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सुबह के शोर-शराबे ने जो नींद ख़राब की उसकी परिणीति मेरे जाग जाने में हुई। मनियां,धौलपुर जिले का एक छोटा सा क़स्बा,जिसमें शहरों की बड़ी-बड़ी कॉलोनियों की जगह छोटे-छोटे मोहल्ले हैं,जहाँ लोग बड़े प्यार से मिलजुल कर एक दूसरे के दुःख दर्द बांटते हुए जीवन जीते हैं,कॉलोनियों के एकदम विपरीत।


WRITER NAMEरचनाकार परिचय:-



लेखक का संक्षिप्त परिचय................।

वैसे तो जागने के बाद नित्यकर्म से फ्री हुआ जाता है लेकिन जैसी की दिन की शुरुआत थी उसी के अनुसार मैने शोर वाली जगह पर पहुचना मुनासिब समझा। एक विधवा औरत का रोना सुन कर आस-पड़ोस के अन्य लोग भी मेरी तरह वहाँ पहुँच गए थे। उसे अपने बेटे की मौत की खबर पहले ही मिल गई थी जिसका शरीर अभी-अभी हमारे सामने लाया गया था। उसके मृत शरीर को देखते देखते मैं कब विचारों के भंवर में जा फंसी पता ही ना चला।

सन् 2009,पापा प्रिंसिपल थे जिसके कारण उनका ट्रांसफर होता ही रहता था और उनके साथ-साथ हमारा भी।इसी क्रम में पापा के साथ-साथ हमने भी ना जाने कितने शहर घूमे ,ना चाहते हुए। कभी जयपुर,कभी जोधपुर तो कभी जैसलमेर। पर पापा थे उसूलों वाले,न कभी ट्रांसफर रुकवाया और न ही कभी पसंद की जगह करवाया। ख़ैर नई जगह मनियां थी,एक छोटा सा क़स्बा। वैसे तो सारा सामान ट्रक में लाया गया था लेकिन जिस गली में मकान किराये पर लिया गया था उसकी चौड़ाई कम होने से सामान को बिना ठेले वाले की मदद के घर तक पहुचना संभव नहीं था। तो एक ठेले वाले की मदद ली गई। हल्का सा गोरा रंग जो धूप में काम करते रहने की वजह से सांवला हो गया था,धूप में पके हुए जीवन की कठिन परिस्थितियों को बताते खिचड़ी बाल,चेहरे पर प्रौढ़ उम्र को दर्शाती लकीरें साफ थीं। कठिन परिश्रम करने से बना गठीला शरीर जिस पर सफेद रंग की सैंडो बनियान जो लगातार काफी दिनों तक पहनने से मटमैली हो गई थी या फिर उसने उसी रंग को आत्मसात कर लिया था। बनियान की फितरत भी अजीब है बिलकुल मनुष्य की तरह ,जैसी परिस्थितियों में रहती है उन्हें पूर्णरूपेण आत्मसात कर लेती है। मानो उन्हीं का मूल तत्व हो। कमर के नीचे से पैरों तक ढीला पैंट,जो उसे ठेले वाले की वेशभूषा में प्रदर्शित कर रहा था। धनीराम नाम था उसका शायद ,जिसे सभी ने मिलकर धन्नो मे बदल दिया था। वह उसी गली में रहता था जिस गली में मकान किराये पर लिया था। सभ्य,कम बोलने वाला,ईमानदार, मेहनती और दिल का सच्चा। उसके ये गुण आज के जमाने में उसे मूर्ख समझने के लिए काफी थे।

घर में एक बूढ़ी माँ थी जिसकी खातिर एक सेठ की दुकान पर लगा हुआ था। पिता होते हुए भी नहीं थे। वह संसार त्याग सन्यासी हो गए थे। वैसे ये भी एक अच्छा तरीका है जिम्मेदारियों से भागने का। जब भी किसी व्यक्ति की इच्छायें पूरी नहीं होती या वह जिम्मेदारियां निभाने में असमर्थ होता है तो यह एक रास्ता हमेशा रहता है उसके पास भागने का और दुनियां की नजर में अपने कायरपन को छिपाकर स्वयं को वीर बताने का। लेकिन उसकी माँ भी थी एक दम हाँकड़। माँ ने उसी दिन से खुद को विधवा मान लिया। वह हमेशा कहती,"सन्यासी तो सबइ है जाय बात तो तबई है जब राजा बन के दिखाय"।

धन्नो जिस सेठ की दुकान पर काम करता था वह तो मानो चालाकी में Ph.D था। धन्नो से पूरे दिन बोझा ढुलवता बदले में कुछ रूपये देता उनको भी बहाने बना काटने की फ़िराक में रहता। कभी दुकान के लिए देर हो जाने पर खुद ही धन्नो के घर आ धमकता।कभी गालियां देता तो कभी मार-पीट पर उतारू हो जाता। लेकिन धन्नो को प्रतिकार करते कभी किसी ने न देखा न सुना। पता नहीं क्या मज़बूरी थी उसकी या शायद प्रतिकार उसके स्वभाव में ही नहीं था। न पिता ने घर छोड़ा तब, न माँ ने खुद को विधवा माना तब और न ही अपने बचपन को बर्बाद होते देख उसने कभी प्रतिकार किया।

कुछ दिनों से सेठ का व्यवहार बदल गया था साथ ही धन्नो का भी। अब वह रोजाना रात को लड़खड़ाते हुए गालियां देता हुआ आता। शुरुआती कई सप्ताह तक तो ऐसा केवल रात को ही होता था लेकिन बाद में तो वह दिन में भी ऐसा ही करने लगा। काम पर जाना तो लगभग बंद ही हो गया। और फिर अचानक उसकी मौत की खबर।

डठरि बनाने की जल्दी में किसी के धक्के से मेरी तन्द्रा टूटी। शमसान घाट पर ले जाते समय उसकी माँ का बिलख-बिलख कर रोना ह्रदय को विह्वल किये जा रहा था। उसका बार-बार धन्नो के मृत शरीर से लिपट कर रोना ,लोगों द्वारा उसे जबरदस्ती धन्नो की लाश से अलग करना,सभी कुछ न जाने कितने दिनों तक मेरी स्मृति में बना रहा। धीरे-धीरे गली में जीवन सामान्य हो गया। वैसे भी दुनियाँ किसी की मोहताज नहीं होती ,वह अपनी रफ़्तार से चलती है।उसके चलने पर एक इंसान के आने या जाने से खास फर्क नहीं पड़ता। दिन बीतते हैं यादें धुंधली हो जाती हैं और जिंदगी सामान्य होकर अपनी रफ़्तार से चलने लगती है।

काफी दिनों बाद एक दिन पूरा घर अस्त-व्यस्त था। काम वाली बाई काफी देर से आई। "इतनी देर कहाँ लगा दी सक्को",माँ ने थोड़ी नाराजगी से पूछा। "वाई जी .................वो मैं ............बात सुन्ति रह गई अई",सक्को ने थोडा सकुचाते हुए जबाब दिया। "क्या बात",माँ ने थोड़े नरम लहजे में पूछा।

"वाई जी तुम्नहें पत्तौ है वा धन्नो ने खुदकुशी करी अई। पहलें तो सेठ ने बाय दारू पीवो सिखाय दयो फिर एक दिना खूब सी दारू पियाइ केँ बाको एक कमरा के बराबर को घरु अपने नाम कराइ लयो।पहलें तो पत्तो नईं चली ।पर कछु दिना बाद जब बाये पत्तो चली तो कछु उपाय दिखो नई सो बाने ख़ुदकुशी कर लई",सक्को ने दुःखी स्वर में पूरी बात कह सुनाई।

इस बात के कुछ दिनों बाद सेठ ने धन्नो की माँ को कमरे से निकाल कर उसपर अपना कब्ज़ा कर लिया था।

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