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फतेहपुर की हमारी कालोनी के बीच में एक बड़ा सा पार्क था जिसके चारों ओर घर बने हुए थे| शाम के ४ बजे दूरदर्शन पर बच्चों का कार्यक्रम देखकर हम सभी छोटे बच्चे पार्क में इकठ्ठा हो जाते थे और फिर ६-७ बजे तक पार्क में पूरी धमा-चौकड़ी होती थी| अजीब अजीब तरह के खेल इजाद कर रखे थे हमने खेलने के लिए और इन खेलों में लड़ाई होने पर अक्सर कट्टी मिल्ली हो जाया कराती थी| कट्टी मिल्ली का कानून भी बड़ा ही सीधा सरल था| जिससे कट्टी करनी हो उसकी हाथ की सबसे छोटी उंगली अपनी सबसे छोटी उंगली से मिला के चूम लो, हो गयी कट्टी, मिल्ली के लिए भी सेम कानून लेकिन इस बार तर्जनी उंगली के साथ| पार्क हमारा दूसरा घर था जिस पर हमारा एक-छत्र अधिकार था|
WRITER NAMEरचनाकार परिचय:-
नाम: राहुल यादव 
जन्म: १० नवम्बर १९८५; भवानीपुर, जौनपुर
शिक्षा: भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान-इलाहाबाद से सूचना प्रौद्योगिकी में बी.टेक., कार्नेगी मेलन विश्वविद्यालय-पिट्सबर्ग से इन्फार्मेशन नेटवर्किंग में एम.एस. कार्यक्षेत्र: कैलिफोर्निया में एक सॉफ्टवेर इंजिनियर के तौर पर कार्यरत|
सिनेमा, खास तौर पर भारतीय समान्तर सिनेमा में रूचि है| इसके अतिरिक्त संगीत सुनना भी बहुत पसंद है| हिंदी साहित्य में विशेष अभिरुचि है, खास तौर पर मुंशी प्रेमचंद जी से बहुत प्रभावित हूँ|
कॉलेज से जुड़े हुए कुछ सस्मरणों पर अंग्रेजी भाषा में एक ब्लॉग लिखते हैं, जिसे मित्रों तथा अन्य पाठकों ने बहुत सराहा और अन्य विषयों पर लिखने के लिए प्रोत्साहित किया|

फिर एक दिन हमारी इस एकमात्र सत्ता पर अतिक्रमण हुआ| एक बड़ा सा ट्रक सचान अंकल के घर के सामने आकर रुका | सचान अंकल के घर के बगल वाला घर खाली था, तो हमने सोचा की कोई नया परिवार आया होगा| पता किया तो पता चला की कोई मिलिट्री के बड़े अफसर आये हैं, जिनका नाम बाद में हम सब बच्चों ने मिलकर कर्नल अंकल रख दिया| ट्रक के साथ दो पोलिस की वर्दी पहने सिपाही भी आये थे जो सामान उतरवा रहे थे| सब सामान उतार लेने के बाद उन लोगों ने एक तम्बू निकला और पार्क के अन्दर चार खूँटें गाड़ कर तान दिया|

खाकी रंग का वो तम्बू हालाँकि बहुत बड़ा नहीं था, और उस बड़े से पार्क में बहुत कम जगह घेरता था, लेकिन फिर भी इस तरह से तम्बू का पार्क में गाड़ना हमें अच्छा नहीं लगा| तम्बू में दो बड़े लकड़ी के तख्ते रख दिए गए थे और उसमे कर्नल अंकल कभी कभी बाकि पोलिस वाले लोगों के साथ मीटिंग किया करते थे| उन मीटिंग्स के अलावा तम्बू अक्सर खाली ही रहता था|


अब जब तम्बू गड़ ही गया था तो हम बचों को इसका इस्तेमाल तो करना ही था| तम्बू हमारे लिए रेडीमेड फिसलपट्टी बन गया| हम लोग दूर से दौड़ के आते थे और तम्बू के ऊपर तक चढ़ जाते थे, फिर फिसलते फिसलते नीचे आना बड़ा आनंद देता था| इसके साथ ही बारिश होने पर अब हमें घर नहीं भागना पड़ता था, हम अम्बू के अन्दर रूक कर अपना खेल जारी रखते थे| कर्नल अंकल अक्सर घर पर रहते नहीं थे तो हमारी इस कारस्तानी का उन्हें पता नहीं चलता था, या यूं कहिये की हमें ऐसा लगता था की उन्हें कुछ नहीं पता|


फिर एक दिन पता नहीं किसके दिमाग में खुराफात सूझी की सब लोग एक साथ तम्बू पर चढ़ते हैं| दो ग्रुप बनाये गए फैसला हुआ की एक ग्रुप एक और से चढ़ेगा और दूसरा ऐन उसी समय दूसरी तरफ से| हम सब चिल्लाते हुए बंदरों की तरह जैसे ही तम्बू के शिखर पर पहुंचे तम्बू हम सभी बचों का भार एक साथ झेल नहीं पाया ओर सब ले दे कर ज़मीन से आ मिला| जिन खूंटों पर तम्बू टिका था उनके परखचे उड़ गए और तम्बू थोडा बहुत फट भी गया|


हम सभी को काटो तो खून नहीं| हालाँकि कर्नल अंकल बहुत सज्जन व्यक्ति थे फिर भी कुछ पता नहीं क्यों कर्नल अंकल का बचों के अन्दर बहुत खौफ कायम था| अभी सिर्फ पांच ही बज रहे थे लेकिन किसी की पार्क में रूकने की हिम्मत नहीं हुई और हम सभी अपने अपने घरों में भाग गए|


मैं और मेरा भाई घर में घुसे तो मम्मी TV पर रविवार के दिन ४ बजे की हिंदी फ़ीचर फ़िल्म का आनंद ले रही थी| वैसे तो रोज़ जब तक मम्मी की दो-चार खरी खोटी हम नहीं सुनते थे तब तक हम खेलने से आने के बाद पैर नहीं धोते थे| लेकिन आज मौके की नज़ाकत को समझते हुए हम दोनों भाइयों ने शराफ़त के साथ अछे से हाथ पैर मुहं धोया और पोछ पाछ के चुप चाप मम्मी के साथ आकर बिस्तर पर बैठ गए और फिल्म देखने लगे| हमारी शराफ़त देखकर मम्मी को शक तो हुआ लेकिन कोई कारण पता न होने की वजह से वो चुप रही|


उधर हुआ ये की थोड़ी ही देर में कर्नल अंकल आ गए और तम्बू का ये हल देखकर उन्हें समझ आ गया की बच्चों की ही करतूत है| फिर उन्हें तम्बू के पास ही छोटा सा चप्पल दिखा, जो की मेरे भाई का था| हुआ ये था की जल्दी जल्दी में हम लोग बेतहाशा भागे थे तो मेरे भाई का चप्पल वही छूट गया था| कर्नल अंकल ने एक सिपाही को बोला की जिसकी भी चप्पल है लौटा आये|


अब वो सिपाही जी एक एक घर में जा जा के पूछ रहे थे और पूछते पूछते हमारे घर तक पहुंचे| घंटी बजने पर मम्मी ने जब दरवाजा खोला तो मेरे भाई ने देख लिया की कुछ चप्पल का आदान-प्रदान हो रहा है, अब चप्पल उसी की थी तो उसे तो सब कहानी पता ही थी| उसने आने वाले तूफ़ान का अंदेशा लगाया और चुप चाप बेड के नीचे घुस गया, जो की मार से बचने के लिए उसकी फेवरिट जगह थी|


हमारी मम्मी की आदत थी की अगर उनसे कोई हम लोगों की तारीफ करता था तो वो बहुत खुश होती थी और साथ ही अगर कोई हमारी शिकायत कर देता था तो उनका परा सातवें आसमान पर चढ़ जाता था| शायद उस सिपाही ने थोड़ी शिकायत लगा दी थी| मम्मी ने ख़ास सींक वाली झाड़ू उठाई और मेरे भाई को ढूँढते कमरे में घुसी| अब वो तो बेड के नीचे घुसा हुआ था तो उन्हें सामने मैं दिखाई दिया| उन्होंने आव देखा न ताव ताबड़तोड़ झाड़ू बरसा दिए| अभी दो तीन झाड़ू ही पड़े थे की झाड़ू खुल गयी और पूरे कमरे में सींक ही सींक फ़ैल गयी| मम्मी और भी ज्यादा गुस्सा गयी| फिर तो सामने उन्हें पानी की पाइप दिखी और उस पाइप से मेरी जो धुनाई हुई, जो धुनाई हुई, की मुझे आज तक याद है|


दो घंटे बाद जब मम्मी का गुस्सा शांत हो गया और मम्मी खाना बनाने में जुट गयी तो मेरा भाई मुस्कुराते हुआ बेड के नीचे से निकला| तूफ़ान गुजर चूका था| पापा जी ने उस दिन रात में सार्वजानिक संपत्ति के बारे में एक शोध ग्रन्थ लिखने लायक लम्बा चौड़ा व्याखान दिया| मम्मी ने भी चुप चाप मार खाने के इनाम में खीर बनायीं| मेरा भाई मम्मी के हाथ से खाता था, लेकिन बेड के नीचे छिपने के कारण पूरी मार मैंने खायी थी इसलिए मम्मी ने मुझे अपने हाथों से खाना खिलाया|

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