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वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ जब यह कहें कि देश में वाकई असहिष्णुता के हालात हो गये हैं और वरिष्ठ टिप्पणीकार विष्णु नागर जब यह कहें कि आमिर यदि अपनी पीड़ा व्यक्त न करते तो एक प्रकार से देशद्रोह ही करते, साहित्यकारों के बाद अब कलाकारों ने भी अपनी असुरक्षा को लेकर चुप्पी तोड़ी है तो इसका स्वागत किया जाना चाहिये, तो ऐसे चिंतकों के वक्तव्यों के आलोक में पूरे राष्ट्र को एक बार फिर चिंतन की आवश्यकता है।



डॉ कौशलेन्द्ररचनाकार परिचय:-



लेखक व्यवसाय से एक चिकित्सक हैं। लेखन में साहित्य एवं कला इनका प्रिय विषय रहा है । 2008 से ब्लॉग पर सक्रिय हैं। ब्लॉग का पता है - bastarkiabhivyakti.blogspot.com
विनोद का तर्क है कि पहले भी खराब रहे हालातों को लेकर यह तर्क नहीं दिया जा सकता कि यह विरोध अभी तक क्यों नहीं हुआ, अब क्यों हो रहा है। आख़िर कहीं से तो शुरुआत करनी ही थी, तो आज से ही क्यों नहीं!

असहिष्णुता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, राष्ट्रद्रोह, धर्मनिरपेक्षता और प्रतिक्रिया जैसे शब्द जितने गम्भीर हैं उतना ही सतही उनका राजनैतिक व्यवहार हो गया है। यह अपने आप में एक गम्भीर चिंता का विषय है। इन विषयों पर अपने विचार रखते समय हम हिंदू या मुसलमान होने और न होने की दृष्टि से चिंतन करते हैं और यही सबसे त्रुटिपूर्ण बात है। कोई हिन्दू बात करता है तो वह असहिष्णु और सम्प्रदायवादी मान लिया जाता है। कोई मुसलमान बात करे तो वह राष्ट्रद्रोही मान लिया जाता है। इन सबसे ऊपर उठकर हमने अभी तक राष्ट्र की दृष्टि से सोचना प्रारम्भ ही नहीं किया है। यहाँ एक संकट यह भी है कि तटस्थभाव से किया हुआ चिंतन दोनो पक्षों में से किसी को भी अच्छा नहीं लगेगा। किंतु हमें पक्ष या विपक्ष की दृष्टि से नहीं बल्कि एक भारतीय की दृष्टि से चिंतन करना ही होगा।
हम मानते हैं कि राजनैतिक दृष्टि से सत्ता में भले ही कोई परिवर्तन हुआ है किंतु कार्यप्रणाली और अधिकारों के दुरुपयोग की परम्परा में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। सत्ता में अपराधियों का वर्चस्व आज भी है, दूषित कार्यप्रणाली आज भी है इसीलिये भ्रष्टाचार में ज़ीरो टॉलरेंस की बात हवा में उड़ गयी।
भारत में हिन्दू और मुसलमान नामक दो धड़े सदा से रहे हैं, हमें यह भी स्वीकार करना होगा। वहीं यह भी सच है कि रोजी-रोटी के लिये संघर्ष करते आम आदमी के लिये इन धड़ों का कोई विशेष अर्थ तकनीकीमीडिया क्रांति से पहले तक नहीं था। अब तकनीकी संसाधनों की उपलब्धता के कारण वैचारिक संक्रमण फैलने में विलम्ब नहीं होता।
हिन्दुओं को यह स्वीकार करना होगा कि अपनी सारी दुर्दशाओं के लिये वे स्वयं उत्तरदायी हैं। राजनैतिक अदूरदर्शिताओं, सांगठनिक अक्षमताओं और राष्ट्रीयचारित्रिक दुर्बलताओं के कारण ही वे बारम्बार पराधीन होते रहे हैं। किंतु अब उन्हें अपने गुणात्मक और चारित्रिक उत्थान पर ध्यान देना होगा।
मुस्लिमों को यह स्वीकार करना होगा कि उनकी सामाजिक दुर्दशा, निर्धनता, अशिक्षा और राष्ट्रीयनिष्ठा के प्रति अविश्वास की स्थिति के लिये वे स्वयं उत्तरदायी हैं। यह सब किसी ने थोपा नहीं है उनपर, बारबार इस्लामिक विस्तार की बात करना, धार्मिक रीफ़ॉर्मेशन की आवश्यकता से इंकार करना, आतंकियों के ज़नाज़ों में हज़ारों की भीड़ की उपस्थिति, इतिहास को अस्वीकार करने का हठ और भारतीय संस्कृति के प्रति उनके अविश्वास ने जो खाइयाँ उत्पन्न की हैं उन्हें भरने का दायित्व भी उन्हीं का है। पूरे विश्व में उपलब्ध ऐतिहासिक और पुरातात्विक तथ्यों के आधार पर उन्हें स्वीकार करना होगा कि इस्लामिक विस्तार की नींव में भयानक नरसंहार और अमानवीय दुष्कर्म किये जाते रहे हैं। उन्हें यह भी स्वीकार करना होगा कि जब हम शरीयत कानून लागू करने की बात करते हैं तो भारतीय संविधान के प्रति अविश्वास प्रकट करते हैं। यदि मलेशिया और इण्डोनेशिया के लोग प्राचीन परम्पराओं में आवश्यक सुधार कर सकते हैं तो हम क्यों नहीं कर सकते! भारतीय मुस्लिमों को भारतीय संस्कृति के प्रति आदर का भाव विकसित करना होगा। यह काम ज़बरन नहीं हो सकता, आदर या प्रेम थोपा नहीं जा सकता इसे संस्कारित और विकसित करना होता है जो कालापेक्षी है।

आपराधिक राजनीति ने भारतीय समाज को बारम्बार अपूरणीय क्षति पहुँचाने का कार्य किया है। पहले तो हम सबको “गंगा-जमनी तहज़ीब” जैसे औचित्यहीन राजनैतिक शब्दजाल से निकलकर मुक्त होना होगा। गंगा और जमुना में सांस्कृतिक भिन्नतायें हैं ही कहाँ? दोनो की तहज़ीब भारत की तहज़ीब है। इनमें से कोई संस्कृति आयातित नहीं है। समन्वय की बात तो उनमें होना चाहिये जो एक भारतीय है और एक आयातित। मोहम्मद-बिन कासिम के नरसंहार से लेकर मुम्बई काण्ड तक हमें किस प्रकार की तहज़ीब नज़र आती है? हम यह कहकर मुक्त नहीं हो सकते कि “आतंक का कोई धर्म नहीं होता”। यद्यपि सैद्धांतिक दृष्टि से यह बिलकुल सच है किंतु व्यावहारिक दृष्टि से सच यह भी है कि पूरे विश्व में फैले ख़ूनीआतंक में इस्लामिक वर्ल्ड स्थापित करने का नारा दिया जा रहा है। पूरे विश्व में फैले आतंकी समूहों में कौन लोग हैं यह बताने की आवश्यकता नहीं है। भारत के गृह मंत्रालय की एक अधिकृत जानकारी के अनुसार भारत से 80 युवक इस्लामिक स्टेट की सेना में भर्ती होने गये हैं जिनमें से 6 को युद्ध के दौरान विदेशों में मारा जा चुका है। सीरिया के इस्लामिक युद्ध में ग़ैरइस्लामिक स्त्रियों और बच्चों के साथ सन् 2012 से जो भी किया जा रहा है वह रूह को कंपा देने वाला है।

हममें से किसी को लगता है कि हिंदू असहिष्णु और प्रतिक्रियावादी हैं। किसी को लगता है कि मुसलमान असहिष्णु और कट्टरधार्मिकविस्तारवादी हैं। हमारी अनुभूतियों में यह पारस्परिक विरोधाभास हमें कभी सही दिशा में नहीं ले जा सकेगा। दोनो ही समुदायों द्वारा जब तक मानवीय मापदण्डों को स्वीकार नहीं किया जायेगा तब तक हमारे दृष्टिकोणों और अनुभूतियों में परिवर्तन नहीं हो सकेगा।

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