ग्वालियर-उज्जैन-इंदौर नगरों में या इनके आसपास के स्थानों (देवास, धार, महू, मंदसौर) में वर्षों निवास किया; एतदर्थ ‘सुमन’ जी से निकटता बनी रही। ख़ूब मिलना-जुलना होता था; घरेलू परिवेश में अधिक। जा़हिर है, परस्पर पत्राचार की ज़रूरत नहीं पड़ी। पत्राचार हुआ; लेकिन कम।

‘सुमन’ जी के बड़े भाई श्री हरदत्त सिंह (ग्वालियर) और मेरे पिता जी मित्र थे। हरदत्त सिंह जी बड़े आदमी थे;  हमारे घर शायद ही कभी आये हों। पर, मेरे पिता जी उनसे मिलने प्रायः जाते थे। वहाँ ‘सुमन’ जी पढ़ते-लिखते पिता जी को अक़्सर मिल जाया करते थे। ‘सुमन’ जी बड़े आदर-भाव से पिता जी के चरण-स्पर्श करते थे। लेकिन, ‘सुमन’ जी में सामन्ती विचार-धारा कभी नहीं रही।

सत्र 1944-45 की समाप्ति के कुछ महीने-पूर्व ‘सुमन’ जी की नियुक्ति ‘विक्टोरिया कॉलेज’ (ग्वालियर) में, हिन्दी-प्राध्यापक पद पर हुई। उन दिनों, मैं  इस कॉलेज में बी.ए. उत्तरार्द्ध का छात्र था। श्री अटल बिहारी वाजपेयी कॉलेज-सहपाठी थे। ‘सुमन’ जी ने लगभग दो-माह हमारी कक्षा ली — सप्ताह में तीन दिन। मैथिलीशरण गुप्त का ‘द्वापर’ पढ़ाया। उनके अध्यापन का ढंग बड़ा ही रोचक-आकर्षक रहता था। भावानुकूल मुख-मुद्राएँ व वाणी। बीच-बीच में  यथा-प्रसंग साहित्यकारों के संस्मरण सुन कर छात्र बड़े प्रभावित होते थे। अनेक कवियों के काव्यांश उन्हें कंठस्थ थे; जो वे जब-तब सुनाते थे। कक्षा में ऐसी रस-वर्षा होती थी कि ‘सुमन’ जी का पीरियड छोड़ने को मन नहीं करता था। उन दिनों ट्योटोरियल-कक्षाएँ भी लगती थीं — चार-चार पाँच-पाँच छात्रों की। सौभाग्य से मैं यहाँ भी ‘सुमन’ जी के बैच में था। ‘सुमन’ जी इन दिनों गणेश कॉलोनी, लश्कर में रहते थे;  मैं  मुरार। एक बार, उनके निवास पर गया — राहुल सांकृत्यायन जी से मिलने। राहुल जी उनके यहाँ ठहरे हुए थे। राहुल जी ऊपर वाले कमरे में किसी ऐतिहासिक आलेख का डिक्टेशन दे रहे थे। अतः उनसे मिलना नहीं हो सका।

उन दिनों ग्वालियर-रियासत थी। ग्वालियर-महाराजा से ‘सुमन’ जी के परिवार के घनिष्ठ संबंध थे। इस ज़माने के यशस्वी कवि-नाटककार श्री जगन्नाथ प्रसाद मिलिन्द ( ‘प्रताप-प्रतिज्ञा’ नाटक के लेखक) भी मुरार में रहते थे। तब राज-भवन में कोई कार्यक्रम हुआ। किसी नाटक का मंचन भी। ‘सुमन’ जी के निर्देशन में। मिलिन्द जी के नाटककार ने इसका स्वागत नहीं किया। उन दिनों इस विषय पर यदा-कदा जो चर्चाएँ होती थीं; सुनता था। इसमें ‘सुमन’ जी का कोई हाथ नहीं था। मिलिन्द जी की उपेक्षा का भी कोई प्रश्न नहीं था; क्योंकि कांग्रेसी/समाजवादी होने के नाते राज-भवन के किसी कार्यक्रम तक में उनका सम्मिलित होना सम्भव न था। फिर भी; मानव-स्वभाव।

श्री अटल बिहारी वाजपेयी ‘राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ’ की कमान सँभाले हुए थे।। ‘सुमन’ जी की वाम विचार-धारा उनके प्रतिकूल पड़ती थी। इन दिनों, ‘सुमन’ जी के दो कविता-संग्रह प्रकाशित हो चुके थे - ‘हिल्लोल’ (1939) और ‘जीवन के गान’ (1941)। ‘विश्वास बढ़ता ही गया’ सन् 1945 में ही आया। श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने ‘सुमन’ जी के काव्य को लक्ष्य कर उन दिनों एक कविता लिखी थी - ‘ये जीवन के गान नहीं है!’ छात्र-जीवन का यह साहित्यिक माहौल पर्याप्त प्रेरक था।

बी.ए. करने के बाद उज्जैन चला आया। हाई स्कूल में अध्यापक की नौकरी करने लगा। जुलाई 1950 में व्याख्याता बन कर धार चला गया। इधर ‘माधव महाविद्यालय’ (उज्जैन) में ‘सुमन’ जी का स्थानान्तरण हो गया। उज्जैन / इंदौर में ‘सुमन’ जी प्रोफ़ेसर रहे, बाद में प्राचार्य रहे, फिर ‘विक्रम विश्वविद्यालय’ (उज्जैन) के कुलपति रहे। ‘सुमन’ जी का प्रेम और सहयोग ख़ूब मिला। शांतिनिकेतन में पी-एच.डी. हेतु शोध करने का लगभग तय था। ‘सुमन’ जी ने ही मेरे संबंध में आचार्य हज़ारीप्रसाद द्विवेदी को लिखा था। औपचारिक इण्टरव्यू के लिए जाना था। हज़ारीप्रसाद द्विवेदी जी ने इंतज़ार किया। ‘सुमन’ जी को हवाई डाक से स्मरण-पत्र भेजा। वह तो , परिवार की विपन्न आर्थिक स्थिति के कारण मैं अपनी स्थायी शासकीय नौकरी छोड़ने का साहस न जुटा सका।

माधवनगर, उज्जैन में जब मैं  मालवा होज़री बिल्डिंग की तीसरी मंज़िल पर रहता था; एक रात अचानक ‘सुमन’ जी, प्रभाकर माचवे जी और प्रभाग चंद्र शर्मा जी आये। उन दिनों मैं अकेला रह रहा था। अविवाहित था। पिता जी का स्थानान्तरण शाजापुर हो गया था। माचवे जी को पता था। एक रात ये तीनों इतिहास-पुरुष मेरे यहाँ सोये; सबेरा होते ही चले गये। अकेला था। रात में क्या सत्कार करता। सुबह भी अवसर नहीं मिला। पर, उनका आना-सोना अविस्मरणीय है।

जब मैं  धार से ‘माधव महाविद्यालय’, उज्जैन पदोन्नत होकर पुनः आया (1955-1960) ‘सुमन’ जी नेपाल में भारतीय राजदूत बन कर काठमांडू चले गये। पत्राचार द्वारा उनसे जुड़ा रहा। सन् 1957 में ‘नागपुर विश्वविद्यालय’ से मुझे पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त हुई।।‘सुमन’ जी को पता चला; इसके पूर्व मेरा पत्र भी उन्हें पहुँचा। किसी संकलन में में  उनकी कविताएँ समाविष्ट करना चाहता था; अतः अनुमति माँगी थी। काठमांडू से ‘सुमन’ जी ने पत्रोत्तर दिया :

भारतीय राजदूतावास काठमांडू (नेपाल)
दि. 27 अप्रैल 1957

प्रिय महेंद्र,
लगभग एक मास पूर्व तुम्हारा कृपा-पत्र मिला था। पत्रों में  तुम्हारी डाक्टरेट की सूचना मिली थी, आनंद-विभोर हो उठा। मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार करो। रहिमन यों सुख होत है बढ़त देखि निज गोत, ज्यों बड़री अँखियाँ निरखि आँखिन को सुख होत। तुम्हारे उत्तरोत्तर उत्कर्ष की कामना करता हूँ।
किसी संकलन में जो भी कविता देना चाहो सहर्ष दे सकते हो। समस्त जीवन के लिए तुम्हें सर्वाधिकार प्रदान करता हूँ। अपनी दोनों नयी पुस्तकें तुम्हें शीघ्र  ही भिजवाऊंगा। सब सुहृदों से स्नेहाभिवादन कहना। मेरे योग्य सेवा लिखना।
                                                                                                                                      स्नेहसहित - सुमन

पत्र क्या था — स्नेह-प्रेम व घनी आत्मीयता से लबालब हृदय-पात्र ! धन्य हो गया ! ऐसी सहृदयता विरल है। यों तो ‘सुमन’ जी के संसर्ग से उनकी महानता हर पल प्रकट होती है। सचमुच, अद्भुत व्यक्तित्व है ‘सुमन’ जी का।

सन् 1958 में मैंने उज्जैन से एक साहित्यिक पत्रिका ‘प्रतिकल्पा’ का सम्पादन किया। परामर्श-मंडल में महापंडित राहुल सांकृत्यायन और पं. सूर्यनारायण व्यास के साथ डा. शिमंगलसिंह ‘सुमन’ को भी रखा। ‘प्रतिकल्पा’ का अंक देख कर ‘सुमन’ जी पर जो प्रतिक्रिया हुई वह निम्नांकित पत्र में दृष्टव्य है:

भारतीय राजदूतावास, नेपाल
प्रिय भाई महेंद्र,
‘प्रतिकल्पा’ प्राप्त कर पुलकित हो उठा। इसके रूप में तुमने मेरा एक बहुत बड़ा सपना पूरा किया है, बधाई। तुम तो जानते ही हो कि अवंतिका मेरे मन में समा गयी है, अतएव उसके प्रति पूर्णतया समर्पित हूँ। सलाहकार क्या सेवक बनने में ही गर्व का अनुभव करता हूँ, अस्तु तुम्हारा आदेश स्वीकार है।

एक बात का ध्यान अवश्य रखना, ‘प्रतिकल्पा’ साहित्य और संस्कृति के प्रवाह में नया कल्प प्रतिष्ठित कर सके। उसकी गरिमा कालिदास की साधना-सर्जना-भूमि के अनुकूल हो। इसे विचारोत्तेजक और संवेदनामयी बनाना, भाव में भी, शैली में भी युग के सारे प्रयोग इसमें स्थान पाएँ। कोई भी अधकचरी कलम केवल प्रोत्साहन के नाम पर मनमानी न कर पाए। नयी प्रतिभाओं को प्रोत्साहन भी दो पर उन्हें यह मालूम पड़ जाय कि ‘प्रतिकल्पा’ में स्थान पाने के लिए तपस्या द्वारा स्वयं का काया-कल्प करना पड़ता है। लेखकों को पारिश्रमिक अवश्य देना। यह युग उपदेशात्मक त्याग के दंभ से दूर है।

मैं शीघ्र ही तुम्हें अपनी एक अच्छी रचना भगवान बुद्ध पर भेजूंगा, मई के अंक के लिए। तीन मई को बुद्ध-पूर्णिमा है। इस अंक के लिए कुछ लेख बौद्ध-पंडितों से अवश्य प्राप्त करो। राहुल जी, भदन्त जी, भगवतशरण उपाध्याय, रामविलास आदि सबको लिखो। आज की साहित्यिक दल-गत संकीर्णताओं से दूर रहो। बाद में में नेपाल के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्वरूपों पर भी लेख भेजता रहूंगा, तुम्हारे पास ब्लाक बनाने का प्रबंध है क्या ?

आदरणीय व्यास जी ( पं. सूर्यनारायण व्यास) से प्रणाम कहना। राहुल जी को में मार्च में यहाँ बुला रहा हूँ।
                                                                                                                                                     सस्नेह,
                                                                                                                                                      सुमन

आगे चल कर ‘प्रतिकल्पा’ का भी वही हश्र हुआ; जो साहित्यिक पत्रिकाओं का होता है। तीन अंक ही निकले। मेरे सम्पादन में उज्जैन से प्रकाशित ‘सन्ध्या’ (मासिक) और ‘प्रतिकल्पा’ (त्रैमासिक) का उल्लेख हिन्दी पत्रकारिता से संबंधित अनेक संदर्भ-ग्रंथों / शोध-प्रबन्धों में होता है। दृष्टव्य — ‘बृहत्  हिन्दी पत्राकारिता कोश’  लेखक डा. प्रताप नारायण टंडन (लखनऊ), ‘नये काव्य-आन्दोलनों के विकास में पत्रिकाओं का योगदान’ (1940-1960) / दिल्ली विश्वविद्यालय / 1981 / लेखिका श्रीमती सरिता सिंह आदि।

‘विक्रम विश्वविद्यालय’ के अन्तर्गत संचालित ‘माधव महाविद्यालय’ में प्रतिनियुक्ति पर और बने रहना मैंने उचित नहीं समझा। स्वेच्छा से, शासकीय सेवा में वापसी की / स्थानान्तरण की माँग की। दतिया-इंदौर-ग्वालियर-महू क्रमशः तबादले हुए — जुलाई 1960 से जुलाई 1964 के बीच। ‘सुमन’ जी ने ‘माधव महाविद्यालय’ (उज्जैन) का प्राचार्य-पद सँभाला। महू से उज्जैन जब-जब जाना होता; ‘सुमन’ जी से अवश्य मिलता। इन दिनों ‘माधव विज्ञान महाविद्यालय’ उज्जैन में अनुज डा. ज्ञानेंद्र भौतिकी-विभाग में प्रोफ़ेसर थे। महू 1969 तक रहा। उज्जैन में भेंट के दौरान ‘सुमन’ जी ने बताया — झाँसी से ‘सेतु प्रकाशन’ के स्वामी श्री सुमित्रानन्दन गुप्त आये थे। ‘कविश्री-माला’ का संयोजन-भार सौंप गये हैं। ‘कविश्री-माला’ के अन्तर्गत ‘सुमन’ जी का भी संकलन निकलना था। ‘सुमन’ जी अपने संकलन के स्वयं संयोजक कैसे रहते; अतः ‘सुमन’ जी ने मात्र ‘कविश्री: सुमन’ का संयोजकत्व मुझे सौंप दिया। इस संकलन का सम्पादन-दायित्व डा. भगवतशरण उपाध्याय जी को सौंपा गया; जो उन्होंने स्वीकार कर लिया। किन्तु, अति-व्यस्तता के कारण डा.भगवतशरण उपाध्याय जी ने ‘संकलन’ की भूमिका लिखने में असाधारण विलम्ब कर दिया। उनका उज्जैन आना बना रहता था। ‘सुमन’ जी किसी-न-किसी प्रयोजन से उन्हें उज्जैन आमंत्रित करते रहते थे। तय हुआ, भगवतशरण जी अब जब भी उज्जैन आएंगे तो उनसे भूमिका का डिक्टेशन मैं ले लूंगा। अप्रैल 1968 में वे उज्जैन आये; किन्तु उन दिनों मैं उज्जैन न जा सका। पता नहीं, क्या बाधा रही। बाद में ‘सुमन’ जी का पत्र आया :

डा. शिवमंगलसिंह ‘सुमन’
प्राचार्य माधव महाविद्यालय, उज्जैन

दि. 25 अप्रैल 1968
प्रिय महेंद्र,
21 एप्रिल का पत्र मिला। भगवतशरण जी (उपाध्याय) 11 अप्रैल से 14 तक यहाँ तुम्हारी प्रतीक्षा करते रहे। वे लिखने के लिए प्रतिश्रुत हैं। तुम यहाँ होते तो इसी अवधि में लिखा भी लेते। वे लेखक ही नहीं लिक्खाड़ हैं, सदियों का काम दशकों में करते हैं।
सदा का,
सुमन

फिर, लगभग तीन माह बाद, लखनऊ से डा. भगवतशरण उपाध्याय जी ने उत्तर दिया :

महानगर, लखनऊ / दि. 22 जुलाई 1968
प्रियवर,
पत्रा-व्यवहार संबंधी दोषों के लिए क्षमा-प्रार्थी हूँ।
उत्तर से भी शीघ्रतर कार्य कर देने का अभिलाषी होने के कारण उज्जैन पहुँच कर आपको एक दिन बुला कर कार्य सम्पन्न कर देने के उपक्रम किये पर, असफल रहा। उसके बाद तो इतना व्यस्त रहा हूँ कि कश्मीर और आसाम प्रवास के उपरान्त अब विदेश प्रस्थान भी स्थगित कर दिया है।
आपका अनुरोध तो स्वीकृत ही है। उस संबंध का कार्य भी समय मिलते ही सम्पन्न कर दूंगा। सुमन जी इधर आने वाले हैं। उनसे मिलते ही विषय पर बात करके आपको लिखूंगा। सम्भवतः उज्जैन भी जाना पड़े, तब आपको पूर्व सूचना दे कर बुलवा लूंगा।
शेष कुशल है। आप स्वस्थ और सानंद होंगे।
                                                                                                                                                       आपका,
                                                                                                                                भगवतशरण उपाध्याय

भूमिका का इंतज़ार बना रहा। 12 जनवरी 1969 को भगवतशरण उपाध्याय जी ने पुनः वादा किया:

महानगर, लखनऊ / दि. 12 जनवरी 1969

प्रियवर,
आपके अनेक अनुत्तरित पत्रों ने मुझे शसरमिन्दा कर दिया है। मैं अनेक बार उज्जैन गया और सोचा तभी आपसे मिल कर करणीय संपन्न कर दूंगा, पर कभी कुछ न हो सका। अब मैं 7-8 फ़रवरी तक उज्जैन फिर जा रहा हूँ। वहीं एक दिन इस कार्य के लिए निकाल कर उसे पूरा कर दूंगा, निश्चय। कृपया इस महीने के अंत तक सुमन जी से पूछ लेंगे कि मैं वहाँ कब रहूंगा। कोशिश करूंगा, 6-9 तक रहने की।
नया साल मुबारक !
                                                                                                                                                  क्षमायुक्त
                                                                                                                               भगवतशरण उपाध्याय
पुनः
मेरी अनवधानता आपके स्नेह में बाधक न बने ! आप सदा मेरे प्रिय रहे हैं, पर स्थिति की अनिवार्यता का क्या कहें !
                                                                                                                                भगवतशरण उपाध्याय

लेकिन, बात फिर नहीं बनी। बमुश्किल, एक दिन, डा. भगवतशरण उपाध्याय जी ने भूमिका लिख कर भेज दी। तुरन्त ‘कविश्री : सुमन’ का प्रकाशन हो गया।

आगे चल कर, ‘सुमन’ जी ‘विक्रम विश्वविद्यालय’ के कुलपति मनोनीत हुए। उनके कारण ‘विक्रम विश्वविद्यालय’ के हिन्दी-विषय से संबंधित तमाम कार्य-कलापों में मेरी अप्रत्यक्ष भागीदारी रही। जो चाहा, अधकिांश ‘सुमन’ जी के सहयोग से सम्भव हुआ। एक ज़बरदस्त हादसा भी हुआ ! ‘सुमन’ जी के निर्देशन में एक शोधार्थी-लेक्चरार ने शोध-प्रबन्ध दाख़िल किया। उस शोधार्थी ने नक़ल कर शोध-प्रबन्ध तैयार कर डाला और ‘सुमन’ जी को बता दिया कि डा. महेंद्रभटनागर इसे देख चुके हैं। जब कि ऐसा नहीं था। मुझ पर ‘सुमन’ जी का विश्वास अटूट था। अतः उन्होंने उस शोधार्थी को प्रमाण-पत्र दे दिया। बाद में, किन्हीं करणों से, जब रहस्य खुला तो ‘सुमन’ जी को बहुत बुरा लगा। ‘सुमन’ जी का क्रोध भी सर्वविदित है। उन्होंने वह शोध-प्रबन्ध परीक्षकों को न भिजवा कर, पहले मेरे पास भेजा। फ़ोन आये। वह तो आद्यन्त नक़ल था ! इन दिनों मैं ‘विक्रम विश्वविद्यालय’ के ‘हिन्दी-बोर्ड’ का अध्यक्ष भी था (19 अक्टूबर 1973 से)। परीक्षक-नामिका मैं ही बना कर आया था।  शासकीय महाविद्यालय, मंदसौर में प्रोफ़ेसर-अध्यक्ष था। इस प्रसंग से शोधार्थी ने मंदसौर में, अपने सूत्रों द्वारा, मुझे डराने की ज़बरदस्त कुचेष्टा की। असामाजिक तत्त्व  मेरे  पीछे  छोड़ दिये ! मुझे पुलिस-रिपोर्ट तक करनी पड़ी। बात फैलती गयी। जिसके शोध-प्रबन्ध से नक़ल की गयी थी; उसे भी पता चल गया। शोध-प्रबन्ध रोक लिया गया। सभी अनुचित तरीक़े निष्फल रहे।

जुलाई 1978 में मेरा स्थानान्तरण ‘कमलाराजा कन्या महाविद्यालय’, ग्वालियर हो गया — जो ‘जीवाजी विश्वविद्यालय’ सकातुर सम्बद्ध है। यहाँ, ‘सुमन’ जी ‘हिन्दी-शोध-उपाधि-समिति’ के बाह्य विशेषज्ञ सदस्य थे। उनके कार्यकाल में स्थानीय मेधाविनी लेखिका कवयित्री कुमारी माधुरी शुक्ला का, डा. लक्ष्मीनारायण दुबे (सागर) के निर्देशन में, पी-एच.डी. उपाधि हेतु, मेरे काव्य-कर्तृत्व पर पंजीयन हुआ। विषय था — ‘हिन्दी प्रगतिवादी कविता के परिप्रेक्ष्य में महेंद्रभटनागर का विशेष अध्ययन’। शोध-प्रबन्ध सन् 1985 में, मेरे सेवानिवृत्त हो जाने के बाद प्रस्तुत; स्वीकृत हुआ। मेरे काव्य-कर्तृत्व पर यह प्रथम शोध-कार्य था। यद्यपि इसके पूर्व डा. दुर्गाप्रसाद झाला द्वारा सम्पादित ‘कवि महेन्द्रभटनागर: सृजन और मूल्यांकन’ (1972) और डा. विनयमोहन शर्मा जी-द्वारा सम्पादित ‘महेन्द्रभटनागर का रचना-संसार’ (1980) नामक आलोचना-पुस्तकों का प्रकाशन हो चुका था। कु. ममता मिश्रा का लघु शोध-प्रबन्ध ‘कवि महेन्द्र भटनागर : जीवन और सर्जना’ (1982) भी जीवाजी विश्वविद्यालय-ग्रंथालय में उपलब्ध था। यह ‘सुमन’ जी की उदारता और विशाल हृदयता का परिचायक है कि उन्होंने सर्वप्रथम मेरे काव्य-कर्तृत्व को शोध के उपयुक्त समझा। इसके उपरान्त तो अन्य विश्वविद्यालयों में भी मेरे साहित्यिक अवदान पर शोध-कार्य का क्रम प्रारम्भ हो गया।

मंदसौर से ग्वालियर स्थानान्तरण के पूर्व (जून 1977) ही, ‘ताशकंद विश्वविद्यालय’ के हिन्दी भाषा और साहित्य के प्रोफ़ेसर-पद पर मेरा मनोनयन हुआ — ‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग’ और ‘भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद्’ द्वारा। दो-वर्ष की प्रतिनियुक्ति पर जाना था। ‘सुमन’ जी इन दिनों भारतीय विश्वविद्यालयों की संस्था के प्रमुख थे। वे प्रायः ‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग’ की बैठकों में भाग लेने दिल्ली जाते रहते थे। संयोग से उन्होंने ‘ताशकंद विश्वविद्यालय’ के लिए प्रोफ़ेसर-हेतु अन्यों के साथ मेरा नाम भी सुझा दिया। संयोग से, ‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग’ के आधुनिक भारतीय भाषाओं के विशेषज्ञ पेनल ने भी विचारार्थ उस नामिका में से मेरे नाम की संस्तुति की। इन दिनों, भारत सरकार के विदेश-मंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी थे। विदेश जाने के पूर्व, विदेश मंत्रालय की  अनुमति अनिवार्य रहती है। अटल बिहारी वाजपेयी जी के समक्ष जब फ़ाइल गई तो उन्होंने मेरा नाम देखते ही मुझे पहचान लिया। हिन्दी-अधिकारी के माध्यम से व्यक्तिगत स्तर पर मिलने के लिए मुझे आमंत्रित किया। साउथ एवेन्यू में जाकर उनसे मिला। विस्तृत विवरण ‘आत्मकथ्य’ में दृष्टव्य। सब-कुछ तय हो जाने के बाद, न जाने क्यों बाधा आ उपस्थित हुई। कारण आज भी अज्ञात। ‘ताशकंद विश्वविद्यालय’ के कुलपति ने टेलेक्स से इस आशय से सूचित किया कि इन दिनों ताशकंद में आवासीय स्थान की कमी है; अतः फ़िलहाल योजना को स्थगित करना पड़ रहा है। सत्य इतना तो है कि फिर भारत से ‘ताशकंद विश्वविद्यालय’ में हिन्दी के किसी भी अन्य प्रोफ़ेसर की प्रतिनियुक्ति नहीं हुई। आगे चलकर, सोवियत संघ में अनेक परिवर्तन हो गये — स्वतंत्र राष्ट्र उजबेकिस्तान बन गया। मेरे पत्र से ‘सुमन’ जी को जब पता चला तो उन्होंने मुझे लिखा:

राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन हिन्दी भवन, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ
दि. 31 मई 1982

प्रिय महेन्द्र,
तुम्हारा 22/5 का पत्र प्राप्त कर बड़ी प्रसन्नता हुई। तुम ताशकंद के लिए अवश्य प्रयत्न करो। पता नहीं कैसे रह गया वह तो क़रीब-क़रीब तय हो गया था। एक बार तुम्हारा विदेश जाना परमावश्यक है; अनुभव व मैत्री आयाम दोनों दृष्टियों से।
यू-जी-सी से प्रोजेक्ट लेने की बात तो अवकाश प्राप्त करने के बाद। उस समय याद दिलाना,  मैं यथाशक्ति प्रयत्न करूंगा।
यहाँ के पुरस्कारों के निर्णायकों में भी तुम्हारा नाम रखवा दूंगा। कोई नयी पुस्तक इस बीच प्रकाशित हुई हो तो उसे भी निःसंकोच पुरस्कार के लिए भेज सकते हो।
आज रात साबरमती से उज्जैन जा रहा हूँ, एक सप्ताह बाद लौटूंगा। इसी प्रकार अपने कुशल-क्षेम से अवगत कराते रहना। बहू रानी को आशीर्वाद और बच्चों को प्यार। 
                                                                                                                                        सस्नेह — तुम्हारा
                                                                                                                                                          सुमन

सन् 1983 में, ‘उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान’ के पुरस्कार-निर्णायकों में मुझे भी शामिल किया गया — जैसा कि ‘सुमन’ जी ने सूचित किया था। मेरे पास पुरस्कार के विचारार्थ उपन्यास आये। श्री भीष्म सहानी का ‘बसन्ती’ उपन्यास पुरस्कृत किया गया। मेरी कार्य-तत्परता से ‘सुमन’ जी संतुष्ट हुए और मुझे लिखा:

उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ
दि. 20 अप्रैल 1983

प्रिय महेंद्र,
तुम्हारा दिनांक 14/4 का पत्र प्राप्त कर बड़ी प्रसन्नता हुई।
तुमने संस्थान का कार्य समय पर समाप्त कर दिया, इससे मुझे सुख मिला। अभी मैं  यहाँ अगले नौ-साढ़ेनौ महीने तो हूँ ही, तुम जब भी इस ओर आओ तो अवश्य मिलना। जिससे सम्भावित चर्चा हो सके। सस्नेह —
                                                                                                                                           तुम्हारा,   सुमन

चेकोस्लोवेकिया के हिन्दी-प्रोफ़ेसर और हिन्दी के लेखक-कवि डा. ओडोलेन स्मेकल से मेरी मित्रता की जानकारी ‘सुमन’ जी को थी। ‘सुमन’ जी जब चेकोस्लोवेकिया गये तो डा. स्मेकल ने उनकी बड़ी आवभगत की। डा. ओडोलेन स्मेकल ने मेरी अनेक कविताओं के चेक भाषा में अनुवाद किये हैं; जिनमें से अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं । ‘सुमन’ जी ने मुझे बताया:

उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ / दि. 19 जुलाई 1983 / कैम्प उज्जैन
प्रिय महेंद्र,
चेकोस्लावकिया से लौटने पर तुम्हारा पत्र प्राप्त कर प्रसन्नता हुई। स्मेकल ने वहाँ बड़ी ख़तिर की। अगस्त में वह भारत आ रहा है। विश्व हिन्दी सम्मेलन में भी सम्मिलित होगा। तब तुमसे मुलाक़ात होगी ही।
स्नेह-आशिष सहित —
तुम्हारा,   सुमन

30 जून 1984 को सेवानिवृत्त होते ही ‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग’ द्वारा स्वीकृत शोध-परियोजना (‘प्रेमचंद के कथा-पात्र: सामाजिक-स्तर और उनकी मानसिकता’) पर कार्य प्रारम्भ कर दिया। ‘सुमन’ जी का प्रसन्न होना स्वाभाविक था :

उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ /  दि. 24 सितम्बर 1984

प्रिय महेंद्र,
28/8 का पत्र यथासमय प्राप्त हो गया था। रिसर्च प्रोजेक्ट स्वीकृत हो जाने की सूचना पाकर प्रसन्नता हुई। अभी तुम्हें और भी बड़े कार्य करने हैं। आचार्य शुक्ल-शती-समापन समारोह 20-21 अक्टूबर को करने का विचार है। शीघ्र ही सूचना पहुँचेगी।
                                                                                                                            सस्नेह — तुम्हारा, सुमन

‘सुमन’ जी ने मुझसे ग्वालियर रियासत विषयक एक जानकारी चाही। संयोग से मित्र श्री शम्भुनाथ सक्सेना जी-द्वारा सम्पादित ‘नर्मदा’ के एक विशेषांक में यह जानकारी उपलब्ध हो गयी। ‘सुमन’ जी को अच्छा लगा; मुझे भी:

उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ / दि. 25 मई 1985
प्रिय महेंद्र,
तुम्हारा 4/5 का पत्र प्राप्त कर प्रसन्नता हुई।
महाराजा जीवाजीराव के राज्याभिषेक के संबंध में मुझे वहीं तिथियाँ चाहिए, जब वे राजगद्दी पर प्रतिष्ठित हुए थे। क्योंकि उसी समय उनके राज्याभिषेक के सांस्कृतिक महोत्सव में मैंने हिन्दी-उर्दू काव्य-समारोह के साथ जोश मलिहाबादी को भी बुलाया था। इस बीच जोश के पुश्तैनी गाँव मलीहाबाद भी हो आया। उनके संस्मरण के सिलसिले में मुझे उक्त तिथियों की आवश्यकता पड़ गयी है। कोई बहुत बड़ी बात नहीं है, पर मुझे किसी संस्मरण में इतिहास संबंधी त्रुटियाँ नहीं करनी चाहिए।
                                                                                                                            सस्नेह — आपका, सुमन

उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ /  दि. 25 जून 1985
प्रिय महेंद्र,
तुम्हारा 20 जून 85 का पत्र प्राप्त कर बड़ी प्रसन्नता हुई। विशेषकर इस बार तुमने इतना परिश्रम करके महाराजा जीवाजीराव सिंधिया के राज्याभिषेक की तिथि उपलब्ध करा ही दी। यह तुम्हारी निष्ठा का परिचायक है।
                                                                                                                            सस्नेह — तुम्हारा,  सुमन

‘सुमन’ जी ‘उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान’ लखनऊ से कब वापस उज्जैन आ गये; पता नहीं चला। मेरा पत्र उन्हें पुनर्निर्देशित होकर मिला। डा. नामवर सिंह के उललेख का संदर्भ याद नहीं आता :

उज्जैन  /  दि. 25 अप्रैल 1986
प्रिय महेंद्र,
तुम्हारा 1 जनवरी 1986 का पत्र पुनर्निर्देशित होकर मुझे यहाँ कुछ समय पूर्व मिल गया था। शायद तम्हें पता नहीं था कि मैं विगत 2 जनवरी 86 को लखनऊ से अलविदा कह कर उज्जैन वापस आ गया, घर के बुद्धू घर को आए। तुम इस ओर आओ तो अवश्य मिलना। यह जान कर संतोष होता है कि तुम निरन्तर काम में लगे रहते हो। यह जागरूकता ही तुम्हारे जीवन को सार्थक करेगी। नामवर मिलेंगे तो तुम्हारे लिए अवश्य कहूंगा।
सस्नेह — तुम्हारा सदा का,
सुमन

इस बीच, किसी एक और पत्र के उत्तर में ‘सुमन’ जी ने, आत्मीयतावश लिखा :

उज्जैन  /  31 मई 1986
प्रिय महेंद्र,
तुम्हारा 15/5 का पत्र प्राप्त कर प्रसन्नता हुई।
मुझे यहाँ आए पाँच महीने हो गए, जिसकी कुल कमाई एक कविता, एक लेख और आधे दर्जन भाषण हैं , पुष्पितां वाचां वाले। इस ज़िन्दगी का आख़िरी दौर समझो, सँभला तो ठीक, अन्यथा हर गंगा।
अपने समाचार देना।
                                                                                                                 सस्नेह — तुम्हारा,   सुमन

15 मई 1986 को सम्पर्क करने के बाद, फ़रवरी 1999 में ‘पद्मभूषण’ से विभूषित होने पर उन्हें बधाई दी। उत्तर में कविता-संग्रह ‘आहत युग’ पर ‘सुमन’ जी ने, माना कि एक ही पंक्ति लिखी; किन्तु सार्थक और विशिष्ट :

उज्जैन  /  11 फ़रवरी 99
प्रिय महेंद्र,
पद्मभूषण पर आपकी बधाई प्राप्त कर कृतकृत्य हुआ। इसे आप जैसे आत्मीय की मंगलकामना का ही प्रतिफल मानता हूँ। आशीर्वाद दीजिए कि इसके योग्य स्वयं को प्रमाणित कर सकूँ। मैं ने तो इसे महाकाल के श्रीचरणों में समर्पित कर दिया है।
                                                                                                                                            तुम्हारा,  सुमन
पु. —  
तुम्हारा ‘आहत युग’ अभी व्यस्तता के कारण नहीं पढ़ पाया। यों नज़र डाली तो उसमें तुम्हारी परिपुष्ट व्यंजनाएँ अवश्य प्रभविष्णु प्रतीत हुईं। — सुमन

‘सुमन’ जी मेरे जीवन में एक महत्त्वपूर्ण सहयोगी-मित्र के रूप में आये। जब-जब कोई बड़ी परेशानी आयी; उन्हें लिखा। उन्होंने यथासम्भव मेरी परेशानियों को दूर करने में मदद की। ‘सुमन’ जी स्वभाव से ही बड़े उदार हैं। दूसरों को सम्मान देना उनका संस्कार है। उनका वार्तालाप सदा शोभन रहता है।‘सुमन’ जी की मौज़ूदगी का अर्थ है — उच्च स्तर, गरिमा, सहृदयता, बौद्धिक ऊँचाई, साकार सांस्कृतिक परिवेश। उन्होंने किसी से कुछ नहीं चाहा। स्वार्थ-भावना से वे सदैव मुक्त रहे। अनेक धूर्तों की चालबाज़ियों का, क्षति पहुँचाने की उनकी कुचेष्टाओं का उन्होंने खुल कर-जम कर सामना किया। बड़ी हिम्मत और  ऊर्जा उनके व्यक्तित्व में समायी हुई है। हताश होना उन्होंने कभी जाना ही नहीं:

तूफ़ानों की ओर घुमा दो नाविक !  निज पतवार !
अथवा
पग के अथक-अभ्यास पर विश्वास बढ़ता ही गया !

जैसी प्रेरक काव्य-पंक्तियाँ जीवन को दिशा प्रदान करती हैं। उनका काव्य हिन्दी-साहित्य में ही नहीं, भारतीय साहित्य में ही नहीं; वरन् विश्व-साहित्य में महत्त्वपूर्ण स्थान का अधिकारी है। वे एक कालजयी कवि के रूप में इतिहास के पृष्ठों पर अंकित हो चुके हैं।
डॉ. महेन्द्रभटनागर, 
110 बलवन्तनगर, गांधी रोड, ग्वालियर — 474 002 [म॰ प्र॰] 
फ़ोन : 0751-4092908
ई-मेल : drmahendra02@gmail.com










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