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योगेश समदर्शी के १० घनाक्षरी छंद:

 योगेश समदर्शी रचनाकार परिचय:-



योगेश समदर्शी का जन्म १ जुलाई १९७४ को हुआ।
बारहवी कक्षा की पढाई के बाद आजादी बचाओ आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के कारण औपचारिक शिक्षा बींच में ही छोड दी. आपकी रचनायें अब तक कई समाचार पत्र और पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं।

१.
चूल्हा और चक्की गई, बाजरा व् मक्की गई
गेंहूँ की भी छान फूंक, भूल गए यार हम
खलतों में आटा लाते, टाटा और बाटा लाते
चटनी आचार सब, लाते हैं तैयार हम
बच्चें भी हमारे आज, पिज्जा मांगने लगे हैं
मैगी उन्हें देके जतला रहे हैं प्यार हम
दूध दही भात भूले, मीठी मीठी बात भूले
घर में घुसेड़ लाये, कितना बजार हम

२.

धोती व लंगोटी छूटी, गाय वाली रोटी छूटी
लाठी और सोंटी छूट, गयी नये दौर में
रीत पीछे छूट रही, मान्यताएं टूट रही
नींद नहीं छूट रही, आज कल भोर में
गाली वाले गीत छूटे, प्यारे प्यारे मीत छूटे
लोक धुनें छूट गयी, जाने कैसे शोर में
देखो नेह छूटे नहीं, बंधन भी टूटे नहीं
गांठे नहीं चल पाती, प्यार वाली डोर में

३.

मंच को लजाने वाले, कविता भुनाने वाले
चोरी का सुनाने वाले, कवि चल पड़े हैं
मक्खन लगाने वाले, तारीफे बताने वाले
झूठ दोहराने वाले, कवि चल पड़े हैं
नाटक दिखाने वाले, मस्खरी जताने वाले
फिलमी सा गाने वाले, कवि चल पड़े हैं
दारू पी के आने वाले, मंचो से कमाने वाले
कविता चुराने वाले, कवि चल पड़े हैं

४.

कौन है जो देश को यूं, लूट लूट खा रहा है
सवा सौ करोड वाला, देश देखता है मौन
मौन है ये भीष्म जाने, कैसी प्रतिग्या लिये हैं
द्रयोधनी कृत्य मूक, देखते है क्यों यूं द्रौण
द्रौण जैसा ग्यानी जब, पापियों का साथ देवें
देश धर्म मान सभी, होते दिखते हैं गौण
गौण यदि हुआ देश, धर्म जरा सोचियेगा
देश वाला काम फिर, बोलिये करेगा कौन

५.

राम कैसे राम हुए, जरा सोचिये हुजूर
चाम नहीं पुजे कोई, पुजता सदा से काम
काम देखो राम जी के, जीवन मिसाल हुआ
त्याग से बडा हुआ है, सदा देखिये जी नाम
नाम ना डुबाया कभी, पिता के वचन हेतु
वन वन भटके थे, चुना नहीं था आराम
आराम को छोड छाड, लंका भी पहुंच गये
रावण घमंड तोड पाये तब ही थे राम

६.

जब राक्षस संतों पे, भारी पडने लगे थे
बढ़ा धरती पे पाप, आये तब ही तो राम
श्रद्धा तो है बड़ी चीज, यही समझाने हेतु
भिलनी के झूठे बेर, खाये तब ही तो राम
पिता के वचन हेतु, निज सुख त्याग दिये
पुरुषोत्तम जैसा पद, पाये तब ही तो राम
खुद राज पाट छोड़, वन वासी हो के जिये
"रावण-घमंड तोड़, पाये तब ही तो राम"

७.

देश का गुलामी वाला, दौर जरा याद करो
आन बान शान वाले, लुटते रहे सवाल
हिम्मत से सामना जो, किया तो फिरंगियों का
गुलामी वाले वो पीछे, छुटते रहे सवाल
देश वाले काले अंग्रेजों ने जो सत्ता पाई
संसद में तब कई, घुटते रहे सवाल
कितनी ईमानदारी, दिखलाएं हम तुम्हें
सीता के चरित्र पे भी, उठते रहे सवाल

८.

जवानी की गलती ये, रेप को बताते नेता
वोट बैंक वाला देखो, घिनौना है ये कमाल
गैंग रेप संभव ही, नहीं हैं बता रहे हैं
नित नये उठते हैं, देखिये यहां बवाल
है तार तार अस्मिता, माता बहनों की रोज
किसी के भी चेहरे पे, दिखता नहीं मलाल
पवित्रता का पैमाना,तय भी करे तो कौन
सीता के चरित्र पे भी उठते रहे सवाल

९.

खुद का ही गान करे, खुद का बखान करे
हो आत्म मुग्ध आदमी, तो विश्वास खोता है
अपनी ही जय कार, चाहे ऐसे नेता को तो
लालची सा आदमी ही, मानता है ढोता है
आलोचनाओ से डरे, निज की बड़ाई सुने
ऐसा राष्ट्र नायक तो, विष बेल बोता है
इतना है मशविरा, मेरा दिल्ली वाले नेता
देश से तो बड़ा निज नाम नहीं होता है

१०.

राज भोगने से नहीं, त्याग से होते महान
जो वन वन भटका, तो वही राम हो गया
आपकी भी सादगी पे, फ़िदा तो हुए थे सभी
किन्तु राज पाके ख़ास, देखो आम हो गया
सरकारी पैसे पे जो, अपनी मसहूरी करे
केजरी जी आपका तो, यही काम हो गया
हाँ दिल्ली वाले जश्न को, देख के ये दुःख हुआ
देखो देश से भी बड़ा, निज नाम हो गया

- - योगेश समदर्शी

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