब लूटने में मस्त हो गया।

2.

दोपहर का वक्त। रघ्घू चमार का घर।
पीछे की ओर कच्चा और आगे की ओर एक कमरा पक्की ईंटों से बना हुआ, जिसमें रघ्घू चिलम सुलगा रहा था। पत्नी फूलमतिया चौका पानी करके भट्टी में शराब पका रही थी। बगल में दूध उबल रहा था। बेटी कमला लालगंज गयी हुयी थी ट्यूशन पढ़ाने।
अमरु पंसारी साइकिल से झोला उतार कर रघ्घू के घर में प्रवेश करता है।
“आओ पंसारी, कइसन आना हुआ, चिलम मारोगे”
“चिलम छोड़ रघ्घू, तुम्हारी कमजोरी लेकर आया हूँ, मनोरंजन का पक्का इंतजाम”
“ये ले अपनी लालपरी”, अमरु झोले से व्हिस्की का खम्भा निकालता है।
“जियो पंसारी, बड़े दिनन के बाद ई अंगरेजी मिली है। ई बिटिया महतारी मिलकर हमार देशी छोड्वाई दिहिन, चिलम से काम चल नहीं पाता।”
अरे, फूलमतिया, तनी दुई गिलास और पियाज काटी के लावा तो, आज पंसारी प्यार लेके आया है”
“रघ्घू, प्यार के साथ पूरा प्लान लेके आया हूँ, तुमको परधानी जितवानी है इस बार।”
“हाँ, तुम्हारी ई विदेशी दारू का कर्ज तभी उतारूंगा, देशी घपले करके।”
फूलमतिया गिलास और प्याज देकर पंसारी को घूरते हुए चली जाती है, रघ्घू पैग तैयार करता है।
“रघ्घू, तुमको जीतने के लिए पंडित और ठाकुर बिरादरी का वोट भी चाहिए होगा, रज्जन सिंह तो पियारे लोध को खडा कर रहा है, लेकिन बबलू पांडे तुम्हारा साथ देना चाहता है,”
“काहे का, आखिर बबलू पांडे भी तो अपना हरिजन कंडीडेट खड़ा करी।” पहला पैग एक झटके में खाली कर देता है रघ्घू।
“पिछली बार का हारा प्रत्याशी है वो, उसको मालूम है तुम्हारे वोट बैंक के बारे मा। सारी चमार बिरादरी तो तुम्हारे साथ है, कुछ पंडित बिरादरी का वोट मिल गया तो तुम निकल जाओगे।”
इस बीच पंसारी एक और पैग रघ्घू को देता है।
“देख रघ्घू, रज्जन तेरी राह का रोड़ा है, इसने तुझसे ब्याज भी खूब ऐंठा हैं, इसके लड़के कई बार तेरी लडकी को भी छेड़ भी चुके हैं। और तू हाथ पे हाथ धरे बैठा है, अब तो थानेदार सी पी कुरील भी तेरी बिरादरी का है। तुझे अपनी बिरादरी में हीरो बनना हैं तो रज्जन सिंह के सामने सर उठाकर चलना सीखना पड़ेगा।”
रघ्घू, एक पैग और खींच जाता है। और एक पूरा प्याज चबा जाता है।
“जी तो करत है कि इसी पियाज के तरह चबा जाई रज्जनवा का।”
एक पैग और ले रघ्घू, बबलू पांडे तुम्हारे साथ है, आज ही रज्जन सिंह के घर जाकर उनको गरिया के आओ, इससे गाँव में तुम्हारा नाम हो जाएगा”
तभी फूलमतिया निकल के बाहर आ गयी, ”वाह! पंसारी मेहरबान तो रघ्घू पहलवान।’ कहीं नहीं जावेक है तुमका, समझे”
रघ्घू तैश में आ गया, ”तू रोकेगी हमका, हम होने वाले परधान हैं, फैसले करेंगे गाँव के, ई रज्जनवा के खिलाफ बड़ी आग है दिल मा, आज निकल जाने दे,”
दम नहीं है देहीं मा, आग निकलेक बजाय हवा निकल जाई तो पता लागी।
रघ्घू फूलमतिया को धक्का देते हुए निकल पड़ता है

3.

रघ्घू रज्जन के घर के सामने अपनी लहराती आवाज से रज्जन के परिवार के सदस्यों को गालियों के फिट कर रहा था। और सफल भी हो रहा था। यूँ तो उसके पांव भी लहर खा रहे थे। पर मुंह की बात ही कुछ और थी। पंसारी तो अपना काम करके निकल चुका था। रघ्घू जुटा था, अवधी जब क्रोधित होती है तो वो खडी बोली का रूप ले लेती है -
“निकल साले, बहुत आग मूती है तूने, मन से लूटा है मनरेगा को, विकलांग पेंशन खा गया, साठ साल से पहले ही लील गया सारी वृद्धा पेंशन। भूतन को रोजगार गारंटी दे रहा है और जो लोग ज़िंदा है उनको ब्याज पर पैसा। निकल चोरकट, हेड मास्टर के साथ मिलकर सारा मिड डे मील खा के पचा गया। और डकार तक नहीं ली मोटे ने। हमको कालोनी नहीं दिलवा पाया और अपनी तीसरी कोठी बनवा रहा है। हम करें इसके घर में मजूरी और ये बनवाये मंजिलें। निकल। आज सारा हिसाब होगा”।
प्रधान के तीनों लड़के घर के सामने मजमा जुटने का इंतज़ार कर रहे थे। मजमा उनकी सामाजिक नाक का प्रतीक होता है। आठ दस लोग जब इकठ्ठा हो गए तो तीनों लाठी लेकर निकले फिर लाठी रखकर जूतों से उसको पीटने लगते हैं।
रघ्घू चिल्ला रहा होता है, ”मार लो सालों, चप्पलों से पीटूँगा तुमको, परधान बन जाने दो एक बार”
वो लोग तब तक जूतमपैजार करते हैं जब तक रघ्घू का मुंह बंद नहीं हो जाता।
तब तक पीछे से फूलमतिया और उसकी बेटी कमला दौडती हुयी आती हैं, फूलमतिया फफक रही थी, ”हाय रे, मार डाला मेरे प्यारे रघ्घू को, मैं छोडूंगी नहीं तुम लोगन का, सारी हवा निकाल दी रघ्घू की, पेट पिचक गवा है, पापड बनी गें सैयां हमार”
तभी रघ्घू चिल्लाता है, ”अरे हम ज़िंदा हन, दारू ज्यादा हो गयी इसलिए लुढ़क गए हैं। चलो लादो हमका रेड़ी पर, लइ चलव थाने का”
लालगंज थाने में दरोगा सी पी कुरील के सामने रघ्घू जोर जोर से कराह रहा था, और उससे भी तेज फूलमतिया रोये जा रही थी। अलाप और विलाप की स्वरलहरियों से थाना गुंजायमान हो उठा था। पति की चोट और पत्नी का प्रेम दोनों की मात्रा इतनी ज्यादा नहीं थी जितनी की कराह और रुदन। यह मामले को गंभीर बनाने का प्रयास था।
दरोगा कुरील से फूलमतिया ऍफ़ आई आर लिखने को कह रही थी, ”साहब, आप तो हमरी बिरादरी के हैं, देखो कितने जूते मारे हैं रज्जन के हरामजादों ने, शरीर पिचक गवा है”
दरोगा कुरील बोले, ”शरीर पर जूते पड़ते हैं तो शरीर फूलता है, पिचकता नहीं। मैं ऍफ़आईआर लिख कार्यवाही भी करता लेकिन यह खुद नशे की हालत में है। इसलिए घर जाओ, और रघ्घू को समझाओ कि शराब पीना बंद कर दे। तुम तो बेचना बंद नहीं कर सकती हो।”
“बुद्धी खराब होई गे रहय हमार जउन यहिका देशी पिए से मना किया, अंगरेजी दारू ने तो पिटवा ही दिया”

4.

अगले दिन की सुबह। फूलमतिया के मन में प्रतिशोध की भावना भड़क चुकी थी। अमरु पंसारी के घर में घुसते ही वह गालियों से उनका स्वागत करती है। पर रघ्घू यह कहते हुए पत्नी को शांत कराता है कि पंसारी ने हमारे स्वाभिमान को जगाया है, वर्ना कभी सोचा न था कि उसको माँ बहन की गालियाँ दूंगा।
पंसारी के आते ही पीछे से बब्लू पांडे की बोलेरो आती है। आते ही वो रघ्घू का हाल पूछता है और एक शीशी फूलमतिया को देते हुए बोलता है, “ये हल्दी का तेल है, जमके मालिश करो रघ्घू की।”
“साहिब, कउनो ज़माना मा ई बहुत तेल लगावत रहा रज्जनवा के, आज देखो सब तेल निकाल डालिस”
“लेकिन इसने जो बहादुरी दिखाई है उसकी मैं तारीफ़ करता हूँ”। बब्लू पांडे ने रघ्घू की पीठ थपथपाई। रघ्घू को दर्द तो हुआ पर बहादुरी के चलते कराह नहीं सका।
पंसारी बीच में टोकता है, “देखो साहेब, ई बात तो पक्की है कि रघ्घू ने रज्जन को गरिया के अपने समाज में नाम तो कमा लिया है, पर पीटे जाने से साख पर बट्टा भी लगा है, रज्जन सिंह के रसूख मा कोइ ख़ास कमी नहीं आयी है”
“बात तो सही कही पंसारी ने, एक पिटे हुए प्रत्याशी को कोई पंडित वोट देना पसंद नहीं करेगा”।
फूलमतिया यह कहते हुए उन्हें आश्वस्त करती है कि वो रज्जन सिंह के लड़कों को पिटवा के रहेगी।

5.

शाम के 7 बजे का वक्त। लालगंज से घाटमपुर के बीच की सूनसान सड़क। जहाँ एक पुलिया की ओट में फूलमतिया अपनी साड़ी और ब्लाउज कमला से फड़वा रही थी। बेटी बार बार मना कर रही थी पर फूलमतिया उसे डपट दे रही थी, “अगर इज्जत गंवाने का नाटक करने से तेरे बाप की इज्जत वापस आ जाए तो बेजा क्या है” थोड़ी देर बाद उसने कमला की समीज भी फाड़ डाली थी। कमला रो रही थी। पर बेबस थी।
तभी फूलमतिया का मोबाइल घनघनाया और उधर से सन्देश आया कि प्रधान के लड़के लालगंज बियर बार से शराब पीकर दो मोटर साइकिलों से निकल चुके हैं। अब फूलमतिया का मिशन छेड़खानी शुरू होने वाला था।
सामने से दो मोटर साइकिलें आती दिखाई पडीं। सड़क पर कमला साइकिल की चेन चढाने लगी। दोनों ने मोटर साइकिलें रोक दीं-
“अरे ये तो कमला है, रघ्घे की बिटीवा। ज्यादा ट्यूशन मिलने लगे का इसको”
कमला चौंकने का नाटक करती है।
उनमें से एक ने एक हाथ चैन और एक हाथ कमला के पीठ पर लगाते हुए बोला, “दारू चढ़ गयी पर निगोड़ी चैन न चढ़ पायी अभी तक।”
तभी फूलमतिया मैदान में आती है और जोर जोर से चिल्लाने लगती है, ”बचाओ, बचाओ, रज्जन के लड़के हमारी इज्जत से खेल रहे हैं”
वो तीनों हैरान हो जाते हैं फिर बाइक पर चढ़कर भागते हैं तो आगे धर लिए जाए हैं। यह फूलमतिया की इन्फार्मेशन टेक्नोलाजी का कमाल था।
लालगंज का थाना। दरोगा सी पी कुरील तीनों पर बेंत बरसा रहा था। उनके गाल फूल आये थे। यह देख फूलमतिया फूले नहीं समा रही थी।
“हरामियों, कितना गिर गए, बेटी तो बेटी माँ को भी नहीं छोड़ा, अच्छा हुआ कि मैं मौक़ा-ए-वारदात पर पहुँच गया” अमूमन ऐसा होता नहीं, पर यह अजूबा कैसा हुआ यह जानने के लिए फूलमतिया के मोबाइल की आउट गोइंग काल देखनी पड़ेगी।
रज्जन सिंह लाव लश्कर के साथ थाने पहुंचा। और दरोगा को अर्दब में लेने की कोशिश करने लगा।
दरोगा डंडा हिलाते हुए बोले, “शराब पीकर गाडी चलाना, बलात्कार की कोशिश, दलित उत्पीडन तमाम केस बना कर अन्दर कर दूंगा तीनों को। जमानत को तरस जाओगे प्रधान।”
रज्जन सिंह समझ गए थे की ऐसे बात बनने वाली नहीं है, तभी दरोगा ने उन्हें अपने केबिन में चलने की ओर इशारा किया।
उस केबिन में वही हो रहा था जिसकी हम पुलिस से अपेक्षा करते हैं। वो सुलह कराने को राजी हो गया, पर लेन देन का मामला जम नहीं पा रहा था।
“देखो प्रधान, बात साफ़ है। मैं ठहरा कुरील, आपकी जाति का होता तो कुछ कम ज्यादा भी कर लेता, फिर आप से नहीं लूंगा तो अपनी बिरादरी का भला कैसे कर पाउँगा?”
बात बीस हज़ार में फाइनल हो गयी। पांच हज़ार फूलमतिया को देकर और 15 अपनी जेब के हवाले कर पीड़ित और पुलिस दोनों का भला कर दिया था दरोगा साब ने।
फूलमतिया ने कमला की इज्जत ताख पर रखकर रघ्घू के हाथों में पांच हज़ार रुपये रख दिए थे। रज्जन सिंह के बेटों की पिटाई से रघ्घू की हड्डियों का दर्द लगभग ख़त्म हो चुका था। आखिर उसने अपने जीवन में एक और उपलब्धि प्राप्त कर ली थी। बेटी की शादी हो न हो, पर उसे चुनाव में जीत नज़र आ रही थी।

6.

करीब दो महीने बाद। लालगंज में कमला को ट्यूशन मिलना बंद हो चुके थे। फूलमतिया का दारू का धंधा भी चौपट हो गया। दरोगा कुरील के ट्रांसफर होते ही रज्जन सिंह ने उसकी भट्टी पर छापा डलवा दिया था। रज्जन सिंह के बदनाम बेटे अब कुख्यात हो चुके थे। घटते जनाधार के बीच वह पियारे लोध को उतारने के जोड़-तोड़ में लगा था।
इधर अमरु पंसारी की मढैया में बबलू पांडे, पुत्तन, राघव जाम पर जाम चढ़ाये जा रहे थे। लालगंज से बियर के केन मंगाए गए थे। जोरदार अट्टहास के बीच बियर और मुर्गे का कार्यक्रम चल रहा था। सफलता और दारू ने मैत्री और समानता का ऐसा वातावरण बना दिया था कि अमरु को बबलू पांडे खुद अपने हाथों से पैग बना के पिला रहा था।
“वाह अमरु, मान गए गुरु, रज्जन सिंह और रघ्घू चमार दोनों की साख गिरा दी तूने, कितना गिरा हुआ कमीना है तू। सबकी छवि खराब करके मुझे पाक साफ़ कर दिया”।
“साहिब, अब आप जइसन बड़े लोगन के साथ रह के थोडा जमादारी हम भी सीख गए हैं न।”
“अब तो अपना मजदूर मद्दे पासी तो जीता हुआ समझो”
एक नशेमन शाम के साथ ही पंसारी की मढैया खाली हो चुकी थी। और जमुनिया उसको बाहों में समा चुकी थी।

7.

अगली सुबह घाटमपुर की राजनीति में जलजला लेकर आयी। अफरा-तफरी का माहौल। हर खेत हर चौबारे पर चर्चाओं का माहौल गर्म हो रहा था। कुछ खिल्लीबाज खैनी मसल मसल के चटखारे ले रहे थे। सार्वजनिक अखबार की इकलौती दूकान ढनगू पान वाले के यहाँ कुछ सभ्य किस्म के लुच्चे पान और पुड़िया का रसास्वादन करते हुए गैर शाकाहारी जुमलों से तंज पर तंज मार रहे थे। रज्जन सिंह और बबलू पांडे हाथ पर हाथ धरे बैठे थे। किसी के घर में चुल्हा नहीं जल रहा था। जब दर्द का सामान वितरण होता है तो दो दुश्मन भी दोस्ताना रवैया अपनाने लगते हैं। इन दोनों के दुःख से रघ्घू चमार खुश था। उसने चिलम में तम्बाकू की मात्रा बढ़ा दी थी। फूलमतिया का जियरा बल्लियों उछल रहा था।
असल में आज सुबह के अखबार में खबर आयी थी कि घाटमपुर की सीट हरिजन के बजाय अन्य पिछड़ी जाति के लिए आरक्षित कर दी गयी थी।
उधर अमरु अपनी मढैया में जमुनिया को बाँहों में लेकर बोल रहा था, “अब तुम बनोगी परधानिन और मैं परधान अमरु पंसारी।“

2 comments:

  1. भारतीय राजनीति में जातिवाद और भ्रष्टाचार किस तरह हावी है, उसे पूरी शिद्दत से सामने लाती इस कहानी के लिए प्रसून जी को बधाई! आशा है कि आगे भी इसी तरह की रचनाएं आपसे पढ़ने को मिलती रहेंगीं।

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