Holi-Nazeer
होली उल्लास का पर्व है। चारों ओर से छलकते रंगों और उन्मुक्त हास-परिहास के बीच शायद ही कोई होगा जो स्वयं भी इस आनंद-पर्व से अनुप्राणित हो कर रंग-रस से सराबोर न हो उठे। ऐसे में कवियों को होली आकर्षित न करे, यह तो संभव ही नहीं है। यही कारण है कि प्राय: हर दौर में कवियों ने होली को अपनी रचनाओं में स्थान दिया है और रीतिकालीन कवियों का तो यह मनपसंद त्यौहार ही है। तो आइये होली के इस पर्व पर पढ़ते हैं कुछ प्रसिद्ध कवियों की होली संबंधी रचनाएं। आरंभ में पढ़ते हैं प्रसिद्ध रीतिकालीन कवि पद्माकर की अत्यंत प्रसिद्ध रचना:

अजय यादवरचनाकार परिचय:-

अजय यादव अंतर्जाल पर सक्रिय हैं तथा इनकी रचनायें कई प्रमुख अंतर्जाल पत्रिकाओं पर प्रकाशित हैं।
ये साहित्य शिल्पी के संचालक सदस्यों में हैं।
फागु की भीर अभीरन में गहि, गोविंदै लै गई भीतर गोरी।
भाई करी मन की पदमाकर, ऊपर नाइ अबीर की झोरी॥
छीन पितंबर कम्मर तें, सु बिदा कै दई मीड़ि कपोलन रोरी।
नैन नचाइ, कह्यौ मुसक्याइ, लला! फिर आइयो खेलन होरी॥
पद्माकर की ही एक और रचना देखें जिसमें वे रंग और प्रेम की तुलना करते हैं:
एकै संग हाल नंदलाल औ गुलाल दोऊ,
दृगन गये ते भरी आनंद मढ़ै नहीं।
धोय धोय हारी पदमाकर तिहारी सौंह,
अब तो उपाय एकौ चित्त में चढ़ै नहीं।
कैसी करूँ कहाँ जाउं कासे कहौं कौन सुनै,
कोऊ तो निकारो जासों दरद बढ़ै नहीं।
एरी! मेरी बीर जैसे तैसे इन आँखिन सों,
कढिगो अबीर पै अहीर को कढ़ै नहीं।
अब पढ़ते हैं भक्तकवि सूरदास की होली रचना:
ब्रज में हरि होरी मचाई।
इततें आई सुघर राधिका, उततें कुंवर कन्हाई।
खेलत फाग परसपर हिलमिल, शोभा बरनि न जाई॥
नंद घर बजत बधाई ॥

बाजत ताल मृदंग, बाँसुरी, वीणा, ढफ, शहनाई।
उडत अबीर गुलाल कुंकुमा, रह्यो सकल ब्रज छाई॥
मानो मघवा झर लाई॥

लेले रंग कनक पिचकाई सनमुख सबे चलाई।
छिरकत रंग अंग सब भीजे झुक झुक चाचर गाई॥
परस्पर लोग लुगाई॥

राधा ने सेन दई सखियन कों, झुंड झुंड घिर आईं।
लपट झपट गई श्यामसुंदर सों बरबस पकर ले आईं॥
लाल जू को नाच नचाई॥

छीन लए मुरली पीतांबर सिरतें चुनर उढ़ाई।
बेंदी भाल नयन बिच काजर नकबेसर पहराई॥
मानो नई नार बनाई॥

मुस्कत है मुख मोड़ मोड़ कर कहाँ गई चतुराई।
कहाँ गये तेरे तात नंद जी कहाँ जसोदा माई॥
तुम्हं अब लें ना छुडाई॥

फगुवा दिये बिन जान न पावो कोटिक करो उपाई।
लेहौं काढ़ कसर सब दिन की तुम चित-चोर सबाई॥
बहुत दधि माखन खाई॥

रास विलास करत वृंदावन जहाँ तहाँ यदुराई।
राधा श्याम की जुगल जोरि पर सूरदास बलि जाई॥
प्रीत उर रहि न समाई॥
भक्तकवि रसखान ने भी होली पर आधारित बहुत सुंदर सवैये और कवित्त लिखे हैं:
फागुन लाग्यौ सखि जब तें, तब तें ब्रजमंडल धूम मच्यौ है।
नारि नवेली बचै नहीं एक, विसेष इहैं सबै प्रेम अँच्यौ है॥
साँझ-सकारे कही रसखान सुरंग गुलाल लै खेल रच्यौ है।
को सजनी निलजी न भई, अरु कौन भटू जिहिं मान बच्यौ है॥
रसखान का ही एक कवित्त देखें:
गोरी बाल थोरी वैस, लाल पै गुलाल मूठि -
तानि कै चपल चली आनँद-उठान सों।
वाँए पानि घूँघट की गहनि चहनि ओट,
चोटन करति अति तीखे नैन-बान सों॥
कोटि दामिनीन के दलन दलि-मलि पाँय,
दाय जीत आई, झुंड मिली है सयान सों।
मीड़िवे के लेखे कर-मीडिवौई हाथ लग्यौ,
सो न लगी हाथ, रहे सकुचि सुखान सों॥
घनानंद ब्रज-भाषा के अन्यतम कवि हुये हैं। विरहाकुल प्रेमियों की होली का वर्णन करते हुये वे कहते हैं:
कहाँ एतौ पानिप बिचारी पिचकारी धरै,
आँसू नदी नैनन उमँगिऐ रहति है।
कहाँ ऐसी राँचनि हरद-केसू-केसर में,
जैसी पियराई गात पगिए रहति है॥
चाँचरि-चौपहि हू तौ औसर ही माचति, पै-
चिंता की चहल चित्त लगिऐ रहति है।
तपनि बुझे बिन आनँदघन जान बिन,
होरी सी हमारे हिए लगिऐ रहति है॥
आधुनिक कवियों में भारतेंदु हरिश्चंद्र ने होली पर कई कविताएं लिखी हैं। एक रचना देखें:
कैसी होरी खिलाई।
आग तन-मन में लगाई॥
पानी की बूँदी से पिंड प्रकट कियो, सुंदर रूप बनाई।
पेट अधम के कारन मोहन, घर-घर नाच नचाई।
तबौ नहिं हबस बुझाई॥

भूँजी भाँग नहीं घर भीतर, का पहिनी का खाई।
टिकस पिया मोरी लाज का रखल्यो, ऐसे बनो न कसाई।
तुम्हें कैसर दोहाई॥

कर जोरत हौं बिनती करत हों, छाँड़ो टिकस कन्हाई।
आन लगी ऐसे फाग के ऊपर, भूखन जान गँवाई।
तुन्हें कछु लाज न आई॥
भारतीय संस्कृति में रचे-बसे मुसलमान कवि भी होली का वर्णन करने में पीछे नहीं हैं। इनमें होली पर कई प्रसिद्ध रचनाएं लिखने वाले नज़ीर अकबराबादी की एक रचना देखें:
जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की।
और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की।
परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की।
ख़ूम शीश-ए-जाम छलकते हों तब देख बहारें होली की।
महबूब नशे में छकते हो तब देख बहारें होली की।

हो नाच रंगीली परियों का, बैठे हों गुलरू रंग भरे
कुछ भीगी तानें होली की, कुछ नाज़-ओ-अदा के ढंग भरे
दिल फूले देख बहारों को, और कानों में अहंग भरे
कुछ तबले खड़कें रंग भरे, कुछ ऐश के दम मुंह चंग भरे
कुछ घुंगरू ताल छनकते हों, तब देख बहारें होली की

गुलज़ार खिलें हों परियों के और मजलिस की तैयारी हो।
कपड़ों पर रंग के छीटों से खुश रंग अजब गुलकारी हो।
मुँह लाल, गुलाबी आँखें हो और हाथों में पिचकारी हो।
उस रंग भरी पिचकारी को अंगिया पर तक कर मारी हो।
सीनों से रंग ढलकते हों तब देख बहारें होली की।

और एक तरफ़ दिल लेने को, महबूब भवइयों के लड़के,
हर आन घड़ी गत फिरते हों, कुछ घट घट के, कुछ बढ़ बढ़ के,
कुछ नाज़ जतावें लड़ लड़ के, कुछ होली गावें अड़ अड़ के,
कुछ लचके शोख़ कमर पतली, कुछ हाथ चले, कुछ तन फड़के,
कुछ काफ़िर नैन मटकते हों, तब देख बहारें होली की।।

ये धूम मची हो होली की, ऐश मज़े का झक्कड़ हो
उस खींचा खींच घसीटी पर, भड़वे खन्दी का फक़्कड़ हो
माजून, रबें, नाच, मज़ा और टिकियां, सुलफा कक्कड़ हो
लड़भिड़ के 'नज़ीर' भी निकला हो, कीचड़ में लत्थड़ पत्थड़ हो
जब ऐसे ऐश महकते हों, तब देख बहारें होली की।।
ब्रजमंडल की होली का विशिष्ट महत्व है। यह पर्व ब्रज की संस्कृति से इस तरह घुला-मिला है कि होली का ज़िक्र ब्रज और ब्रजवासी कन्हैया के बिना अधूरा ही रहता है। यही कारण है कि होली पर लिखते समय कलम अपने आप ब्रज-भाषा की ओर झुकने लगती है। नज़ीर की यह रचना इसका अच्छा उदाहरण है:
जब खेली होली नंद ललन हँस हँस नंदगाँव बसैयन में।
नर नारी को आनन्द हुए ख़ुशवक्ती छोरी छैयन में।।
कुछ भीड़ हुई उन गलियों में कुछ लोग ठठ्ठ अटैयन में ।
खुशहाली झमकी चार तरफ कुछ घर-घर कुछ चौपैयन में।।
डफ बाजे, राग और रंग हुए, होली खेलन की झमकन में।
गुलशोर गुलाल और रंग पड़े, हुई धूम कदम की छैयन में।
परंतु ऐसा नहीं है कि अन्य भाषाओं में होली अभिव्यक्त नहीं हुई है। नज़ीर की ही एक अन्य रचना देखें:
हिन्द के गुलशन में जब आती है होली की बहार।
जांफिशानी चाही कर जाती है होली की बहार।।

एक तरफ से रंग पड़ता, इक तरफ उड़ता गुलाल।
जिन्दगी की लज्जतें लाती हैं, होली की बहार।।

जाफरानी सजके चीरा आ मेरे शाकी शिताब।
मुझको तुम बिन यार तरसाती है होली की बहार।।

तू बगल में हो जो प्यारे, रंग में भीगा हुआ।
तब तो मुझको यार खुश आती है होली की बहार।।

और हो जो दूर या कुछ खफा हो हमसे मियां।
तो काफिर हो जिसे भाती है होली की बहार।।

नौ बहारों से तू होली खेलले इस दम नजीर।
फिर बरस दिन के उपर है होली की बहार।।
होली विषयक इन सुंदर रचनाओं के साथ आप सबको होली की रंगा-रंग शुभकामनाएं!

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