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जीवन एक संघर्ष, एक चुनौती है जिसे हर इंसान को स्वीकारना पड़ता है। संघर्ष में न सिर्फ़ उन्हें ऊर्जस्विता मिलती है, बल्कि जीवन की विविध दिशाओं और दशाओं से उनका परिचय भी होता है। मानव समाज का इतिहास स्त्री को सत्ता, प्रभुत्व एवं शक्ति से दूर रखने का इतिहास है।





 देवी नागरानी रचनाकार परिचय:-






देवी नागरानी

480 वेस्ट सर्फ स्ट्रीट, एल्महर्स्ट, IL-60126




नारी की संघर्ष-क्षमता और ऊर्जा में ही उसकी अपनी पहचान बनाने और कुछ कर पाने की ताक़त छिपी हुई होती है। जब उस पर बन आती है तो वह अपने घर-संसार, जीवन के वरदान बच्चों के लिए ज़िंदगी की सारी चुनौतियों से रू-ब-रू होती है, उन्हें स्वीकारती है। कात्यायनी की एक सशक्त रचना ‘जादू नहीं कविता’ का एक-एक अंश स्त्री में सच से लड़ने की स्फूर्ति प्रदान करता हुआ मन में, सोच में, जीवन के संघर्ष की राहों में हौसले की ऊर्जा फूंकता है।


“स्वीकार है मुझे यह अधूरापन

और यह नाउम्मीदी

उम्मीदों के नाम पर, लो

मुझे स्वीकार है इन हालत की /

समूची चुनौतियाँ...!


आधुनिक समाज के बदलते मूल्यों को रेखांकित करते हुए अपने आत्मकथ्य के साथ-साथ अपने अन्दर के सन्नाटे से मुक्ति पाने की कोशिश में नारी खुद के मन को भेदती है, लहुलुहान करती है। आपने ही पात्र की गहराई और गरिमा में खुद डूब जाती है। इस तत्व पर कमलेश्वर जी, कलम के माध्यम से चक्रव्यूह को छेदने का काम करते हुए लिखते हैं - “ ताज महल से ज़्यादा खूबसूरत परिवार नामक संस्था का निर्माण करने वाली औरत खुद उसी में घुट-घुट कर दफ़न होती है, सबके लिये सुख और शुभ तलाश करती औरत अपने ही आँसुओं के कुँओं में डूबकर आत्महत्या करती है।“


सच भी है, अपनी ही बनाई हुई दीवारों में औरत बन्दी हो जाती है, अपने भीतर के न्यायलय में स्वयं को यह निर्णय सुनाती है, कारावास का दंड भोगती है. लेकिन आज ज़माना बदलाव की ओर क़दम बढ़ा रहा है। जिसके मन में आग लगे वही बुझाने के रास्ते ढूँढने को आमादा रहता है। कहते हैं जब तक पानी हमारे पैरों तले से नहीं गुज़रता, पाँव गीले नहीं होते। अपनी समस्या का समाधान पाना अब नारी का ध्येय बन गया है। पुरुष प्रधान समाज में हालातों से मुकाबला करना अब नारी का लक्ष्य बन गया है।


बदलते जमाने में नारी पुरुष की जागीर नहीं, उसके साथ कंधे से कंधा मिला कर चलने में सक्षम है। आधुनिक नारी पुरुष की संपति मात्र न बनकर उसकी सहभागिनी होकर जीवन व्यतीत करना चाहती है। घर और बाहर की हर परिधि में अपनी पहचान बनाए रखने के लिए अपने परिवार से, अपने पति से सहकार के अपेक्षा रखती है। शिक्षा की रोशनी में अब नारी अपने रास्ते खुद तय कर रही है। पुरानी पगडंडियों को लांघते हुए आज हर क्षेत्र में नारी कार्यरत है- पुलिस में, सेना में, विदेश-विभाग, प्रौध्योगिकी, विज्ञान, स्वास्थ विभाग, पत्रिकारिका से लेकर अन्तरिक्ष यात्रा व उपग्रह प्रक्षेपण जैसे चुनौती भरे कार्यों में वह पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है। अपनी क्षमताओं के कारण वह आज बच्चे का पालना भी झुलाती है, विमान भी चलाती है, हर ज़रूरत का ध्यान रखते हुए भी वह अपने घर, परिवार की जवाबदारी से बेमुख नहीं होती। पर जब परिस्थितियाँ उसके स्वाभिमान और सम्मान के चिथड़े उड़ाने लगतीं हैं, तब वह चीत्कार उठती है --


दुनिया ने जिसे सिर्फ औरत समझा /
तूने उसे महज़ बच्चों की माँ समझा !



विरोध को सह कर भी नारी अपने हौसलों को विराम नहीं देती। उसकी संघर्ष-क्षमता और ऊर्जा में ही उसकी अपनी पहचान है यह वह जान गई है। जैसे एक नन्हा दीपक घनघोर अंधकार में भी पराजय नहीं मानता, ऐसे में नारी अपनी लड़ाई ख़ुद लड़ते हुए उस चक्र से मुक़्त होना चाहती है जहां उसे समाज क़ैदख़ाने की घुटन बख्शता है। इसी मानसिकता को एक नया अर्थ देते हुए सिंध की बाग़ी शायरा अतिया दाऊद लिखती हैं---


मुझे गोश्त की थाली समझ कर

चील की तरह झपट पड़ते हो

उसे मैं प्यार समझूँ ?

इतनी भोली तो मैं भी नहीं

मुझसे तुम्हारा मोह ऐसा है

जैसा बिल्ली का छिछड़े से !

उसे मैं प्यार समझूँ ?

इतनी भोली तो मैं भी नहीं-12


विभाजन के छः दशक बाद भी आज शक्ति सम्पन्न नारी त्याग और संवेदना की वशीभूत यातनायें झेलने को विवश है। विभाजन की त्रासदी में प्रतिशोध की मदांधता में विरोधी गुटों ने खोज-खोज कर स्त्रियों की अस्मत लूटी, उनकी हत्या तक करने से नहीं चूके, ‘कारी’ करार करते हुए उन्हें मौत के घाट उतारा। यही परिदृश्य हमें झकझोर कर यह सोचने पर मजबूर करता है कि इस देश में ही नहीं, विश्व के मानव समुदाय को ऐसी विभीषिकाओं से बचने की दिशा में सजग रहना होगा, उनके मान-सम्मान को कायम रखने के लिए आगे कुछ नहीं, बहुत कुछ करना होगा।


नई सदी की नारी की दुनिया में सब कुछ है- उसका घर, परिवार, नाते-रिश्ते, समाज-संसार लेकिन वह स्वयं कहाँ है?


वह कहाँ है? एक अस्तित्वपूर्ण सवाल, जवाब की तलब में आज भी टंगा हुआ है। अनेक स्थानों पर विवाहित महिलाएं अपने घर आँगन में, समाज में जलील होती हैं, शब्दों के तीरों से तिरस्कृत होते हुए उन हालातों का सामना करती है. अपने घर, अपने आंगन, अपने चूल्हे चौके, अपनी चारदीवारी के भीतर सीमित- सास के तानों, दहेज से जुड़ी समस्याओं, पति की उपेक्षा, कन्या भ्रूण हत्या के प्रताड़न से झुलसती है। समाज में आज भी कायरता को बल समझने की भूल करने वाले अमानुष, औरत पर उंगली व हाथ उठाने को मर्दानगी समझते हैं।


पुरुष अपनी सर्वश्रेष्ठता और महानता से जुड़ी 'मेल-डोमिनेंस' से बाहर निकले, यही आज के समाज के लिए बेहतर परिवर्तन होगा। नारी को अपना सहभागी, सहयोगी मानकर उसे आदर सम्मान दे जिसकी वह हक़दार है। अब वह पुरुष की दासी नहीं : अपनी चाह का परचम लिये वह जिस राह पर जाती है, वहां संघर्ष करते हुए राह में आई हर चुनौती को स्वीकारती है. -विर्मश की नई चुनौतियां से भिड़ते हुए नये आयाम पाने में सक्रिय हो रही है - एक बेहतर जिन्दगी जीने का हक़ पा रही है. आज का बोया हुआ यह संघर्ष का बीज आने वाले कल में फलित होगा, मर्द और औरत की सीमा रेखाओं को उलांघते हुए उसके जीवन में बदलाव लायेगा और एक स्वच्छ सम्पन्न जीवन जीने का अधिकार देगा. इन्हीं संभावनाओं को स्पष्टता प्रदान करती अतिया दाऊद की ये पंक्तियाँ डंके की चोट पर कह रही है ---


तुम इंसान के रूप में मर्द
मैं इन्सान के रूप में औरत
लफ़्ज़ एक है-

मगर माइने तुमने कितने दे डाले

मेरे जिस्म की अलग पहचान के जुर्म में -10


केवल अपने को स्वतंत्र मान लेने से वह स्वतंत्र नहीं हो जाती। अपने घर की मालकिन कहलाई जाने वाली नारी कई बार चाहते हुए भी अपने किए हुए फैसलों को अमल में लाने की हैसियत नहीं रखती। नारी मन की व्यथा, पीड़ा और अन्तर्मन की अकुलाहट को पलपल महसूस किया जा सकता है। जैसे दुख उनके जीवन का अहम हिस्सा है, देह के ज़रूरी अंग-सा! तभी तो उसका अस्तित्व चीत्कार उठता है -


‘‘मैं नारी मात्र हूँ नारी ही रहना चाहती हूँ।

सीता नहीं होना चाहती

उसे पसंद नहीं सीता का परीक्षा देना

राम की परीक्षा का विकल्प तब भी था,

और आज भी !


आज के दौर में कलम तलवार की धार बनकर बेज़ुबान की ज़ुबान बन गई है। शब्दों की सियाही में आज की औरत की एक ऐसी रूदाद है, एक ऐसी आपबीती है जिसकी एक-एक पंक्ति में औरत के दिल के भरभराते अहसासों और जज़्बों की घुटन महसूस की जाती है। अब उसकी हर चाहत खामोशी के पर्दों को चीरकर इन अल्फ़ाज़ की गहराइयों के माध्यम से अपने जज़्बों की अभिव्यक्ति बनकर गूंजने लगी है ।शब्दों की सूनी खलाओं में आतिया जी के हृदय की बेज़ुबान चीखों की गूंज सुनिए-


दुनिया में आँख खोली तो मुझे बतया गया

समाज एक जगंल है, घर एक पनाहगाह

मर्द उसका मालिक और औरत किरायेदार

किराया वह वफादारी की सूरत में अदा करती है-

मैं भी रिशते नातों में खुद को पिरोकर

किस्तें अदा करती आई हूँ-25


इन अल्फाज की गहराइयों में झांकते हुए मानव मन कितनी ही जिंदगानियों के भीतर झांक पाता है. कल और आज की नारी में ज़मीन आसमान का अंतर है। वह अपनी सोच को ज़बान देने में कामयाब हुई जा रही है, अपने भले-बुरे की पहचान रखते हुए, अपनी सुरक्षा, आत्म-निर्भरता व प्रगति की हर दिशा में अधिकार पाने की राहें तलाश रही है। अतिया दाऊद की अभिव्यक्ति में हर नारी की आवाज़ पाई जाती है। जहां मुल्कों की सरहदें अपना वजूद खो बैठती है, जहां सदियों के फासले तय करना उनके लिए आसान हुआ जाता है, सच के सामने आईने रखते हुए वे कह उठती है----


जिस धरती मां की कसम खा कर

तुम से स्नेह निभाने के वाद किये थे

उस धरती को हमारे लिये कब्र बनाया गया है

देश के सारे फूल नोंचकर बारूद बोया गया है -30


नई नस्ल की बुलंद आवाज़ अतिया दाऊद की कलम से लिखी शायरी में सरसराहट से विस्फोटित होती हुई एक ज़ोरदार आवाज में औरत के दोज़ख की आग में जलती जिन्दगी के आस पास की कठिनाइयाँ बयान करती है। नकाबों में छिपे भेड़ियों, चेहरों, किरदारों के तेवर देखते हुए यही कहा जा सकता है कि औरत ने संघर्ष स्वीकार लिया है, चट्टानों से टकराना स्वीकार कर लिया है। पूर्ण रूप से वर्तमान में जीना सीख लिया है और भविष्य को अपने हाथों से सँवारने का संकल्प ले लिया है।'


कहा गया है कि ‘जो साहित्य देश समाज तथा समूची मानवता को कुछ नहीं देता, उसका सृजन करके कागज़ काले पीले करने का कोई अर्थ नहीं।‘

स्त्रीवाद लेखन अस्मिता का प्रमाण है, कोई मनोरंजन नहीं। स्वतंत्र रूप से अपने भीतर की संवेदना को, भावनाओं को निर्भीक और बेझिझक स्वर में वाणी दे पाने में नारी सक्षम हुई है। अपने अन्दर की छटपटाहट को व्यक्त करना अब उसका का ध्येय बन गया है। स्वरूप ध्रुव के शब्दों में नारी मन की व्यथा और संघर्ष दोनों ज़ाहिर हैं :


सुलगती हवा में स्वास ले रही हूँ दोस्तो

पत्थर से पत्थर घिस रही हूँ दोस्तो


सिंध की लेखिका अतिया दाऊद ने भी दोस्तों की दोस्ती को मानवता की तराज़ू में तोलते हुए लिखा है —


दोस्त, तुम्हारे फरेब के जाल से निकल तो आई हूँ

मगर हक़ीक़त की दुनिया भी दुख देने वाली है। -9


जो कवि अपने शीश-महल में बैठकर काव्य सृजन करते है वे तानाशाहों के अत्याचारों से वाकिफ़ तो होते हैं, लेकिन मनुष्य की पीड़ा और वेदना उन्हें द्रवित नहीं करती. लेखन में काव्य सौन्दर्य तथा कथ्य और शिल्प का अद्भुत तालमेल पाठक की उकीरता जगाने के लिए काफ़ी है। चिंता-प्रधान काव्य रहस्य की सीमाओं को छू पाने की, प्रविष्टि पाने की क्षमता रखता है। यही संधि रचनाकार को कसौटी पर खरा उतारती है। अपने मनोभावों को वह कलम की नोक से नहीं, तलवार की धार से वार करती दिखाई देती है। यही उत्तरदायित्व निभाने का जीवंत और कारगर माध्यम है. नारी आज रिश्तों की निरख- परख करते हुए अपने विचार बेझिझक, बेबाकी के साथ सामने रखने से नहीं कतराती —अपने मनोभावों को ज़बान देते हुए मेरी एक कविता का अंश भी अपना इज़हार करते हुए यही दावा कर रहा है---


रिश्तों की बुनियाद

सुविधाओं पर रखी गईं हों, तो

रिश्ते अपंग हो जाते हैं

अर्थ सुविधा के लिए स्थापित हों, तो

रिश्ते ललच की लाली में रंग जाते हैं

और अगर...

रिश्ते साथ निभाने की नींव पर टिके हों, तो

जीवन मालामाल हो जाता है !


नारी के मन की सइरा में शायद उसका सफर सदियों से जारी है। अपने मन रूपी ज्वालामुखी से पिघले हुए लावे की मानिंद निकली काव्य धारा में वह निरंतर प्रताड़ित मन की भावाभिव्यक्ति करते हुए लिखती है--


‘मुझे खाध पानी चाहिए फलने फूलने के लिए, डाली के साथ।

मैं खुश हूँ सिर्फ ‘मैं’ होने में!’---


बस इसी कामना से,


देवी नागरानी

480 वेस्ट सर्फ स्ट्रीट, एल्महर्स्ट, IL-60126




13 comments:

  1. देवी नागरानी जी अपने लेख के माध्यम से नारी में छुपी स्मिता देश समाज मानव जाती को असलियत से रूबरू कराने का यतन किया काफी कुछ बताने समझाने का प्रयत्न किया । बधाइयां जी !
    देखिये -
    नारी के इतिहास में
    है कविता जान ।
    सच से लड़ने की
    सहर्ष स्फूर्ति प्रदान ।
    सहना नहीं अब
    लड़ना ही मान ।
    बदलते परिवेश में
    मुकावला ठान ॥

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    उत्तर
    1. Sukh mangal ji, Nari ka maan sansmaran khud apna saman hota hai. Kisi ko khud se jyada n sahi khud jaisa samajh a to ghalat nahin hota....Aapki panktiyaan sphoorti pradaan KARNE mein saksham hai. Abhaar ke saath...

      हटाएं
    2. Devi Nangrani ji
      समानता का भाव सजोये
      देश मचलता चल रहा |
      कौन अब कहने को चला
      देश अपना पिछड़ रहा |
      तेज हवाओ से भी तेजवह
      विद्दुत वेग सा बढ़ रहा ||

      हटाएं
  2. बहुत बढ़िया आपका नया लेख अच्छा लगा, शुभकामनाये !

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  3. Gyanipamdit ji
    Aapne Lekh Padha aur protsahan Taurus do shabd likhe....use liye rahe dil se dhanywaad....Sadar...

    उत्तर देंहटाएं

  4. नमस्ते आदरणीया देवी जी
    आपका लिखा आलेख नारी मन की संवेदनाओं को
    उजागर करता हुआ एक एक शब्द द्वारा सदियों से सुप्त
    नारी ह्रदय के झेले अत्याचारों की त्रासदी का कच्चा चिट्ठा
    खोल कर पढ़नेवाले को मनोमंथन से झकझोर देता है।
    आपको मुबारकबाद बेबाक और संवेदना से भरपूर लिखने के लिए और मेरी संसफर सभी उज्ज्वल भविष्य के लिए
    एक साथ सद्भावनाएँ देती हूँ।
    " आज के दौर में कलम तलवार की धार बनकर बेज़ुबान की ज़ुबान बन गई है। शब्दों की सियाही में आज की औरत की एक ऐसी रूदाद है, एक ऐसी आपबीती है जिसकी एक-एक पंक्ति में औरत के दिल के भरभराते अहसासों और जज़्बों की घुटन महसूस की जाती है। अब उसकी हर चाहत खामोशी के पर्दों को चीरकर इन अल्फ़ाज़ की गहराइयों के माध्यम से अपने जज़्बों की अभिव्यक्ति बनकर गूंजने लगी है "

    स स्नेह सादर

    -- लावण्या

    उत्तर देंहटाएं
  5. बधाई इस साइट पर आपका सभी साहित्यकारों का

    उत्तर देंहटाएं
  6. रमेश कुमार15 मार्च 2016 को 4:37 pm

    दुनिया में आँख खोली तो मुझे बतया गया

    समाज एक जगंल है, घर एक पनाहगाह

    मर्द उसका मालिक और औरत किरायेदार

    किराया वह वफादारी की सूरत में अदा करती है-

    मैं भी रिशते नातों में खुद को पिरोकर

    किस्तें अदा करती आई हूँ-25

    वाह...वाह...अच्छा आलेख

    उत्तर देंहटाएं
  7. आदरणीय देवी नगरानी जी को जितना पढो कम है...बहुत ही अच्छा आलेख ..बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  8. रमेश कुमार1 अप्रैल 2016 को 10:08 am

    नारी के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती...देवी नागरानी जी को आभार

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत सुन्दर अालेख है देवी जी, बिल्कुल सही कहा अापने "आज के दौर में कलम तलवार की धार बनकर बेज़ुबान की ज़ुबान बन गई है।" इस कथन पर पूरी तरह खरी उतरती है अापकी कलम इस अालेख में ।

    नारी सशक्तीकरण विषय पर मेरे अालेख में से कुछ पंक्तियाँ अाप से सांझा कर रही हूँ

    यूँ ही खामोश रहोगी तो कोई जीने नहीं देगा
    जीना है तो.…आवाज जरा ऊंची उठाओ
    यूँ ही मांगते रहने से यहाँ हक़ कोई नहीं देगा
    आगे बढ़ो और हक़ को जरा हक़ से उठाओ

    सादर
    मंजु मिश्रा
    www.manukavya.wordpress.com

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