खुद रही है लगातार-लगातर
बैलाडिला की श्रृंखला
फौलाद का यह पहाड
उगल रहा है फौलाद, लगातार-लगातार ।
निगल कर फौलाद
उगल रही है, कम्पनियॉ लगातार-लगातर
नोट-नोट और नोट
सरकारें बदल रही है लगातार-लगातर
नोटों से वोट ।
पेरिफेरियल विकास के आकडों के बोझ में
दबा पहाड के निचे का
“निचले तबके” का आदमी
समझ नही पा रहा है; 
आकडों और विकास की बीच की दुरी ।
आकडों से प्रदर्शन से बाहर
बैलाडिला पहाड से उतरती
ड्ंकनी नदी का पानी;
रणनीतिकारों के सोच से परे
लाल होता जा रहा है ।
काला लोहा
लाल आंसु रो रहा है ?  
या यह पहाड अपने मर्दन पर
रक्तिम स्ख:लन कर रहा है ।
छोटे-छोटे दिमागों में,
बडी-बडी लालच लिये
खरोच रहे है, लोग
धारवाड की श्रृखंला
धार खोते-खोते धारवाड, लगातार-लगातर
धार देता जा रहा है
जंगल के मस्तिष्कों
आदमी के चुप को ।
सर झुकाये खडे सागौन का मौन क्रन्दन
बर्राता है, रह-रह कर
सुनो यहॉ आदमी चुप है।
चुप आदमी कें सांसों के
लोहार के धौकनी में बदलने से पहले
पत्थरों और पेडों का बयान ले लो
देर हो जाय्रेगी
घटते पहाड, लगातार निचे गिरता भु-जल का स्तर
भर रहा है रह-रह कर
छोटे-छोटे दिमागों में
सुखा, सुखे विचार
रह-रह कर जंगलों का, जंगल में रहते

आदमी का हरापन मर रहा है

3 comments:

  1. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  2. जयनारायण जी ! बैलाडीला के दर्द को आवाज़ देने के लिये साधुवाद के पात्र हैं आप । किंतु .......
    यदि काव्य की दृष्टि से समालोचना की जाय तो विनम्रतापूर्वक कहना चाहूँगा काव्यशिल्प अच्छा है किन्तु व्याकरणीय अशुद्धियों को दूर किया जाना चाहिये । आशा है अन्यथा नहीं लेंगे ....और सुधार करने का प्रयास करेंगे । ध्यान रखिये ...आप एक अंतरराष्ट्रीय मंच पर हैं जहाँ आपके लेखन के हर पक्ष को जाँचा-परखा जाता है ।

    उत्तर देंहटाएं
  3. आदमी का हरापन .....आदमी के दिमाग़ का हरापन ............धरती का हरापन .......मर रहा है सब कुछ । चुप आदमी को बोलना होगा ..........वाकई देर तो हो चुकी ....बहुत देर हो चुकी है ......। नये लोग आ गये हैं ............नई मशीनें आ चुकी हैं ............बैलाडीला को अब नये तरीके से मारा जायेगा । विकास ! तुम दूर ही रहो तो अच्छा । हमें यह विकास नहीं चाहिये .......प्राणों के मूल्य पर बिल्कुल नहीं ।

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