Bachchan1



क़ैस जौनपुरीरचनाकार परिचय:-



उत्तर प्रदेश के जौनपुर कस्बे में जन्मे क़ैस जौनपुरी वर्तमान में मुम्बई में अवस्थित हैं। 

आप विभिन्न फिल्मों, टीवी धारावाहिकों आदि से बतौर संवाद और पटकथा लेखक जुड़े रहे हैं। आपने रॊक बैंड "फिरंगीज़" के लिए गीत भी लिखे हैं। इनके लिखे नाटक "स्वामी विवेकानंद" का कई थियेटरों में मंचन भी हो चुका है। 

अंतर्जाल पर सक्रिय कई पत्रिकाओं में आपकी कहानियाँ, कविताएं आदि प्रकाशित हैं।
यहाँ ज़मीन पर किसान
भूखे बच्चे की तरह
धरती मााँ की छाती
निचोड़-निचोड़ कर थक गया है
लेकिन धरती मााँ की
सूखी छातियों में दूध
उतर नहीं रहा
ज़मीन के कई हिस्सों में पानी बरस नहीं रहा

वहाँ ऊपर भगवान
किसी लापरवाह बाप की तरह
पाप और पुण्य की नई-नई धाराए
लिखने में व्यस्त है

कैसा लापरवाह बाप है
इसे अपने रोते बिलखते
बच्चे भी दिखाई नहीं देते
जो मशरूफ़ है दफ़ाएँ लिखने में
कि किसको कौन सी सज़ा देगा
मरने के बाद

पीछले बीस सालों में गिनती
तीन लाख़ हो चुकी है
अब तो आाँखें खोलो
और अपने बड़े बेटों से कुछ बोलो

जिनके हाथ ने तुमने घर की
ज़िम्मेदारी दे रखी है
जिन्होंने अपनी ज़िम्मेदाररयों से
अपनी आाँखें मूँद रखी हैं
पहले सज़ा दो
ज़िन्दा गुनहगारों को
मौत के बाद के लिए
बचा के रखो
अपने संस्कारी हथियारों को

बच्चे तो तुम्हारे ही हैं
तुमसे बचके कहाँ जाएगे
दिन भर अगर डर से भटके भी
तो शाम तक लौट आएँगें
फिर तुम भी ज़रा
तमीज़ से पेश आना
और बेरहम बाप मत कहलाना
और झूठ मूठ का रोब मत दिखाना
बच्चे तुमने अपनी ज़रूरत के लिए पैदा किए थे
बच्चों से पहले तुम्हें ज़मीन पे आना चाहिए था
ज़िन्दगी कैसे जीनी है
बताना चाहिए था

तुमने शुरुआत ही ग़लत कर दी
पहले कानून फिर इनसान बनाने चाहिए थे
तुमने पहले इनसान फिर कानून बनाया है
सच कहूँ दोस्त
तू यहीं लड़खड़ाया है

वरना सब कुछ तो ठीक था
बस कानून ही बनाना था
तो ये भी बना देते कि कोई पेड़ नहीं काटेगा
वरना उसकी भी गर्दन उड़ा दी जाएगी
पेड़ नहीं कटते
तो धरती मााँ की
छातियों का दूध
कभी नहीं सूखता
और तुम्हारा कोई भी बच्चा
सूखे और भूख की वजह से नहीं मरता

तुम्हारे बड़े बेटों ने घर में फेरबदल कर दी है
जिसका खामियाज़ा छोटों को भुगतना पड़ रहा है
छोटे भी बड़ों की गलतियाँ सुधारने में
नई गलतियाँ कर रहे हैं
और ज़िन्दगी जीने के
रोज़ नए-नए तरीक़े गढ़ रहे हैं

और तुम कैसे बाप हो
तुम्हारी आाँख के सामने ही
तुम्हारे बच्चे बिगड़ रहे हैं
और तुम्हें फ़र्क भी नहीं पड़ता
ये बच्चे तो तुम्हारे ही हैं
या तुम भी इन्हें कहीं से उठा के लाए थे

ज़बाब दो
चुप क्यों हो
देखो ऐसे चुप न रहो
तुम्हारी ख़ामोशी
किसी और तरफ़ इशारा करती है
इतनी सारी औलादें
नाज़ायज़ और हराम की नहीं हो सकतीं

तुम्हारे सिवा और कौन है
जो इनकी ज़िम्मेदारी लेगा
***

2 comments:

आपका स्नेह और प्रस्तुतियों पर आपकी समालोचनात्मक टिप्पणियाँ हमें बेहतर कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करती हैं.

पुस्तकालय

~~~ साहित्य शिल्पी का पुस्तकालय निरंतर समृद्ध हो रहा है। इन्हें आप हमारी साईट से सीधे डाउनलोड कर के पढ सकते हैं ~~~~~~~

डाउनलोड करने के लिए चित्र पर क्लिक करें...

आइये कारवां बनायें...

साहित्य शिल्पी, हिन्दी और साहित्य की सेवा का मंच, एक ऐसा अभियान.. जो न केवल स्थापित एवं नवीन रचनाकारों के बीच एक सेतु का कार्य करेगा अपितु अंतर्जाल पर हिन्दी के प्रयोग और प्रोत्साहन का एक अभिनव सोपान भी है, अपने सुधी पाठको के समक्ष कविता, कहानी, लघुकथा, नाटक, व्यंग्य, कार्टून, समालोचना तथा सामयिक विषयो पर परिचर्चाओं के साथ साहित्य शिल्पी समूह आपके समक्ष उपस्थित है। यदि राष्ट्रभाषा हिदी की प्रगति के लिए समर्पित इस अभियान में आप भी सहयोग देना चाहते हैं तो अपना परिचय, तस्वीर एवं कुछ रचनायें हमें निम्नलिखित ई-मेल पते पर प्रेषित करें।
sahityashilpi@gmail.com
आइये कारवां बनायें...

Followers

Google+ Followers

Get widget