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• दूध से नहाकर जो तू, भगवान बना बैठा है,
हस्ती तेरी बनाई है, माँ नें छातियाँ निचोड़ कर।


 सुशील कुमार 'मानव' रचनाकार परिचय:-



नाम : सुशील कुमार 'मानव' आजीविका :अनुवादक साहित्यिक कार्य: कविता,कहानी, गजल लिखना आयु 32 वर्ष, निवास: इलाहाबाद शिक्षा : हिंदी, समाज शास्त्र, और जैव-रसायन से परास्नातक मोबाइल नं. 8743051497

• राह-ए-इश्क में दो कदम, साथ-साथ जब से चले,
दर्द – दर्द सी वो है, अश्क-अश्क सा मैं हूँ।

• उलझनों की फाइलों में , यूं दबी है जिंदगी,
कि आदमी आदमी, दफ्तर हुआ जाता है।

• प्यार कुछ और नही, महज एक बेवकूफी है
कर बैठते हैं जिसे, अक्सर समझदार लोंग ।

• प्यार के चिटफंड में, हर कोई निवेश कर सकता है ,
बर्बाद होने की आखिर, कोई उम्र नही होती ।

• .सुना है, टिकती नही वफा, कहीं भी ज्यादा देर तलक
यूँ ही मुफ़लिसी का नाम, मैने वफा रख लिया है ।

• कुछ तो बिका है मुफलिस सर-ए-शाम बाज़ार में
घर में महँगे साज़-ओ-सामान , नहीं यूँ ही आये हैं ।

• मिल गया है उसे शायद, कोई जिन्न बोतल का,
दिल में नये-नये अरमान, नहीं यूँ हीं आये हैं।

• हो गये हैं मेहनतकश, आजकल एसी, कार वाले,
इन दिनों कुछ यूं, जिम का कारोब़ार बढ़ चला है ।

• भुगतो ऐ, बेनसीबों! सज़ा-ए-बेखुदी अपनी,
घर से भागे को, कबीले का सरदार बना बैठे हो!

• जिसकी मौत पर, पंडित भी रोये, काजी भी रोये
सदियों में पैदा होता है, ऐसा एक कलाम कोई।

• दो मुल्कों में अमन-ओ-प्यार है, लिख दूँ तो सितम़ हो जाये,
रोटी न मिले ओज कवि को, सियासतदां बे-इमाँ हो जायें।

• हकीकत नहीं वहम है,ये नफ़रत दिलों की,
अमन से रहे पड़ोसी, ये हम भी चाहते हैं।

• वैक्युम क्लीनर ने साफ कर दिये, कुछ इस हद तक संस्कृतियों को,
अब भूले-बिसरे बूढ़े चौखट तक, कोई लेने धूर अशीष नही आता।

• इतना बड़ा नरसंहार हुआ, और कोई मुज़रिम नही!
इस बात पर जाँच अधिकारी को, पद्म पुरस्कार मिलना चाहिए।

• राष्ट्र निमार्ण के मुद्दे पर, उनकी संजीदगी का आलम देखिए,
कि चल पड़े हैं रह़नुमाई को, तमाम बिल्डर्स उनके झंडे तले ।

• बेंचवाद की दहलीज पर , न्याय कुछ इस कदर बेमानी है,
कि अब केस नही ठेका, लेने लगे हैं काली कोट वाले ।

• मजहब के हथौड़े से, वो कील ठोकते गये ।
हालात के सलीब़ पे, गरीब़ झूलता रहा ।

• डर पर जीत का , उद्घोष है ये काफ़िरी
मंदिरों में लिख दो, मस्जिदों में लिख दो ।

• शर्मिन्दा हूँ यारों मैं , उन्नति के इस बयार पे,
कि विदेशी चड्ढियों के बिना , बे-आब़रू हम हैं !

• गिद्धों की गवाही पर, कौवे जिरह करेंगे ।
बकरा कैसे मरा? मामला भेड़िये के दरबार में है!

• न्याय मरा, भरोसा मरा, उदार हिंदुत्व की पहचान मरी
हाशिमपुरा में सिर्फ मुसलमान नही मरे ।

• कानून के अंधेपन का फायदा , मिलने लगा जज को
आखिर, यूं ही तो किसी को, मलाई नही मिलती !

• डूबने की हसरत लिए ही, उतरा हूँ समंदर में,
मैं जानता हूँ, हर कश्ती को किनारे नहीं मिलते।

• मासूमों के लहू से, हर छाती लहूलुहान थी
संवेदनाएं सरहदों की मोहताज़ नहीं होती।

• हाथों में हथियार लिए, कुछ मुर्दे घूम रहे हैं,
इंसानियत का तकाज़ा है, इन्हें दफ़नाओ नहीं, जिंदा करो।

• भगवान हो जाता है, या फिर शैतान हो जाता है,
आस्था व्यक्तित्व पे हावी हो तो इंसान,इंसान नहीं रह जाता।

• जिस भरोसे की पूँछ पकड़, मैं बैठा रहा अब तलक,
पता लगा आखिर में कि, वो पड़ोसी के गधे की है।

• समाज का पहरेदार , आज वो बना बैठा है,
बदनामी के चर्चे जिसके, कल थे गली-गली ।

• अपने ही घर में खुलकर, जी नहीं पाता है वो,
कुछ इस कदर उसे यारों, ख़ौफ –ए-शराफ़त है।

• हिंदू का है, न मुसलमान का है
सियासत की देह का, कोढ़ है मज़हब।

• प्यार की गलियों से, कभी गुज़रना ही न हुआ मेरा,
वसीयत में पिता ने, शराफ़त मेरे नाम जो लिख दी थी
• आजमाने लगा हूँ जब से, चालाकियों के दाँव-पेच,
कहने लगे हैं लोंग, कि मैं दुनियादार हो गया हूँ

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