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विजयलक्ष्मी विभा
मन रे तू भी हो जा योगी ।
दे संदेश जगत को ऐसा , रहे न कोई रोगी ।।
माला जपे न करे तपस्या , बने न यह जग ढोंगी ।
केवल प्राणायाम करे नित , हो तेरा सहयोगी ।।
जो चाहेगा तुझे मिलेगा , चाहत पूरी होगी ।
सतगुरु दे यह सीख जगत को , योगी हो हर भोगी ।।
चलो विभा कर लो योगासन , हरदम स्वस्थ रहोगी ,
मन योगी हो जाये , सत्वर , प्रभु के चरण गहोगी ।।


विजयलक्ष्मी विभारचनाकार परिचय:-



विजयलक्ष्मी विभा

----------------------------------विजयलक्ष्मी विभा --------
--------- मन रे योग बडा गुणकारी -------
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विजयलक्ष्मी विभा
मन रे योग बडा गुणकारी ।
तू अपना ले इसको तो हो , कभी न तेरी हारी ।।
देता यह सबको नव जीवन , जन-जन का हितकारी ।
लाभ प्राप्त करते हैं इससे , रोगी और व्यभिचारी ।।
शरण चला जा तू सतगुरु की , जो हो यों उपकारी ।
बिना दक्षिणा माँगे देवें , तुझको विद्या सारी ।।
संयम - नियम , धर्म की देवें , शिक्षा बारी -बारी ।
सांस-सांस में लिख दें जग की , प्रभु की महिमा न्यारी ।।
जब तक जग में रहे विभा तू , जीवन जी सुखकारी ,
सतगुरु जब आलोक बिछायें , धो ले सब अँधियारी ।।

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विजयलक्ष्मी विभा
-----कर ले प्राणायाम----
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विजयलक्ष्मी विभा
भाई रे , कर ले प्राणायाम ।
हर दुख का उपचार यही है , यही अनौखा बाम । ।
मत दे दोष जगत को पगले , कर न इसे बदनाम ।
दुख ही दुख मिलते गर तुझको , है तू ही नाकाम । ।
बैठे- बैठे जीना चाहे , करे न कोई काम ।
कैसे चले यंत्र इस तन का , करे न तू व्यायाम ।।
राग द्वेष , आलस से होगा , तेरा काम तमाम ।
बिन बरखा बादल छायेंगे , होगी दिन में शाम ।।
चल दे तू सतगुरु के पथ पर , जा उनके ही धाम ।
विभा बतायेंगे वे तुझको , कहाँ मिलेंगे राम ।।

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विजयलक्ष्मी विभा
----------देख रे मन अपना दर्पन --------
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विजयलक्ष्मी विभा
देख रे मन अपना दर्पन ।
धूल चढी जो इसे साफ कर , हो प्रभु का दर्शन ।।
जिस तन के भीतर तू रहता , उसमें लगे व्यसन ।
इन्हें दूर करने को जग का , काम न आये धन । ।
पा जायेगा मुक्ति जगत से , करले ले योगासन ।
तेरे साथ चलेगा तेरा , यद्यपि लघु है तन ।।
विलोमनुलोम कपाल भारतीऔर मयूरासन ।
जो सिखलायें सतगुरु तुझको , सीख उसे रे मन ।।
सतगुरु देंगे तुझको उज्जवल ऐसा एक रतन ।
उनके पथ पर चले विभा तो, मिलें तुझे भगवन ।।

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विजयलक्ष्मी विभा

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