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कुछ दिन पहले की बात है। यहीं कोई दो माह पहले की। मुझे अपने कार्यक्षेत्र, अपने विद्यालय से एक परियोजना पर काम करने का अवसर मिला था। पर्यावरणीय चिंतन। र्पावरणीय चिंतन पर कुछ काम करते हुए मुझे जलवायु परिर्वतन पर कुछ तथ्य प्रस्तुत करना था। चिंता में सराबोर करने वाले तथ्य। लोगों को सोचने पर विवश करने वाले तथ्य।

केशव मोहन पाण्डेयरचनाकार परिचय:-



नाम : केशव मोहन पाण्डेय वर्तमान पता: महिपालपुर, नई दिल्ली स्थायी पता : सेवरही, (तमकुही रोड), कुशीनगर, उत्तर-प्रदेश शिक्षा : एम.ए. (हिंदी), बी. एड. साहित्य-कर्म : • गृह नगर में जुलाई 2002 से साहित्यिक संस्था ‘संवाद’ का संचालन • वर्ष 2013 में भोजपुरी कहानी-संग्रह 'कठकरेज' प्रकाशित। • अलग-अलग मंचों से दर्जनों नाटकों का लेखन के साथ निर्देशन। • आकाशवाणी गोरखपुर से अनेक हिंदी और भोजपुरी कहानियों का प्रसारण। • दैनिक जागरण, हिंदुस्तान, यूनाइटेड-भारत, विश्वगाथा, भोजपुरी-पंचायत, हेलो-भोजपुरी समेत अनेक पत्र-पत्रिकाओं में तीन सौ से अधिक लेख, दर्जनों कहानी, साक्षात्कार और अनेक कविताओं का प्रकाशन। • हिंदी टेली फिल्म 'औलाद' समेत भोजपुरी फिल्म ‘कब आई डोलिया कहार’ के लेखन के साथ ही टी वी धारावाहिकों और अनेक अलबम्स के लिए हिंदी, भोजपुरी गीत रचना। • साल 2002 से शिक्षण और पाठ्यक्रम निर्माण में संलग्न और वर्तमान में दिल्ली में शिक्षण-कार्य और स्वतंत्र लेखन। पुरस्कार व सम्मान : • वर्ष 2013 में विश्व-भोजपुरी सम्मलेन दिल्ली द्वारा 'श्री सिपाही सिंह श्रीमंत' सम्मान। • वन-विभाग कुशीनगर (उ. प्र.) द्वारा पर्यावरणीय नाटक के लेखन और निर्देशन के लिए 2004 में सम्मानित। • किसान पी जी कॉलेज सेवरही, कुशीनगर (उ. प्र.) द्वारा अपने नाटक 'जंग ज़ारी है' के लिए सम्मानित। सम्पर्क : kmpandey76@gmail.com

जीवन की आशाओं का तथ्य। जीवन पर मँडराने वाले ग्रहण का तथ्य। वैचारिक अभिक्रियाओं का तथ्य और विचारशील कर्मठता का तथ्य। उन्हीं तथ्यों और स्रोतों की तलाश में एक सहकर्मी से किरिबाती देश का नाम सामने आया।
वास्तव में मैं किरिबाती देश से पूर्णतया अनभिज्ञ था। जब स्रोतों का अध्ययन करने लगा तो पता चला कि किरीबती लगभग तीस से भी अधिक द्वीपों का समूह और एक उठे हुए प्रवाल द्वीप से बना देश है। इसकी राजधानी दक्षिणी तवारा है। भूमध्य रेखा में विस्तारित इस देश के पूर्व से अंतरराष्ट्रीय तिथि रेखा गुजरती है। किरिबाती को स्थानीय भाषा में गिल्बेर्ट्स कहा जाता है। यह नाम यहाँ के मुख्य द्वीप श्रृंखला गिल्बर्ट द्वीप से लिया गया है। किरिबाती 1979 में ब्रिटेन से स्वतंत्र हुआ। यह राष्ट्रमंडल, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष व विश्व बैंक का सदस्य है। 1999 में यह देश संयुक्त राष्ट्र का पूर्ण सदस्य बन गया। समुद्र से दो मीटर की ऊंचाई पर बसे किरिबाती द्वीप समूह के 32 द्वीपों के अगले 50 साल में समुद्र में समा जाने का अनुमान लगाया जा रहा है। प्रशांत महासागर में स्थित यह द्वीपीय देश जलवायु परिवर्तन का पोस्टर बन गया है। किरिबाती की पुरानी छवि प्रवाल द्वीपों, ताड़ के पेड़ों, मूंगे की चट्टानों और सामान्य जीवनशैली वाले देश की है, लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र का स्तर बढ़ने की वजह से इसे खतरा पैदा हो गया है।
स्वतंत्रता की दृष्टि से किरिबाती भले ही एक नवीन देश हो परन्तु इसका इतिहास 3000 ईसापूर्व से माना जाता है। इसका कुल क्षेत्रफल 811 वर्ग किमी है। यहाँ संसदीय गणतंत्र की सरकार है। यहाँ का राजनैतिक माहौल बड़ा ही शांत और स्वच्छ है। यहाँ के राष्ट्रपति श्री एनोट टोंग तथा उपराष्ट्रपति तेइमा ओनोरिओ है। यहाँ पर जातीय समूहों में 98 प्रतिशत माइक्रोनेशियन जाति के लोग रहते हैं जबकि बाकी दो प्रतिशत में अन्य जातियाँ हैं। 2010 की जनणना के अनुसार यहाँ पर करीब एक लाख तीन हजार पाँच सौ लोग है। इस प्रकार यहाँ की जनसंख्या घनत्व 135 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है। किरीबती में किरीबती डालर तथा आस्ट्रेलियन डालर मुद्रा है। किरिबाती एक परोपकारी चिंतन रखने वाला देश है। इस देश का राष्ट्रीय वाक्य है - ते माउरी, ते राओई आओ, ते ताबोमोआ अर्थात् ‘स्वास्थ्य, शांति एवं समृद्धि’। यह द्वीपीय देश धरती की सबसे अधिक आबादी वाली जगहों में से एक है। ताजा अनुमानों के मुताबिक यहाँ करीब एक लाख दस हजार लोग रहते हैं। इनमें से आधे लोग दक्षिण तारावा द्वीप पर ही रहते हैं। इस प्रकार दक्षिण तरावा किरिबाती की राजधानी होने के साथ-साथ देश का सबसे बड़ा नगर है। यहाँ की राजभाषा अंग्रेजी के साथ ही जिलिबर्टीज भी है।
ब्रिटेन से आजादी मिलने के बाद किरिबाती की आबादी तेजी से बढ़ी है। यहाँ के गाँव अब आपस में जुड़ गए हैं। यहाँ सड़क के किनारे और समुद्र के पास भरपूर शहरीकरण हुआ है। यहाँ जमीन की कमी का मतलब है, बहुत कम खेती और अत्यधिक जल। ऐसे में यहाँ के निवासी खाने के लिए आयातित, प्रसंस्कृत और जलीय खाद्य पदार्थों पर बहुत अधिक निर्भर हैं। किरिबाती में बड़े पैमाने पर आर्थिक पलायन हुआ है। वहाँ दक्षिणी टवारा की ओर पलायित होने का एक यह भी कारण है कि यह देश समुद्र में समाहित होता जा रहा है। बात यह सामने आयी कि पर्यावरणीय परिवर्तन और प्राकृतिक असंतुलन के कारण किरिबाती अगले पचास वर्षों में पूर्णतः समुद्र में समा जाएगा। देश का जलावतरण हो रहा है और वहाँ के लोग जीवन बचाने की आशा में पलायित हो रहे हैं। यहाँ के राष्ट्रपति का सकारात्मक सोच और वैश्विक मंच से लगातार प्रश्न उठाए जाने के कारण लोगों की जिजीविषा बढ़ने लगी है। राष्ट्रपति एनोटे टोंग माने हैं कि ‘‘बाहरी द्वीपों पर रहने वाले समुदाय प्रभावित हुए हैं। हमारा एक गाँव डूब गया। बहुत सी जगह समुद्र का पानी तालाब के साफ पानी में मिल गया। यह फसलों को भी प्रभावित कर रहा है।’’ उनका कहना है कि ‘‘ऐसा देश के बहुत से द्वीपों पर हो रहा है। यह कोई अलग सी घटना नहीं है। गंभीर किस्म के जल सैलाबों को देखा गया है। यह सब वास्तविकता है, जिसका हम सामना कर रहे हैं, चाहें वो जलवायु परिवर्तन से प्रेरित हो या न हों।’’ बात यह है कि आबियांग तारावा के उत्तर में स्थित कम आबादी वाला द्वीप है, जहाँ का एक गाँव समुद्र की लहरों में समा गया है।
किरिबाती के राष्ट्रपति एनोटे टोंग ने विश्व मंच से अनेक बार पर्यावरणीय परिवर्तन पर अपनी आवाज़ बुलंद की है। वे विश्व के विकसित देशों से अपने नागरिकों के जीवन के लिए जमीन की माँग की है। उनका मानना है कि आज जो विश्व समुदाय के समक्ष जलवायु परिवर्तन से खतरा उत्पन्न हुआ है, उसके पीछे औद्योगिक विकास और प्रकृति का दोहन है। चीन का उदाहरण देकर यह बात सिद्ध किया जा सकता है कि औद्योगिक विकास के लिए बहुत से देश पर्यावरण की चिंता ही नहीं करते। अगर किरिबाती में जो भी खेती की जमीन है, तो वहाँ की मुख्य उपज में नारियल और प्रशांत महासागर द्वीपों में उगने वाला एक गोलाकार फल ब्रेडफ्रूट है। हालांकि यहाँ फसलों के बहुत लंबे समय तक टिके रहने पर संदेह है जिसके कारण न चाहते हुए भी इस देश ने प्रमुख खाद्य निर्यातक बनने के लिए सहायता एजेंसियों के प्रस्ताव लेना शुरू कर दिया है। इस प्रकार किरिबाती के लिए भोजन, आवास और जीवन, सबकी चिंता समान रूप से मुँह बा रही है।
अब देश में खाद्य सुरक्षा की कमी के बाद भी दक्षिण तारावा एक तरह से सुरक्षा का आभास दे रहा है। इसका अधिकांश भाग समुद्री दीवारों से सुरक्षित किया गया है। इन दीवारों को स्थानीय लोगों ने आसपास खुदाई करके बनाया है। यहाँ सड़कों की सुरक्षा के लिए सीमेंट से बनी नई दीवार बालू के बोरों से भरी है। दुर्भाग्य से समुद्र से सुरक्षा के दोनों तरीकों का हानिकारक प्रभाव पड़ रहा है। मगर जीवन की तलाश में मानव लाभ-हानि की चिंता कहाँ करता। वह तो बस हर लाभ पर हँता है और हर हानि पर रोता है। राष्ट्रपति टोंग कहते हैं कि जनसंख्या का दवाब और पर्यावरण क्षरण तात्कालिक समस्याएं हैं। ऐसे में यहाँ जिंदा रहने की कोशिश कर रहे लोगों के लिए जलवायु परिवर्तन पर एक परिप्रेक्ष्य पाना कठिन है। उनके पास ऐसी चीजों का सामना करने के लिए संसाधन नहीं हैं, जो उनके जीवन को सीधे प्रभावित नहीं करेंगी। हम पर खतरा मंडरा रहा है। हम फ्रंट लाइन पर हैं।
बदलते पर्यावरण और प्रकृति के दोहन का प्रभाव एक मात्र किरिबाती के द्वीपों पर ही नहीं पड़ रहा है। जब मैं अपने प्रोजेक्ट की तैयारी में पढ़ाकू कीड़ा बना हुआ था तब पता चला कि आज दुनिया के अनेक द्वीपों पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण समुद्र का बढ़ता जलस्तर है। वैज्ञानिकों द्वारा आशंका व्यक्त किया जा रहा है कि कहीं माॅरीशस, लक्षद्वीप और अंडमान द्वीपसमूह के साथ श्रीलंका और बांग्लादेश जैसे देशों का अस्तित्व भी समाप्त हो सकता है। एक आकलन के अनुसार अब तक पूरी दुनिया में करीब 2.5 करोड़ लोग द्वीपों के डूबने के कारण विस्थापित हुए हैं। यदि राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान की मानें तो खाड़ी के द्वीपों में से ज्यादातर के हालात ठीक नहीं हैं। पर्यटन के लिहाज से बड़े केन्द्र और खूबसूरत देशों में शुमार मालदीव पर भी खतरा मंडरा रहा है। बताया जाता है कि जलवायु परिवर्तन के कारण मालदीव ने आबादी को नई जगह बसाने की योजना बनायी है और इसके लिए जमीन खरीदने पर भी विचार कर रहा है। अब तक समुद्र के जलस्तर बढ़ने से दुनिया में 18 द्वीप पूरी तरह जलमग्न हो चुके हैं। 54 द्वीपों के समूह सुन्दरवन पर भी खतरा मंडरा रहा है। आकलैंड, न्यूजीलैंड प्रशांत द्वीप क्षेत्र में स्थित 10 लाख की आबादी वाला किरिबाती देश के द्वीप भी संकट में है। समुद्र का पानी दक्षिण प्रशांत क्षेत्र के इस देश को पाट सकता है। किरिबाती का उच्चतम बिंदु समुद्र तल से केवल दो मीटर अधिक है। अभी किरिबाती के लोगों को बसाने की खातिर 6000 एकड़ जमीन खरीदकर फिजी में शिफ्ट करने की योजना पर भी काम चल रहा है।
दरअसल मौजूदा हालात में 0.2 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक की रफ्तार से तापमान में बढ़ोतरी हो रही है जिसके कारण 2100 तक चार डिग्री तक दुनिया का तापमान बढ़ जायेगा। इसके कारण समुद्र के जलस्तर में दिनोंदिन बढ़ोतरी का अहम कारण ग्लोबल वार्मिंग है, जिसके चलते द्वीपों पर डूबने का खतरा मंडरा रहा है। दुनिया के वैज्ञानिकों ने आशंका व्यक्त की है कि यदि समुद्र के जलस्तर में बढ़ोतरी की यही रफ्तार रही तो 2020 तक 14 द्वीप पूरी तरह खत्म हो जाएंगे। नतीजन जहाँ मुंबई, शंघाई, बीजिंग, न्यूयार्क जैसी बड़ी आबादी वाले तटीय शहरों के लिए खतरा बढेगा, वहीं बाढ़, सूखा तूफान, हिमस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं की तादाद में भी बढ़ोतरी होगी। संयुक्त राष्ट्र का आकलन है कि समुद्र के बढ़ते जलस्तर से छोटे-छोटे द्वीपों पर रहने वाले तकरीब दो करोड़ लोग साल 2050 तक विस्थापित हो चुके होंगे। वैज्ञानिकों का मानना है कि 21वीं सदी के अंत तक समुद्र के जलस्तर में एक मीटर की बढ़ोतरी होगी। इस बारे में असल दिक्कत यह है कि कार्बन उत्सर्जन के मामले में अमीर देश भारत और चीन जैसे देशों पर ज्यादा बोझ डालने की कोशिश में हैं।
जलवायु परिवर्तन से मानवीय, पर्यावरणीय और वित्तीय नुकसान बर्दाश्त से बाहर होता जा रहा है। इसके लिए पूरे विश्व को कार्बन उत्सर्जन कम करना होगा। जीवन की आशा बची रहेगी। इसके लिए सबको मिलकर काम करना पड़ेगा। मिलकर प्रयास करना पड़ेगा। धरती पर बढ़ते तापमान के खतरे के लिए, पारिस्थितिकी संतुलन के लिए, समुद्री द्वीपों के संरक्षण के लिए कानून बनाना होगा। जब हम मिलकर प्रयास करेंगे तभी बचाव की उम्मीद बचायी जा जा सकती है। किरिबाती जैसे एक देश को उसके जलावतरण से उसे बचाया जा सकता है।

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