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"सर जी ................!"
"सर जी ................!"
"सर जी ! मेरी बात सुनो|"
"अरे देख नहीं रहा, जरूरी बात हो रही है, थोड़ी देर रुक नहीं सकता?
"सर जी, जरूरी क्या! आधे घंटे से आप तो प्रॉपर्टी की बात कर हैं| जबकि मैं अपना काम छोड़कर आपसे अपने बच्चे की पढ़ाई के बारे में पता करने आया हुँ|"
"बात क्या करनी है, तेरा बच्चा हमारे स्कूल में पढ़ रहा है| स्कूल की वर्दी फ्री, किताबें फ्री, दोपहर को खाना भी फ्री| मजे ही मजे, और बता क्या पूछना है?"

 सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा रचनाकार परिचय:-


हरियाणा स्थित जगाधरी में जन्मे सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा 32 वर्ष तक दिल्ली में जीव-विज्ञान के प्रवक्ता के रूप में कार्यरत रहने के उपरांत सेवानिवृत हुए हैं तथा वर्तमान में स्वतंत्र रूप से लघुकथा, कहानी, बाल - साहित्य, कविता व सामयिक विषयों पर लेखन में संलग्न हैं।
आपकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, यथा “आज़ादी”, “विष-कन्या”, “तीसरा पैग” (सभी लघुकथा संग्रह), “बन्धन-मुक्त तथा अन्य कहानियाँ” (कहानी संग्रह), “मेरे देश की बात” (कविता संग्रह), “बर्थ-डे, नन्हे चाचा का” (बाल-कथा संग्रह) आदि। इसके अतिरिक्त कई पत्र-पत्रिकाओं में भी आपकी रचनाएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं तथा आपने कुछ पुस्तकों का सम्पादन भी किया है।
साहित्य-अकादमी (दिल्ली) सहित कई संस्थाओं द्वारा आपकी कई रचनाओं को पुरुस्कृत भी किया गया है।

"सर जी फ्री कुछ मत दो| मेरी गुजारिश तो यह है कि तीन साल से मेरा बच्चा आपके पास पढ़ रहा है| वो हर साल पास भी हो जाता है पर उसे आज तक न तो दो और दो चार का पता है और न ही दो दुनी चार का| अपना या मेरा नाम लिखना कब सीखेगा, मुझे तो पता नहीं, आपको पता हो तो बता दें|"
सर जी आगंतुक की पूरी बात सुन पाते कि उससे पहले ही उनके मोबाइल की घंटी बज उठी, “यह भैंण की घंटी भी अभी बजनी थी| रूक जरा बात सुन लूँ फिर तुझे बताता हुँ कि तेरे साहबजादे को दो दुनी चार का पता कब लगेगा …………… हाँ साहब जी! जब आप नगदी लेकर पार्टी के सामने बैठोगे न, तो बिकवाल जरूर टूटेगा, आप टेंसन मत लो| बस दोपहर बाद आ जाओ, मैं भी पहुंच जाऊंगा| आज हर हाल में आपकी डील पक्की करवा देंगे| बस आप हमारे कमींसन में कोई कटौती मत करना ......... ठीक है जी, अब रखता हुँ|"
वह उनकी ओर मायूस नजरों से देखते हुए लाचार मुद्रा में खड़ा था| बच्चे सामने के खाली मैदान में कंचे खेल रहे थे|
"हाँ भई, अब बताओ तुम्हे क्या दिक्क्त है, तेरे बच्चे का स्कूल में नाम है और वो हर साल पास भी हो रहा है, और तुझे सरकार से क्या चाहिए?"
"सर जी! स्कूल आते हुए उसे तीन साल हो गए हैं और वो तीन हरफ़ भी ठीक नहीं लिख पाता?"
"हरफ़ लिखने आ गए तब क्या तू उसे हाकिम बना लेगा|"
"हाकिम न सही सर जी, दो हरफ़ पढ़कर कम से कम आपकी तरह प्रॉपर्टी - डीलरी तो कर ही लेगा|"
"तो फिर एक काम कर, सुबह - शाम उसे मेरे प्रॉपर्टी - डीलिंग वाले दफ्तर में भेज दिया कर| अभी तो साफ़ - सफाई करेगा| दो - चार साल में काम भी सीखा दूंगा| हो सकता है जल्दी भी सीख जाए क्योंकि लड़का तेरा होनहार है|" मास्टर जी ने अपनी पैनी नजर उस पर टिका दी|
"सर जी| मैं तो अपने बच्चे की पढ़ाई के बारे में जानने आया था|" वह लाचार होकर बोला तो मास्टर जी को भिनकते देर नहीं लगी, “अरे फ्री के सौदागरों, मैंने उसकी पढ़ाई पूरी होने से पहले ही उसका रोजगार पक्का कर दिया| इस स्कूल में दो दुनी चार जान कर वो क्या हर रोज तुझे अंडे दे दिया करेगा| जा अब सिर मत खा, अभी मुझे हाजिरी लगाकर जरूरी काम के लिए निकलना भी है| मेरी बात, तेरे समझ में आ गयी हो तो फिर कभी फुर्सत में आना, तेरे बच्चे को ही नहीं तुझे भी दो दुनी चार का पहाड़ा अच्छी तरह से रटवा दूंगा|”
उसने अपने बच्चे को बुलाया और उसका हाथ पकड़ कर बोला, "चल मेरी रेहड़ी पर बैठ, तुझे सब्जी बेचने के गुर सिखाऊँ| मास्टर जी को जरूरी काम करने दे|”

2 comments:

  1. बहुत बढ़िया आपका नया लेख अच्छा लगा, शुभकामनाये !

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  2. अच्छी लघु कथा.…
    ~अशोक तिवारी

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