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" पापा ! आप यह क्या ले आये. मुझे यह खिलौने नहीं चाहिए . " बिटिया ने कहा .


 सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा रचनाकार परिचय:-


हरियाणा स्थित जगाधरी में जन्मे सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा 32 वर्ष तक दिल्ली में जीव-विज्ञान के प्रवक्ता के रूप में कार्यरत रहने के उपरांत सेवानिवृत हुए हैं तथा वर्तमान में स्वतंत्र रूप से लघुकथा, कहानी, बाल - साहित्य, कविता व सामयिक विषयों पर लेखन में संलग्न हैं।
आपकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, यथा “आज़ादी”, “विष-कन्या”, “तीसरा पैग” (सभी लघुकथा संग्रह), “बन्धन-मुक्त तथा अन्य कहानियाँ” (कहानी संग्रह), “मेरे देश की बात” (कविता संग्रह), “बर्थ-डे, नन्हे चाचा का” (बाल-कथा संग्रह) आदि। इसके अतिरिक्त कई पत्र-पत्रिकाओं में भी आपकी रचनाएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं तथा आपने कुछ पुस्तकों का सम्पादन भी किया है।
साहित्य-अकादमी (दिल्ली) सहित कई संस्थाओं द्वारा आपकी कई रचनाओं को पुरुस्कृत भी किया गया है।

" बच्चे ! यह तो सबसे अच्छे खिलौने हैं . यह देखो छोटा सा चूल्हा ., छोटे - छोटे स्टील के बर्तन , यह प्यारा सा छोटा सा प्रेशर -

कुक्कर , यह छोटा सा चकला और यह छोटा सा बेलन . इनसे आप आराम से किचन - किचन खेलेंगीं . साथ -

साथ अपने पापा के लिए छोटे - छोटे , हल्के - हल्के फुल्के भी बना कर देंगीं ."

" पापा मुझे मम्मी की तरह खाना बनाने वाली नहीं बनना . मैं नही लेती यह खिलौने ." -

" तो हमारी छोटी सी बिटिया बड़े होकर क्या बनना चाहती हैं , जरा हमें पता तो चले . हम अपनी बिटिया को वही खिलौने लाकर दे देंगे . -

" पापा ! मझे एक मोबाइल लाकर दीजिये . हम टीचर - टीचर खेलेंगें . हमे बड़े होकर टीचर बनना है .." -

" वेरी गुड . उसके लिए तो आपको एक ब्लैक - बोर्ड और चॉक की जरूरत होगी . हम शाम को आफिस से वापिस आते वक्त एक ब्लैक --

बोर्ड और चॉक का एक डिब्बा अपनी टीचर बिटिया के लिए जरूर लेकर आयेंगें ." -

" नहीं पापा हमें तो मोबाइल ही चाहिए ." -

" मोबाइल क्यों ? वो कोई खिलौना थोड़े ही है जो हमारी बिटिया मोबाइल से खेलेगी ." -

" पापा टीचर भी तो जब भी क्लास में आती हैं , मोबाइल या तो सुनती हैं या फिर उस पर उंगलियां चलाते हुए उस पर खेलती रहती हैं , इसलिए मुझे तो मोबाइल से टीचर- टीचर ही खेलना है , प्लीज ला दीजिये न ." -

पापा अपनी बिटिया के भविष्य की चिंता में खो गए. -

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