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(11.) कुण्डलिया के छंद में

 महावीर उत्तरांचली रचनाकार परिचय:-



१. पूरा नाम : महावीर उत्तरांचली
२. उपनाम : "उत्तरांचली"
३. २४ जुलाई १९७१
४. जन्मस्थान : दिल्ली
५. (1.) आग का दरिया (ग़ज़ल संग्रह, २००९) अमृत प्रकाशन से। (2.) तीन पीढ़ियां : तीन कथाकार (कथा संग्रह में प्रेमचंद, मोहन राकेश और महावीर उत्तरांचली की ४ — ४ कहानियां; संपादक : सुरंजन, २००७) मगध प्रकाशन से। (3.) आग यह बदलाव की (ग़ज़ल संग्रह, २०१३) उत्तरांचली साहित्य संस्थान से। (4.) मन में नाचे मोर है (जनक छंद, २०१३) उत्तरांचली साहित्य संस्थान से।

कुण्डलिया के छंद में, कहता हूँ मैं बात
अंत समय तक ही चले, यह प्यारी सौगात
यह प्यारी सौगात, छंद यह सबसे न्यारा
दोहा-रौला एक, मिलाकर बनता प्यारा
महावीर कविराय, लगे सुर पायलिया के
अंतरमन में तार, बजे जब कुण्डलिया के

(12.) जिसमें सुर-लय-ताल है जिसमें सुर-लय-ताल है, कुण्डलिया वह छंद
सबसे सहज-सरल यही, छह चरणों का बंद
छह चरणों का बंद, शुरू दोहे से होता
रौला का फिर रूप, चार चरणों को धोता
महावीर कविराय, गयेता अति है इसमें
हो अंतिम वह शब्द, शुरू करते हैं जिसमे

(13.) छह ऋतू बारह मास हैं छह ऋतू बारह मास हैं, ग्रीष्म, शरद, बरसात
स्वच्छ रहे पर्यावरण, सुबह-शाम, दिन-रात
सुबह-शाम, दिन-रात, न कोई करे प्रदूषण
वसुंधरा अनमोल, मिला सुन्दर आभूषण
जिसमे हो आनंद, सुधा समान है वह ऋतू
महावीर कविराय, मिले ऐसी अब छह ऋतू

(14.) नदिया में जीवन बहे नदिया में जीवन बहे, जल से सकल जहान
मोती बने न जल बिना, जीवन रहे न धान
जीवन रहे न धान, रहीमदास बोले थे
अच्छी है यह बात, भेद सच्चा खोले थे
महावीर कविराय, न कचरा कर दरिया में
जल की कीमत जान, बहे जीवन नदिया में

(15.) घिन लागे उल्टी करे घिन लागे उल्टी करे, ठीक न होवे पित्त
ज़ख़्म दिए आतंक ने, दुखी देश का चित्त
दुखी देश का चित्त, क़त्ल रिश्तों का करते
कभी धर्म के नाम, कभी जाति-ज़हर भरते
महावीर कविराय, बात कड़वी पिन लागे
सिस्टम ज़िम्मेदार, आचरण से घिन लागे

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