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राज- खजाना रिक्त प्राय था ।

 मनन कुमार सिंह  रचनाकार परिचय:-



मनन कुमार सिंह संप्रति भारतीय स्टेट बैंक में मुख्य प्रबन्धक के पद पर मुंबई में कार्यरत हैं। सन 1992 में ‘मधुबाला’ नाम से 51 रुबाइयों का एक संग्रह प्रकाशित हुआ, जिसे अब 101 रुबाइयों का करके प्रकाशित करने की योजना है तथा कार्य प्रगति पर है भी। ‘अधूरी यात्रा’ नाम से एक यात्रा-वृत्तात्मक लघु काव्य-रचना भी पूरी तरह प्रकाशन के लिए तैयार है। कवि की अनेकानेक कविताएं भारतीय स्टेट बैंक की पत्रिकाएँ; ‘जाह्नवी’, ‘पाटलीपुत्र-दर्पण’ तथा स्टेट बैंक अकादमी गुड़गाँव(हरियाणा) की प्रतिष्ठित गृह-पत्रिका ‘गुरुकुल’ में प्रकाशित होती रही हैं।

राजस्व –उगाही पर ज़ोर हुआ । आय के हर स्रोत की परताल हुई । तहसीलदार परेशान था कि कहाँ से आय बढ़े , रानी तो जान ही निकाल डालेगी । अंतःकरण ने आवाज दी कि इधर –उधर देखने से क्या खाक मिलेगा ? नीचे देख । अभी तो धरती को ही खजाने का मूल स्रोत बना लिया गया है। उसे खरीदो , बेचो । फिर –फिर उसी क्रम से हथेली भले ही थोड़ी गंदी हो , पर मैल तो खूब जमेगा न । अफरा –तफरी में नवनियुक्त तहसीलदार ने धरती माँ को निहारा । उसे याद आया पिछली दफा तबादले के बाद योगदान हेतु जाते वक्त उसने देखा था इस विस्तृत भूभाग पर पशु घास खोजते थे,मिलने पर चर भी लेते । आज बहुमंज़िली इमारतें खड़ी दिखती हैं , खड़ी हो भी रही हैं । वह चौंक गया । बंजर की रेत सोना हो गयी। सरकार को क्या मिला होगा ?खोजबीन पर पता चला ; भूखंडों की पहले जन कल्याणकारी संस्थाओं के नाम लीज हुई ,फिर क्रमवार क्रय –बिक्रय से बड़े –बड़े हाथों पर मैल खूब जमा था , पर राज –खजाना मुँह बाये, आँख मिचकाते बस सब देखता रह गया , खाली –का –खाली । कारण था औने –पौने में खरीद , फिर ऊँची कीमतों पर भूखंडों की बिक्री। यही तो गोरखधा था उनका । प्रलेख में कीमत कम ही रहती जिससे राजकोष दबाव में रहा ।कितने ही बिक्रय रद्द हुए , कार्रवाई शुरू हुई । पर अफसोस एक बड़ा हाथ मैल मुक्त होने की कोटि में आ गया । राज्य का क्या होगा यदि उसके नुमाइंदों के ही हाथ बंध जायें ?इधर तहसीलदार सीना फुलाये रहा कि बड़ी मछली जाल में फँस गयी है ,वाहवाही होगी । पर हुआ उल्टा । आज अपनी बदली का क्रम और बार गिनते –गिनते थक गया है बेचारा ।अनुभवी साथी उसे सीख देते हैं कि तहसीलदारी ऐसे थोड़े ही होती है । कुछ तो समझ रखो भाई । आखिर भाईचारा भी तो कोई चीज है । सिर्फ राजस्व से राज –काज चला है भला ?और भी तो रास्ते हैं उसे बढ़ाने के । ***

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