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अल सुबह आज मेहता जी से बहस हो गयी.... मैंने कुछ परेशानी भरे अल्फ़ाज़ में पत्नी से चाय का प्याला लेते हुए कहा .....आपका दिमाग खराब है? जहाँ जाते हो वहीं कुछ न कुछ उल्टा सीधा करके आते हो .....अरे मेहता जी बेचारे कितने भले इंसान हैं, हर जरूरत के वक्त सामने खड़े होते हैं और भूल गए जब आपका एक्सीडेंट हुआ था, तब कोई रिश्तेदार नहीं आया था आपके पास...... वो बेचारे मेहता जी ही थे जिन्होंने तुम्हारी मदद की थी .......पत्नी के श्रीवचनों में एक भाव था.... एक एहसानमंद आवाज थी .......

 नागपाल सिंह रचनाकार परिचय:-



नागपाल सिंह
9828157423
शिक्षाविद
B.Sc., M.A., MBA, B.Ed.
वर्तमान में शिक्षा सलाहकार व् व्यक्तित्व व मीडिया सलाहकार
भीलवाडा (राजस्थान)

अरे भाई बात तो सुनो, क्या हुआ.....? बस लगीं अपना राग अलापने ........ वो आज टहलते वक्त सच्ची राष्ट्रीयता पर चर्चा हो रही थी. उसी के चलते उनसे बहस हो गयी. ...... वा जी वाह....हमारे पड़ोसी अपना दूसरा मकान बना रहे हैं और तुम्हारे छोटे भैया ने दूसरा प्लाट ले लिया, घर में आज तक बड़ी गाड़ी नहीं आई और बेटी का ब्याह सर पर है.... इन बातों में तो आपका ध्यान रहता नहीं है ..... और राष्ट्रीयता की चर्चा ... क्या बात है? .... अपने सांसद जी को बोल दो वो तुम्हारा घर संभाल लेंगे और तुम राष्ट्रीयता का झंडा लेकर चलते रहना .......
अरे भाई सांसद जी कहाँ से आ गये बीच में? ...... और मुझे मेरी राष्ट्रीयता का स्मरण वो क्यों कराएँगे? मेरी अपने राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी वो क्यों बताएँगे भला? ....... क्या यही काम बचा है अब सरकार के पास? क्या एक एक आदमी को अब राष्ट्रीयता सरकार सिखाएगी? ...... यही तो कारण बना बहस का मेहता जी साथ और अब तुम .... चाय पी लूँ या जाऊँ नहाकर? ..... मेरी भावनात्मक धमकी का पत्नी पर असर हुआ .... और विपक्षी तेवर का सारा जोर चाय के प्याले पर लगा, मेज पर ऐसे रख के चली गयी जैसे हमारे सांसदों ने मिर्ची स्प्रे से अपना विरोध जताया था .......
मेज पर फैली चाय को साफ़ करते हुए मैं सोच ही रहा था कि आखिर कमी कहाँ रह गयी, तभी ......... अखबार के आने की आवाज ने दरवाजे पर दस्तक दी .... तो लगा थोडा मन लग जाएगा. यही सोच कर मैंने अखबार उठाया तो मुख्य पृष्ठ पर छपी कार ने झाँककर मेरा मजाक उड़ाया... खैर पढना तो था ही ..... मंत्री ने कितना पैसा लिया विदेश में रहने वाले ललित मोदी से सरकार खुलासा करे .... विपक्ष हंगामे पे अड़ा .... संसद नहीं चलने देंगे ...... मानसून सत्र बर्बाद ........ हमारे पडोसी देश ने अपने नागरिक को पहचानने से इनकार किया ...... याकूब मेमन को फाँसी देने वाले जज को धमकी ...... दाढ़ी नहीं रखने वालों के खिलाफ इस्लामी फ़तवा ..... हाय रे ये मास्टर प्लान ..... सब्जी लाना नहीं भूलना वरना शाम को खाना नहीं बनेगा...... जी नहीं ये खबर नहीं पत्नी का रोजनामचा था जो इसी समय मिलता था ....... ख़बरों से बचने के लिए अखबार को उल्टा रखा तो फिर वही कार मुझे चिढ़ा रही थी ......
अपना चश्मा रखते हुए मैंने चाय ख़तम की तो सोचा आखिर समस्या क्या है? आखिर राष्ट्रीयता का मतलब क्या है?..... है क्या ये चीज?.... जिसकी चर्चा रोज हर समय ... हर घडी होती है लेकिन सामने नहीं आती ये राष्ट्रीयता ...... आखिर है क्या?...... बचपन से बच्चों को ये कहकर पढ़ाया जाता है कि बड़े होकर विदेश में नौकरी करने की इस उपलब्धि को राष्ट्रीयता कहेंगे?..... बड़े गर्व से अपने रिश्तेदारों को विदेशी नागरिक बताकर सीना ऊँचा करना, क्या ये है?......येन केन प्रकारेण धन संग्रह करना ... लेकर ... देकर .... हड़पकर ... छीनकर ..... लूटकर.... सफ़ेद कपडे पहनकर या फिर किसी एकरंगी पोशाक पहनकर..... चाहे जैसे भी हो बस धन चाहिए ...... यहाँ मैं एक बात का जरूर स्मरण करा दूँ.... उक्त सारे क्रिया विशेषणों के स्थायित्व में मुझे तो लगता है हम सब सहयोग कर रहे हैं ..... एक प्रश्न है ..... आखिर गैर-राष्ट्रीय है कौन?....... क्या सिर्फ रिश्वत लेता एक अधिकारी?....... या फिर एक भ्रष्ट नेता?...... या टैक्स चोरी करता एक कर्मचारी?..... या फिर सरकार को किसी भी प्रकार से अपना सहयोग न करने वाला आम नागरिक?...... आखिर किसे कहेंगे अराष्ट्रीय?........ शिक्षक अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन राष्ट्रहित में न करके स्वयं के हित में करता है तो क्या ये राष्ट्र-विरोध नहीं है?..... शिक्षा के उच्च केन्द्रों को राजनीति का गुरुकुल बना दिया, क्या ये राष्ट्र विरोध नहीं है? खाली पड़े कक्षा-कक्ष और महकते मयकदे, क्या ये राष्ट्र विरोध नहीं है? .... सरकारी टैक्स को चुराने का हर हथकंडा अपनाता व्यापारी .. क्या ये राष्ट्र विरोध नहीं है?...... अस्पतालों में चहुँ ओर फैला सम्बन्धवाद........ क्या ये राष्ट्र विरोध नहीं है?....... मुख्य बाज़ार में बेपरवाह और बेतरतीब वाहनों का अनियमित शक्ति प्रदर्शन, क्या ये राष्ट्र विरोध नहीं है?.. अपने घर के बाहर नियमों के विरुद्ध अतिक्रमण कर निर्माण करना, क्या ये राष्ट्र विरोध नहीं है? ऐसी हर जगह, वस्तु और साधन जो अपना नहीं है, उसका दुरुपयोग करना, क्या ये राष्ट्र विरोध की श्रेणी में नहीं आएगा ..... रेल के टूटे काँच .... बस की फटी सीट ..... अस्पतालों की पीक व थूक से सजी दीवारें ...... गन्दगी के ढेर से अटे सामुदायिक स्थल... चाहे बाग हो, नदी हो, तालाब हो, सड़क हो ... चाहे जो हो ... क्या ये राष्ट्र विरोध नहीं है?....... कानून के खिलाफ प्रकृति की अंधाधुंध दोहन क्या इसे राष्ट्र द्रोह नहीं कहेंगे........? कहेंगे साहेब कहेंगे .........
अगर आमजन ऐसे राष्ट्र द्रोह करना छोड़ दें तो राष्ट्रीयता की बात करना समझ में आ सकता है. सिर्फ कोरे शब्दों से किसी को दोष देना राष्ट्रीयता नहीं हो सकती ...... सोशल मीडिया पर रोज नित नए गुरु ज्ञान के सम्प्रेषण से राष्ट्रीयता नहीं आती ...... ये आती है राष्ट्र प्रेम से .... अपनी जिम्मेदारियों को राष्ट्र के प्रति समर्पित करने से ..... ये आती है एक सभ्य नागरिकता का कर्त्तव्य निर्वहन करने से ... राष्ट्रीयता आती है सामाजिक सरोकार से ... राष्ट्रीयता पैदा होती है सद्भाव से न कि स्वार्थ से ..... ये वो आदत है जो बुराई से परे की चीज है ..... जो स्वयं में परिवर्तन की बात करती है .... जब सरकार अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन राष्ट्र हित में करे ... नीतियाँ बनाये... न कि ढिंढोरा पीटे तो राष्ट्रीयता कही जा सकती है ..... जब किसी देश के नागरिक अपनी सामाजिक व राष्ट्रीय जिम्मेदारी को समझें तो राष्ट्रीयता का विकास होता है ... अपने बच्चों में राष्ट्रहित में ज्ञान देना राष्ट्रीयता है न कि ऊँचे भवन बनाने में .... अपने बच्चों की शादी में करोड़ों रुपये के खर्च का बयान राष्ट्रीयता नहीं है ....... वैसे भी स्वतंत्रता दिवस आ रहा है .... खूब चर्चा होगी आजकल राष्ट्र की ..... जी हाँ होगी लेकिन चर्चा ही ..... कपड़े पहनकर भी राष्ट्रीयता दिखाई जायेगी ..... रेलियाँ भी निकाली जाएँगी और नारे भी लगाये जायेंगे ....... खूब होगा दिखावा ............... वाह री राष्ट्रीयता ....

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