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माँ जब थी तो भरा रहता था घर का कोना कोना
चाची ताई बहनो संग कम पड़ता था बिछोना

 सुजाता शुक्ला रचनाकार परिचय:-



सुजाता शुक्ला
एम आई जी -1, सेक्टर -3, शंकर नगर ,रायपुर,(छत्तीसगढ़ )
ई मेल – shukla.sujata7093@gmail.com
परिचय := एम एस सी वनस्पति शास्त्र से करने के बाद कुछ महीनो कॉलेज मे अध्यापन आकाशवाणी रायपुर से कविता कहानियाँ प्रसारित ,नवभारत पेपर सहित अन्य पत्र पत्रिकाओं मे कहानी कवितायें एवम लेख प्रकाशित ,वर्तमान मे आकाशवाणी रायपुर मे नैमीत्तिक
उद्घोषिका एवम दूरदर्शन मे कार्यक्रमों का संचालन

चूल्हे से बने पकवानो की महक जाती थी चारों ओर
छप्पन भोग सा लगता था माँ के हाथों का कौर
स्वस्तिक के शुभ चिन्हो से सजती हर दीवार थी
वो गाँव घर गलियाँ मानो जीवन का सम्पूर्ण सार थी
विशाल आँगन के तले तब हर दरवाजा खुलता था
एक घर का बच्चा प्यार से सबकी गोदी झूलता था
चक्की पीस आटा निकलता एक ही चूल्हा होता था
परिवार मिल बाँट खाता चैन की नींद सोता था
गाँव की बेटी का दामाद मिलकर छाँटा जाता था
पेड़ों बीच चौपाल बना सुख दुख बांटा जाता था
सुखद भली आत्मीयता थी एक दूजे के साथ
परिवार एक जुट रहता था चाहे दिन या रात
बड़ी भली है मधुर स्मृति सुंदर सरल गाँव की
याद आती है आज भी बरगद पीपल के छांव की

5 comments:

  1. खूबसूरती से गावँ के भोलेपन व् शुद्ध भावना का समावेश किया गया है ...सुजाता जी को बधाई हो

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  2. माँ की ममता और काशी, अयोध्या का कोना , जिसने छुवा हो गया विश्व में सोना |
    आती याद उसे अपनी सभ्यता -संसकृति लेना ,मधुर स्मृति सरल गाँव का लोना ||
    गगन उसे छूकर भी दिखता सब कुछ मानो बौना, साथ -साथ मगर अपना बिछौना|
    वट वृक्ष ,पीपल ,तुलसी, नीम वा किलकत छौना,मंगल कहत महाव्रत महाकाल हौना||

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  3. माँ जब थी तो भरा रहता था घर का कोना कोना
    चाची ताई बहनो संग कम पड़ता था बिछोना
    ..बहुत सुन्दर मर्मस्पर्शी रचना ..
    माँ जैसा को नहीं मिलता संसार में फिर कभी

    उत्तर देंहटाएं
  4. खुबसूरत अभिव्यक्ति ..........सुजाता जी को बहुत -2 बधाई ..!

    उत्तर देंहटाएं

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