अकेले गुनगुनाऊं
कौन गीत गाऊं?
मम्मी की लोरी
पापा थपकी
बिटिया न झपकी !
जनम दिन आया
सुबह ने बताया
फिर से
दुआओं का कुमकुम
कैसे लगाऊं मैं अबकी !
दूरी बहुत है
आँखों की पुतरी
परदेशी बिटिया
अभी अभी
पांवों में अपने
खड़ी होने की खातिर
तुलसी के चौरे
रपक कर झुकी है,
मकड़ियों के
जालों से
उलझा एकाकी
पीछे छूटी यादें
ख्यालों में अब भी
अक्षत के टीके
फुलहरी में साँसें
गंध सी रुकी है,
कलेजे के टुकरे
पतझर सा बिखरे
कैसे सहेजूँ
फरका की आंधी
गुजर गई कबकी !
अकेले गुनगुनाऊं
कौन गीत गाऊं
मम्मी की लोरी
पापा थपकी
बिटिया न झपकी !
जनम दिन आया
सुबह ने बताया
फिर से
दुआओं का कुमकुम
कैसे लगाऊं मैं अबकी !


==========

 रामेश्वर सिहं राजपुरोहित "कानोडिया"

 बालोतरा
 जिला - बाङमेर
सम्पर्क सूत्र - 9799683421

3 comments:

  1. सर,
    "अकेले गुनगुनाऊं" येआपकी बाल कविता बहुत अच्छी लगी www.gyanipandit.com की और से शुभकामनाये !
    धन्यवाद

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