मखदूम मोहिउद्दीन
दक्षिण भारत में पैदा हुए उर्दू शायरों में शायद सबसे अधिक प्रसिद्धि मखदूम मोहिउद्दीन को प्राप्त हुई। 4 फ़रवरी 1908 को तत्कालीन हैदराबाद रियासत के अन्डोल गाँव में (अब जिला मेडक में) जन्मे मखदूम मोहिउद्दीन एक प्रतिष्ठित क्रांतिकारी और बहुमुखी प्रतिभा के शायर थे। तत्कालीन हैदराबाद राज्य के निजाम के खिलाफ 1946-1947 के तेलंगाना विद्रोह में सबसे आगे रहने वाले मख़दूम ने हैदराबाद में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना की थी। वे कामरेड एसोसिएशन और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सक्रिय सदस्य थे। उनके नाम पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के हैदराबाद स्थित दफ़्तर को मखदूम भवन के नाम से भी जाना जाता है।

मखदूम की प्रकाशित कृतियों में उनके तीन काव्य-संग्रह ’सुर्ख सवेरा’, ’गुले-तर’ और ’बिसात्-ए-रक़्स’ प्रमुख हैं। ’बिसात-ए-रक़्स’ के लिये उन्हें 1969 का साहित्य अकादमी अवार्ड भी प्राप्त हुआ है।

अजय यादवरचनाकार परिचय:-



अजय यादव अंतर्जाल पर सक्रिय हैं तथा इनकी रचनायें कई प्रमुख अंतर्जाल पत्रिकाओं पर प्रकाशित हैं।
ये साहित्य शिल्पी के संचालक सदस्यों में हैं।

मखदूम का बचपन बहुत सुखद नहीं रहा। जब वह सिर्फ छह साल के थे, तभी उनके पिता की मृत्यु हो गई और उनकी माँ ने दूसरी शादी कर ली। उनके चाचा ने उनकी परवरिश की। गांव में स्कूल और धार्मिक शिक्षा हासिल करने के बाद उच्च शिक्षा के लिए वे हैदराबाद आ गए। उन्होंने उस्मानिया विश्वविद्यालय से 1936 में स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त की। शिक्षा पूरी करने के बाद वे हैदराबाद में ही बस गये और ब्रिटिश शासन के खिलाफ आज़ादी की लड़ाई में शामिल हो गए।

मखदूम ने 1934 में सिटी कॉलेज में उर्दू साहित्य के प्राध्यापक के रूप में काम करना शुरू कर दिया। वह एक बहुमुखी प्रतिभा के कवि थे। वे भारत के आंध्र प्रदेश राज्य में कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक थे। बाद में वे हैदराबाद रियासत के भारत के साथ विलय के लिए हैदराबाद रियासत के तत्कालीन राजशाही के खिलाफ लामबंद हो गए। हैदराबाद के तत्कालीन शासक, मीर उस्मान अली खान (निजाम) ने स्वतंत्रता के लिए लोगों को उत्साहित करने के कारण उन्हें जान से मारने का आदेश दिया था। हैदराबाद के भारत विलय के बाद वे कुछ समय तक आंध्र प्रदेश विधानसभा के सदस्य भी रहे। इस दौरान उन्होंने रूस और चीन सहित कई कम्युनिस्ट देशों की यात्रा भी की।

मखदूम हैदराबाद के हरदिलअज़ीज़ शायर थे। वे बड़े ही मिलनसार और खुशमिज़ाज बल्कि हँसोड़ किस्म के आदमी थे। वे न केवल शायरी के कद्रदानों बल्कि सामान्य रिक्शेवालों, होटलों के बेयरों, छोटे बच्चों, घरेलू औरतों तक से एक सी बेतक़ल्लुफी से मिलते थे। मखदूम की लोकप्रियता डा० ज़ीनत साज़िदा के शब्दों में कुछ ऐसी थी, “मोगलपुरे के नौजवानों से लेकर चिक्कड़-पल्ली के मज़दूरों तक जिस को देखिये एक फैशन सा बना लिया है कि मखदूम की मुहब्बत में मरे जा रहे हैं।“ खुद अपना मज़ाक उड़ाने में उनका कोई सानी नहीं था। मुज़्तबा हुसैन उनके ऐसे कई किस्से सुनाते है:

आप की याद आती रही रात भर
एक बार मखदूम अलसुबह ओरियेंट होटल पहुँचे और बेयरे से पूछा, “निहारी है?
बैरा बोला, “नहीं है।“
मखदूम ने पूछा, “आमलेट है?”
बैरा बोला, “नहीं“
मखदूम ने फिर पूछा, “खाने के लिए कुछ है?”
बैरे ने जवाब दिया, “इस वक़्त तो कुछ नहीं है।“
इस पर मखदूम बोले, “ये होटल है या हमारा घर कि यहाँ कुछ भी नहीं है!”
उनकी आदत थी कि कोई नई ग़ज़ल कहने के बाद फौरन किसी न किसी को सुना डालते थे। इस आदत को लेकर एक लतीफा वे खुद ही सुनाया करते थे:
एक दिन उनसे ग़ज़ल हो गई तो फौरन ओरियेंट होटल चले आए कि कोई माई का लाल मिल जाए तो उसे ग़ज़ल सुनाएं। यहाँ कोई न मिला तो ’सबा’ के दफ़्तर चले गए। वहाँ भी कोई न मिला। थक-हार कर चाइनीज बार में चले गए। बार के बैरे क़ासिम को बुला कर कहा, “दो पैग व्हिस्की ले आओ।” क़ासिम व्हिस्की ले आया तो उससे बोले, “बैठो और व्हिस्की पियो।“ क़ासिम शरमाता रहा मगर वो अड़े रहे। आखिर उसने खड़े-खड़े व्हिस्की पी ली। फिर बोले, “दो पैग व्हिस्की और ले आओ।” दूसरे दौर में भी उन्होंने क़ासिम को व्हिस्की पिलाई। फिर तीसरा दौर चला। इसके बाद मखदूम ने क़ासिम से कहा, “अच्छा क़ासिम! अब मेरे सामने बैठो, मैं तुम्हें अपनी ताज़ा ग़ज़ल के कुछ शे’र सुनाना चाहता हूँ।“
यह सुनते ही क़ासिम ने कहा, “साहिब, आप बहुत पी चुके हैं। आपकी हालत गैर हो रही है। चलिये, मैं आपको घर छोड़ आऊँ।“ मखदूम द्वारा अपनी होशमंदी के हजार सुबूत पेश करने के बाद भी क़ासिम ने उस रात उनकी ग़ज़ल नहीं सुनी।
आइये पढ़ते हैं मखदूम की एक नज़्म ’नया साल’ जिसमें उनका ये मसखरापन झलक मारता है:
फिर छिड़ी रात, बात फूलों की
करोड़ों बरस की पुरानी
कुहनसाल दुनिया
ये दुनिया भी क्या मस्खरी है!
नये साल की शाल ओढ़े
बसद तन्ज़, हम सब से ये कह रही है
कि मैं तो ’नई’ हूँ
हँसी आ रही है।
मखदूम अक्सर अपने परिचितों को जानबूझकर छेड़ते भी रहते थे। ऐसा ही एक किस्सा है:

एक बार मखदूम एक अन्य हैदराबादी शायर सुलेमान अरीब के घर पर मशहूर पेन्टर सईद बिन मुहम्मद के साथ बैठे थे। बातों के क्रम में वे बोले, “शाइरी मुसव्विरी से कहीं ज़्यादा ताकतवर मीडियम है।“
सईद बिन मुहम्मद ने जवाब दिया, “मुसव्विरी और शाइरी का क्या तकाबुल! शाइरी में तुम जो चीज बयान नहीं कर सकते, हम रंगों और फार्म में बयान कर देते हैं। तुम कहो तो सारी उर्दू शाइरी को पेन्ट कर के रख दूँ।“
मखदूम बोले, “सारी उर्द शायरी तो बहुत बड़ी बात है; तुम इस मामूली मिस्रे को ही पेन्ट कर दो – पंखुड़ी इक गुलाब की सी है।“
सईद बिन मुहम्मद ने कहा, “ इसमें कौन सी बड़ी बात है; मैं कैनवास पर एक गुलाब की पंखुड़ी बना दूँगा।“
वे बोले, “पंखुड़ी गुलाब की तो पेन्ट हो गई, मगर ’सी’ को कैसे पेन्ट करोगे?”
सईद बिन मुहम्मद बोले, “’सी’ भी भला कोई पेन्ट करने की चीज है?”
मखदूम बोले, “मिस्रे की जान तो ’सी’ ही है। सईद! आज मैं तुम्हें नहीं जाने दूँगा जब तक तुम ’सी’ को पेन्ट नहीं करोगे।“
यह सुनते ही सईद बिन मुहम्मद भाग खड़े हुए।
25 अगस्त, 1969 को जब मखदूम की मृत्यु हुई तो हजारों लोग धाड़ें मार-मार कर रो रहे थे जैसे कि उनके परिवार से ही किसी की मृत्यु हो गई हो। उनके व्यक्तित्व और जीवन को उन्हीं के शब्दों में बयान करें तो:

रात भर दीदा-ए-नमनाक में लहराते रहे
एक शख़्स था ज़माना था के दीवाना बना
इक अफ़साना था अफ़साने से अफ़साना बना।

इक परी चेहरा के जिस चेहरे से आईना बना
दिल के आईना दर आईना परीखाना बना।

क़ीमि-ए-शब में निकल आता है गाहे-गाहे
एक आहू कभी अपना कभी बेगाना बना।

है चरागाँ ही चरागाँ सरे आरिज़ सरेज़ाम
रंग सद जलवा जाना न सनमखाना बना।

एक झोंका तेरे पहलू का महकती हुई याद
एक लम्हा तेरी दिलदारी का क्या-क्या न बना।
मखदूम के सरमाये में एक तरफ तो उनके क्रांतिकारी सरोकारों से जुड़ी शायरी है तो दूसरी ओर एक बड़ा भाग इससे अलग खालिस रूमानी शायरी का भी है। इस संदर्भ में मशहूर शायर ख़्वाज़ा अहमद अब्बास ने बिल्कुल ठीक कहा था कि, “मख़्दूम एक धधकती ज्वाला थे और ओस की ठंडी बूँदें भी, वे क्रांति के आवाहक थे और पायल की झंकार भी। वे ग्यान थे, वे कर्म थे, वे प्रग्या थे, वे क्रांतिकारी छापामार की बन्दूक थे और संगीतकार का सितार भी। वे बारूद की गंध थे और चमेली की महक भी।“ उनकी कई रचनाओं (जैसे ’जाने वाले सिपाही से पूछो वो कहाँ जा रहा है’, 'दो बदन प्यार की आग में जल गये, एक चंबेली के मंडवे तले', 'आपकी याद आती रही रात भर' और 'फिर छिड़ी रात बात फूलों की' आदि) ने हिन्दी फिल्मों के ज़रिये भी लोगों के दिलों में जगह बनायी है। तो आइये आज पढ़ते हैं, उनकी ये गज़ल:
जाने वाले सिपाही से पूछो

ज़िन्दगी मोतियों की ढलकती लड़ी, ज़िन्दगी रंगे गुल का बयाँ दोस्तो
गाह रोती हुई, गाह हँसती हुई, मेरी आँखें हैं अफ़सानाख़्वाँ दोस्तो।

है उसी के ज़माले-नज़र का असर, ज़िन्दगी ज़िन्दगी है, सफ़र है सफ़र
साया-ए-शाखे गुल, शाखे गुल बन गया, बन गया अब्र, अब्रे-रवाँ दोस्तो।

इक महकती बहकती हुई रात है, लड़खड़ाती निगाहों की सौगात है
पंखुड़ी की ज़बाँ, फूल की दास्तां, उसके होठों की परछाइयाँ दोस्तो।

कैसे तै होगी ये मंज़िले-शामे-ग़म, किस तरह से हो दिल की कहानी रक़म
इक हथेली में दिल, इक हथेली में जां, अब कहाँ का ये सूद-ओ-ज़ियां दोस्तो।

दोस्तो एक दो ज़ाम की बात है, दोस्तो एक दो गाम की बात है
हाँ उसी के दरो बाम की बात है, बढ़ न जाये कहीं दूरियाँ दोस्तो।

सुन रहा हूँ हवादिस की आवाज़ को, पा रहा हूँ ज़माने के हर राज़ को
दोस्तो उठ रहा है दिलों से धुआँ, आँख लेने लगी हिचकियाँ दोस्तो।
मखदूम की एक और ग़ज़ल आप यहाँ पढ़ सकते हैं:
वो जो छुप जाते थे क़ाबों में, सनमखानों में

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