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कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष के षष्ठी तथा सप्तमी(दीपावली के 6 वे तथा 7 वें दिन बाद) को मनाए जाने वाले इस पर्व को छठ कहते है। सूर्य षष्ठी के इस बिशेष त्योहार को बड़का परबयाछठ(डाला छठ)” कहा जाता है। इस सम्पूर्ण चराचर जगत का अस्तित्व भगवान सूर्य की ऊष्मा पर ही टिका है। गीता में भगवान कृष्ण कहते है- तपाम्यहं(अध्याय 9 श्लोक 19) अर्थात मै सूर्य रूप को तपता हूँ। फिर ”(अध्याय 10 श्लोक 21) मे भगवान कहते है ज्योतिषां रविरंशुमान अर्थात ज्योतियों में किरणो वाला सूर्य हूँ। सभ्यता के इतिहास में छठ ही एकमात्र ऐसा पर्व है जिसमे डूबते सूर्य की आराधना की जाती है। हम सभी जानते है अस्त होता सूर्य दीनता का प्रतीक है, वही उगता हुआ सूर्य सुख –समृद्धि का प्रतीक है। साल मे दो बार “चैत और कार्तिक मास” मे मनाये जाने वाले इस महापर्व को अधिकांश व्रती कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष में ही पूर्ण श्रद्धा और आस्था के साथ करते है। इस पर्व के साथ अनेक धारणाएँ जुड़ी हुई है। ऐसा माना जाता है कि इस पर्व को मन, वचन, स्वच्छता तथा कर्म की शुद्धता से करने पर पारिवारिक एवं शारीरिक सुख-शांति, समृद्धि प्राप्त होती है। इस व्रत के संबध में एक पौराणिक कथा है - आसुरी शक्तियों को पराजित करने के लिये देवताओं ने सेनानायक के रूप मे शिव-पार्वती के कनिष्ठ पुत्र कार्तिकेय को चुना। माता पार्वती ने अपने पुत्र के रक्षार्थ अस्ताचलगामी सूर्य को अर्ध्य देकर पूजन किया और अपने पुत्र के लिये उन्होने सूर्य देवता से प्रण किया कि यदि मेरा पुत्र विजयी होकर सकुशल लौट आया तो मै विधिवत आपकी पूजा करूँगी। सब कुछ वैसा ही हुआ जैसी माता पार्वती की इच्छा थी। कार्तिकेय विजयी हो, सकुशल लौट आए। फिर माता पार्वती ने विधिवत निर्जल व्रत रखा। ऐसी मान्यता है कि देवी पार्वती ने वर्तमान बिहार में गंगा नदी में ही अर्ध्य दिया था। इसलिये यह महापर्व सर्वप्रथम बिहार मे ही लोकप्रिय हुआ और आज भी है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि आज के बदलते आधुनिक परिवेश में लगभग सारे पर्व-त्यौहारों की अवधारणा बदल रही है, लेकिन इस विशेष महापर्व छठ में आज भी सदियों पुरानी चली आ रही परम्परा देखी जा सकती है। न श्रद्धा मे कमी आई है और न उल्लास में ही कमी आई है। बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश मे छठ निष्ठा से मनाया जाता है। देश के अन्य शहरो में तथा विदेशों में बिहारियों के होने से छठ मनाया जाने लगा है। दिल्ली में तो अब यह वृहत रूप से मनाया जाने लगा है।
छठ मनाये जाने की विधि:- छठ मुख्य रूप से महिलायें करती है पर पुरूष भी इसे करते है। इस महापर्व में ऊँच-नीच, जाति-धर्म, स्थान का कोई भी बंधन नही है। इसे कोई भी स्त्री-पुरूष अपनी स्वेच्छा से कर सकते है।

केलवा जे फरेला घवद से,
ओपर सुगा मड़राए।
मरबो रे सुगवा धनुख से,
सुगा गिरे मुरझाए।
इन पंक्तियों में महिला कहती है कि केले के घेरे पर सुग्गा(तोता) मंडरा रहा है। कहीं वह उसे जूठा न कर दे। इसलिये उसे भगाते हुए उपरोक्त गीत व्रती महिला गाती है। इस पंक्ति विशेष से अंदाजा लगाया जा सकता है कि छठ में स्वच्छता कितनी अधिक जरूरी है। दूसरे शब्दों मे यदि यह कहें कि स्वच्छता, शुद्धता, पूर्ण श्रद्धा, भक्ति और समर्पण का पर्व छठ है तो इसमे कोई अतिशयोक्ति न होगी। छठ के चार पाँच दिन पहले अर्थात दीपावली के तुरंत बाद सम्पूर्ण घर को, खासकर जहाँ व्रती को व्रत करना है अच्छी तरह धोकर, पोंछकर स्वच्छ बना लेना चाहिये। फिर गेहूँ को बारीकी से चुन कर पवित्र जल से धोते है और साफ कपड़े पर सुखाते है। सुखाते वक्त विशेष कर गेहूँ की पहरेदारी के लिये किसी व्यक्ति का होना जरूरी है। कोई पक्षी, पशु गेहूँ को जूठा न करे, इसका विशेष ख्याल रखा जाता है। यूँ तो चक्की (पत्थर की जो हाथ से चलाई जाती है) मे गेहूँ पीसने का तथा चावल पीसने का विधान है पर शहर में चक्की उपलब्ध नहीं है इसलिये मिल वाले अपनी चक्की (मशीन वाली) को धो-पोंछकर ही पूजा का गेहूँ और चावल पीसते है। कार्तिक मास में मिलने वाले फलों को छठ के लिये इस्तेमाल किया जाता है- केला, ईख, नारियल (पानी वाला), नींबू, सिघाड़ा (पानी फल), हल्दी, सूथनी, सिडकी, बेर, कोहड़ा, गागल (एक प्रकार का बड़ा नीबू), सेब, नारंगी, नाशपाती, बेड, अनानास, अमरूद, मूली आदि (वैसे सिर्फ केला, ईख, नारियल और गागल से भी अर्ध्य दिया जा सकता है) तथा अरता के पात, लौंग, इलाइची, कसैली, पान, सिंदूर आदि की जरूरत होती है।
गेहूँ के आटे से छठ के दिन दोपहर से पहले, केसार (चावल के आटे से बनाया जाने वाला विशेष मिष्ठान्न), ठेकुआ, खस्ता, परूकिया (सब मैदे आदि से बनने वाले विशेष मिष्ठान्न) बना कर तैयार कर लिया जाता है। सुबह ही इन्हें धोकर अच्छी स्वच्छ टोकरी(सामान्यत: बाँस की) में रखा जाता है। फिर संध्या के समय सूप मे सभी फल एवं उपरोक्त पकवानों से अर्ध्य देने का विधान है। छठ से एक दिन पहले खरना तथा खरना से एक दिन पहले ’नहा खा’ होता है। नहा खा अर्थात स्नान के उपरांत ही भोजन करने का नियम है। इसी दिन से छठ पर्व की शुरूआत हो जाती है। नहा खा मे चावल, दाल, कद्दू (लौकी) की सब्जी आदि खाये जाते हैं और इसी दिन से व्रती सामान्य बिस्तर त्याग जमीन पर या अपने अलग बिछावन पर सोते है। फिर छठ के एक दिन पहले छठ का प्रसाद बनाने में नया चूल्हा (मिट्टी का शुद्ध माना जाता है) और आम की लकड़ी का इस्तेमाल होता है, जो शुचिता के साथ स्वास्थ की दृष्टि से भी हितकर है।
परना(रसियाव) के दिन रसियाव (साठी के चावल तथा गुड़ से बनने वाली विशेष प्रकार की खीर), रोटी, फलों मे सिर्फ केले का प्रसाद बना सूर्य देव की पूजा की जाती है तथा यहीं देव-स्थान के पास एक शीर्शोपता (मिट्टी से बना हुआ) या कहीं-कहीं केले के पत्ते पर छठ के लिये निकाल पर पूजा की जाती है। इसके उपरांत रसियाव, रोटी और केला बाँटा जाता है।

इस के बाद व्रती निर्जल रहकर छठ के दिन अस्ताचल गामी सूर्य को नदी, सरोवर या गंगा मे खडे रहकर अर्ध्य देती हैं। इसके लिये बाँस से बनी सूप में क्रमश: गेहूँ से बने ठेकुआ, खस्ता, मैदा से बने पडुकियाँ, चावल से बना केसार, नारियल, केला आदि अन्य मौसमी फल (अपने सुविधा और सामर्थ्य अनुसार) अर्ध्य मे शामिल किये जाते हैं। व्रती सूप मे सभी पुजा सामग्री (जैसा ऊपर वर्णित है) दीप के साथ रखतीं हैं और वहाँ भी शीर्शोपता पर जल रखती हैं और उसकी पूजा करती हैं।
सूप को हाथ मे उठा कर अस्त सूर्य को दिखा कर हाथ मे ले जल मे खड़ी रहती है और परिवार के सभी सदस्य बारी-बारी से उस सूप मे गंगाजल या शुद्ध जल धीरे-धीरे गिराते है। तत्पश्चात दुध से भी अर्ध्य दिया जाता है। इस प्रकार अस्ताचल गामी सूर्य की पहली पूजा सम्पर्ण होती है।

फिर सुबह होने का इंतजार (नदी के तट पर रहकर या अपने घर वापस आकर अपनी सुविधा के अनुसार) किया जाता है। प्रात: वही क्रिया फिर दोहराई जाती है। अस्त सूर्य के अर्ध्य के बाद प्रात:कालीन सूर्य के अर्ध्य के बाद नदी के जल से व्रती स्नान कर घर लौटती है।

विशेष यह है कि सारे फल, सूप आदि लेकर परिवार का कोई सदस्य नदी तट तक नंगे पाँव जाता है और घर के सभी सदस्य वहीं पर मौजूद रह इस पर्व की शोभा को चार चाँद लगा देते है। इस प्रकार यह महापर्व शुचिता और सफाई का कठोरता से पालन करते हुए समाप्त होता है।
पारण अर्थात व्रत समाप्ति के दिन जाति भेद-भाव से गरीब-अमीर, कुलीन और पिछड़ी जातियों के भेद-भाव ऊँचा उठ कर व्रती को सम्मान दिया जाता है। उनसे प्रसाद ग्रहण करना सौभाग्य माना जाता है। नारी के सम्मान के साथ साथ इस विशेष व्रत का क्रांतिकारी पक्ष यह है कि यह व्रत पोथी, पंडित, मंत्र और पूजाविधि की बंधी-बंधाई पद्धति से मुक्त है।
समय के साथ साथ कोसी भरने की प्रक्रिया छठ में शुरू हुई जो सामान्य जन मे लोकप्रिय हुई।
कोसी भरने की प्रक्रिया:- स्थान विशेष एवं परिस्थिति के अनुसार कोसी (एक प्रकार का मिट्टी का घडा विशेष जिसमे दीप भी बना होता है) भरने की अलग अलग प्रक्रिया हो सकती है।

छ्ठ मे संध्या अर्ध्य देने के पश्चात कोसी भरने की प्रक्रिया कहीं कहीं देखी जाती है जो विशेष कामनाओ की पूर्ति हेतु की जाती है। यह जरूरी नही कि हर छठ व्रती इसे करे। जो महिला (वस्तुत: पुरुष इसे नहीं भर सकते) अपनी विशेष मनोकामना पूर्ति हेतु इसे करने की प्रतिज्ञा करती है वही इसमे भाग लेती है। संध्या अर्ध्य के बाद घर लौट कर या नदी के तट पर रह कर ही कोसी भरी जाती है।

इसमें महिला व्रती ईख को (7 या 14 को आपस मे जोडकर) खडी करती है। कहीं 2 (जोड़ा) या 1 प्रण के अनुसार कोसी भरी जाती है फिर स्थान विशेष को अयपन (चावल और हल्दी से बना घोल) से विशेष चिन्ह अंकित कर दीप जलाती है। चननी (गमछा या विशेष प्रकार का सूती कपड़ा) में छठ में प्रयोग आने वाले फलों तथा अन्य सामान को बांधते है और इसे ईख मे बांध कर ईख को खडा करने मे प्रयोग करते है। इस कोसी को मिट्टी के हाथी (जिस पर दिये भी बने होते है) के ऊपर रखा जाता है और हाथी के आगे गेहूँ का ढेर भी रखा जाता है तथा कोसी के साथ ही साथ वह सारे चीजें जो चननी मे होते है डाले जाते है और इसके चारो तरफ ढक्कनी (मिट्टी के बरतन) में फल आदि रख कर इस पर दीप जलाया जाता है। उसके बाद स्त्रियाँ अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु क्षेत्रीय गीतों का सामूहिक गान करती है जिससे सूर्यदेव को प्रसन्न किया जा सके। साथ ही साथ सुबह होने का इंतजार भी करती है। फिर अरूणोदय के सूर्य को अर्ध्य दे कर छठ समाप्त करती है।
उपसंहार- सूर्य उँचे आकाश मे विराजने वाले देवता है। इसके बावजूद उन्होने धरती से संबंध विच्छेद नहीं किया है। सूर्य की रश्मियो के कारण ही इस चराचर जगत में हरियाली और खुशहाली है। सूर्य अमींरों की अट्टालिकाओं एवं गरीबों की झोपड़ियों में सम भाव से अपना तेज बिखेरते रहते है। वे दूसरो के पोर पोर में अपना उजाला भर देने के लिये सदैव जलते रहते है। वे खुद को लुटाते रहते है। वे अगर अपनी आँख मूदँ ले तो प्रलय आ जाए। सूर्य के प्रति श्रद्धा भक्ति रखने वाले लोग सूर्य के उपर्युक्त चरित्र को अपने दैनिक आचरण में क्यों नही उतार पाते है? ऊँचाई पर होते हुए भी सूर्य इस जगत में रहने वालों को गले लगाए रहते है। पर आज आम आदमी अपनी स्वार्थ और स्वांत: सुख के लिये अपने सपने बुनने मे मशगूल है। किंतु सूर्य का संदेश है- परमार्थ के लिए जलते रहो। एक तरफ सूर्य स्वास्थ्य और सुख बाँट रहे है तो दूसरी तरफ इस धरती के लोग ऊर्जा तो बाँटते है पर आतंक के रूप में, अग्नि के रूप में, दर्द और दुख देने के लिए। इंसान और सूर्य के बीच उतना बड़ा अंतर एवं ऐसी असमानता कि आश्चर्य की कोई सीमा नही है। कभी त्रेतायुग में महर्षि अगस्त्य के कहने पर सूर्यवंशी राम ने “आदित्य हृदय “ का पाठ कर रावण का वध किया था लेकिन आज आदमी चारों तरफ फैले आतंक के रावणत्व का सफाया कैसे करे? आदित्य प्रत्येक मनुष्य के मन:आकाश में विराजमान है किंतु अत्यंत दुख की बात है सभी ने उन्हें अस्त कर रखा है। जरूरत है अन्धकार की गिरफ्त से बाहर आने की। अपने अंत:करण के सूर्य को जगा कर अर्ध्य देने की, तभी चहुँ ओर प्रकाश फैलेगा-विश्वास से पूर्ण प्रेम का, शांति, परम शांति एवं विश्व शांति, समृद्धि के उजाले का। आमीन..

सूर्य की बात हो और सूर्य मन्दिरो की बात न हो----
देश-प्रदेश के प्रमुख सूर्य मंदिर:-

उलार्क-यह अब उलार नाम से जाना जाता है। कहते है कि भगवान कृष्ण के वंशज शाम्ब को कुष्ठ व्याधि हुई जिससे मुक्ति के लिये शाम्ब ने देश के 12 जगहों पर भव्य सूर्य मन्दिर बनवाए थे और भगवान सूर्य की आराधना की थी। ऐसा कहा जाता है तब शाम्ब को कुष्ठ से मुक्ति मिली थी। उन्ही 12 मन्दिरो मे उलार एक है। अन्य सूर्य मंदिरो मे देवार्क, लोलार्क, पूण्यार्क, औंगार्क, कोणार्क, चाणार्क आदि शामिल है। यहाँ की मूर्तियाँ पालकालीन है जो काले पत्थर (ब्लैक स्टोन) से निर्मित हैं। बताते है कि मुगलकाल मे विदेशी आक्रमणकारियों ने देश के कई प्रमुख मंदिरो के साथ उलार मन्दिर को भी काफी क्षति पहुँचाई थी। बाद में भरतपुर नरेश के वंशजो द्वारा इस पौराणिक मन्दिरो के जीर्णोद्धार की बात कही जाती है। बताते है कि संत अलबेला बाबा करीब 1852-54 के बीच उलार्क आए और जनसहयोग से मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। खुदाई के दौरान यहाँ शिव, पार्वती, गणेश आदि देवताओं की दर्जनो विखंडित पालकालीन दुर्लभ मूर्तियाँ मिलीं। उलार मंदिर मे नेटुआ (एक विशेष जाति) नचाने की प्रथा अब भी कायम है जो इसकी खासियत है। इस प्रथा का जिन महिलाओ को पता है वे अपने आँचल को जमीन पर बिछा देती है जिसपर नेटुआ नाचते हुए बाजा बजाता है। माना जाता है कि सूर्य देवता इससे प्रसन्न होते है। यहाँ छठ के अतिरिक्त रविवार को भी दूर-दूर से अनेक श्रद्धालु महिलायें खासतौर पर पूजा-अर्चना के लिये जुटती है। साथ ही साथ यहाँ भव्य मेला भी लगता है।

कोणार्क
:-राजा नरसिंह देव प्रथम ने 13वीं शदाब्दी में ”ब्लैक पैगोड़ा” के नाम से प्रसिद्ध उड़ीसा के इस मन्दिर को बनवाया था। यह विशाल सूर्य मंदिर एक रथनुमा आकार का है जिसे 7 घोड़ों द्वारा खींचते हुए दिखाया गया है। प्रवेश द्वार पर दो हाथियों को शेरो से लड़ते हुए दर्शाती मूर्तियाँ स्थापित है।

उन्नाव:- इस सूर्य मंदिर का नाम बह्यन्य देव मन्दिर है। यह मध्यप्रदेश के उन्नाव में स्थित है। इस मन्दिर में भगवान सूर्य की पत्थर की मूर्ति है जो एक ईंट से बने चबूतरे पर स्थित है जिस पर काले धातु की परत चढी हुई है। साथ –ही-साथ 21 कलाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले सूर्य के 21 त्रिभुजाकार प्रतीक मंदिर पर अवलंबित है।

मोदेरा:- गुजरात के पाटन नामक स्थान से 30 किलोमीटर दक्षिण मे एक गाँव “मोदेरा” मे यह विख्यात सूर्य मंदिर स्थित है। यह सूर्य मन्दिर स्थापत्य कला एवं शिल्प का बेजोड़ नमूना प्रस्तुत करता है। सन 1026 ई. मे सोलंकी वंश के राजा भीमदेव प्रथम द्वारा इस मन्दिर का निर्माण हुआ था। वर्तमान समय में इस मन्दिर मे पूजा करना निषेध कर दिया गया है।

रनकपुर:- राजस्थान के रनकपुर नामक स्थान में अवस्थित यह सूर्य मंदिर, नागर शैली मे सफेद संगमरमर से बना है। भारतीय वास्तुकला का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करता यह सूर्य मंदिर जैनियों के द्वारा बनवाया गया था जो उदयपुर से करीब 98 किलोमीटर दूर स्थित है।

सूर्य पहर:- असम में गुवाहाटी के समीप गोलपारा नामक स्थान पर सूर्य पहर नाम के पर्वत पर यह सूर्य मंदिर स्थित है। भगवान सूर्य के अलावा इस मन्दिर मे नौ शिवलिंग भी है।

दक्षिणारका:- यह मन्दिर बिहार के गया जिले मे स्थित है। सावित्री देवी को समर्पित इस मंदिर मे कई देवियों की प्रतिमाएँ भी स्थापित है। इस मंदिर का निर्माण मौर्य कालीन राजा चन्द्रगुप्त मौर्य के जन्म से भी पहले हुआ था।

देव:- बिहार के औरंगाबाद जिले से लगभग 20 किलोमीटर दूर प्रखंड मुख्यालय देव मे देवार्क सूर्य मंदिर है। छठ महापर्व मे इस मन्दिर का पौराणिक महत्व बढ़ जाता है। इस मन्दिर के निर्माण के विषय मे मन्दिर के मुख्य द्वार पर ब्रह्मलिपि मे लिखित तथा संस्कृत मे अनुवादित श्लोक के अनुसार 12 लाख 16 हजार वर्ष त्रेता युग बीत जाने के पश्चात एक कुष्ठ से पीड़ित राजा एल ने इसका निर्माण कराया था। अपने शिल्प और सौन्दर्य के कारण यह मन्दिर प्रसिद्ध है।

औंगारी:- इस सूर्य मन्दिर का निर्माण तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में करवाया गया था। यह मन्दिर बिहार के नालन्दा जिले के औंगारी नामक स्थान पर स्थित है। एक प्रसिद्ध तालाब के तट पर स्थित यह सूर्य मन्दिर बिहार की कला एवं संस्कृति का परिचायक है। इस मन्दिर की खास विशेषता यह है कि यहाँ मनौती पूर्ण होने की आशा मे श्रद्धालु विशेष मुद्रा में भगवान सूर्य को अर्ध्य देते है।

बेलाउर:- इस मन्दिर का निर्माण राजा सूबा ने करवाया था। बाद मे बेलाउर गाँव में कुल 52 पोखरा (तालाब) का निर्माण कराने वाले राजा सूबा को राजा बावन सूब के नाम से पुकारा जाने लगा। बिहार के भोजपुर जिले के बेलाउर गाँव के पश्चिमी एवं दक्षिणी छोर पर अवस्थित वेलाउर सूर्य मंदिर काफी प्राचीन है। राजा द्वारा बनवाए 52 पोखरो मे एक पोखर के मध्य में यह सूर्य मन्दिर स्थित है। यहाँ छठ महापर्व के दौरान प्रति वर्ष एक लाख से अधिक श्रद्धालु आते है जिनमे उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश के श्रद्धालु भी होते हैं। ऐसा कहा जाता है कि सच्चे मन से इस स्थान पर छठ व्रत करने वालों की सभी मनोकामनाएँ पूरी होती है तथा कई रोग-व्याधियाँ से भी मुक्ति मिलती है।

1 comments:

  1. कभी पूजा-पाठ का बड़ा विरोधी रहा हूँ ... किंतु अब ऐसे लौकिक अनुष्ठानों को बहुत आवश्यक मानता हूँ ... यह इतना ही आवश्यक है जितना कि शरीर के लिये प्राण !

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