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केंद्र सरकार ने एक बार फिर भूमि अधिग्रहण अध्यादेष को जारी कर दिया है। लोकसभा में नौ संशोधन होने के बाद पारित हुए विधेयक को सरकार ने राज्यसभा में प्रस्तुत नहीं किया। सरकार के सभी प्रमुख मंत्रियों ने, यहां तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ‘मन की बात’ में भूमि अधिग्रहण विेधेयक से किसानों को होने वाले लाभों और विपक्षी दलों द्वारा फैलाये जा रहे भ्रम को बताया, परंतु बात नहीं बनी।

 डॉ.पुष्पेंद्र दुबे रचनाकार परिचय:-

डॉ.पुष्पेंद्र दुबे, डी-37 सुदामानगर, इन्दौर


यह भूमि अधिग्रहण विधेयक वैसा ही जैसा हिन्दी के उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने ‘रंगभूमि’ उपन्यास में चित्रित किया है। इस उपन्यास में वर्णित तथ्य 2015 में वर्तमान सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण विधेयक में ज्यों की त्यों उभरते दिखाई देते हैं। उपन्यास के पात्र जान सेवक और सूरदास के बीच हुए संवाद से मुंषी प्रेमंचद की चिंताएं समझ में आती हैं। सूरदास भीख मांगने के लिए जान सेवक की गाड़ी के पीछे दौड़ लगा देता है। जान सेवक को सिगरेट का कारखाना खोलने के लिए जमीन चाहिए। जान सेवक अपने मुलाजिम ताहिर से गोदाम के पीछे की जमीन का सौदा पटाने की बात करता है। ताहिर बताता है कि यह जमीन सूरदास की है। तब जान सेवक जमीन बेचने के लिए सूरदास से बात करते हैं।

‘‘साहब ने गाड़ी रुकवा दी, लज्जित नेत्रों से मिसेज सेवक ने देखा, गाड़ी से उतरकर सूरदास के पास आए और नम्र भाव से बोले - क्यों सूरदास, यह जमीन तुम्हारी है ?

सूरदास - हां हुजूर, मेरी ही है। बाप-दादों की इतनी ही तो निषानी बच रही है।

जान सेवक - तब तो मेरा काम बन गया। मैं चिंता में था कि न-जाने कौन इसका मालिक है। उससे सौदा पटेगा भी या नहीं। जब तुम्हारी है, तो फिर कोई चिंता नहीं। तुम जैसे त्यागी और सज्जन आदमी से ज्यादा झंझट न करना पड़ेगा। जब तुम्हारे पास इतनी जमीन है, तो तुमने यह भेष क्यों बना रखा है ?

सूरदास - क्या करूं हुजूर, भगवान् की जो इच्छा है, वह कर रहा हूं।

जॉन सेवक - तो अब तुम्हारी विपत्ति कट जाएगी। बस, यह जमीन मुझे दे दो। उपकार का उपकार, और लाभ का लाभ। मैं तुम्हें मुंह-मांगा दाम दूंगा।

सूरदास - सरकार, पुरुखों की यह निशानी है, बेचकर उन्हें कौन मुंह दिखाउंगा।

जान सेवक - यहीं सड़क पर एक कुआं बनवा दूंगा। तुम्हारे पुरखों का नाम चलता रहेगा।

सूरदास - साहब, इस जमीन से मोहल्ले वालों का बड़ा उपकार होता है। कहीं एक अंगुल भी चारा नहीं है। आसपास के सब ढोर यहीं चरने आते हैं। बेच दूंगा, तो ढोरों के लिए कोई ठिकाना नहीं रहेगा।

जान सेवक - कितने रुपये साल चराई के पाते हो ?

सूरदास - कुछ नहीं, मुझे भगवान खाने भर को यों ही दे देते हैं, तो किसी से चराई क्यों लूं ? किसी का और कुछ उपकार नहीं कर सकता, तो इतना ही सही।

जॉन सेवक - आष्चर्य से तुमने इतनी जमीन यों ही चराई के लिए छोड़ रखी है ? सोफिया सत्य कहती थी कि तुम त्याग की मूर्ति हो। मैंने बड़ों-बड़ों में इतना त्याग नहीं देखा। तुम धन्य हो! लेकिन जब पशुओं पर इतनी दया करते हो, तो मनुष्यों को कैसे निराश करोगे ? मैं यह जमीन लिए बिना तुम्हारा गला न छोडूंगा।

सूरदास - सरकार, यह जमीन मेरी जरूर है, लेकिन जब तक मुहल्लेवालों से न पूछ लूं, कुछ कह नहीं सकता। आप इसे लेकर क्या करोगे ?

जान सेवक - यहां एक कारखाना खोलूंगा, जिससे देश और जाति की उन्नति होगी, गरीबों का उपकार होगा, हजारों आदमियों की रोटियां चलेंगी। इसका यश भी तुम्हीं को होगा।

सूरदास - हुजूर, मुहल्लेवालों से पूछे बिना मैं कुछ नहीं कर सकता।

जान सेवक - अच्छी बात है, पूछ लो। मैं फिर तुमसे मिलूंगा। इतना समझ रखो कि मेरे साथ सौदा करने से तुम्हें घाटा न होगा। तुम जिस तरह खुश होगे, उसी तरह खुश करूंगा। सूरदास के समान ही आज किसानों की लड़ाई औद्योगीकरण के अंधानुकरण से है। अंततः सूरदास की जमीन छिन जाती है, क्योंकि उसके पास विकल्प नहीं रहता, परंतु आज किसानों पास ‘ग्रामदान’ और ग्रामस्वराज्य का विकल्प मौजूद है। सूरदास यह अवश्य कहता है कि मुहल्लेवालों से पूछूंगा, परंतु वह अपनी जमीन बचाने में नाकाम रहता है। आज यदि किसान जमीन पर व्यक्तिगत मालकियत का मोह छोड़कर विनोबा भावे के ग्रामदान विचार के मुताबिक ग्राम रचना कर लेते हैं, तो भूमि अधिग्रहण विधेयक को नकारा जा सकता है। किसानों के लिए राजनीतिक आंदोलन के माध्यम से अपनी जमीन बचाना कठिन होगा। उन्हें इस विधेयक की काट स्थानीय स्तर पर ही करना होगी।

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