IMAGE1
दूजा दिण, इस्कूल रै इस्टाफ रूम मांय, खूणा में पड़िया इस्टूल माथै सुपारी लालसा बैठा-बैठा सोचण लागग्या क “इस्कूल रा मास्टरां नै चाहिजै, क “की तरै ई खिलकौ व्हेतौ रेवै, अर वै बैठा-बैठा इण खिलका रा मज़ा लेवता रेवै...अर, आगला भुगतण वाळा मिनख री मान-मरयादा री अठै किन्नै ई परवाह कोयनी ? अै कमसळ तौ अैङा है, कुत्तौ नै न्हाखै जैङा! म्हनै उकसाय नै भेजद्यौ, इण स्यामली रै कन्नै...क, आ फुठरी स्यामली थान्नै चावै घणी! इण वास्तै रातै बारा बाजियां पछै, बुलायौ है थान्नै मिळन्नै!”


 दिनेश चन्द्र पुरोहित रचनाकार परिचय:-






लिखारे दिनेश चन्द्र पुरोहित
dineshchandrapurohit2@gmail.com

अँधेरी-गळी, आसोप री पोळ रै साम्ही, वीर-मोहल्ला, जोधपुर.[राजस्थान]










कब्बूङा -  लिखारे दिनेश चन्द्र पुरोहित
इस्टाफ रूम री बारी सूं मूंडौ बारै काड नै माड़साब सुपारी लालसा, बारै निसरती पणिहारी नै टका-टक देखण लागग्या! पछै राम जाणै, क्यूं व्हीना फुठरापण ऊँ रींझता उण बिचारी नै छेड़ लेवै ? छेङता थकां अेक जुम्लौ परो बोलै, व्हिनै! क “अै स्यामली रायकाणी, थूं फुठरी घणी म्हारी जान! कुरबान हूँ जाऊं, थारै माथै!” अठी नै वै जुम्लौ बोलता व्है, अर ऊपर आसमान मांय उड़ता कब्बूडा ज़मीन माथै पड़योङौ धान देख लेवै! पछै कांई ? वै तौ धान देखतां ई, फरणाटै सूं उतरै हेटै ज़मीन माथै! अर अेकै-साथै टूट पङै, धान रै माथै!
आ परिंदा री उड़वा री आवाज़ इत्ती तेज़ व्है, क इन्नै आगै माड़साब रा बोल्योड़ा जुमला री आवाज़... व्हिनै आगै, की बक नहीं राखै! पण, माड़साब नै असल बात कांई ठाह ? लुगाइयां रै मांय, चेहरौ पढ़ण री काबिलियत व्या करै! माड़साब री लट्टू ज्यूं घूमती आंख्यां नै देख, वा अंदाजो परो लगाय लेवै क “माड़साब की खोटा बोल्या व्हेला ? पछै कांई, रीसाणी हुयोड़ी स्यामली रायकाणी जूती मारण सारुं पग कन्नी हाथ बढ़वै....पण, जूती कन्नी हाथ पूगै नहीं अर उण पैला माथै माथै मेल्योड़ो बेवड़ो धडाम करतौ हेटै पङै....आंगणै सुय रिया, काबरिया कुत्ता रै माथै! बापङौ कुत्तौ दरद रै मारै, किळियावै! कुत्ता रौ किळियावणौ सुण नै स्यामली घबरा जावै, अर व्हिनौ पग धरीज जावै कुत्तङा री पूंछ माथै! अबै वो कुत्तौ भिमर कांई जावै, नैङी ऊबी धोळकी कुत्ती नै आपरी बादुरी दीखावतौ...स्यामली रायकाणी री पिण्डी पकड़ नै, डाचो परो भरै! डाचो भरतां ई, स्यामली चिरळावै जोरां ऊँ क “अै म्हारी जामण, मर गयी म्हूं तौ....म्हारा बाप!” औ खिलकौ देखतां ई, सुपारी लालसा डग-डग हंसण ढूका अर साथै-साथै कमरा में बिराज़्या मास्टर भी हंसण ढूका! अबै औ हंसी रौ किल्लोर जाय पूगौ, कारीवाहक हेड माड़साब किसोरी लालसा रै कानां मांय! सुण नै कारीवाहक हेड माड़साब किसोरी लालसा, कमरा रै मांय नै बङै! अर आवतां ई वै ठीमर सुर में कैवण लागै क “बोलौ-बोलौ बैठा रेवौ, सरदारों! यूं हाका कर नै, म्हारी कुरसी हिला रिया हौ ? थाणी हंसी रौ किल्लोर सुण नै, टाबरिया क्लासां सूं बारै झांकण लागग्या है....” वै बोलता-बोलता ढब्या ई कोयनी, जित्तै पाहङै ऊबा माड़साब देव कुमारजी व्यारौ छोड़योङौ अधूरौ जुमलौ पूरौ करता थकां यूं कैवण लागा क “आ बात हेड माड़साब नै ठाह पड़गी, तौ म्हारी खैर कोयनी!” कांईसा, किसोरी लालसा... थे आ इज़ बात, कैवणी चावता हा कांई मालक ?” देव कुमारजी औ जुमलौ बोल्यो इज़ हो, अर अठी नै औ आंगणै बैठ्यो मूंडौ लागोङौ नंदियो चपरासी फाटक सूं ऊठियो...अर कमर लचकावतौ, किसोरी लालसा रै कन्नै जाय पूगौ! पछै तहज़ीब-वहज़ीब नै आघी बाळतौ, व्यारै खांधा माथै आपरौ हाथ परो मेल्यो...अर पछै यूं बोलण लागौ, क “औ माड़साब! क्यूं आकरा-आकरा बोलौ हो ? आ कुरसी ख़ाली दो दिणां री इज़ है, हेड माड़साब रै आवतां ई आ सारी अकड़ ठीक हो जासी!” इत्तौ सुणतां ई, किसोरी लालसा नै रीस आई तौ घणी...पण सोचण लागा, क “क्यूं किन्नी कुदीठ मिनख नै, मुंडा तोड़नौ मौकौ देवणौ ? औ मिनख तौ सारा मास्टरां री कमजोरियां भली-भाँती जाणै, अर इन्नै पेट रै मांय अेक भी बात पचै नी...न मालुम औ करै भी दुस्मनी काडतौ, किन्नै ई मास्टर री छानै री बातां हेड माङसाब रै साम्ही चवड़ी कर दी तौ इस्कूल में बवाळ पैदा व्हे जावेला ? इण वास्तै इज़, कोई भी मास्टर इन्नै साम्ही लूज़ बात करै कोयनी! औ ठेरियो, कुचमादिया रौ ठीईकरो! औ अेक-अेक बात, लूण-मिरच लगा नै हेड माड़साब नै पोद्या करै! अर साथै-साथै गाम री चौपाल में बूढा-बडेरा बिचै बैठ नै, अेक-अेक मास्टर री पोल खोलतौ जावै! क, किसौ मास्टर किन्नै खिलाफ़ ख़ाली हफ्वात करतौ रैवै! इण मास्टरां री बुराइयां करतौ, वो केई सच्चा-झूठा किस्सा गढ़ नै लोगां नै सुणाद्या करै!
अठी नै अेक बात और है, क औ नंदियो हेड माड़साब री नज़रां में सेवा-भावी गिणिज्या करै! घर-ग्रस्थी रा चक्कर मांय पड़ नै हेड माड़साब री घरवाळी, जोधपुर स्हेर छोड़ नै कठेई जावै कोयनी! इण जोधपुर मांय काम ई घणा व्है, अै मोटयार हुयोड़ा टाबरां सारुं समझदार अर वैवार कुसल वर-वधु जोवणा क कठेई रिस्तेदारी मांय मरगत व्ही व्है तौ उठै फेरा में जावणौ...ई तरै समाज में बैठां हां, तौ काम भी घणा व्या करै! रिस्तेदारी निभावणी, कोई सरल काम कोयनी! न्यात रै मांय किन्ना ई छोरा-छोरी पनीजै, भळै बठै पधारो मती पण नैत घालण में देरी नहीं करणी...अै सगळा नियम-क़ायदा निभावतां, हेड माड़साब री लुगाई नै गाम में आवणौ पोसावै कोयनी! इण जोधपुर री लुगाइया रौ बंतल करण रौ न्यारौ सौक, रोज़-रोज़ मांयकै जावणौ अर भाई-भुजाइयां बीचै बिराज़ नै परायी-पंचायती करणी...अै लावा लेवण रा सौक, गाम रै मांय कीकर निभै ? अठै हेड माड़साब री सोच न्यारी, वै तौ औ समझै क गाम में लुगाई राख नै खरचौ क्यूं बधावणौ ? लोगां रै कैयां-कैयां लुगाई नै राख भी दां तौ, आ घरवाळी दस वळा जावेला जोधपुर...ज़रै हफ़्ता मांय अेक वळा जोधपुर जाय नै लुगाई-टाबर सम्भाळणौ चोखौ! अर, अठै नांदिया जैङा सेवा-भावी मौजूद! ज़रै, आ आफ़त किण सारुं पालणी ? वै भी राज़ी अर म्हैं भी राज़ी, लोगां रौ कांई ? दूजी आ बात भी है, क औ नंदियो हेड माड़साब री सेवा करण में लारै क्यूं रेवै ? औ ठेरियो खावासजी महराज, जाति सभाव रै कारण “औ मिनख अठै री बातां उठी नै करणी कीकर भूलै, अर हेड माड़साब रौ घर इण सारुं घणौ चोखौ! अठै तौ वौ हेड माड़साब नै वस मांय कर नै, आराम सूं इस्टाफ माथै आपरौ सिक्को जमा सकै!” पछै अैङौ चोखौ हाथै आयोङौ खिदमात करण रौ मौकौ, औ कीकर हाथ ऊँ निकळण देई ? बस औ इज़ मतौ बणा नै वौ, हेड माड़साब रै घरै सबाह-साम रोटियाँ पकावण लाग गियो! अठै हेड माड़साब नै आवै कोयनी रोटियाँ पकावणी, अर नी है गाम में है कोई ढाबौ! इण कारण, नांदिया बिण व्यांरौ काम चालै कोयनी! बस, पछै कांई ? आ इणीज़ कमज़ोरी रौ फ़ायदौ उठावतौ वौ हेड माड़साब नै स्टाफ रै खिलाफ़ भड़कावण लाग गियो! अबै हेड माड़साब आंख्यां मींच नै, व्हीनी अेक-अेक बात माथै भरोसौ करतां व्हिनै राज़ी राखण लागग्या! औ इज़ कारण है, औ हेड माड़साब रै ओळू-दोळू घूमतौ रेवै! किनै ई माड़साब नै हेड माड़साब सूं सीधौ मिळण नी देवै! इण बातां सूं, नंदिया री ठौड़ इस्टाफ रै मांय घणी ऊची व्हेग्यी! बस इण कारण इज़, औ इस्टाफ रा बंदा नै ढाई फूस री झूपड़ी समझण लाग गियो!
चाणचूकै इस्टाफ रूम रै मांय बिराज्या गुरुजनौ नै, चपरासी बंसी लालसा री गूँज सुणीजण में आयी! वै ज़ोर-ज़ोर सूं बोलता जा रिया हा, क “कब्बूडा पड़ग्या, कब्बूडा पड़ग्या!” इण गूँज रै साथै बंसी लालसा कमरा मांय बड़ै! अर लम्बी-लम्बी सांसा खाय नै कैवण लागै, क “सरदारों अठै कियां बिराज़्या हो ? फटकै सूं होल में पूगौ, नी तौ सारो चूरमौ ख़तम व्है जासी....अर, थे भूखा रेय जावोला!”
“कांई आ बात सच्च है, कांई आ बात सच्च है ?” कैवता-कैवता सगळा माड़साब ऊठण लागग्या, जित्तै माड़साब जाला प्रकासजी कमरा रै मांय नै बङै! आवतां ई ज़ोरां सूं वै कैवतां जावै, क “क्यूं मर रिया हो ? अठै इज़ आ रियो है, चूरमा रौ कङाव! इण राम प्रतापसा माड़साब रै असरिज्यो कोयनी, होल रौ दरुज़ौ खुलतां ई मांय आय बाङिया! अै भाईजी तौ अैङा है क सगळी तहज़ीब-वहजीब नै आघी बाळी, अर चूरमा माथै टूट पड़िया कब्बूङा व्है ज़्यूं! अबै औ चूरमौ अठै इज़ आ रियौ है, मरौ मती!” व्यांरै इत्तौ केवतां ई, कङाव ऊचायोड़ा चपरासी पूना रामसा मांय बङै! व्यांरै लारै-लारै आवै, चूरमा सूं भरियोङा हाथ ल्यां राम प्रतापसा! सूरत तौ राम प्रतापसा री अैङी दीसै, मानो मालक जीमता व्हौ अर कोई खोड़ीळौ-खाम्पौ आय नै व्यांरी थाळी उठा नै लेग्यौ व्है ?
इण गामां री इस्कूलां मांय अै दाल, बाटा अर चूरमा री पार्टीयां तौ अक़सर रोज़ व्हेती रेवै! बस कोई इस्टाफ रौ बन्दौ पारटी इच्छा सूं दे दे, कै पछै सगळा जणा मिळ परा नै किणी अेक बंदा नै दुह लेवै! जिण पारटी रौ बच्योड़ो चूरमौ इण कङाव मांय धरीज़ नै होल मांय सबाह सिरोण सारुं धरियो गियो, वौ चूरमौ नवा बाबू सतानाराणसा रै इस्कूल मांय ड्यूटी जोइन करण री खुसी मांय लीवी गयी पार्टी रौ है! इस्टाफ रा बंदा इण भोळी गाय नै, कालै इज़ इण कब्बूङा इस्टाफ रा क़ायदा बताय नै दुह ली ही!
अबै औ कड़ाव, अठै मेज़ माथै कांई मेलिज्यौ ? अठै तौ तहज़ीब-वहज़ीब नै आघा बाळता, सगळा माड़साब कब्बूङों रै तरै अेकै-साथै उण चूरमा माथै जूंझ पड़ै! अै सगळा माड़साब ठेरिया भोजन-भट्ट, अै तौ मथुरा रा चौबेजी अर छब्बेजी जैङा पण्डतां नै खावण मांय लारै राखण वाळां दीसै! खावती वळा, इयां नै तौ की मालुम कोयनी क औ चूरमौ कठै जा रियो है ? किन्नेई तौ घुस रियो है कांन मायं, तौ किन्नेई घुस रियो है नाक मांय! घणा उतावळा माड़साब राम प्रतापसा रा सगळा बाल चूरमा सूं भरीज़ग्या है! इण माङसाबां रै पेट मांय कित्तौ चूरमौ बड़ रियो है, अर कित्तौ चूरमौ घुस रियौ है व्यांरै गाबा रै मांय नै ? औ हिसाब-किताब, अबै कुण लगा सकै ? इन्नौ जवाब किन्नै ई कन्नै कोयनी, ना तौ औ हिसाब-किताब कोई राखणी चावै...बस अै तौ ख़ाली आ प्रतियोगिता जीतणी चावै, क कुण मिनख औ फोगट रौ माल बत्तौ खा सकै ? अबै तौ बस अैङौ लागै है, क वै तौ “तगङौ भोजन-भट्ट” रौ खिताब जीतण सारुं त्यार हुय नै इज़ आया व्है ? कई लोग तौ अलसबाह लूण ठोक नै आपरौ पेट साफ़ कर ल्यो हो, ताकि इण बखत वै अव्वल आय सकै! चूरमा ठोकण में मची धमा-चौकड़ी री आ आवाज़, स्यामली रै कानां मांय बड़ै! बारी मांय झाँक नै, चूरमा माथै कब्बूङा रै तरै टूट पड़िया माड़साबां नै भाळती व्हीनै रेत रा टीला माथै ढांडा री ळौथ नै नौंचता गिरज़ङा रौ झुण्ड भळै याद आ जावै! दोणू रै मांय अेकसी समानता पाय नै, व्हा ज़ोरां रा ठहाका लगावती थकी खिल-खिल हंसण ढूकी! हंसती पांण व्हिनै निगै आय जावै, माड़साब सुपारी लालसा! ज्यांरौ खमीस रौ कोलर ऊचौ कर नै माड़साब देव कुमारजी बड़ा आराम सूं चूरमौ घुसावता जा रिया हा! बापड़ा सुपारी लालसा नै, कांई ठाह ? क, अबार बारुड़ी कीडियां, व्यांरै बदन मांय चढ़ नै काटणौ काम चालू कर देवेला! अर्जुन नै तौ ख़ाली चिड़ी री आंख दीखती, अर अठै सुपारी लालसा नै ख़ाली चूरमौ इज़ दीसै...बस, कित्तौ बत्तौ चूरमौ आपरै गोगा मांय डाल नै नैचो करां! ताकि आपां रेवां अव्वल, चूरमौ ठोकण में! इण स्यामली नै छाने-छुपकै देखतां रौ मंज़र माड़साब देव कुमारजी सू छानै रेयौ कोयनी! वै तौ ठहाका लगावती स्यामली नै देखतां ई, झट दोणू हाथां री आंगळियां नै मिलाय नै केमेरा री सूरत परी बणावै! उण पछै फिळम डाइरेक्टर री तरै, उण हिरोइन स्यामली नै देखण लागग्या! अबै व्हिनै निरखतां-निरखतां, सुपारी लालसा नै यूं कैवण लागा क “वाह सा वाह! कांई कैवणौ, सुपारी लालसा आपरौ ? आ अपछरा जैड़ी फूठरी स्यामली थाणै माथै अणूती रींझ गयी है! मैं तौ थाणै आगै....” काळा भसूंड सुपारी लालसा रै माथै रींझणौ, तौ खलकत रौ सांतवौ इचरच व्या करै! पछै कांई ? राज़ी व्है नै, ऊठ’र बारी कन्नी जावणी चायो! पण गेला बिचै पड़िया इस्टूल नै वै दैख नहीं साकिया, अर टक्कर खाय नै पड़िया धरतियां! औ मंज़र दैखतां ई, स्यामली री कांई दसा व्है ? रामा पीर इज़, जाण सकै! बस वा तौ खिल-खिल इण तरै हंसती गयी, क व्हीना पेट रा बळ खुलण लागा! अबै सुपारी लालसा पाछा ऊठिया, उण स्यामली नै इण तरै हंसतौ देख नै, व्यांरी मींइजी परी बळी! अबै वै रीस्यां बळता, व्हिनै कैवण लागा क “स्यामली थारी मौत आयी है, सूता सेर नै छेड़ रयी है ? अबै थूं कठेई अेकली मिळजै म्हने, थारी जवानी री सारी अकड़ ख़तम नहीं कर दी... तौ म्हारौ नांम, सुपारी लाल नहीं!” सुपारी लालसा रौ रीस सूं भरयोडौ औ थोबड़ौ, रातै मुंडा रै बांदरा जैङौ दीसण लागौ! इण थोबड़ा नै दैख, स्यामली तौ ज़ोरा री किळकारी मार नै बठै सूं अदीठ हुय जावै!
पछै कांई ? मास्टरां रै तौ चाहिजै ख़ाली, डग-डग हंसण रौ मुद्दौ! बस वै तौ सुपारी लालसा नै घणौ ऊचौ लेवतां व्यांरा बोल्योड़ा डाइलोग माथै, ज़ोरां ऊं हंसता जावै! अठी नै किसोरी लालसा तौ बिचारा भूल जावै, क थोड़ा दिण पैली नुवी बत्तीसी मुंडा मांय जड़वाई ही! अबै वै इण टैम अैङा खुल नै हंसै, क व्यांरी नुवी बत्तीसी उछळ नै देव कुमारजी रै भोगना माथै पड़ै! देव कुमारजी औ समझै, क कोई खोड़ीळौ-खाम्पौ ठोलो मारद्यो व्है ? जित्तै व्यांनै किसोरी लालसा रौ पिचकयोड़ौ मूंडौ दीसै, जिण मांय अेक असली दांत चमकतौ दीसै! हमार तौ मालक किसोरी लालसा दीखता हा, जवान..! अबै बिचारा बूढा डोकरा रै माफ़िक दीसण लागग्या! औ तमासौ दैख नै सुपारी लालसा औ मोसा बोलण रौ मौकौ क्यूं चूकै ? बस पछै कांई ? झट बोबाड़ा काडता छूटा बोल पड़िया, क क्यूं छक्कै रै तरै, हंसता जा आ रिया हो ? थाणै ऊं तौ आ बत्तीसी सम्भाळीजै कोयनी, थे कांई लुगाई नै संभाळता व्होला ?” अबै छक्का री उपमा, राठोड़ सरदार किसोरी लालसा नै कीकर चावी लागै ? अैङा सरदार जिका बांकङळी मूंछ्यां राखण वाळा व्हौ, जिणारी आंगळियां आखा दिण मूंछ्याँ माथै ताव देवती रेवै...अबै इयां नै कोई नामुंछ्यौ मिनख, नाज़र कैय दे..? आ बात, इयांनै बरदास्त करण रै बारै लागै! व्यांनै तौ इत्तौ याद है क इस्कूल लारै आयोड़ी नाडी माथै पांणी भरती जवान लुगाइयां, व्यानै निरखती फिळम बाबासा री लाडली रौ गीत गुनगुनावती जावै क “बाँकड़ळी मूंछा वाळौ आयो रै आंगन में..” अबै अै बातां सोचता थकां किसोरी लालसा रै वास्तै चुल्लू भर पाणी मांय, मरन्नी कंडीसन बण जावै! अबै वै हकळावता-हकळावता यूं बोलण ढूका, क “म..म..मरद तौ, अेक दंता भळा! म्हूं तौ घणौ चोखौ हूं, सुपारी लाल! थारै ज्यूं अमल री डळी लेय नै काम कोयनी चलावूं! अजेतांई म्हारा गोडा स..स..सलामत है!” व्यारै इत्तौ कैवतां ई देव कुमारजी झट आंगणै पड़ी नक़ली बत्तीसी उठाय नै, व्यानै झिलाय नै कैवता जावै क “औ रणबंका राठोड़ी मुछंयां राखण वाळा राठोड़ सिरोमणी महाराजा किसोरी लालसा, लिरावौ मालक..थाणी जवानी रौ सबूत! अबै बण जावौ, पाछा जवान!” इत्तौ कैय नै, देव कुमारजी मुळकण लागग्या!
जित्तै बंसी लालसा ऊठ परा नै, घड़ी देखै! रिसेस रौ बखत हुय जायां सूं, वै जाय नै घंटी लगा देवै! अबै रिसेस व्हेग्यी, टाबरिया चिरळावता-चिरळावता क्लासां सूं बारै निकळ नै ग्राउंड में आइग्या है! अबै इस्टाफ-रूम बैठ्या मास्टर औ सोचण लागग्या, क नैचौ व्यौ...अबै आराम सूं टांगा पसार नै बैठां, चाय-चूई पीवां नै धुवां काडा बीड़ियाँ रा! नसेड़ी लोगां नै, यूं भी ख़ाली बैठणौ सुवावै कोयनी! ख़ाली बखत मिळतां ई, इयांनै बीङी-सिगरेट कै ज़रदौ सेवन करण री बायङ आवै! बस सा, अबै किसोरी लालसा नै बीड़ी पीवण री बायङ आवा ढूकै! बीङी रौ बण्डल काडण सारुं खून्जै में हाथ घालै, पण बीड़ी रौ बण्डल मिळै कोयनी! अबै व्यांनै फ़िकर हूवण लागै, क औ बीड़ी रौ बण्डल छेवट गियो कठै ? व्यांरा मुंडा माथै आवता-जावता भावां नै पढ़ नै, सुपारी लालसा यूं कैवण लागा क “वाह भाई, भाई! मरद तौ अैक दंता भळा! कांई बोल्या, अै महापुरस ? अै कैङा हितंगिया मिनख है, जिका अेक बीङी रौ बण्डल संभाळ नहीं सकै...वै कांई आपरी लुगाई नै संभाळता व्हेला ? अैङा नाज़र रौ तौ मूंडौ देखणौ, पाप है!”
इण तरै, फेरूं अेक वळा मरदपणा माथै चोट लगा दी..औ, कुदीठ मिनख ? अबै किसोरी लालसा कीकर बरदास्त करै, इण मिनख री वाहियात हरक़तां ? किसोरी लालसा रौ जालामुखी रूपी मूंडौ खुल्यां पैली, औ नंदियो घोड़ा-गाडी बीड़ी रौ बण्डल लाय नै व्यांरै हाथ में परो मेल्यो अर हाथ जोड़ नै कैवण लागौ “कुरसी रा मालक! औ बीड़ियाँ रौ बण्डल, आपनै म्हारी तरफ़ सूं नज़र! अरे मालक, अबै आप म्हनै यूं करडी-करडी नज़रां सूं मती देखो! म्हूं रोहिड़ा रौ जिनावर, आप सूं घणौ डरुं हूँ!”
इण इस्टाफ में किसोरी लालसा रै सिवा, कोई इस्टाफ रौ बन्दौ औ घोड़ा-गाड़ी छाप बीड़ियाँ रौ बण्डल पीवै कोयनी! पछै औ बीड़ियाँ रौ बण्डल, इण कुदीठ नांदिया रै कन्नै आयौ कीकर ? औ सोच-सोच नै, किसोरी लालसा काया परा व्या! इण नांदिया री कुचमादिया रा कारनामां री जाणकारी पैला सूं राखतां, किसोरी लालसा इण बात नै ओछी में काटी! क, क्यूं इण ओछी जात नै मुंडा लगावां ? छेवट बारै निसरती लालकी नै मांय नै इज़ रेवण दी! पण, औ ठेरियो मानखो सरीर! यूं आ आयोड़ी रीस, सोरास ख़तम व्है कोयनी! सब जणा जाणै, क कुम्हारण माथै कुम्हार रौ ज़ोर चालै कोयनी! ज़रै वौ जाय नै खींचै गधेङी रा कांन! बस, अबै इणी तरै किसोरी लालसा नांदिया री ठौड़, इण सुपारी लालसा सूं इज़ ऊळज जावै! वै मूंडा सूं खीरा न्हाख्तां व्है ज्यूं, कैवण लागा क “सुपारी लाल, थूं किसौ मरद है ? मरद व्है, तौ पैला थूं इण स्यामली नै वस में कर नै दीखा! पछै मैं कैवूं, क थूं अेक मरद है! इण पछै इज़ मांगजै, म्हारै कन्नू म्हारै मरदपणा रौ सबूत!”
अबै तौ हंसी-मज़ाक री बातां, आपरौ रूप बदळण ढूकी! औ हंसी-मुज़हाक़ रौ माहोल, जंगाह बणन ढूकौ! इण सूं बचण सारुं, माड़साब अजमेरी लालसा हिंदी-मारवाड़ी खिचड़ी भासा मांय बोलता थकां हंसी रा फव्वारा छोड़न लागा! वै यूं कैवता गिया, क “सुपारी लालसा बौत माहिर है, जी! इयांको आता है, वसीकरण मिन्त्र! अभी-अभी इन्होंने जाप कीदा, इसलिए वह स्यामली इनको प्यार भरी नज़रों सूं देख नै गयी है! अजी, उसका मुळकणा और हंसणा तो प्यार का अंदाज़ है!”
माड़साब अजमेरी लालसा री बात सुण नै, सगला जणा डग-डग हंसण ढूका! अबै माड़साब किसोरी लालसा रै मूंडा माथै, मुळकाण छा जावै! स्कूल मांय रिसेस रौ बखत ख़तम व्हेग्यौ है, चपरासी जाय नै रिसेस ख़तम हूवण री घंटी लगा देवै! अबै सगला मास्टर आप-आपरी क्लासां मांय जाय नै, टाबरां नै पढ़ावण लाग जावै!
दूजा दिण, गाम में हाको फुटग्यो क “कालै रातै सुपारी लालसा चोरी करण री नीयत सूं सरजू रायका रै घर में घुसग्या, अचाणचक सरजू री घरवाळी स्यामली री नींद उछट जावै! अर व्हिनै चिरळायां सूं मोहल्ला रा लोग जाग जावै, अर माड़साब रंगै हाथ पकड़ीज़ जावै! माड़साब रै कन्नै स्यामली रा कड़ा अर कांठळौ बरामद व्है! दूजा दिण औ सरजू राइको माड़साब रै खिलाफ़ रपट लिखावणी चावतौ हो, पण गाम रा मौज़ीज़ मिनख बिचै पड़ परा नै मआमलौ सुलझा देवै! ई तरै माड़साब सुपारी लालसा रै, जेल जावण री गेल परी छूटै!
दूजा दिण, इस्कूल रै इस्टाफ रूम मांय, खूणा में पड़िया इस्टूल माथै सुपारी लालसा बैठा-बैठा सोचण लागग्या क “इस्कूल रा मास्टरां नै ख़ाली औ इज़ चाहिजै, क “की तरै ई खिलकौ व्हेतौ रेवै, अर वै बैठा-बैठा इण खिलका रा मज़ा लेवता रेवै...पण, आगला भुगतण वाळा मिनख री मान-मरयादा री अठै किन्नै ई परवाह कोयनी ? अै कमसळ तौ अैङा है, कुत्तौ नै न्हाखै जैङा! म्हनै उकसाय नै भेज दियौ, इण स्यामली रै कन्नै...क, आ फुठरी स्यामली थान्नै चावै घणी! इण वास्तै रातै बारा बाजियां पछै, बुलायौ है थान्नै मिळन्नै!” पछै कांई ? म्हूं गेलसफ़ौ बण्योङौ गियौ उठै, अर खाया जूत! जूत पड़ती वळा, अेक ई कुतिया रौ ताऊ म्हनै बचावनै मांय नै बळियौ कोयनी! अै तौ कमसळ रा मूत, बारै ऊबा-ऊबा मज़ा लेवता रिया! अबै इयांनै, मिनख कैवूं कै ढांडा ? ठौड़-ठौड़ गाम रा लोगां कन्नै जाय नै, लावा लेवता इण किस्सा नै फेरूं सुणावता न्यारा जावै!”
रिसेस री घंटी बाजण लागी, अबै क्लासां छोड़ नै सगला मास्टर इस्टाफ रूम में बङ नै कुर्सियां माथै बैठ गिया...अर अठी नै, बंसी लालसा इस्टाफ-रूम मांय आय नै इस्टोव रा पम्प मारण ढूका! अर साथै-साथै पांणी सूं भरयोङौ भगोळौ, चाय बणावां सारुं चढ़ाद्यौ! अबै पांणी उकळै जित्तै, बीड़ी रा धुवां काडता थकां आपरौ थाकेलौ उतारण लागा! व्यांनै ई तरै धुवां काड़ता दैख नै, माड़साब देव कुमारसा नै बीड़ी पीवण री बायङ आवा लागी! खून्जै मांय बीड़ी-सिगरेट राखणा, देव कुमारसा रै उसूला रै खिलाफ़ है! पण अठै दूजां लोगां नै बीड़ी पीवता दैख नै, व्यांरी मनङा में आ बायङ उछाळा लेवां ढूकी! मन मांय सोचल्यौ, क किणी तरै औ नसौ पूरो व्हेणौ चाहिजै! जिण सूं औ बखत, सोरौ कट जावै! छेवट आंती आय नै बीड़ी मांगता कैवण लागा, क “बंसी लालसा, कांई अेकला-अेकला बीड़ियाँ रा धुवां काडौ हो ? सुरग में जावणौ व्है, तौ अेकलौ बैठ नै नसौ नहीं करणौ! लौ काडौ सा, थाणौ तीर छाप बीड़ी रौ बण्डल! मैं भी बीड़ी पीवण मांय, थाणौ साथ परो देऊं!”
बंसी लालसा बिचारा भोळा जीव, ना कैवण री इयां रै मायं आदत कोयनी! बस बिचारा, लिहाज़ रै मारै करै कांई ? झट बीड़ी रौ बण्डल काड नै, माचिस रै साथै अेक बीड़ी परी पकड़ा देवै.... देव कुमारसा नै! पछै कांई ? बीङी हाथै आवतां ई, बीड़ी सिळगाय नै देव कुमारसा धुवां काडण लागग्या! ज्यूं ई औ बीड़ी रौ धुवौं, बंसी लालसा रै मुंडा माथै छावण लागौ! त्यूं ई, व्यांरै अंतस मांय विचारां रौ जुद्ध छिड़ जावै! अबै व्यांरी घरवाळी रा आकरा बोल व्यांरै कानां में गूंजण लागै, क “थोरौ बीड़ियाँ रौ खरचौ अणूतौ बधग्यौ है, अैङा ई थाणा लखण रैया तौ छोरी रा हाथ पीळा कीकर करोला ?” सच्ची बात तौ आ है, क बंसी लालसा आखा दिण पीवै ख़ाली च्यार-पांच बीड़ी! पण अै इस्टाफ रा बंदा दिण-भर बीड़ी मंगता-मांगता, बिचारा बंसी लालसा रा अेक-दो आखा बण्डल ख़तम करा देवै! इण तरै बंसी लालसा रौ बीड़ियाँ रौ खरचौ अणूतौ बढ़ जायां सूं, व्यांनै आपरी बेर रा औळबा न्यारा सुणन्ना पड़ै! औळबा सुणै तौ बंसी लालसा सुणै, मास्टरां रै बाप रौ कांई जावै ? व्यांनै तौ, बीड़ी बराबर मिळती रैवै...पछै कांई ? दूजी अेक आ बात है, जिन्नै आप बंसी लालसा री मज़बूरी भी समझ सकौ! क, इस्टाफ वाळा सूं अक़सर बंसी लालसा रै कई कांम पङै! यदा-कदा कदेई टैम माथै तनख्वाह रा बिल पास नहीं हुवै, ज़रै अै इस्टाफ रा बन्दा इज़ व्यारौ आयौ कांम काडिया करै! बस उण बखत बंसी लालसा नै इत्तौ इज़ कैवणौ पङै, क "देव कुमारसा या फलाणसा, तनख्वाह मिळी कोयनीसा! की पैसा-वैसा उधार दिरावौ सा, तनख्वाह मिळेला ज़रै पैसा पाछा दे दूंला सा!” बस, पछै कांई ? ई तरै आफ़त री वेळा भी, बंसी लालसा रौ कांम सळट जावै! औ इज़ कारण है, जिण कारण अै बंसी लालसा इण मास्टरां नै इत्ता भाव दिया करै!
अबै मेज़ रै माथै कलाकंद री छाब धरीज़गी है, व्हीनी धम..धम री आवाज़ सूं बंसी लालसा रै विचारां री कड़ियाँ टूट जावै! चेतौ आवतां ई वै साम्ही जोवै, साम्ही दीसै राम प्रतापसा! अबै व्यांरी मनभावणी सीरी जबान सूं निकल्योङा सबद व्यांरै कानां मअे बङै, वै कैवतां जा रिया हा क “भायां आ मिठाई है, माड़साब कुरङा रामजीसा री तरफ़ सूं! वै फस्ट इयर में, थर्ड डिविजन सूं पास व्या है! अबै सरदारों, तैयार व्है जावौ! मैं थाणै सारुं न्यारा-न्यारा बंट कर रियो हूँ, बस मालकां अठै कब्बूङा नी पड़ना चाहिजै!”
इत्तौ जल्दी मिठाई रा बंट करणा, माड़साब जाला प्रकासजी नै कीकर चोखौ लागै ? अबै वै इण खावण री वेळा, खङूसिया मिनख री तरै बिचै फाडी फंसावता ज्यूं बोलण ढूका क “कांई करौ, ठोकिरा ? थोड़ी ताळ ठेहर जावौ, गाम सूं कुरड़ा रामजी रा दो-तीन मिंत गाम सूं हमार आवण वाळा है...इस्कूल में! वै भळै, इयांनै मिठाई खवावण सारुं अठै बुलायौ है!”
पण जठै व्है कब्बूङा रौ जमाव, उठै किन्नी भी आदमी री बाट नाळणी व्यांरै क़ायदा रै खिलाफ़ व्है! पछै कांई ? झट कब्बूङा रा ख़ास मेम्बर देव कुमारसा परा बोल्या, क “इण इस्टाफ रूम रै मांय ख़ाली इस्टाफ रा बन्दा इज़ जीम सकै, दूजा जणां नै अठै जीमवां रौ कोई हक़ नहीं है!” पछै कांई ? अेक कब्बूङा नै दूजा कब्बूङा रौ समरथन करणौ, बौत ज़रूरी है! क्यूं कै, आ तौ जग री रीत है! जठै इण खलकत मांय, अेक कागळा रै कावं-कावं करियां सूं सारा कागळा कावं-कावं करण लाग जावै...उठै कोई कोयल कूकती व्है, तौ कुण सुणै ? ज़रै इण कब्बूङा री बात राखता माड़साब अजमेरी लालसा झट ऊठ नै बिचै कैवण लागा, क “सौ फीसदी साची बात कही है, देव कुमारजी नै! कोई हक़ नहीं रखते हैं, ये बारळै मिनख!” अबै औ कावं-कावं करणौ, इण कागळों रौ हक़ बणग्यौ...अबै च्यारुमेर इण मास्टरां री अवाज़ां गूंजण लागी, पछै तौ बिचारा राम प्रतापसा नै मज़बूर व्है नै, छाब रौ डोरो खोलणौ चालू करै! डोरौ खुलतां ई, च्यारुमेर कलाकंद री सौरम फ़ैल जावै! औ तौ चोखौ हुयौ, वै माड़साब संत कुमारजी रौ बंट पैला सूं अलग धरद्यौ! अबै आ मन भावणी सौरम, सगळा मास्टरां नै कब्बूङा बणन सारुं उतावळौ करण लागी! वै क्यूं अबै, बंट हूवण री बाट नाळी ? बस, अबै सगला जणा अेकै-साथै टूट पङै कलाकंद माथै! औ खावण रौ मंज़र, भळै अनोखौ ? अेक दंता रा मालक किसोरी लालसा इण तरै औ खावा रौ मंज़र दैख नै घबरा जावै! वै औ सोचण लागग्या, क “औ कांई व्है रियौ है, बेटी रा बापां ? म्हूं ठेरियो, अेक दांत वाळौ! इण तरै इयांरै बिचै भिळ नै, कीकर अरोगूंला औ कलाकंद ?” छेवट वै बोल्या, क “हैं हैं औ कांई करौ हो, सरदारों ? थोङौ मिनखीचारौ तौ राखौ, पांच-दस मिनट रुक जावता तौ थाणौ कांई जावतौ ? जित्तै आय जावता, कुरङा रामजी रा दोस्त!” अठी नै बंसी लालसा नैरा बोलण ढूका, क “चाय तौ पैली पी लेवता, पछै बण जावता कब्बूङा!” दरुज़ा ऊँ हाका पाड़तां यूं कैवण लागा “कब्बूङा पङग्या, कब्बूङा पङग्या! आ जाऔ, बच्योङा गुरुजनों! लारै कोई, रैयजौ मती!” अबै किसोरी लालसा नै माल री फ़िकर हूवण लागी, क “औ कलाकंद तौ अबार आंख्यां रै आगै सूं अदीठ हुय जावेला! पछै, कांई करां बापूड़ा ? आपां बिणा खायां, रैय जावेला!” पछै कांई ? बिचारा, कब्बूङा बण्योड़ा मास्टरां रा मुंडा ताकण लागग्या...क अै भळा मिनख, थोड़ा रुक जावै तौ...वै भी उणारै साथै मिळ जावै ! व्यांनै ई तरै मुंडा ताकता दैख नै माड़साब देव कुमारजी सल्ला देवता ज़ोरां ऊँ बोल्या, क “रैवण दौ, किसोरी लालसा! खावणौ हुवै तौ भेळा व्है जावौ, नी तौ पछै म्होणौ मूंडौ ताकता रैय जावोला!” पछै मुळकाण छोड़ता बोल्या, क “थे, कांई खाय सकौ ? हो तौ थे, ख़ाली अेक दंता रा मालक!” देव कुमारजी री बात सुण नै, किसोरी लालसा नै समझ आइग्यी क “अबै कब्बूङा नी बण्या, तौ लारै की नी हाथै आवेला! बस, पछै कांई ? झप्पीङ करतौ अेक झप्पाटौ मारै, अर उठा लेवै कलाकंद रौ अेक मोटो हिस्सौ! कब्बूङा पड़वा री धम..धम री अवाज़ां, बरामदा में चैलक़दमी करता माड़साब संत कुमारजी रै कांना में पड़ी! व्यां रै अंतस मांय आ बात छा जावै, क “आज़ इस्टाफ रूम मांयs, कोई नुवौ खिलकौ व्हेग्यौ व्हेला ? लौ चालौ बठै, कविता री च्यार लैण बणावां रौ मुद्दौ परो मिळी!” औ ख़याल दिमाग़ मायं आवतां ई, माड़साब तौ इस्टाफ रूम मांय बावड़ै!
इस्टाफ रूम मांय जाय नै, माड़साब कांई देखै ? बैंचा, कुर्सियां, कै इस्टूल की नी बच्या, व्यांरै बैठन्नै ? ज़रै माड़साब जाय नै बिराज़ग्या, बारी रै मांय! अबै बैठा-बैठा व्यांरै निगै में आवै, बोलौ-बोलौ बैठ्या सुपारी लालसा! जिका बिचारा मौन धारण कीधोड़ा, खूणा में पड़िया इस्टूल माथै बिराज़्या हा! व्यानै ई तरै बोलौ-बोलौ बैठा दैख नै, संत कुमारसा रौ जीव घणौ कळपण लागौ! वै समझ नी पा रिया हा, क अै सुपारी लालसा हरमेस री तरै कब्बूङा बण नै कलाकंद क्यूं नी अरोग रिया है ? छेवट मोसा बोलता, मास्टरां नै कैवण लागा क “भाई लोगों, औ थोरो गिरदीकोट भरती पांण बिचारा सुपारी लालसा रौ तौ ध्यान राखौ...!”
औ सुणतां ई, सगळा जणा खिल-खिल हंसण ढूका! अठै तौ किसोरी लालसा सूं बिणा बोल्यां असरीजै कोयनी, वै आंख्यां मटकावता-मटकावता कैवण ढूका क “सुपारी लालसा रौ कांई कैवणौ सा ? अै तौ मोटा जादूगर ठेरिया, अै चावै तौ कलाकंद नै उड़ा नै आपरै मुंडा मांय न्हाख सकै! ज्यूं आ स्यामली जादूगरनी आपरी आंख्यां नचाय नै, मिनखां नै नचाद्या करै! भळै वौ मिनख साधु हुवौ या सैतान ? किन्नी आदमी रौ वस, इन्नै आगै चालै कोयनी! अेक बात सुपारी लालसा नै समझा दूं, क इयांनै अबै बिसरयोड़ी बातां याद राखण री कोई ज़रूरत नहीं! अैङा वाकया कई लोगां रै साथै बीतता रैवै, पण इयांरै तरै कोई खूणा में बैठ नै रोवै कोयनी! अैङा किस्सा सारुं अठै रा गाम वाळा औ अखाणौ बोल्या करै, क मरदां रै कांई फ़रक पड़ै ? वै तौ बाड़ में, मूतता आया है! फ़रक तौ पङै, लुगाइयां रै! जिन्नै बारै में कोई हंगी-मूती बातां कर दे, तौ अै बिचारी किन्नेई मूंडौ दीखावण लायक नी रैवै!” जित्तै देव कुमारसा मस्करियां रा मीठा चुंठिया चमठावता, बिचै परा बोल्या क “इण वास्तै इज़ सुपारी लालसा रै माथै चोरी रौ आरोप लागौ, पण सच्चाई आ है क चोरी असल में हुई कोयनी! गाम वाळां बिचारा स्याणा ठेरिया, वै स्यामली री बदनामी कीकर हूवण देवता ? अरे सा, आ स्यामली तौ इणीज़ गाम री है! अर अै सुपारी लालसा है, दूजा गाम रा! इयांरै दुःख-दरद सूं, इण गाम वाळां नै कांई लेणौ-देणौ ? व्यांरी, अै क्यूं फ़िकर करी ?”
इत्ती बातां सुण्यां पछै भी, सुपारी लालसा बोलौ-बोलौ बैठ्या रैया! अैङौ लागै, क जाणै वै नी बोलण री कसम खाय लीवी व्है ? वै तौ अबै औ इज़ सोचता जा रिया है, क अै माता रा दीना बोलता व्हेला तौ बोलता व्हेला भींता नै! कादा रै मांय भाटा न्हाख्या सूं, छांटा तौ आपाणै माथै इज़ उछळेला! आ बात सोचता-सोचता व्यांनै भगवती प्रसाद रौ दूवौ याद आय जावै अर पछै वै इन्नै मनन करण लाग जावै क “धूड़ उङायाँ सर चढै, मतना अगरी घाल! नीचै माथै जग नवै, कीरत रोपै थाम!”
अबै संत कुमारसा बारी रै बारै झाँकण लागग्या है, “हर रर्र रर्” करतौ बैवतौ बायरौ व्यांरै बदन नै छूवण लागौ! औ ठंडौ-ठंडौ बायरौ व्यांरै हिवङा नै रिंझावण लागग्यौ, अबै अै आणंद री मनभावणी ठंडी-ठंडी ल्हेरां व्यांरा काव्य मूड नै की उकळण सारुं तैयार करै! हमार थोड़ी देर पैली, इस्कूल लारै मूत्तनै गिया हा...जठै अै टीला माथै अेक ढांडा री लोथ नौंचता, गिरझङा रौ झुण्ड दैख नै आया हा! वौ मंज़र, भळै याद आ जावै! दस पावंङा आघै ऊबा कुत्तङा, ऊचौ मूंडौ करिया ऊऽऽ ऊऽऽ री आवाज़ में किळियावता जावता हा! अर अबै आ कुत्तङों री किळियावण री आवाज़, व्यांरै कांना मांय गूंजण लागै! अबै औ पूरौ मंज़र, व्यांरी आंख्यां रै आगै छा जावै! पछै कांई ? पछै कांई ? इण अश्रु कवि री जीभ माथै, देवी सरस्वती आय नै बैठ जावै! पछै तौ अै भाईसा, झट इण मंज़र माथै, ऊचा सुर में गीत गावणौ चालू करै क “अै ऊचा गिरजङा बैठ्या, कुत्तङा रोवै रै! जद देखसी बादळिया री ओर, अै क्यूं बरसै रै! अै पाळ गुजरता कब्बूङा, दाणौ-वाणौ जोवै रै! ज्यांरौ पेट है गिरदीकोट, कियां भरवा रै!”
उणारै काव्य रस में खलल डालणौ, देव कुमारजी आपरौ परम कर्तव्य समझता आया है! हरमेस री तरै इयांरै काव्य रंग में विध्न डालण सारुं, वै संत कुमारजी री खिल्ली उडावता यूं कैवण लागा क “संत कुमारसा! मालक हमार तौ आप इज़ बारी रै मांय ऊचा बिराज़्या हो, आप सूं चोखौ दूजौ गिरजङौ कुण व्है सकै ?” पण संत कुमारसा मगन व्योङा गीत गावता रैया, व्यांनै कोई ‍मुतळब नहीं...कुण कांई बोलै ? वै तौ आपरौ गीत चालू राख्यौ! वै ऊचा सुर मांय इण तरै गावता रैया, क “अै कुण-कुण जीमास्या कब्बूङा नै, नी तौ कूकारोळ मचै! ज्यां नै लागौ लालकी रौ सवाद, कियां छूटै रै!”
माड़साब संत कुमारजी ठेरिया, पण्डतजी महाराज! जिण सूं राम प्रतापसा इयांरौ घणौ ख़याल राखै, हरमेस री तरै आज़ भी, इयांरौ हिस्सौ पैली सूं अलग धरद्यौ हौ! उण हिस्सा माथै, देव कुमारसा री नज़र पड़ जावै! संत कुमारजी नै काव्य रस मांय डूबोड़ा दैख नै, वै तौ फटकै सूं मारियो अेक झप्पाटौ! अर संत कुमारजी रै हिस्सा रौ कलाकंद उड़ाय नै, धर देवै आपरै मूंडा मांय! पछै वै सायंती सूं कैवण लागै, क “अठै तौ परसाद माथै, अै अेंठा-चूठा हाथ पड़िया व्हेला! पछै आ परसादी पंडत सा तौ ठोकता नहीं, वैसे भी अै डायबिटीज़ नैरी पाल राखी है! अबै औ सोच लौसा, क पंडत सा रै हाथै नहीं आयौ औ परसाद तौ की कोयनी सा! इण देव कुमार पंडित रै हाथै आइग्यौ, परसाद...आ अेक इज़ सखरी बात है, सा!” पण अठै तौ की असर नी पङियौ, संत कुमारजी री गायकी माथै! वै तौ बराबर गावता रैया, क “अै पाळ गुजरता कब्बूङा, दाणौ-वाणौ जोवै रै! ज्यांरौ पेट है गिरदीकोट, कियां भरवा रै!”
कलाकंद अरोगता मास्टरां नै, खावण रै सिवा किणी बात रौ ध्यान नहीं! गीत गावता-गावता संत कुमारजी नै, बारी रै बारै रौ नज़ारौ दैखण में आवै! अेक ढांडा री लोथ नै, गिरजङा रौ झुण्ड नौंच-नौंच नै खा रियौ है! आघौ बैठौ अेक बूढौ गिरजङौ, दयावणी नज़रां सूं आपरा साथियां नै निहारतौ जा रियौ है! बस, इणी तरै सुपारी लालसा भळै इण बूढ़ा गिरजङा री तरै कब्बूङा बण्योङा मास्टरां नै अजेतांई भाळता जा रिया है!
अबै संत कुमारजी बोलौ-बोलौ रेवता, कब्बूङा मास्टरां नै आपरै हिवङै मांय औ सुवाल करण लगा क “अै कब्बूङा, अबै फेरूं कदै पङेला ?”
[सन १९८१ – १९८२ में राजकीय माध्यमिक विद्यालय आसोप में स्वर्गीय शिव प्रतापजी छंगाणी [संस्कृत अध्यापक] अर स्वर्गीय दिवाकरजी [वरिष्ठ अध्यापक, अंग्रेजी] कार्यरत हा, अै दोणू जणा हंसोड़ फ़ितरत रा हा! इयांरा अेक-अेक लतीफ़ा सुणतां, इस्कूल माड़साब बिणा हंसिया नी रैय सकता! आज़ अै दोणू मुअज्ज़म इण ख़लकत में नहीं है, पण इयांरी यादां उण मास्टरां रै हिवङै में है! इण दोणू मुअज्ज़म नै, आ म्हारी कहानी समर्पित है! भगवान इण दोणां री आत्मा नै, सायंती प्रदान करै!]



2 comments:

  1. रमेश कुमार7 अप्रैल 2016 को 10:12 am

    कहानी लम्बी है...पर राजस्थानी नहीं जानने के कारण कुछ समझ नही आया..फिर भी साहित्य शिल्पी का अच्छा प्रयास कि स्थानीय भाषाओं को भी तरज़ीह दे रहे हैं....

    उत्तर देंहटाएं
  2. रमेशजी,
    आपके कथना के अनुसरण में, मारवाड़ी कहानी 'कब्बूड़ा' का हिंदी अनुवाद साहित्य शिल्पी को प्रेषित कर चुका हूं, मगर अभी तक वो हिंदी अनुवाद प्रकाशित नहीं हुआ है ! आप अभिषेखजी सागर से निवेदन करके उक्त हिंदी अनुवाद शीघ्र प्रकाशित करवाने का प्रयास करें ! यह कहानी "हास्यस्पद है, इसे पढ़ते-पढ़ते आप हंसते-हंसते लोट-पोट हो जाओगे ! इसके अलावा एक और हास्य कहानी भी भेजी गयी, जिसका शीर्षक है - "बोरटी रा कांटा" ! आप फ़िक्र नहीं करें, इस कहानी के साथ हिंदी अनुवाद भी, मैंने प्रेषित किया है ! बस आप अभिषेखजी से निवेदन करके, इन कहानियों को प्रकाशित करवाने का श्रम करें !
    दिनेश चन्द्र पुरोहित dineshchandrapurohit2@gmail.com

    उत्तर देंहटाएं

आपका स्नेह और प्रस्तुतियों पर आपकी समालोचनात्मक टिप्पणियाँ हमें बेहतर कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करती हैं.

पुस्तकालय

~~~ साहित्य शिल्पी का पुस्तकालय निरंतर समृद्ध हो रहा है। इन्हें आप हमारी साईट से सीधे डाउनलोड कर के पढ सकते हैं ~~~~~~~

डाउनलोड करने के लिए चित्र पर क्लिक करें...

आइये कारवां बनायें...

साहित्य शिल्पी, हिन्दी और साहित्य की सेवा का मंच, एक ऐसा अभियान.. जो न केवल स्थापित एवं नवीन रचनाकारों के बीच एक सेतु का कार्य करेगा अपितु अंतर्जाल पर हिन्दी के प्रयोग और प्रोत्साहन का एक अभिनव सोपान भी है, अपने सुधी पाठको के समक्ष कविता, कहानी, लघुकथा, नाटक, व्यंग्य, कार्टून, समालोचना तथा सामयिक विषयो पर परिचर्चाओं के साथ साहित्य शिल्पी समूह आपके समक्ष उपस्थित है। यदि राष्ट्रभाषा हिदी की प्रगति के लिए समर्पित इस अभियान में आप भी सहयोग देना चाहते हैं तो अपना परिचय, तस्वीर एवं कुछ रचनायें हमें निम्नलिखित ई-मेल पते पर प्रेषित करें।
sahityashilpi@gmail.com
आइये कारवां बनायें...

Followers

Google+ Followers

Get widget