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उस दिन नीरजा नहीं आयी ।मास्टर मधुप के पहुँचने के थोड़ी देर बाद प्रभा पढ़ने के कमरे में पहुंची ।उसने जल्दी –जल्दी अपनी किताबें निकाली , बैठ गयी पढ़ने ।मास्टर मधुप कुछ कहते उसके पहले ही बोल पड़ी , ‘सर , आज नीरजा नहीं आयी’।मास्टर मधुप ने बेरुखी से कहा, ‘फॅसी होगी कहीं या नहीं होगी घर पर’।


 मनन कुमार सिंह  रचनाकार परिचय:-



मनन कुमार सिंह संप्रति भारतीय स्टेट बैंक में मुख्य प्रबन्धक के पद पर मुंबई में कार्यरत हैं। सन 1992 में ‘मधुबाला’ नाम से 51 रुबाइयों का एक संग्रह प्रकाशित हुआ, जिसे अब 101 रुबाइयों का करके प्रकाशित करने की योजना है तथा कार्य प्रगति पर है भी। ‘अधूरी यात्रा’ नाम से एक यात्रा-वृत्तात्मक लघु काव्य-रचना भी पूरी तरह प्रकाशन के लिए तैयार है। कवि की अनेकानेक कविताएं भारतीय स्टेट बैंक की पत्रिकाएँ; ‘जाह्नवी’, ‘पाटलीपुत्र-दर्पण’ तथा स्टेट बैंक अकादमी गुड़गाँव(हरियाणा) की प्रतिष्ठित गृह-पत्रिका ‘गुरुकुल’ में प्रकाशित होती रही हैं।

‘नहीं,सर । वह अपने कमरे के बाहर आयी थी किताबें लेकर ‘।

‘अच्छा जी, काम की बातें करो ।कल क्या पढ़ाया था मैंने? बनाओ’, मधुप ने आदेश दिया ।

सबक देख लेने के बाद मास्टर मधुप उठते –से लगे ।उनका मन आज जाने कैसा हो रहा था ।वे कुछ उखड़े –उखड़े –से थे ।वे प्रभा को तकरीबन पाँच – छः माह से पढ़ा रहे थे ।बीच में नीरजा पढ़ने आने लगी थी।प्रभा आठवीं कक्षा की छात्रा थी और नीरजा ग्यारहवीं की ।मधुप ने जल्दी –जल्दी पढ़ाई पूरी की , बोले ‘देखो , पढ़ाई पर ध्यान दिया करो , वरना पीछे पड़ जायेगी’। वे चल पड़े ।

उधर नीरजा अपने कमरे में बैठी थी , किताबें फैलाये । ध्यान कहीं और , जैसे आनेवाली एक –एक आहट का जायजा ले रही हो । क्या पता कब मास्टरजी आ जायें ?लेकिन वे कब के चले गए थे , उसे पता न था । वह तुरत उठी और बैठक में जा पहुँची । दादीजी वहाँ नीरजा की माँ से घर – गिरस्ती की बातें कर रही थीं । नीरजा रूआँसे स्वर में बोली , ‘दादीजी, मास्टरजी प्रभा को पढ़ाकर चले गये । अब वे मुझे नहीं पढ़ायेंगे , मैं फेल हो जाऊँगी’।

‘उदास मत हो बेटी । वे वैसे आदमी नहीं हैं । जरूर पढ़ायेंगे तुझे’, दादीजी ने कहा ।

‘आपने आखिर वहाँ जाकर पढ़ने से मुझे क्यों मना किया ?मैं प्रभा के साथ ही पढ़ लेती । क्या हो जाता उससे ? इतने दिनों से पढ़ ही रही थी न’,नीरजा के स्वर में उलाहना का भाव था ।

‘बकवास मत करो । तुझे पढ़ना ही है न? कहे देती हूँ कि वे तुझे पढ़ायेंगे , यहीं इसी कमरे में’। उनसे कुछ और कहना नीरजा ने व्यर्थ समझा । वह खोयी –खोयी –सी वहाँ से चली गयी ।

दूसरे दिन मधुप ने घर में प्रवेश किया। नीरजा की दादी ने अपनी ख़ासी महीन आवाज में पुकारा , ‘ बेटा’।

मधुप के पाँव ठिठक गये । वे पास आ गये । सवालिया निगाहों से उन्होने दादीजी की तरफ देखा । वे बोलीं , ‘बेटा ,नीरजा की पढ़ाई ..’।

लगा बोली कंठ में अटक गयी है।

‘पढ़ तो रही है,’ मधुप ने कहा ।

‘बेटा, समझ ही रहे हो । पड़ोस का मामला है’।

‘मैं तो कोई पड़ोसी नहीं ‘।

‘लेकिन मन मिलता है तभी तक काम निकलता है,बेटा।प्रभा के घरवाले पड़ोसी हैं ‘।

मधुप समझ गये कि कल नीरजा क्यों पढ़ने नहीं आयी । मकान एक था , पर घर तो उसमें दो थे ; एक प्रभा के नाना का , दूसरा नीरजा का । घरवालों के मन के मेल ने करवट ली , तो नीरजा भला प्रभा के बैठक में कैसे जाती पढ़ने ? दादीजी की प्रतिष्ठा दाँव पड़ लगी थी ।

मधुप विवश थे , बूढ़ी दादी की झुकी कमर के सामने झुक जाना पड़ा उन्हें । नीरजा की पढ़ाई चलने लगी।

यह सिलसिला ज्यादा नहीं चल पाया । मधुप तो झुक गये , पर मिट्टी –तेल की समस्या ने सिर उठा लिया । रात को पढ़ाई भला होती कैसे बिन रोशनी ?किल्लत हो गयी थी तेल की , कीमत आसमान छू रही थी , ऊपर से आर्थिक तंगी अलग से। बूढ़ी दादी ने कमर सीधी की , दूर देखा प्रभा के कमरे तक । प्रभा के यहाँ जरूरत की चीजें आसानी से मुहैया हो जाती थीं । तेल की भी कमी नहीं थी वहाँ । नीरजा प्रभा के साथ उसके कमरे में पढ़ने लगी ।

मास्टर मधुप और नीरजा हम उम्र –से थे । सो उनके बीच थोड़ा स्नेहिल संबंध स्थापित हो चला था । माधुर्यघुली बातें लगती थीं एक दूसरे की ।

उस दिन दोनों लड़कियां पढ़ रही थीं । वे अपना –अपना सबक तैयार कर रही थीं । मधुप ने नीरजा से पूछा , ‘ बनाया जी ?’

‘जी’।

‘दिखाओ’।

‘बना रही हूँ’।

‘बना लिया फिर भी बना रही है?’

‘मुझे नहीं आता , सर’।

‘क्यों ? बताया तो था ?’

‘हाँ । नहीं सर’। नीरजा ने अपने खासे सहमे –से आह्लादमिश्रित स्वर में कहा ।

‘हाँ , नहीं । क्यों नहीं ,सर ?’

मधुप के इस अंदाज से वह चिढ़ गयी । चेहरे पर झेंप जाहिर हो रही थी। प्रभा कुतूहलपूर्वक उसकी तरफ देख रही थी । नीरजा लज्जित हो गयी , नजरें धरती में गड गयीं । मधुप के मर्दाना हाथ की झिड़की माथे पर पड़ी , वह सिमटकर आधी हो गयी , दुबककर सोचने लगी , ‘ काश ! अपने कमरे में पढ़ती । प्रभा के समक्ष लजाना न पड़ता ।‘ उसके गोरे चेहरे पर लाली बढ़ गयी थी । वह मधुप की झिड़की से अंदर –ही –अंदर खिली हुई थी । प्रभा ने कहा , ‘ मौसी , फर्श पर क्या तलाश रही हो ?’

नीरजा की अंतर की उत्फुल्लताजनित कपोलों की लाली अब रोष का पर्याय बन जाने को आमादा थी। स्नेह की सुलगती बाती ज्वाला बनने को आतुर हो चली थी । बालिका के व्यंग्य –वचन से किशोरी आहत थी । वह प्रतिवाद करना चाहती थी , पर मधुप के हास्य –व्यंग्य मिश्रित हाव –भाव की कल्पना कर वह गुमसुम बैठी रही ।

पढ़ाई समाप्त हुई । मधुप बाहर निकले ।पता चला कि नीरजा की दादी ने उन्हें याद किया है । मन –ही –मन सोचा , ‘ परिवर्त्तन का यह दौर कहाँ तक चलेगा?’वे उनके पास हाजिर हुए । देखा वे बिस्तर पर लेटी हैं , तबीयत कुछ ठीक नहीं है ।मधुप को देखकर बोलीं , ‘ बेटा , तुम्हारे ही सहारे नीरजा चल रही है । पढ़ जाएगी तो यश होगा’।

‘मैं कहाँ मना कर रहा हूँ?’ मधुप ने कहा ।

‘अच्छा बेटे’, उन्होने कहा ।

नीरजा चाय लेकर आ गयी । पहला प्याला मधुप की तरफ बढ़ाकर उसने ‘चाय’ कहा , तो मधुप ने प्याला उसके हाथ से ले लिया । दूसरा प्याला उसने दादीजी को दिया और सेवा करने बिस्तर पर बैठ गयी, चेहरा मधुप की तरफ था । मधुप ने चाय की चुस्की ली तो समझ गये कि तेल की जगह आज चीनी ने ले ली है शायद । मिठास कम थी , कड़वाहट ज्यादा । दादीजी को ऐसा अहसास हुआ । बोलीं , ‘ चीनी कम थी’।

‘तो क्या हुआ?’ मधुप बोले । नजर नीरजा की तरफ गयी , तो वह जैसे गड़ –सी गयी। लगा उनकी नजरें कह रही हों , ‘ यह भी मजबूरी है’।

थोड़ी देर बातें चलीं । दादीजी ने घर का सारा किस्सा उन्हें सुना दिया । मधुप आशय समझ चुके थे । वे और ज्यादा ऊबना नहीं चाहते थे , सो विदा ले चल पड़े ।

रास्ते में एक –एक शब्द उन्हें याद आ रहे थे । एक दिन नीरजा के दादा ने कहा था , ‘ बेटा , पढ़ाओ नीरजा को । तुम्हारी मदद कर दूँगा ‘। दूसरी बात दादीजी मधुप को हीरा कहा करती थीं । वैसे तो इलाके में बहुत –से पढे –लिखे लोग थे जो बच्चों को पढ़ाकर अपना पेट पालते थे । वैसे नौजवान भी थे जो इस पेशा से अपने घर का खर्च निकलते थे । पर दादीजी को वे किसी पीड़ा से कम नहीं लगते थे क्योंकि पैसा कमाना उनकी फ़ितरत में शामिल था । किसीकी आशीर्वाद बिखेरती वाणी उनका निमित्त नहीं हो सकती थी ।

मधुप की परेशानी कुछ और थी---- कम मिठास की चाय , तेल की दुर्लभता , पड़ोस की भावना ....... । इन सबने मिलकर एक माला का रूप ले लिया था , जिसे मधुप अपने गले में महसूस कर रहे थे । चाहते थे कि इससे निजात मिले , पर ऐसा हो नहीं रहा था । कारण कि यह माला बड़ी श्रद्धा से उन्हें समर्पित थी । माला के मनकों में उन्हें सदा दो सतृष्ण नयनों का आभास होता था , जो वर्त्तमान के पास भविष्य की अमानत थे तथा जिनमें अनगिनत बहुरंगे सपने पल रहे थे ।

प्रभा के साथ -साथ नीरजा की पढ़ाई चलती रही ।

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