बहुत कोशिश के बाद उन्होंने मुझे पहचाना और मैने उनका कपकपाता हुआ हाथ पकड़ लिया, यह उनसे मेरी आखिरी मुलाकात थी। लाला जी का आखिरी साक्षात्कार भी मैने ही उनकी अंतिम यात्रा से लगभग एक वर्ष पूर्व लिया था। तब सु:ख़द आश्चर्य यह था कि उन्होंने लिख कर सभी प्रश्नों के उत्तर दिये थे। विश्वास ही नहीं होता कि लाला जगदलपुरी अब हमारे बीच नहीं रहे। उनका देहावसान 14.08.2013 की सायं 5:00 बजे तिरानबे वर्ष की आयु में हुआ। दण्डकवन के इस ऋषि को बस्तर क्षेत्र के पर्यायवाची के रूप में जाना जाता था।

रियासत कालीन बस्तर में राजा भैरमदेव के समय में दुर्ग क्षेत्र से चार परिवार विस्थापित हो कर बस्तर आये थे। इन परिवारों के मुखिया थे - लोकनाथ, बाला प्रसाद, मूरत सिंह और दुर्गा प्रसाद। इन्ही में से एक परिवार जिसके मुखिया श्री लोकनाथ बैदार थे, वे शासन की कृषि आय-व्यय का हिसाब रखने का कार्य करने लगे। उनके ही पोते के रूप में श्री लाला जगदलपुरी का जन्म 17 दिसम्‍बर 1920 को जगदलपुर में हुआ था। लाला जी के पिता का नाम श्री रामलाल श्रीवास्तव तथा माता का नाम श्रीमती जीराबाई था। लाला जी तब बहुत छोटे थे जब पिता का साया उनके सिर से उठ गया तथा माँ के उपर ही दो छोटे भाईयों व एक बहन के पालन-पोषण का दायित्व आ गया। लाला जी के बचपन की तलाश करने पर जानकारी मिली कि जगदलपुर में बालाजी के मंदिर के निकट बालातरई जलाशय में एक बार लाला जी डूबने लगे थे; यह हमारा सौभाग्य कि बहुत पानी पी चुकने के बाद भी वे बचा लिये गये।

लाला जी का लेखन कर्म 1936 में लगभग सोलह वर्ष की आयु से प्रारम्भ हो गया था। लाला जी मूल रूप से कवि थे। उनके प्रमुख काव्य संग्रह हैं – मिमियाती ज़िन्दगी दहाड़ते परिवेश (1983);पड़ाव (1992); हमसफर (1986) आँचलिक कवितायें (2005); ज़िन्दगी के लिये जूझती ग़ज़लें तथा गीत धन्वा (2011)। लाला जगदलपुरी के लोक कथा संग्रह हैं – हल्बी लोक कथाएँ (1972); बस्तर की लोक कथाएँ (1989); वन कुमार और अन्य लोक कथाएँ (1990); बस्तर की मौखिक कथाएँ (1991)। उन्होंने अनुवाद पर भी कार्य किया है तथा प्रमुख प्रकाशित अनुवाद हैं – हल्बी पंचतंत्र (1971); प्रेमचन्द चो बारा कहानी (1984); बुआ चो चीठीमन (1988); रामकथा (1991) आदि। लाला जी ने बस्तर के इतिहास तथा संस्कृति को भी पुस्तकबद्ध किया है जिनमें प्रमुख हैं – बस्तर: इतिहास एवं संस्कृति (1994); बस्तर: लोक कला साहित्य प्रसंग (2003) तथा बस्तर की लोकोक्तियाँ (2008)। लाला जी की रचनाओं पर दो खण्डों में समग्र (2014) यश पब्लिकेशंस से प्रकाशित किया गया है। यह उल्लेखनीय है कि लाला जगदलपुरी का बहुत सा कार्य अभी भी अप्रकाशित है तथा दुर्भाग्यवश कई महत्वपूर्ण कार्य चोरी कर लिये गये। यह 1971 की बात है जब लोक-कथाओं की एक हस्तलिखित पाण्डुलिपि को अपने अध्ययन कक्ष में ही एक स्टूल पर रख कर लाला जी किसी कार्य से बाहर गये थे कि एक गाय ने यह सारा अद्भुत लेखन चर लिया था। जो खो गया अफसोस उससे अधिक यह है कि उनका जो उपलब्ध है वह भी हमारी लापरवाही से कहीं खो न जाये।

लाला जगदलपुरी के कार्यों व प्रकाशनों की फेरहिस्त यहीं समाप्त नहीं होती अपितु उनकी रचनायें कई सामूहिक संकलनों में भी उपस्थित हैं जिसमें समवांय, पूरी रंगत के साथ, लहरें, इन्द्रावती, हिन्दी का बालगीत साहित्य, सुराज, छत्तीसगढ़ी काव्य संकलन, गुलदस्ता, स्वरसंगम, मध्यप्रदेश की लोककथायें आदि प्रमुख हैं। लाला जी की रचनायें देश की अनेकों प्रमुख पत्रिकाओं/समाचार पत्रों में भी स्थान बनाती रही हैं जिनमें नवनीत, कादम्बरी, श्री वेंकटेश्वर समाचार, देशबन्धु, दण्डकारण्य,युगधर्म, स्वदेश, नई-दुनिया, राजस्थान पत्रिका, अमृत संदेश, बाल सखा, बालभारती, पान्चजन्य, रंग,ठिठोली, आदि सम्मिलित हैं। लाला जगदलपुरी ने क्षेत्रीय जनजातियों की बोलियों एवं उसके व्याकरण पर भी महत्वपूर्ण कार्य किया है। लाला जगदलपुरी को कई सम्मान भी मिले जिनमें मध्यप्रदेश लेखक संघ प्रदत्त "अक्षर आदित्य सम्मान" तथा छत्तीसगढ़ शासन प्रदत्त "पं. सुन्दरलाल शर्मा साहित्य सम्मान’ प्रमुख है। लाला जी को अनेको अन्य संस्थाओं ने भी सम्मानित किया है जिसमें बख्शी सृजन पीठ, भिलाई; बाल कल्याण संस्थान, कानपुर; पड़ाव प्रकाशन, भोपाल आदि सम्मिलित है। यहाँ 1987 की जगदलपुर सीरासार में घटित उस अविस्मरणीय घटना को उल्लेखित करना महत्वपूर्ण होगा जब गुलशेर अहमद खाँ शानी को को सम्मानित किया जा रहा था। शानी जी स्वयं हार ले कर लाला जी के पास आ पहुँचे और उनके गले में डाल दिया; यह एक शिष्य का गुरु को दिया गया वह सम्मान था जिसका कोई मूल्य नहीं; जिसकी कोई उपमा भी नहीं हो सकती।

केवल इतनी ही व्याख्या से लाला जी का व्यक्तित्व विश्लेषित नहीं हो जाता। वे नाटककार एवं रंगकर्मी भी थे। वर्ष 1939 में जगदलपुर में गठित बाल समाज नाम की नाट्य संस्था का नाम बदल कर वर्ष 1940 में सत्यविजय थियेट्रिकल सोसाईटी रख दिया गया। इस संस्था द्वारा मंचित लाला जी के प्रमुख नाटक थे – पागल तथा अपनी लाज। लाला जी ने इस संस्था द्वारा मंचित विभिन्न नाटकों में अभिनय भी किया था। 1949 में सीरासार चौक में सार्वजनिक गणेशोत्सव के तहत लाला जगदलपुरी द्वारा रचित तथा अभिनित नाटक "अपनी लाज" विशेष चर्चित रहा था। लाला जी बस्तर अंचल के प्रारंभिक पत्रकारों में भी रहे हैं। वर्ष 1948 – 1950 तल लाला जी ने दुर्ग से पं. केदारनाथ झा चन्द्र के हिन्दी साप्ताहित "ज़िन्दगी" के लिये बस्तर संवाददाता के रूप में भी कार्य किया है। उन्होंने हिन्दी पाक्षिक अंगारा का प्रकाशन 1950 में आरंभ किया जिसका अंतिम अंक 1972 में आया था। अंगारा में कभी गुलशेर अहमद खां शानी की कहानियाँ भी प्रकाशित हुई हैं। लाला जगदलपुरी 1951 में अर्धसाप्ताहिक पत्र "राष्ट्रबंधु" के बस्तर संवाददाता भी रहे। समय समय पर वे इलाहाद से प्रकाशित "लीडर"; कलकत्ता से प्रकाशित "दैनिक विश्वमित्र"; रायपुर से प्रकाशित "युगधर्म" के बस्तर संवादवाता रहे हैं। लालाजी  ने वर्ष 1984 में देवनागरी लिपि में निकलने वाली सम्पूर्ण हलबी पत्रिका "बस्तरिया" का सम्पादन प्रारंभ किया जो इस अंचल में अपनी तरह का अनूठा और पहली बार किया गया प्रयोग था। लाला जी न केवल स्थानीय रचनाकारों व आदिम समाज की लोक चेतना को इस पत्रिका में स्थान देते थे अपितु केदारनाथ अग्रवाल, अरुणकमल, गोरख पाण्डेय और निर्मल वर्मा जैसे साहित्यकारों की रचनाओं का हलबी में अनुवाद भी प्रकाशित किय जाता था। ऐसा अभिनव प्रयोग एक मिसाल है; तथा यह जनजातीय समाज और मुख्यधारा के बीच संवाद की एक कड़ी था जिसमें संवेदनाओं के आदान प्रदान की गुंजाईश भी थी और संघर्षरत रहने की प्रेरणा भी अंतर्निहित थी।

लाला जगदलपुरी से जुड़े हर व्यक्ति के अपने अपने संस्मरण है तथा सभी अविस्मरणीय व प्रेरणास्पद। लाला जगदलपुरी के लिये तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने शासकीय सहायता का प्रावधान किया था जिसे बाद में आजीवन दिये जाने की घोषणा भी की गयी थी। आश्चर्य है कि मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह शासन ने 1998 में यह सहायता बिना किसी पूर्व सूचना के तब बंद करवा दी; जिस दौरान उन्हें इसकी सर्वाधिक आवश्यकता थी। लाला जी ने न तो इस सहायता की याचना की थी न ही इसे बंद किये जाने के बाद किसी तरह का पत्र व्यवहार किया। यह घटना केवल इतना बताती है कि राजनीति अपने साहित्यकारों के प्रति किस तरह असहिष्णु हो सकती है। लाला जी की सादगी को याद करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार हृषिकेष सुलभ एक घटना का बहुधा जिक्र करते हैं। उन दिनों मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह जगदलपुर आये थे तथा अपने तय कार्यक्रम को अचानक बदलते हुए उन्होंने लाला जगदलपुरी से मिलना निश्चित किया। मुख्यमंत्री की गाड़ियों का काफिला डोकरीघाट पारा के लिये मुड़ गया। लाला जी घर में टीन के डब्बे से लाई निकाल कर खा रहे थे और उन्होंने उसी सादगी से मुख्यमंत्री को भी लाई खिलाई। लाला जी इसी तरह की सादगी की प्रतिमूर्ति थे।

कार्य करने की धुन में वे अविवाहित ही रहे थे। जगदलपुर की पहचान डोकरी निवास पारा का कवि निवास अब लाला जगदलपुरी के भाई व उनके बच्चों की तरक्की के साथ ही एक बड़े पक्के मकान में बदल गया है तथापि लाला जी घर के साथ ही लगे एक कक्ष में अत्यधिक सादगी से रह रहे थे। इसी कक्ष में उन्होंने अंतिम स्वांस ली। 

3 comments:

  1. फेसबुक पर
    Satyajeet Bhattacharjee, Anupam Awasthi, Bablu Siddique और 9 अन्य को यह पसंद है.

    लोग जो इसे पसंद करते हैं
    बंद करें

    करीबी मित्र
    मित्र
    Rahul Bhardwaj
    387 आपसी मित्र
    मित्र
    मित्र
    Satyajeet Bhattacharjee
    131 आपसी मित्र
    मित्र
    मित्र
    Chandrakant Pargir
    58 आपसी मित्र
    मित्र
    मित्र
    Jayprakash Manas


    मुकेश सिंघानिया

    Shiva Wavalkar
    Bablu Siddique
    Sita Deshmukh
    Gs Manmohan
    Anupam Awasthi
    Gautam Kewaliya
    Nuzhat Nausheen Khan

    उत्तर देंहटाएं
  2. आप, Rishikesh Khodke, Satyakam Dixit, Virendra Yadav और 36 और को यह पसंद है.
    टिप्पणियाँ
    Abhishek Sagar
    Abhishek Sagar good work Rajeev jee congrats
    नापसंद · जवाब दें · 1 · 18 दिसंबर को 04:47 अपराह्न बजे
    DrRupendra Kavi
    DrRupendra Kavi Gr8
    नापसंद · जवाब दें · 1 · 18 दिसंबर को 10:54 अपराह्न बजे
    DrRupendra Kavi
    DrRupendra Kavi Gr8
    नापसंद · जवाब दें · 1 · 18 दिसंबर को 11:07 अपराह्न बजे

    उत्तर देंहटाएं
  3. लाला जगदलपुरी का साहित्य तो मुझे पढ़ने को नहीं मिला पर उनके कार्यों के साथ उनका परिचय पढ़ने को मिला. इसके लिए साहित्य शिल्पी का आभार. साहित्य के लिए उनके किए गए साहसिक प्रयास वंदनीय है.

    उत्तर देंहटाएं

आपका स्नेह और प्रस्तुतियों पर आपकी समालोचनात्मक टिप्पणियाँ हमें बेहतर कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करती हैं.

पुस्तकालय

~~~ साहित्य शिल्पी का पुस्तकालय निरंतर समृद्ध हो रहा है। इन्हें आप हमारी साईट से सीधे डाउनलोड कर के पढ सकते हैं ~~~~~~~

डाउनलोड करने के लिए चित्र पर क्लिक करें...

आइये कारवां बनायें...

साहित्य शिल्पी, हिन्दी और साहित्य की सेवा का मंच, एक ऐसा अभियान.. जो न केवल स्थापित एवं नवीन रचनाकारों के बीच एक सेतु का कार्य करेगा अपितु अंतर्जाल पर हिन्दी के प्रयोग और प्रोत्साहन का एक अभिनव सोपान भी है, अपने सुधी पाठको के समक्ष कविता, कहानी, लघुकथा, नाटक, व्यंग्य, कार्टून, समालोचना तथा सामयिक विषयो पर परिचर्चाओं के साथ साहित्य शिल्पी समूह आपके समक्ष उपस्थित है। यदि राष्ट्रभाषा हिदी की प्रगति के लिए समर्पित इस अभियान में आप भी सहयोग देना चाहते हैं तो अपना परिचय, तस्वीर एवं कुछ रचनायें हमें निम्नलिखित ई-मेल पते पर प्रेषित करें।
sahityashilpi@gmail.com
आइये कारवां बनायें...

Followers

Google+ Followers

Get widget