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ददाश्त पर बहुत जोर डालने पर उसे याद आया कि इस बसंत पंचमी पर वह पूरे अस्सी साल की हो जायेगी |

रचना व्यासरचनाकार परिचय:-



रचना व्यास मूलत: राजस्थान की निवासी हैं। आपने साहित्य और दर्शनशास्त्र में परास्नातक करने के साथ साथ कानून से स्नातक और व्यासायिक प्रबंधन में परास्नातक की उपाधि भी प्राप्त की है।

या दद्दा ने उसका नाम वासंती रखा था | जिस साल देश को अंग्रेज आजाद कर गये , उसी साल वह शादी के बंधन में बंधी | पर वो जहाँ भी गई उसने एक ही माहौल देखा - अपनेपन का , प्रेम का | बड़े -बड़े खेत खलिहान , बड़ी हवेली , ढेर सारे गाय-भैस और मिट्टी में खेलते बाल -गोपाल | घर में वो पांच बहुएं थी | सबने चार -चार टाबर जने थे | बड़ी चूल्हा -चौका देखती | दूसरी के कपड़े दूध , माखन , मठ्ठे से महकते रहते | दोनों मँझली धान पीसती , मसाले कूटती | सबसे छोटी आंगन में बैठी पीतल के बरतनों को राख़ से चमकाती | सबमें बहनापा था | हॅसते -गाते मिलजुलकर सारा दिन काम में लगी रहती |

घर का बड़ा बेटा पढ़ा -लिखा था | सरकारी नौकरी में था | उसने पिता से बात की अब जमाना बदल गया है | बच्चों को शहर में पढ़ने भेजना चाहिए | सभी बच्चे पढ़कर ऊँचे ओहदों पर पहुँच गए | ब्याह हुए | शहर की बहुए आई | उन्हें अपनी बड़ी सास के चूल्हे का धुँआ आंसू देता | दूसरी सास के कपड़ो से उबकाई आती | मंझली दोनों सास का काम तो उन्होंने शहर से चक्की मंगाकर आसान कर दिया | उन्हें छोटी सास की तरह अपने हाथ काले करना मंजूर न था | अतः शहर से बोरा भरकर स्टील के बर्तन और धुलाई का पाउडर मंगवाया गया | फिर भी देर -सवेर एक -एक करके सब शहरों में रहने लगी | बेटियाँ ससुराल की हो गई | बड़ी हवेली में सन्नाटा -सा रहने लगा | उम्र हावी थी सो पहले की तरह उनके हाथ -पैर नहीं चलते थे | बेटे -पोते उन्हें बुढ़ापे में जीवन का सुख देना चाहते थे | अपने -अपने माँ -बाऊजी को वे अपने शहरों में ले गए | हवेली वीरान हो गई | उम्र के पाँच दशक साथ रहने वाली देवरानी-जेठानी तीज -त्यौहार पर भी मिलने को तरसती | पहले होली-दीपावली को बेटे टेलीफोन पर बात करवा देते थे | पर जबसे जायदाद के बंटवारे का मामला कोर्ट तक पहुँचा , वे अपनी -अपनी दहलीज में सिमट कर रह गई | एक -एक करके चारों बड़ी काल -कलवित हो गई | एक वासंती जिन्दा थी नए जमाने के रंग -ढंग देखने के लिए | वो डाइपर पहनने वाली अपनी चौथी पीढी को देख रही थी | अपनी जवानी में जो चीजें उसकी कल्पना में भी नहीं थी , उन्हें देख -देखकर वो आश्चर्य से भर जाती | उसके बेटे का फोर bhk फ्लैट था पर उसमें न आंगन था न छत थी जहाँ कोई पापड़ -मंगोड़ी बनाये या नींबू के आचार का मर्तबान रखे | कोरी मटकी की महक के लिए उसका नाक तरस गया था | जाने कितनी दीपावली वो मिट्टी के दीयों बगैर पूज चुकी थी | पोता दूर तक चक्कर लगा आया पर उसे गोवर्धन पूजा के लिए गोबर न मिला | अमावस्या पर पितरों की धूप लगाने के लिए कण्डे नहीं मिलते थे | जो चीजें उस हवेली में सर्वत्र सुलभ थी वो यहाँ पैसे देने पर भी नहीं मिलती थी | मशीन चलाते ही कपड़े साफ ,घर साफ | जब गाँव में कोई शादी-ब्याह होता , तो पूरे गाँव की दावत होती | सौंधी मिट्टी पर बैठकर , हरी पत्तल में खालिस घी का मोहनथाल , लड्डू , हलवा व पूरी परोसे जाते | मिट्टी के कुल्हड़ में रायता पीना उसे आज भी याद था | यहाँ तो अब सब होटल में जाते है | पोता बता रहा था कि बहुत पैसा खर्च होता है वहाँ | पहले कई महीनों में चिठ्टी-पत्री आती थी | तब जाकर मायके का , अपने-परायों का हाल-चाल मालूम होता था | उसके लिए सबसे बड़ा अजूबा मोबाइल था जिससे कभी भी कहीं भी बात हो जाती थी | जब कभी भी बेटा बहुत थका या उदास होता , उसकी गोद में सिर रखकर आँखे मूंद लेता | उसे ऐसा लगता मानो उसका ये मुन्नू कभी बड़ा ही नहीं हुआ | अब भी वो उसे बाहों में समेट सकती है , दुलार सकती है , उसका माथा सूंघ सकती है | तभी उसका मोबाइल बज उठता और वह बात करता बाहर निकल जाता ; उससे कोसों दूर | जब कभी पोते की बहू उससे बतियाती , वो अपने गांव की बातें उसे बताती | कितनी ही बातों पर वह आश्चर्य करती , कभी खिलखिलाती ; तभी मोबाइल बजने पर वह व्यस्त हो जाती , वासंती की यादें अधूरी छोड़कर| उसे वह जोड़ने का साधन कम तोड़ने का साधन ज्यादा लगता था | अकेलेपन से ऊबकर वह सोचती कि फिर से घर में पीतल के बरतन आ जाये और वह घंटों आंगन में बैठी उन्हें राख से चमकाती रहे |

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