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‘नारी की झांई पड़त, अंधा होत भुजंग
कबिरा तिन की कौन गति, जो नित नारी को संग ’


 सुशील कुमार 'मानव' रचनाकार परिचय:-



नाम : सुशील कुमार 'मानव'
आजीविका :अनुवादक
साहित्यिक कार्य: कविता,कहानी, गजल लिखना
आयु 32 वर्ष,
निवास: इलाहाबाद
शिक्षा : हिंदी, समाज शास्त्र, और जैव-रसायन से परास्नातक
मोबाइल नं. 8743051497

जी हाँ मैं कबीर दास जी की स्त्री विरोधी दृष्टिकोण पे परिचर्चा को आगे बढ़ा रहा हूँ। यह बात प्रायः उठती है कि इतने बड़े समाज सुधारक होने के बावजूद संत कबीर ने स्त्रियों से जुड़े सामाजिक बुराइयों पर बोलने के बजाय स्त्री विरोधी स्वरों को अपने शब्द क्यों दिये ? पर, क्या वाकई में कबीरदास जी समाज सुधारक या समाज चिंतक थे ?

कबीर दास जी को समाज सुधारक मानकर उनकी कृतियों की विवेचना या विश्लेषण करना, शायद कबीर दास जी के साथ अन्याय होगा।

कुछ सामाजिक विसंगतियों जैसे जातिवाद, हिंदू-मुस्लिम वैमनस्य , धार्मिक पाखंड आदि पर विरोध कबीर दास जी की व्यक्तिगत भुक्तभोगिता से उपजी खीझ की व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति थी। चूंकि कबीर दास जी स्त्री नही थे, और न ही उन्होंने स्त्री के रूप में सामाजिक बुराइयों को भोगा था, तो स्पष्ट है कि स्त्री विरोधी सामाजिक विसंगतियों के प्रति उनमें खीझ नही थी। जबकि जातिगत या धर्मगत पीड़ा ,उपेक्षा और अपमान उन्होनें झेला था और इन सबके प्रति उनमें बहुत गुस्सा था।

ये तो बात हुई कबीर जी के स्त्रियों के पक्ष में आवाज न उठाने की। अब प्रश्न है कि आखिर कबीर जैसा संत, जो मानवीयता व प्रेम का इतना बड़ा पक्षधर था ,वो स्त्रियों के प्रति इतना कटु, इतना मुखर क्यों था ? इसके लिए हमें कबीर के ‘परिवेश ’ को खंगालना होगा। दरअसल व्यक्ति अपने परिस्थितियों व परिवेशों का ही प्रतिबिंब होता है, और संत कबीर भी इसके अपवाद नही थे।

यदि हम कबीर को ‘कर्ण ’ के समानान्तर रखकर एक तुलनात्मक अध्ययन करें तो तस्वीर कुछ ज्यादा स्पष्ट हो सकती है। हालाँकि दोनो के समयकाल में बहुत अंतर है, पर यदि हम आज से सत्तर-अस्सी वर्ष पूर्व के समयकाल पर भी नजर डालें तो पायेंगे कि स्त्री विरोधी विसंगतियों की प्रासंगिकता समयकाल से परे है।

कर्ण की माँ ने जहाँ उन्हे विवाह पूर्व जन्मा था, तो वहीं कबीर की माँ ने उन्हें विधवा होने के बाद जना। दोनो की माँएं उच्च जाति की थी , ऐसी जाति से जो सामाजिक सत्ता व जनजीवन पे व्यापक प्रभाव रखता था।पर जन्म के बाद उन दोनो की ही माँ ने लोकलाज के भय से उन्हें नदी और तालाब के किनारे छोड़ दिया। ऊँची जाति, ऊँचे कुल से संबंध रखने के बावजूद भी दोनो को यदि आजीवन जातिगत पीड़ा व तिरस्कार झेलना पड़ा तो वो उनकी माँओं के कारण ही था। स्त्री जाति के प्रति कटुता या विद्वेश दो स्त्रियों की चरित्रहीनता के कारण उन दोनो को मिले एक अभिशप्त जीवन की परिणति थी। जिसकी केंद्रबिंदु स्त्री के रूप में उनकी माँओं का पथभ्रष्ट, अमर्यादित आचरण था। ऐसी मनोदशा में नारी का प्रतिबिंब भी मिल जाये तो अपनी पूरी कुंठा, पूरी खीझ, समूची अभिशप्तता उड़ेल देते हैं। कर्ण ने जहाँ मौके-बे-मौके स्त्री दुगर्ति पे व्यंग्य, अपमान, अट्ठहास करके स्त्री से जातिगत भड़ास निकाली तो वहीं कबीर ने अपने शब्द अभिव्यंजना को इस भड़ास का माध्यम बनाया। कर्ण के समयकाल में स्त्रियां जहाँ प्रतियोगिताओं,युद्धों, खेलों में जीती जाने वाली चीज व उपहारगत मिलनेवाली दासियां थी ,तो कबीर के समयकाल में क्रय-विक्रय की जाने वाली उपभोग की वस्तुएं। इस तरह दोनो के ही समयकाल में नारी संवेदना का उद्भव लगभग नही ही हुआ था। जो संवेदना दिखती भी है, वो नारी के रूप में उस ‘जीव ’ के लिए है, जोकि वो स्वयं भी हैं, अर्थात वो किंचिद नारी संवेदना रहस्यवाद के आवरण में लिपटे ‘स्व’ (पुरुष) के लिए है। जोकि अपनी मुक्ति के लिए बेवकूफी की हद तक तड़प रहा है।

कबीर दास की वैचारिकता और उनपर पड़े दार्शनिक प्रभाव की बात करें तो नारी के प्रति उनकी अवधारणा और स्पष्ट हो जाती है। कबीर फक्कड़ स्वभाव , उदार आचरण वाले साधनात्मक रूप से कट्टर व्यक्ति थे। अर्थात अति धर्मवादी थे।

‘हरिभक्ति जाने बिना, बूढ़ि मुआ संसार ’ तथा
‘जब मैं था तब हरि नहि, अब हरि है मैं नाहि ’
और ‘पंडित बाद बदंते झूठा, राम कह्याँ दुनिया गति पावै ’

जैसे दोहों से स्पष्ट है। स्वभावतः अति-धर्माववादी व्यक्ति स्त्री विरोधी होता है क्योंकि स्त्री जाति लगभग हर धर्म में त्याज्य या तुच्छ वस्तु बताई गई है।

कबीर दास जी निर्गुण एवं निराकार ईश्वर के उपासक थे। उलके लिए ज्ञान और योग ईश्वर तक पहुँचने के रास्ते थे, जिसमें निर्वेद और वैराग्य का भाव प्रधान था। लगभग सभी धर्मों में ज्ञान और स्त्री को दो परस्पर विरोधी चीजें मानी गई हैं। जबकि स्त्री त्याज्यता को वैराग्य का नाम दिया गया है।

कबीर की सोच पर वैष्णव सम्प्रदाय और सूफियाना प्रेम मार्ग का जबर्दस्त प्रभाव था। हालाँकि दोनो मार्गों में एक परस्पर विरोध भी है। वैष्णव जहाँ परमात्मा को पुरुष और जीवात्मा को स्त्री मानते हैं वहीं सूफी लोग परमात्मा को स्त्री व जीवात्मा को पुरुष मानते हैं।

कबीर वैष्णव सम्प्रदाय के ज्यादा नजदीक लगते हैं, जब वो स्वयं को स्त्री (पत्नी) एवं भगवान को पुरुष (पति) रूप में देखते हैं।

‘दुलहिनि गावहुँ मंगलाचार, हम घरि आये हो राजा राम भरतार ’ तथा
‘कहैं कबीर मै कछु न कीन्हाँ, सखी सुहाग राम मोहि दीन्हाँ ’

एक बात और ध्यान रखने की है कि कबीर के आराध्य राम थे । हालाँकि कबीर ने कहा है कि उनके राम दशरथ के पुत्र नही हैं और वो बिना मुख, माथा वाले निराकार पुरुष हैं।पर ऐसा कैसे संभव है? उनके गुरु रामानंद जी जिन्होंने ‘राम-राम ’ गुरुमंत्र कबीर को दिया, उनके आराध्य राम तो दशरथ के पुत्र और साकार रूप वाले थे।

संभवतः कबीर के रामनामी रटन पे उस काल के पाखंडी ब्राम्हणों ने नाराजगी जताई होगी और उन सब के विरोध में ही कबीर ने अपने अलग राम की रचना की होगी। पर कबीर ने लिखा है-
‘रामदेव संग भाँवरि लैहूँ , धनि धनि भाग हमार
सुर तैंतीसू कौतिग आये, मुनियर सहस अट्ठासी
कहैं कबीर हमैं ब्याहि चले हैं, पुरुष एक अविनासी ’

यदि कबीर दशरथ नंदन राम को नही मानते तो तैंतीस करोड़ देवता, अट्ठासी हजार मुनि, ब्रम्हा व वेद को कैसे मान सकते हैं? स्पष्ट है कि सीता के पति राम ही कबीर के ईष्ट थे । और सीता, ताड़का, सुपर्णखा, कैकेयी, मंथरा आदि का राम के जीवन में जो प्रभाव था ,वो भी कबीरदास जी को ऊपर परिलाक्षित हुआ दिखता है।

अधिकतर हिन्दू सम्प्रदायों में माया या ईश्वर की माया का उल्लेख है।माया (स्त्री रूपी संज्ञा) को ज्ञान विरोधी व बुद्धि, विवेक का नाश करने वाली कहा गया है, जिसके कारण व्यक्ति सांसारिक दुखों को भोगता है। कबीर ने भी माया के लिए ठगिनी, मार्जारि,डायनि,आदि शब्दों का प्रयोग कर उसकी भर्त्सना की है।

जबकि ‘योनि’ शब्द का प्रयोग- जन्म लेने, सांसारिक दुःखों को भोगने व मुक्ति या बंधन तीनों को संदर्भ में किया गया है।

1. ‘योनि’- अर्थात स्त्री- जन्म लेना (84 हजार योनियों का जिक्र है)। पुरुष कर्म को योनि से जोड़कर देखा गया है, कहा गया है कि पुरुष या जीव का जन्म पुराने जन्म के कर्मों को भोगने व नये या अगले जन्म से मुक्ति के लिए तप करने या ईश्वर का नाम जपने के निमित्त हुआ है।

2. यौनाकर्षण- अर्थात स्त्री से दूर होना, वैराग्य माना गया है (गृहस्थ का अर्थ गृहिणी से होता है)। ज्ञान प्राप्ति ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग है और स्त्री तरह-तरह के यौनाकर्षण कृत्यों द्वारा मायाजाल में बाँधकर रखती है। इसी तरह ज्ञान रूपी रास्ता जो ईश्वर तक जाता है , उसमें स्त्री सबसे बड़ी बाधा है, अतः स्त्री का त्याग यानी वैराग्य मुक्ति का एकमात्र रास्ता है।

3. मुक्ति- मुक्ति का आशय भी योनि (सांसारिकता) से मुक्ति , योनि अर्थात नया जीवन या फिर से जन्म लेने से भी है।
योनि बंधन , जन्म लेने (दुःख भोगने),स्त्री संगति, (सांसारिकता में उलझे रहने) और पाप (मुक्ति का मार्ग खोजने से है)
इस तरह हम देखते हैं कि संत कबीर पर वेदांत दर्शन का बहुत ज्यादा प्रभाव है। इसी दर्शन का प्रभाव ही कबीर की वैचारिक अवधारणा को स्त्री विरोधी बनाता है और वो लिखते है-
‘नारी तो हम भी करी, जाना नही विचार
जब जाना तब परि हरि, नारी बड़ी विकार ’ ।

इस तरह हम ये निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि, कबीर एक समाजवादी कवि नही बल्कि, संत कवि थे । संत सूफी, जोगी, वैरागी और संन्यासी होने का अर्थ ही है- स्त्री को अपने पथ से विलग करना और अपने अनुयायियों को भी ऐसा करने का आग्रह करना। संत या भक्त कवियों की रचनाओं या कृतियों का आधार भी यही ‘आग्रह ’ थे। और इन आग्रहपूर्ण रचनाओं में स्त्री विरोधी स्वर ज्यादा कटु और मुखर तरीके से व्यक्त किये गये हैं, भर्तहरि की ‘वैराग्य शतकम् ’ भी इसी ‘आग्रह ’ का उदाहरण है। अब चाहे आप इसे ‘भक्ति आंदोलन ’ का नाम दे लीजिए, चाहे ‘मुक्ति आंदोलन ’ का। पर सब कुछ इसी की आंड़ में हुआ है।

1 comments:

  1. लेखन पर पूर्ववर्ती के साथ ही देशकाल और समाज का प्रभाव स्पस्ष्ट दिखाई देता है ........कोई भी लेखन हो उसे अनादिकाल से पुरूष ही लिखते आये थे. इसलिए वही लेखन नारी के विरोध में सर्वाधिक है ... आज भी देखिये टीवी के सीरियल हो या सिनेमा, कविता हो या शायरी या फिर फूहड़ चुटकुले ..सभी नारी के इर्द-गिर्द ही घूमकर उसे मनोरंजन के नाम दे दिया गया है ..
    जब ये हाल आज है तो फिर कबीर दास जी तो ज़माने बीत गए लिख दिया होगा ....फिर भी मैं मानती हूँ की वे समाज सुधारक तो थे ही ...क्योकि नारी विरोधी ज्यादा कुछ लेख पढ़ने में नहीं मिलता है ....

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