[अरुण शौरी की पुस्तक पर एक विमर्श]
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विचारधाराओं ने इतिहास का किस तरह कूडा कर दिया है, इसकी परत दर परत खोलती है अरुण शौरी की वाणी प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक “जाने माने इतिहासकार – कार्यविधि, दिशा और उनके छल”। आप किसी भी धारा-विचारधारा के हों किंतु इतिहास को जानने समझने और लिखने से पहले इस पुस्तक को एक बार अवश्य पढा जाना चाहिये। भारतीय इतिहास की अब तक लिखी अधिकतम पुस्तकें या तो अंग्रेजों के दृष्टिकोण हैं अथवा वामपंथियों के। अंग्रेजों ने अपने उपनिवेश पर जब लिखा तो इस बात का ध्यान रखा कि ब्रिटिश श्रेठता का भाव बचा रह सके। वामपंथी इससे दो कदम आगे बढे और उन्होंने अतीत का विश्लेषण मार्क्स-लेनिन-माओ वाली अपनी थाती के इर्दगिर्द रह कर ही किया और इससे इतर जो कुछ भी देखा और पाया गया उसे फेंक-फांक दिया गया। अरुण शौरी की इस किताब और उनके निष्कर्षों को खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि एक एक नामचीन इतिहासकार का नाम ले कर उनके कार्यों, उनके लेखन की दिशा और छलों का सबूतो, संदर्भों और दस्तावेजों सहित खुलासा किया गया है।

पुस्तक पढ कर सिहरन भर गयी चूंकि यह स-प्रमाण सिद्ध किया गया है कि किस तरह कथित वामपंथी इतिहासकारों ने मनगढंत कहानियाँ रची और उन्हें इतिहास कह कर आगे कर दिया। अपने झूठ को सौ बार कह कर सच करार देने वाले फार्मूलों के तहत किस तरह प्रकाशन के वामपंथी अड्डों और मीडिया के लाल खेमों का बेहतरीन इस्तेमाल किया गया। इतिहास लेखन के नाम पर किस तरह बडे बडे नामचीन इतिहासकारों ने इस तुर्रे के साथ कि हम तो कोई तनख्वाह नहीं लेते, वे रिसर्च की आड में सरकारी खजाने में बडी सेंध लगाते रहे यहाँ तक कि आज भी अधिकांश के प्रोजेक्ट अधूरे हैं या उन्हें दी गयी समयावधि से कई गुना अधिक समय हो जाने के बाद भी पूरा कर हस्तगत नहीं किये गये। यह एक निश्चित घोटाले की ओर इशारा है और इस पर सरकार को कोई जांच बिठानी चाहिये। बौद्धिक घोटालों का उजागर होना इस दृष्टि से भी आवश्यक है कि नयी पीढी स्थापित प्रतिमानों के लिखे को ही पत्थर की लकीर न मान बैठे।

पश्चिम बंगाल में वाम शासन समय में पाठ्यपुस्तकों में किस तरह की छेडछाड की गयी तथा कैसे पूर्वाग्रहपूर्ण संशोधन जोडे गये वह आश्चर्य में डालते हैं। अरुण शौरी की पुस्तक यह सिद्ध करती है कि भारतीय इतिहास वस्तुत: आज भी अनकहा, अधूरा और पूर्वाग्रहपूर्ण दस्तावेजीकरण है। यदि जाने-माने इतिहासकारों के लिखे को ताला लगा कर नये सिरे से कार्यारम्भ किया जाये तो ही कुछ बेहतर और सच के करीब पहुँचा-पाया जा सकता है। इस पुस्तक को पढते हुए अरुण शौरी पर इतिहास लेखन को दक्षिणपंथी दृष्टि से देखने के भी आरोप लग सकते हैं। इस बात को समझने की आवश्यकता है कि शौरी ने बहुत हिम्मत के साथ स्थापित मठों-मठाधीशों कर करारा प्रहार किया है। इस पुस्तक को समाप्त करने तक तथा उनके द्वारा प्रस्तुत संदर्भों, तर्कों का निजी तौर पर भी पडताल करने के बाद यह कहना चाहता हूँ कि भारतीय इतिहास को सही सोच, सही दृष्टिकोण, विचारधारा से अवमुक्ति एवं पुनर्लेखन की आवश्यकता है।

1 comments:

  1. अब राजीव रंजन जी कह रहे हैं तो पढ़ना पड़ेगा ।
    सब जानते हैं कि इतिहास तो विजयी लोगों का होता है पराजितों का नहीं । किंतु अब तो इतिहास हवा में भी लिखा जाता है यानी एक गम्भीर बौद्धिक षड्यंत्र । शौरी जी जैसे उत्साही और तटस्थ लोगों को सही इतिहास लेखन के लिये आगे आने की आवश्यकता है । यूँ राजीव जी स्वयं भी इतिहास को खंगालने के बाद ही तथ्य देने के लिये जाने जाते हैं । आमचो बस्तर इसका इसका उदाहरण है ।

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