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उत्तर भारत की गर्मी की महिमा का जितना वर्णन किया जाये उतना कम है| मई जून में घर से बाहर निकलो तो ऐसा लगता है की आसमान से आग बरस रही है, फिर क्या दिन क्या रात| सूरज की रोशनी इतनी तेज और चमकीली होती है की आँख खोलना मुश्किल हो जाता है| जमीन इतनी गरम हो जाती है की नंगे पैर चलो तो लगता है की अंगारों पर चल रहे हैं| पसीना तो बहुत आता है लेकिन सब गर्मी से भाप बन कर उड़ जाता है| और अगर न उड़ पाए तो और मुसीबत, पसीने से लथपथ पूरा शरीर चिप चिप करने लगता है| बच्चे तो बच्चे बड़े भी घमौरियों की चुभन से हैरान हो जाते हैं| टीवी पर ठंडा ठंडा कूल कूल जैसे प्रचारों की भरमार हो जाती है| पथ्थरों और इंटों से बने मकान ऐसे जलने-तपने लगते हैं मानो भठ्ठी हो| घर के बाहर तो इस गर्मी का कोई इलाज़ नहीं है, लेकिन घर के अन्दर इस भीषण गर्मी से दो-दो हाथ करने की हिमाकत कोई कर सकता है तो वो हैं हमारे कूलर महाशय|

WRITER NAMEरचनाकार परिचय:-
नाम: राहुल यादव 
जन्म: १० नवम्बर १९८५; भवानीपुर, जौनपुर
शिक्षा: भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान-इलाहाबाद से सूचना प्रौद्योगिकी में बी.टेक., कार्नेगी मेलन विश्वविद्यालय-पिट्सबर्ग से इन्फार्मेशन नेटवर्किंग में एम.एस. कार्यक्षेत्र: कैलिफोर्निया में एक सॉफ्टवेर इंजिनियर के तौर पर कार्यरत|
सिनेमा, खास तौर पर भारतीय समान्तर सिनेमा में रूचि है| इसके अतिरिक्त संगीत सुनना भी बहुत पसंद है| हिंदी साहित्य में विशेष अभिरुचि है, खास तौर पर मुंशी प्रेमचंद जी से बहुत प्रभावित हूँ|
कॉलेज से जुड़े हुए कुछ सस्मरणों पर अंग्रेजी भाषा में एक ब्लॉग लिखते हैं, जिसे मित्रों तथा अन्य पाठकों ने बहुत सराहा और अन्य विषयों पर लिखने के लिए प्रोत्साहित किया|

हम गर्मी की छुट्टियों में हर साल गाँव जाते थे| अब गाँव में आम की अमराइयों की बयार और पीपल के पेड़ की घनी शीतल छाँव से ही काम चल जाता था और अगर इतने पर भी मन न भरे तो जाके तलैया या नहर में डुबकी लगा लो| इसलिए गाँव में कूलर महाशय को कभी जानने समझने का मौका नहीं मिला| ऐसे ही कक्षा ३ या ४ की गर्मी की छुट्टियाँ मनाकर हम गाँव से वापस फतेहपुर लौटे तो देखा की बेडरूम की खिड़की से सटा हुआ घर के बाहर की तरफ कुछ रखा हुआ है| बाहर झाँक के देखा तो लोहे के स्टैंड पर एक दैत्याकार कूलर रखा हुआ है|

लोहे का कूलर जिसे पापा ने खरीदने की बजाय किसी दुकान से असेम्बल कराया था| एक बड़ी सी पानी की टंकी, खस-खस से भरी हुए तीन तरफ की दीवारें और सामने की तरफ एक बड़ा सा एक्झास्ट पंखा| वैसे तो अमूमन छोटे कूलर में पानी को टंकी से खींच कर खस-खस के ऊपर डालने वाली मशीन जिसे हम टुल्लूर बोलते थे, टंकी के अन्दर ही लगी होती थी| लेकिन इस भीमकाय कूलर का काम छोटे मोटे टुल्लुर से चलने वाला नहीं था तो एक बड़ा टुल्लुर अलग से लगाना पड़ा था| टंकी से एक पाइप निकल कर टुल्लुर में आता था और दूसरा टुल्लुर से निकल कर कूलर में जाता था| टुल्लुर चोरी न हो जाये इसके लिए टुल्लुर घर के अन्दर खिड़की पर था और पाइप खिड़की से बाहर निकली हुई थी| कूलर के पीछे वाली दीवार दरवाजे का काम करती थी जिसे कूलर की सफाई वगैरह करने के लिए खोल कर निकाल सकते थे| और सामने की तरफ पंखे के आगे खड़ी -पड़ी लोहे की पत्तियां थी जिसे आप ऊपर-नीचे दायें-बाये घुमा कर हवा की दिशा को कण्ट्रोल कर सकते थे|

खैर जैसे ही पापा ने कूलर स्टार्ट किया कूलर और टुल्लुर की आवाज से पूरा घर भर गया और उसके साथ ही एक अजीब से मछली वाली गंध फ़ैल गयी जो की अक्सर कूलर स्टार्ट करने के कुछ देर बाद तक फैली रहती थी| हम सभी बच्चे यानि की मैं मेरा भाई और मेरी बहन कूलर के सामने खड़े हो गए| हालाँकि मैं इतना छोटा था की पैर उठाने पर भी मेरा सिर्फ गर्दन के ऊपर वाला हिस्सा कूलर के सामने आ पा रहा था, फिर भी बाल उड़ाते हुए कूलर की सर्र सर्र हवा का मैंने खूब मजा लिया|

लेकिन इस मजे के साथ ढेर सारे काम भी बढ़ गए| कूलर का पानी एक दिन में ख़तम हो जाता था तो शाम को पानी आने पर कूलर में पाइप लगा के पानी भरना पडता था और निगरानी करनी पड़ती थी ताकि टंकी भरते ही पानी बंद किया जा सके वर्ना पानी बाहर गिर के सब कीचड़ कर देता था| साथ ही हफ्ते में एक बार कूलर की टंकी भी साफ़ करनी पड़ती थी|

इसके साथ ही हर साल कूलर की रंगाई का कार्यक्रम होता था| गर्मी की शुरुआत होने पर पापा ब्लैक जापान नामक कला पेन्ट कूलर की टंकी और स्टैंड रंगने के लिए और कोई एक रगीन पेन्ट कूलर की दीवारें रंगने के लिए लाते थे| और कूलर रंगने की जिम्मेदारी हम दोनों भाइयों को सौपी जाती थी| हम दोनों भाइयों को रंगाई पुताई में बड़ा आनंद आता था, तो हम लोग अपना काम बाँट लेते थे मसलन टंकी के अन्दर मैं करूंगा और टंकी के बाहर का हिस्सा मेरा भाई| बाकायदा कूलर की दीवारों को रेगमाल से घिस-घिस कर कर पहले जमा हुआ नमक निकालते थे और फिर पोतने के बाद धुप में थोड़ी देर के लिए रखते थे सूखने के लिए| इस कार्यक्रम के कारण हमारे कूलर महाशय की तबियत हमेशा दुरुस्त बनी रही| कुछ सालों के बाद तो पानी के टंकी पर पेन्ट की इतनी मोटी परत बन गयी कि अगर लोहा हटा भी दो तो भी पेन्ट की दीवार में पानी टिका रहे| कूलर की घास भी हर दूसरे तीसरे साल बदलवानी पड़ती थी| जिस दिन नयी घास लग के आती थी उस दिन कूलर एक्स्ट्रा ठंढी हवा देता था| पानी को सुगन्धित करने वाला इत्र भी खरीद के लाते थे ताकि कूलर चलने पर कमरा महकता रहे|

हमारे प्रतापगढ़ आने पर कूलर महाशय की जिंदगी में काफी बदलाव आये और हमे ये भी पता चला की हमारे कूलर महाशय बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे| प्रतापगढ़ में पानी की बहुत समस्या था| रोज सबेरे-शाम सिर्फ कुछ समय के लिए पानी आता था| इसलिए पानी इकठा करके रखना पड़ता था| १०० लीटर की एक बड़ी टंकी और एक बड़ा टब तो खरीद लिया था लेकिन फिर भी कभी कभी पानी ख़तम हो जाता था| इस समस्या के समाधान के लिए कूलर की टंकी में भी पानी हमेशा रखा जाने लगा, फिर चाहे गर्मी हो चाहे ठंडी| बस अंतर ये था की गर्मी में कूलर जी स्टैंड पर टिके रहते थे और ठंडी में उन्हें उतार कर चार इंटों का आसन दिया जाता था| उस पानी को कपडे बर्तन धोने जैसे कामों के लिए इस्तेमाल किया जाता था| और फिर यहाँ पानी भी बहुत धीरे आता था इसलिए पाइप से कूलर में चढ़ता नहीं था, तो पानी को बाल्टी-बाल्टी भरना पड़ता था जो कि काफी मेहनत वाला काम था| इसके साथ ही यहाँ पर खिड़की बहुत बड़ी थी तो हम लोगों ने दफ्ती और गत्ते कूलर के मुहं को छोड़ कर पूरे खिड़की में लगा दिए ताकि ठंडी हवा बाहर न भाग सके|

प्रतापगढ़ में मेरा और मेरे भाई का कमरा बिलकुल अलग था| दिन में तो हम सभी कूलर के सामने ही जमघट लगाये रखते थे लेकिन कूलर जी की सेवा करने के बाद भी हमें रात में ठंडी हवा से वंचित होना पडता था| हमने पापा जी गुजारिश करी की एक छोटा कूलर हमारे कमरे में भी लगा दिया जाये| पापा जी मान भी जाते थे लेकिन इससे पहले कि कूलर आये हम गर्मी की छुट्टियाँ मानने गाँव निकाल जाते थे और वापस आने पर हीलाहवाली में कूलर सेलेक्ट करते करते इतनी गर्मी बचती ही नहीं थी की कूलर खरीद हो सके, और इस तरह कभी दूसरा कूलर आया ही नहीं|

खैर कुछ सालों के बाद मैं और मेरा भाई घर से निकल गए तो हमें इन सब चीजों की जरूरत भी नहीं रही| फिर हमारे घर से चले जाने पर कूलर के रख रखाव में भी कमी आ गयी| और फिर कूलर काफी पुराना भी हो चला था| स्टैंड की एक टांग टूट गयी थी तो उसकी जगह एक के ऊपर एक ईंटें रखकर काम चलाना पड़ता था| टंकी में जहाँ पर पाइप लगी थी वहां से लगातार पानी टपकने लगा था| सामने की तरफ ऊपर-नीचे दाये-बाये हवा घुमाने वाली पत्तियां भी जम गयी थी और हमेशा एक ही दिशा में आती थी| बॉडी भी कुछ सालों बाद पुताई के आभाव में जंग खाकर ज़र्ज़र हो गयी| अंततः पंखा निकलकर बाकि का कूलर अभी पिछले साल लोहे के भाव कबाड़ी को बेंच दिया, हालाँकि उसमें लोहे से ज्यादा तो मुझे बीसियों परत पेन्ट का वज़न लग रहा था| प्लान ये था की एक दूसरी कूलर की बॉडी खरीद कर पंखा उसमें लगा दिया जायेगा| लेकिन फिर ए.सी. लग गया और पंखे को भी किसी इलेकट्रेशियन को बेच दिया गया|

कूलर अब भी उत्तर भारत के मध्यम वर्गीय परिवार का एक अहम् हिस्सा है और पिछले कुछ सालों में जिस तरह से सूरज देव का प्रकोप बढ़ा है, मुझे तो कूलर महाशय की अहमियत कम होती नहीं लग रही| ए.सी. खरीदना हर किसी के बस की बात नहीं, और अगर कोई खरीद भे ले तो उत्तर भारत में जिस तरह बिजली की किल्लत है उस हिसाब से कितना ए.सी. चल पायेगा उसका भगवन ही मालिक है| तमतमाती चिलचिलाती गर्मी में घरों की खिडकियों से चिपके हुए कूलर, उत्तर भारत के शहरों और कस्बों की पहचान हैं और आने वाले कुछ समय तक ये पहचान बनी रहेगी|

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