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सूर्य किरणों को ताक रही है,
पर्वत घाटी नाक रही है,
पेड घने है, मोड़ है घाटी,
बस्तर पथ में बंजारी घाटी,


 शिवशंकर श्रीवास्तव 
रचनाकार परिचय:-



शिवशंकर श्रीवास्तव , पिता स्व. रामसिंह श्रीवास्तव एवं माता श्रीमती सत्यभामा श्रीवास्तव के यहाँ 05 जनवरी 1986 को लेखक का ज्रम हुआ। स्नातक (तृतीय वर्ष) में अध्यनरत है, कम्प्युटर पाठ्‌यक्रम में डिप्लोमा के पश्चात्‌ भी शिक्षा जारी है। वर्तमान में ये नगरीय प्रशासन विभाग के नगर पंचायत में कार्य कर रहे हैं ।

शिवशंकर वर्ष 1999 से लेखन प्रारम्भ किया जिसमें कविता, कहानी, लेख निरंतर लिख रहे हैं। इसके अतिरिङ्कत बस्तर की कला संस्कृति, इतिहास, पर्यटन, गीत संगीत, आदिवासी लोकजीवन में लेखन एवं समकालीन विषय पर पत्रकारिता में इनकी समान पकड़ है। रचनाएँ देश भर के दैनिक समाचार पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हुई। आकाशवाणी के्रद्र जगदलपुर से रचनाएँ प्रसारित होती है।

शिवशंकर छत्तीसगढ़ शासन सृजनात्मक लेखन शिविर वर्ष 2004 में कविता ''बस्तर के द्घने जंगल'' के लिए तृतीय स्थान पुरस्कार मिला, प्रदेश सरकार के पाठ्‌य पुस्तक में कविता ''बस्तर के घने जंगल ''प्रकाशन हेतु चयनित हुई । साहित्यिक संस्थाओं ने वर्ष 2009 में भारतीय दलित साहित्य अकादमी छत्तीसगढ़ से राज्य स्तरीय ''कौमी एकता अवार्ड'' एवं वर्ष 2010 में युवा समूह प्रकाशन महाराष्ट्र से राष्ट्रीय स्तरीय ''सेवन स्टार अवार्ड'' सम्मानित किया ।

शिवशंकर से ब्लॉग shivshankarshrivastava.blog.com या Email-shivshankar686@gmail.com या मो. 09406110779 में सम्पर्क किया जा सकता है। इनका स्थायी पताः गीदम, पोस्ट ऑफिसगीदम 494441 जिलादक्षिण बस्तर दंतेवाड़ा (छत्तीसगढ़) है ।


सुंदरता का रूप सुनहरा,
चट्टानों की छोर पडी है,
जंगल जागे पहरी घाटी,
बस्तर पथ में बंजारी घाटी,

निकल पड़ो तुम पथ में कोई,
नील गगन से उतर रहे हैं,
बंजारे की सरगम घाटी,
बस्तर पथ में बंजारी घाटी,

उज्ज्वल करती श्वेत रंग से,
ऋतु शीत मंे भेंट घाटी,
नत मस्तक है, उँची घाटी,
बस्तर पथ में बंजारी घाटी,

हवा शीत में सेख रही है ,
बंजारी माता देख रही है,
घने-घने से जंगल घाटी,
बस्‍तर पथ में बंजारी घाटी,

हरियाली में तप रही है,
दूर गगन से जप रही है,
ग्रीष्‍म ऋतु में तपन घाटी,
बस्‍तर पथ में बंजारी घाटी,

रूप सुवहानी इस नयनों में,
स्‍वागत करती झूलना घाटी,
बैलाडीला की मारडूण्‍म घाटी,
बस्‍तर पथ में बंजारी घाटी,

झेक रही है धूप छॉव को,
हवा सुनाती लोरी गॉव को,
घुम रही परिक्रमा घाटी,
बस्‍तर पथ में बंजारी घाटी,

झीरम घाटी या माड घाटी,
या बस्‍तर प्रस्‍तर की घाटी,
विलाप रही है अलाप घाटी,
बस्‍तर पथ में बंजारी घाटी,
शिवशंकर श्रीवास्तव, दंतेवाड़ा

6 comments:

  1. रमेश कुमार10 मार्च 2016 को 9:35 am

    बस्तर का क्या मनमोहक चित्रण है.....

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  2. शिवशंकर जी, बहुत ही अच्छी कविता...बधाई

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