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आज यमराज के दरबार में एक अजीबोगरीब मामले की सुनवाई चल रही थी , सभी सभासद विस्मय से इस मुकदमे की सुनवाई को सुन रहे थे, अब यमलोक के पीपी चित्रगुप्त की बारी थी, महाराज यमराज के आदेशेनासुर उन्हें सारा माजरा दरबार के समक्ष प्रस्तुत करना था...


 नागपाल सिंह रचनाकार परिचय:-



नागपाल सिंह
9828157423
शिक्षाविद
B.Sc., M.A., MBA, B.Ed.
वर्तमान में शिक्षा सलाहकार व् व्यक्तित्व व मीडिया सलाहकार
भीलवाडा (राजस्थान)

चित्रगुप्त ने महाराज यमराज को प्रणाम कर मुक़दमे की कार्यवाही शुरू करने की आज्ञा लेकर, फरयादी की ओर इशारा करके कहा की , महाराज ये प्रथ्वी वासी नीम का पेड़ है, इसने पिछले १० वर्षों से कुछ खाये पीए बगैर आज की डेट मांगी थी, इसका कहना है इसे इच्छा म्रत्यु चाहिए , लेकी न महाराज यमलोक के कानून के हिसाब से तो इच्छा म्रत्यु का हक तो हमने प्रथ्वी वासियों को दिया ही नही है , हाँ वहां के सबसे बड़े कृपा पात्र मनुष्य यदा-कदा यमलोक के कानून की पेचीदगियों का दुरूपयोग कर आत्महत्या जैसा कृत्य कर लेते हैं , लेकी न इच्छा म्रत्यु का हक तो हमने प्रथ्वी पर की सी को दिया ही नहीं है !

ओर महाराज अगर हम इस नीम के पेड़ को इच्छा म्रत्यु का हक दे देते हैं तो हमारे दरबार में म्रत्यु नहीं, इच्छा म्रत्यु से अपना जीवन त्यागने वालों के लिए अलग से एक विभाग की स्थापना करनी पड़ेगी तथा जिसका आकार म्रत्यु विभाग से कई गुना बड़ा होगा तथा यमलोक उसका खर्च वहन करने की स्थिति में कतई नहीं है क्योंकि म्रत्यु विभाग का खर्चा भी बड़ी मुश्किल से चल रहा है , प्रथ्वी वासी तो आजकल इश्वर के नाम पर अब सिर्फ स्वयं पर ही व्यय करते हैं जिससे ईश्वर के निमित्त तो कुछ भी नहीं पहुँच रहा, ओर ऊपर से ये इच्छा म्रत्यु विभाग, नहीं महराज कतई नहीं .......

अगर इस नीम के पेड़ को ये अधिकार दे दिया तो यमलोक की आर्थिक स्थिति धरातल में चली जायेगी ओर एक दिन यमलोक का अस्तित्व खतरे में पड जाएगा, ओर इश्वर की शासन व्यस्था ही खत्म हो जायेगी ....

चित्रगुप्त के इस वाक्य पर वहां उपस्थित सभी सभा सदों ने भी अपने हाव भाव प्रकट कर महाराज यमराज के समक्ष करुना की स्थिति में इस मुकदमे को ख़ारिज करने की गुहार लगायी....

कटघरे में खड़ा वो नीम का पेड चुपचाप इस कार्यवाही को देख रहा था, जब उसे लगा कि चित्रगुप्त के विचारों से उसकी बात नहीं बनने वाली है तो उसने दोनों हाथ जोड़कर यमराज से प्रार्थना की , कि उसे एक बार बोलने का मौका दिया जाय, जिसका भी सभी सभा-सदों जोर शोर से विरोध किया.......

क्योंकी वो प्रकृति पे हो रहे अत्याचारों से अच्छी तरह से वाकिफ थे ओर वो जानते थे कि प्रकृति का अस्तित्व खतरे के कगार पर आ गया है , और कहीं ऊपर से ये इच्छा म्रत्यु, अगर ऐसा कानून बन गया तो प्रकृति में ये हक पाने वालों की होड मच जायेगी ओर अंतत: यमलोक की समूची शासन व्यवस्था ही खत्म हो जायेगी, फिर उनका क्या होगा?......इसी सोच से सहम कर उन्होंने नीम के पेड़ की बात तक ना सुनने का अनुरोध किया ............

खैर .....इश्वर तो इश्वर है .....यमराज ने धर्मंरक्षार्थ नीम के पेड़ को अपनी बात कहने का अवसर दे दिया .......

नीम के पेड़ को लगा जैसे उसे मन मांगी मुराद मिल गयी हो , उसने दोनों हाथ जोड़कर कहा ...हे महाराज मेरा जन्म आज से वर्षों पूर्व लावारिशों की भांति मनुष्यों के घरों से चारों ओर से घिरे मिटटी के एक ढेर में हुआ था , मैंने अपनी आँखे खोली ही थी कि मुझे मनुष्य के हाथों का स्पर्ष अनुभव हुआ, मैंने देखा कि मेरी जड़ों के नीचे से मिटटी को हटाया जा रहा है , मैं भयभीत हो गया , लेकिन मुझे अन्य लावारिश नन्हे पोधों से दूर एक चबूतरे के कोने पर ऊँची सी जगह लगा दिया गया, मैं भी अपने स्थानान्तरण से काफी खुश हुआ ओर अन्य नन्हे पोधों से ऊँचा स्थान प्राप्त करने का गोरव भी मुझे उन हाथो ने दिया ...

अब रोज मनुष्य ने बड़े प्यार से मेरा लालन पालन किया , कभी भी मुझे पानी और देखभाल से वंचित नहीं रखा गया , मैं भी बड़ा होने लगा , और मनुष्य के सानिध्य में कब मेरे साथ जन्मे उन नन्हे पोधों का जीवन समाप्त हो गया , मुहे एहसास ही नहीं हुआ .....

धीरे –धीरे मेरा ख़याल रखने वालों की संख्या बढती गयी , कभी कोई पानी पिलाता तो कोई मुझे संवारता , मैं भी उनके लिये अपने प्राकृतिक कर्त्तव्य का निर्वहन करने को आतुर था,ओर जितना ख़याल मेरे परिवार वाले मेरा रखते थे , मैं भी उनके लिए अपनी शाखाएं फैलाकर उन्हें छाँव देने में बड़ा आनंद प्राप्त करता था!

मैं कब पेड़ से मनुष्य के उन परिवारों का हिस्सा बन गया , मुझे पता ही नहीं चला....यहाँ तक कि मेरी स्थिति परिवार में सर्वोच्च थी , कोई भी पारिवारिक निर्णय मेरी उपस्थिति के बगैर नहीं लिया जाता था, सभी लोग मेरी छाँव में सोते थे, फुर्सत के पल में मेरे नीचे आकर बैठते थे, उनके दुःख ओर सुख की बातों में शामिल होकर मुझे बड़ा अच्छा लगता था, बड़ों का सम्मान , नियम से जीवन यापन ओर सभी के काम-काज में निस्वार्थ भाव से योगदान देना मेरे परिवार का आधार था ओर मैं भी अपने परिवार के इस व्यवहार से काफी गोरवान्वित महसूस रहता था, समय के साथ मेरे परिवार का आकार बढ़ता चला गया , ओर मैं भी अब काफी विशाल आकार लेकर अपने परिवार का साथ निभा रहा था , कि अचानक दिन परिवर्तित होने लगे ........और बुरे दिनों की शुरुवात मेरे परिवार के बुजुर्गों के देवासहन के साथ ही शुरू हो गयी थी , उनके जाने के बाद अब मेरा परिवार एक साथ नहीं बैठता था , में देखता था कि सभी लोग बहुत व्यस्त से हो गए हैं , कुछ सदस्य परिवार छोड़कर कहीं दूर शहर में चले गए , यदा-कदा कोई सदस्य मेरे पास आता था ओर अपने पैर मुझ पर रखकर बस थोड़ी ही देर में चला जाता था , पता नहीं क्या हो गया था मेरे परिवार को ?.......अब मेरे पास कोई नहीं आता है ...सब एक दूसरे से खफा –खफा से रहते हैं ...कभी अपने परिवार की बात मुझसे साझा नहीं करते...अब तो मेरा परिवार टूट सा गया है ...लगता है वह परिवार नहीं पडोसी दुश्मन हो गया है ....यहाँ तक कि अब तो मेरे भी हिस्से तय कर दिये गए हैं ...मेरी कुछ शाखायें किसी के हिस्से में आई ओर कुछ शाखायें किसी ओर के .....

मुझसे ये देखा नहीं जाता महाराज ...मैं तो स्वयं ही उन्हें अपने अंग देकर प्रस्फुटित होता रहता हूँ फिर मेरे हिस्से करने की क्या आवयश्कता है? .... अब तो बात मुझे काट कर आपस में बाँट लेने तक आ गयी है ओर मेरे समानुपातिक विभाजन पर मेरे परिवार में खूनी जंग शुरू हो गयी है ...महाराज मैं नहीं चाहता कि मैं ओर मेरा परिवार हिस्सों में बटें......मैं मेरे परिवार के विघटन का कारण नहीं बनना चाहता...मैं मेरे सामने अपने परिवार को मरता हुआ नहीं देख सकता ..इसलिए मुझे इच्छा म्रत्यु दे दीजिए...मुझ पर कृपा कीजिये महाराज.....ऐसा कहते कहते ना जाने कितने अश्रु नीम के पेड़ की आखों से बह गए ओर वहां उपत्थित सभी सभा सदों की आँखों को भी भिगो गए !

यमराज तक भी अपने भावों को छुपा नहीं पाए ओर नीम के पेड़ की इस व्यथा से सहम गए ....परन्तु वे स्वयं मानव के कृत्य से परिचित थे और जानते थे नीम का पेड़ ही नहीं वरन समस्त प्रकृति की हालत नीम के पेड़ जैसी ही है, वे सिर्फ एक ही बात सोच रहे थे कि कब तक ये प्रकृति मोन रहकर मानव का साथ निभाएगी? कब तक मेरे आदेशों की पालना वह निर्विरोध करती रहेगी? कब तक वो मानव को अपना परिवार मानती रहेगी? कब तक वो सहन करती रहेगी? ओर यदि एक दिन प्रकृति ने मेरे आदेश का उलंघन कर दिया तो मनुष्य का क्या होगा? ....खैर नीम के पेड़ की अपील तो खारिज कर दी गयी थी .........परन्तु यमराज भी असमंजस से भरे खतरे में पड़े मनुष्य के भविष्य के बारे में सोचते हुए , कक्ष से बाहर चले गए .

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