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’और, क्या चल रहा है?’ पूछने के बाद मैंने दुसरा प्रश्न कर दिया ’आंटी कहां है?’ सुना है बीमार रहती है?’ सुषमा ने जवाब देने के बजाए अपनी बेटी से कहा ’जा, अंकल के लिए पीने का पानी ला’ फिर वह इधर-उधर की बातें करने लगी मेरी इन बातों मे कम ही रूचि थी मैं तो आंटी से मिलकर, उनका हाल-चाल पूछकर जल्दी ही निकल जाना चाहता था ।


 भारत दोसीरचनाकार परिचय:-



भारत दोसी,58/5,मोहन कालोनी, बांसवाडा राज 327001 मो 9799467007 ई - मेल : dosi.bharat@gmail.com

मेरे फिर से पूछने पर मुंह बनाते हुए सुषमा बोली ’अन्दर है, लेकिन आज बाई नहीं आई है इसलिए तुम्हारी आंटी को नहलाया-धुलाया नहीं किया गया है ।’ उसकी बात सुनते ही मैं कमरे मे चला गया । बदबू के मारे कमरे मे रूकना असम्भव था मैंने मुंह पर रूमाल रख दिया । आंटी पलंग पर लेटी थी चादर, तकिया बहुत गंदा था उनके शरीर पर सैंकडों मक्खियां मंडरा रही थी पैशाब, शौच सब कुछ कपडों मे कर दी थी । वे मुझे पहचान गई ,मुस्करा दी । लेकिन मुस्कराहट के पीछे जो भारी वेदना ,असहायता थी वह दिख रही थी मुझे देखकर वह उठना चाहती थी लेकिन ....। मैंने कमरे मे रखे दस्ताने पहने । पानी और रूई की मदद से उनका सारा शरीर साफ किया पंच किया ,उनके कपडे बदले फिर कमरे मे स्प्रे किया । कमरे मे बने जालें उतारे, झाडू लगाया , पौंछा किया फिर उनके पास कुछ देर बैठा रहा वे बोल नहीं सकती थी लेकिन उनकी आंखों से बहते आसूँ सारी कहानी कह रहे थे । मेरे इतना सब करने के बावजूद सुषमा कमरे मे नहीं आई ।

जब मैं जाने लगा तब सुषमा की बेटी ने पूछा ’ मम्मी ये अंकल कौन है ?’ सुषमा ने धीरे से कहा पर मैंने सुन लिया ’ हमारे पडौस मे रहते थे दलित है इसलिए मम्मी की साफ-सफाई मे दिक्कत नहीं आई ।’ उसके कहने मे जा व्यंग थ वह मैं समझ गया । शायद उसने मुंह बनाया होगा । मै चाहता तो आटो रिक्शा कर लेला पर मन खिन्न था इसलिए पेदल ही बस स्टेण्ड को चल दिया ।

वैसे भी मेरा जब मुड खराब होता है ,या कुछ बुरा होता है तो मैं चलता ज्यादा ही हॅू इससे मुझे ताकत मिलती है । टिकट लेकर बस मैं बैठ गया । यादो ने घेर लिया ।

तब गोकुल धाम नया ही बना था यह कालोनी थी जिसमे मेरे पिताजी ने भी एक टुप्लेक्स ले लिया था क्योंकि पिताजी ने अपने नाम के साथ आर्य जोड रखा था इसलिए उनको आसानी से बंगला मिल गया था पास के ही बंग्ले में सुषमा का परिवार रहता था जो आज भी रहता है हमारे और इसके परिवार मे अच्छा परिचय था खाना-पीना था । मैं और सुषमा साथ ही पढते थे और एक ही कक्षा मे पढते थे हम साथ मे रोजाना बस जाते थे यहा तक की ट्युशन के टिचर आते तो हम साथ ही पढते थे क्यूं की क्लास उसके घर लगती थी इसलिए मैं भी कई बार वही चाय, नाश्ता कर लेता था । जब हम बडे हुए और कालेज जाने लगे तो हमारी जोडी प्रेम जोडी के रूप मे पहचानी जाने लगी सच तो यह भी था की हम एक दुसरे से प्रेम भी करते थे ।

सुषमा के मम्मी-पापा को इससे कोई आपत्ति नहीं थी वे तो आगे की योजना भी बना बैठे थे की मेरी नौकरी लगे तो सुषमा का विवाह कर दिया जाए । क्योकि हम आर्य समाजी थे तो हमारे यहा साल भर में एक दो बार हवन आदि होता था जिसमे कालोनी के सारे लोग आते थे पिताजी के भक्ती भाव की प्रशंसा करते थे । फिर मेरी नौकरी लग गई यही से सारा विवाद खडा हो गया समाचार पत्रों मे जिनकी नौकरी लगी उन सभी के नाम छपे थे । संवाददाता ने इसे हमारे वर्ग के साथ छाप दिया जिसमे मुझे एसएसी कोटे से बताया गया जो सच भी था लेकिन यह बात सुषमा के मम्मी-पापा सहित पुरी काॅलोनी वालो के लिए आश्चर्य की थी आगे जब उन्होंने खोजबीन कर जान लिया कि हम सफाईकर्मी जाति से है तो हमारा बहिष्कार हो गया ।

आंटी ने तो मेरे मम्मी को बहुत भला बुरा कहा वे तो आहत महसुस करती रही की एक सफाईकर्मी परिवार का उनके रसोई मे आना-जाना था उनका श्रेष्ण ब्राहमण धर्म अपवित्र हो गया था इसलिए उन्होंने ब्राहमणों को बुलाकर घर को गंगा जल से धुलवाया था वह यज्ञ-हवन करवाया था । सुषमा को मेरे घर आना जाना तो बंद हुआ ही उसको घर से बाहर निकलने से भी रोक दिया मेरी तरफ देखना तो उसके लिए पाप घोषित कर दिया गया ।

क्योकि मेरी नौकरी अच्छे पद पर लगी थी इसलिए सरकार ने मुझे सभी सुविधा युक्त बंगला दिया इसलिए मैं अपने मम्मी-पापा के साथ वहा रहने लगा कुछ दिनों के बाद मेरा स्थानान्तरण हो गया लेकिन सुषमा मेरे दिल मे बसी हुई थी । मेरे लिए हमारे ही समाज के स्तरीय परिवार से रिश्ते आने लगे लेकिन मैं कोई ना कोई बहाना बनाकर टालता रहा । इस बीच सुना की सुषमा को विवाह कर दिया गया है उसका पति घर जमाई बनकर साथ रहने लगा । उसके शराब पीकर मारपीट करने, जुआ खेलने से परिवार तबाह हो गया था और एक दिन वह र्दुघटना मे चल बसा इस बीच उसकी बेटी को जन्म हो गया । पिताजी की पंेशन से सुषमा का घर चल रहा था मैंने एक बार अपने एक मित्र के माध्यम से उसको नौकरी के लिए प्रस्ताव भी भेजा लेकिन उसकी मां ने इसे अपनी बेइज्जती मानी की एक दलित से सहयोग लिया जाए ।

समय गुजरता गया, उम्र बढती गई इस बीच आंटी बीमार रहने लगी उनकों पेरलसिस हो गया । इस बीच मुझे आज इस शहर मे कुछ काम से आना पडा तो उनसे मिलने चला गया वहां आंटी की हालात देखकर दुख हुआ वही एक निर्णय भी लिया ।

जब घर गया और कुछ दिनों के बाद मम्मी ने एक फोटो बताया, रिश्ता समझाया तो में विवाह को तैयार हो गया । सुख था की मेरी सुषमा से शादी नहीं हुई ।

1 comments:

  1. मजा आ गया ...व्यंग ,तंग प्रचंड है समाज पर भी और समाज की सोच पर भी...अंत तो सही बदलाव की निसानी है

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