टायरों की जली काली मिट्टी से सना
मोबिल में लिपटा काला लड़का 
जब हँसता है तो 
पूरी दुनिया 
उसकी सफेद दूधिया दाँतों में फँस जाती है l 

रात है गहरी -
छोटी सी दुनिया में मस्त ये छौरे
गैराज में छितरा रहे इधर-उधर -
पसर रहे गमछे बिछा
अपने बटुए टटोलते
पेट में पैर डाल
आधी नींद में
अगले बस कार ट्रक की प्रतीक्षा में

सपनों में भागते सुख
का पीछा करती
रोज़ कितनी ही जोख़िम भरी रातें
इन बच्चों की
यूँ ही कट रही गैराज में
टायरों स्क्रू पेंचकश डीजल मोबिल के बीच
सोते-जागते, खाँसते-कुहरते
बीमारियों से लड़ते
मौत के साये में जैसे-तैसे पलते-बढ़ते।

1 comments:

  1. गरीबी और बाल श्रम पर प्रहार करती ये कविता यतार्थ के बहुत करीब है ....सुशील जी को बधाई और शुभकामनाएं !

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