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बस्तर अंचल में प्रचलित मेले मड़ईयाँ वस्तुत: यहाँ की जीवन रेखायें हैं। इन के माध्यम से समाजशास्त्र को स्वांस मिलती है, इतिहास मुस्कुरा उठता है और अर्थशास्त्र अपनी भूमिका अदा करता है। पूजा पाठ, अर्चना अनुष्ठान, टोना टोटका, झाड़ फूंक के साथ साथ देवी देवता से मान मनौव्वल भी, मेले नाच और नोकझोंक का लोक रंग भी और बाजार में होने वाली बिकवालियाँ भी, यह सब कुछ मिला कर बस्तर के मेले मड़ई का चित्र खींचा जा सकता है। आमतौर पर फसल कटाई के पश्चात बस्तर में मेले मड़ई का सिलसिला आरम्भ हो जाता है। प्रतिवर्ष हजारो लोग अपने देवी देवता के साथ पूर्व निर्धारित मड़ई स्थल पर इकट्ठा होते हैं। मड़ई के आयोजन स्थल तो निश्चित हैं किंतु आयोजन की तिथि क्षेत्र के माझी आदि तय करते हैं। बस्तर में मड़ई का आयोजन दिसम्बर माह से आरम्भ हो कर अप्रैल तक चलता रहता है। पूरे सम्भाग में परम्परा के अनुसार चालीस स्थानों पर इसका श्रंखलाबद्ध आयोजन होता है। अधिकांश स्थानों पर मड़ई जनवरी और फरवरी माह में भरती है जबकि कुछ दिसम्बर और फरवरी में। धनौरा की मड़ई अप्रैल माह में लगती है।

Rajeev Ranjan Prasadरचनाकार परिचय:-


सुप्रसिद्ध लेखक राजीव रंजन प्रसाद का जन्म बिहार के सुल्तानगंज में २७.०५.१९७२ में हुआ, किन्तु उनका बचपन व उनकी प्रारंभिक शिक्षा छत्तीसगढ़ राज्य के जिला बस्तर (बचेली-दंतेवाडा) में हुई। आप सूदूर संवेदन तकनीक में बरकतुल्ला विश्वविद्यालय भोपाल से एम. टेक हैं।
विद्यालय के दिनों में ही आपनें एक पत्रिका "प्रतिध्वनि" का संपादन भी किया। ईप्टा से जुड कर उनकी नाटक के क्षेत्र में रुचि बढी और नाटक लेखन व निर्देशन उनके स्नातक काल से ही अभिरुचि व जीवन का हिस्सा बने। आकाशवाणी जगदलपुर से नियमित उनकी कवितायें प्रसारित होती रही थी तथा वे समय-समय पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हुईं। 

उनकी अब तक प्रकाशित पुस्तकों "आमचो बस्तर", "मौन मगध में", "ढोलकल", "बस्तर के जननायक", "तू मछली को नहीं जानती" आदि को पाठकों का अपार स्नेह प्राप्त हुआ है। बस्तर पर आधारित आपकी कृति "बस्तरनामा" अभी हाल ही में प्रकाशित हुई है। आपकी "मौन मगध में" के लिये आपको महामहिम राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय राजभाषा पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है

वर्तमान में आप सरकारी उपक्रम "राष्ट्रीय जलविद्युत निगम" में कार्यरत हैं। आप साहित्य शिल्पी के संचालक सदस्यों में हैं।
एक समय था जब इन मड़ईयों के बहाने पूरी रियासत अलग अलग निर्धारित स्थलों में एकत्रित होती थी और उत्सव नृत्य के बहाने कुटीर उद्योग पुष्पित-पल्लवित होता रहा। लाल-आतंकवाद के दौर में बस्तर क्षेत्र की उत्सवधर्मिता को ग्रहण सा लगने लगा है। साथ ही साथ ट्रेड-फेयरों में सपरिवार घूमने इतराने वाले हमारे सभ्य और तथाकथित बौद्धिजीविक समाज को भी प्रगतिशीलता के नाम पर त्यौहारों और उत्सवधर्मिता पर ऐतराज हो चला है। वस्तुत: समाजशास्त्र और इतिहास का अवगुण्ठन न समझ पाने वाले लोग अपनी अपनी विचारधाराओं के चश्मे से किसानोंऔर ग्रामीणोंके त्यौहारों पर् स्वयं की सोच का मौखौटा पहन पहन कर विवेचना करते हैं।

बस्तर सम्भाग में चालीस स्थानों पर श्रंखलाबद्ध रूप मे मड़ई आयोजित होती है जिनमे प्रमुख स्थल: - भानुप्रतापपुर क्षेत्र में सेलेगाँव, हतकरा, भोदिया, सम्बलपुर, हतकोबेडा, भानुप्रतापपुर, बरहेड़ी, कोडेकुर्स, बुरगूकोण्डल और असुलरवार; कांकेर क्षेत्र में गोविन्दपुर, कुरमा, हलबा, चरामा, हरदुल, डोकला, पूरी, पतेगाँव, सलहेटोला, उमरधा, देवरी, पीथपाल, कांकेर, सरागा, पतोड़, सरवन्दी, नारयपुर, नवागाँव और लखनपुरी; नारायणपुर क्षेत्र में अंतागढ़ और परतापुर; कोण्डागाँव क्षेत्र में कोण्डागाँव, फरसगाँव, केसकाल और विश्रामपुरी; जगदलपुर क्षेत्र में कुम्हरावण्ड, चितरकोट, बस्तर, चपका और देवडा; इसके अतिरिक्तदंतेवाड़ा में तथा बीजापुर क्षेत्र के मद्देड़ में मड़ई प्रमुखता से आयोजित की जाती है। संभाग में कोण्टा ही एकमात्र ऐसा क्षेत्र है जहाँ मड़ई आयोजित नहीं की जाती है।

गाँव-गाँव से लोग अपने परिजनों और देवी-देवताओं के साथ मड़ई में पहुँचते हैं जहाँ पूजा-प्रार्थना के बाद वहाँ सजे बाजार मे खरीददारी की जाती है। मड़ई मे इकट्ठे हुए हैं तो मित्रों और रिश्तेदारों से एक ही जगह मिलने-बतियाने का भी यह अवसर है और उल्लास जताने, दु:ख तकलीफ बाँटने तथा नाचने गाने का भी यह समय है। ग्रामीण कुटीर उद्योग जो बहुतायत नष्ट हो गये आज भी मड़ईयों के भरोसे ही साँसे ले रहे हैं जहाँ स्थानीय बढ़ई, लुहार, कुम्हार, बुनकर, मूर्तिकार, बाँस का काम करने वाले दस्ताकार आदि अपने अपने उत्पादों के साथ एकत्रित होते हैं और उनकी वर्ष भर की अपनी जीविका के लिये व्यवस्था करते हैं। जनजातीय समाज की उत्सवधर्मिता के पीछे चाहे जो भी धार्मिक कारण हों कितु इनका आयोजन न केवल सामाजिक समरस्ता को बढ़ाता है साथ ही साथ स्थानीय उत्पादों से ले कर क्षेत्र की कला को यह बाजार और प्रचार प्रदान करता है।

इसी कड़ी में फागुन मड़ई की बात करना उचित है। बस्तर की आराध्यदेवी माँ दंतेश्वरी के सम्मान में मड़ई फागुन शुक्ल की सष्ठी से ले कर चौदस तक आयोजित की जाती है। पहले दिन कलश की स्थापना होती है। दूसरे दिन खोर-खूंदनी होती है जिसमे माई जी की डोली निकलती है; अष्टमी को लोकगीत और लोक नृत्य का मजमा जमता है जो देखते ही बनता है। इसी तरह नृत्य और गीत के आयोजन पूरे लोक-उत्साह के साथ दशमी, एकादशी तथा द्वादशी तिथियों में भी चलते हैं। कई नृत्य तो खरगोश, कोतरी, चीतल, गौर आदि के शिकार पर आधारित आखेट नृत्य जैसेलमहामार, चीतलमार, कोडरीमार आदि होते हैं। इसी क्रम में मिट्टी के प्रति कृतज्ञता दर्शाने और उसके प्रति नतमस्तर होने का त्यौहार माटी तिहार भी मनाये जाने की प्रथा है। त्रयोदशी को मड़ई अपने सम्पूर्ण उत्थान पर होती है जिसमे रंगबिरंगे जुलूस के साथ माई की डोली क्षेत्र भर के देवी-देवताओं और उनके ध्वज-प्रतीकचिन्हों के साथ उपस्थित होती हैं। चतुर्दशी को आंवरा-मार आजोजित होता है जिसमे उपस्थित जन-समुदाय दो दलों में विभक्त हो कर एक दूसरे पर आँवला-फल से मार करता है। यह उल्लेख करना उचित होगा कि सम्पूर्ण बस्तर क्षेत्र में आँवला एक प्रमुख वनोपज है। इसी रात्रि को होलिका दहन किया जाता है; इसके पश्चात पादुका पूजन के साथ फागुन मड़ई अपने अंतिम चरण की ओर बढ़ती है। अगले दिन होली की उमंग और रंग में मड़ई स्थल सरोबार हो उठता है।

बस्तर की होली अर्थात फागुन मड़ई की चर्चा हुई है तो यहाँ की दीपावली अर्थात दियारी त्यौहार पर भी बात कर ही लेनी चाहिये। दियारी को बस्तर के आदिवासी किसानों का त्यौहार कहा जाना चाहिये। इसे मनाने का समय वह होता है जब किसान अपने धान की कटाई-मिंजाई कर चुका होता है। अब समय खाली है और उसका ध्यान अपने मवेशियों पर जाता है। आदिवासी दियारी त्यौहार में पशुओं के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रदर्शित करता है। इस अवसर पर किसानों की लक्ष्मी अर्थात पशुधन की पूजा अर्चना की जाती है, उसके स्वस्थ रहने की कामना की जाती है तथा विशेष रूप से तैयार खिचड़ी खिलाई जाती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि दियारी त्यौहार मनाये जाने के साथ ही बस्तर अंचल में मेले-मड़ई का सिलसिला आरंभ होता है जो फागुन मड़ई के आयोजन तक जारी रहता है।

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