साहित्य शिल्पीरचनाकार परिचय:-


संगीता पुरी का जन्म संगीता पुरी जी का जन्म 19 दिसम्‍बर 1963 को झारखंड के बोकारो जिला अंतर्गत ग्राम - पेटरवार में जन्‍म हुआ। रांची विश्‍वविद्यालय से अर्थशास्‍त्र में स्‍नातकोत्‍तर की डिग्री 1984 में ली। उसके बाद झुकाव अपने पिताजी श्री विद्या सागर महथा जी के द्वारा विकसित की गयी ज्‍योतिष की एक नई शाखा गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष की ओर हुआ, जिसके अध्‍ययन मनन में अपना जीवन समर्पित कर दिया। कंप्‍यूटर का प्रोग्रामिंग सीखा और गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष पर आधारित अपना साफ्टवेयर बनाने में सफलता प्राप्‍त की। सितम्‍बर 2007 से ही ज्‍योतिष पर आधारित अपने अनुभवों के साथ ब्‍लागिंग की दुनिया में । दुनिया को देखने का अपना नजरिया कभी कभी फुर्सत के क्षणों में कविताओं , कहानियों के रूप में पन्‍नों पर उतर जाता है। भारत सरकार के बाल विकास मंत्रालय की ओर से वर्ष 2016 की 100 सफलतम महिलाओं में शामिल।

`जन्म दिन मुबारक हो´ शायद मुबारकबाद देनेवाले को मेरे शरीर की किसी गतिविधि से मेरे जाग्रत होने का अहसास हुआ हो ,पर मेरी नींद तो मुबारकबाद सुनकर ही खुली थी। प्रत्युत्तर में ‘धन्यवाद’ तो कह गया था, पर मन हर बार की तरह प्रसन्न नहीं था। कहीं पढ़ा तो था कि कई प्रदेशों में जन्मदिन को दुखद माना जाता है , क्योंकि इस दिन लोगों को अपनी उम्र में से एक वर्ष खो देने का दुख रहता है । पर मेरे लिए वह जन्मदिन दुखद इसलिए था , क्योंकि मैं 27 वर्ष की उम्र पूरे कर चुका था और अब मैं किसी सरकारी नौकरी के लायक नहीं रह गया था । दिल में बंधी आशा चार-पॉच वर्षों से चरमराते हुए चूर-चूर हो गई थी । बचपन के सारे सपने धीरे-धीरे साथ छोड़ चुके थे ।

क्या उमंग और उत्साह के साथ पढ़ाई शुरु की थी मैने । `पढ़ोगे ,लिखोगे तो होगे नवाब खेलोगे कूदोगे तो होगे खराब ´ की गहरी छाप मन में पड़ी थी । तभी तो जब और बच्चे इधर-उधर धमाचौकड़ी मचा रहे होते , मैं पढ़ाई-लिखाई में व्यस्त रहा करता । यही कारण था कि बचपन से बारहवीं कक्षा तक मेरे सिवा कक्षा में प्रथम आने की बात कोई छात्र सोंच भी नहीं सका था । जान-पहचानवाले लोग और शिक्षक हमेशा मेरे उत्साह में वृद्धि करते । गणित और विज्ञान मेरे रोचक विषय थे । उलझे हुए सवालों को चुटकियों में हल करते देखकर शिक्षकों को मुझसे बड़ी उम्मीदें रहती । इतने बड़े गॉव में टॉपर रहनेवाले बेटे से मेरे पिताजी भी बहुत खुश रहा करते थे, उन्होने बिना किसी हिचकिचाहट के ग्रेज्युएशन के लिए मुझे शहर भेज दिया था। मैने काफी मेहनत की और ग्रेज्युएशन भी अच्छे नंबरों से उत्तीर्ण किया । परन्तु कई तरह की कोचिंग के बावजूद भी अपनी प्रतिभा के योग्य नौकरी न प्राप्त कर सका । छोटी मोटी नौकरी करने के लिए मै मजबूर नहीं था, इस कारण पढ़ाई समाप्त करने के बाद पिताजी के दवाब में मुझे गॉव वापस आना पड़ा । और चार-पॉच वर्षों तक कोशिश करने के बाद भी कोई नौकरी हाथ न आयी और इस तरह मैने जीवन में कभी नौकरी न पा सकने का एक पड़ाव और पार कर लिया था।

उम्मीदों के सहारे तो जीवन जीया जा सकता है ,पर जब उम्मीदें समाप्त हो तो जीने का कोई उद्येश्य नहीं रह जाता । धीरे-धीरे हर कार्य से मेरा जी उचटने लगा । जवान बेटे को निराश और हतोत्साह देख मेरी मॉ का दिल भर आया । जीवन में भटकाव आता देख पिताजी मेरे जीवन को सुधारने की कोशिश में लग गए । मुझे अपने खानदानी पेशे `पुरोहिताई´ को अपनाने की सलाह दी । हमारे खानदान में वेद-पुराणों के अध्ययन करने , जन्मकुण्डली बनाने , भविष्यवाणी करने, पूजा-पाठ करवाने तथा बुरे ग्रहों को शान्त करवाने का
पेशा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला आ रहा था । पिताजी ने आरम्भ में ही मेरे भाई को सारी शिक्षा प्रदान कर दी थी और वह इस कार्य को अच्छी तरह सम्भाल रहा था । मेरी कुशाग्र बुद्धि को देखते हुए उन्होने मुझे इस पेशे से दूर रखा था। विज्ञान के विद्यार्थी होने के कारण मुझे खुद भी इस विद्या में बिल्कुल रुचि नहीं थी । पर पिताजी के अनुरोध पर मैने कुछ `टाइम-पास´ के ख्याल से और कुछ अपने भाग्य `कहीं ग्रहों के कारण ही तो मेरी नौकरी नहीं हो सकी´ को जानने के ख्याल से आध्यामिक पुस्तकों का अध्ययन आरम्भ किया । सही मेहनत के बाद भी फल न मिले, तो दृष्टिकोण में अंधविश्वास का पुट आ ही जाता है ।

मेरे पिताजी पं अभयानन्द जोशी इस क्षेत्र के जाने-माने पण्डित थे । सिर्फ अपने गॉव में ही नहीं , अगल-बगल के गॉवों में भी वे धार्मिक सलाह देने और पूजा-पाठ करवाने के लिए मशहूर थे । उनके पास धार्मिक ग्रन्थो का अच्छा संग्रह भी था । मैने स्वयं कई लोगों के मुख से अपने पिताजी की प्रशंसा सुनी थी । आध्यात्मिकता के प्रति आकर्षण का चाहे जो भी कारण रहा हो , मै इसके अध्ययन में जुट गया । संस्कृत और गणित - दोनो ही विद्या में कुशाग्र होने के कारण मुझे कहीं भी पिताजी की मदद की जरुरत नहीं पड़ी । कुछ ही समय में पिताजी के स्व-निर्मित पुस्तकालय के मोटे-मोटे ग्रन्थो में बताए गए मूल तथ्यों की जानकारी मुझे हो गई । प्राचीन ऋषि-मुनियों के अध्ययन और ज्ञान पर मै अचिम्भत था । कई हजार वर्षों बाद उपस्थित होनेवाली समस्याओं पर भी उनका ध्यान केन्द्रित था । उनके समाधान के लिए भी उन्होने कुछ न कुछ उपाय बताए थे । यथा - किसी भी जलाशय से स्नान कर निकलते वक्त एक मुटृठी मिटृटी निकालकर तट पर पॉच पिण्ड बनाने का विधान , ताकि नदी की गहराई बनी रहे । उसमें तॉबे के सिक्कों को डालने का नियम , ताकि तॉबे के
आवेशित अणु जल में अपना प्रभाव डालते रहें , जो स्वास्थ्यवर्द्धक होते हैं। उसमें अस्थि-विसर्जन को भी धर्मिकता सो जोड़ा गया , ताकि जल में कैल्शियम और फॉस्फोरस की मात्रा बनी रहे और बाढ़ आने पर जमीन को प्रचुर खाद प्राप्त हो सके । पेड़-पौधों और जीव-जन्तुओं के संरक्षण के लिए भी उनलोगों जो नियम बनाए , वे उस समय के लिए काफी दूरदर्शी कदम माना जा सकता है । नारियों के महत्व को बढ़ाने के लिए कन्या-पूजन का विधान आदि। हॉ ,यह भी सही है कि उनके कुछ नियम और सिद्धान्त आज के दौर में खरे नहीं माने जा सकते थे।

खैर, मेरे वैज्ञानिक बुद्धि को चिन्तन के लिए अब काफी बातें मिल गई थी ।शीघ्र ही जन्म-कुण्डली-निर्माण और भविष्‍य कथन करने के सारे आयामों को भी मैने सीख लिया । किन्तु ग्रहों के आधार पर फलित की भविष्य वाणी करने के प्राचीन ग्रन्थो में बतायी गई तरीकों को मेरा वैज्ञानिक मस्तिष्क स्वीकार कर पाने में सक्षम न हो सका । विभिन्न ग्रहों की विभिन्न स्थितियों को संभावनावाद के नज़रिए से हमेशा ही गलत पाया । एक ऐसा योग ,जो 10 प्रतिशत या 25 प्रतिशत कुण्डलियों तक में हो सकता है , उसे राजयोग कहना भला कितना उचित है , इसी तरह 5/12 कुण्डलियों में मंगला या मंगली का योग इतना बुरा कैसे हो सकता है कि वह अपने पति या पत्नी की मृत्यु करवा दे । एक चन्द्रमा के नक्षत्र के आधार पर वर-कन्या के स्वभाव में इतनी समानता कैसे हो सकती है कि वे सारा जीवन किसी झंझट के बिना व्यतीत कर दें , यह सब मेरा वैज्ञानिक मस्तिष्‍क नहीं कबूल कर पा रहा था।

कर्म-काण्ड की बातें तो मुझे और भी अटपटी लगी । मंगलवार या शनिवार को शेविंग कैसे बुरा हो सकता है , बिल्ली के रास्ता काट देने से किसी की परीक्षा कैसे बुरी हो सकती है, यदि किसी ग्रह की बुरी दशा को मान भी लिया जाए तो उसे यज्ञ-जाप-पूजा-पाठ द्वारा कैसे दूर किया जा सकता है, ग्रन्थों को पढ़ते-पढ़ते मेरा दिमाग भन्ना गया । जिस वैदिककालीन विद्या के प्रति मन के किसी कोने में थोड़ी-बहुत आस्था बनी हुई थी ,वह चूर-चूर हो गई । तो क्या पिताजी इस झूठ-मूठ की विद्या से ही लोगों को बहला रहें हैं , किसी
जन्मकुण्डली में गड़बड़ी बतलाकर तथा उसे दूर करने के उपाय बतलाकर उनसे हजारो रुपए व्यर्थ ही झटकते आ रहें हैं, बुरे ग्रहों के निदान के रुप में उन्हें रत्न पहनने की सलाह देकर रत्न की दुकानवाले से कमीशन प्राप्त करते आ रहें हैं और मेरा भाई , वह पिताजी के नक्शेकदम पर अधिक तेज कदमों से चल रहा है । तभी तो , जब से भाई ने पुरोहिताई का काम सम्भाला है , हर दिन किसी न किसी गॉववाले के ग्रहों की शान्ति हेतु पूजा-पाठ चलती ही रहती है। पर मै , मै ऐसा कैसे कर सकता हूं । मै लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ नहीं कर सकता । मै लोगों को बतलाकर ही रहूंगा कि सत्य क्या है ??

मेरे मन में नए उसाह का संचार हुआ । शायद इसलिए मुझे कोई नौकरी नहीं मिली। प्रकृति ने शायद समाज के , राष्ट् के और विश्व के कल्याण के लिए मुझे जन्म दिया है । इसलिए न चाहते हुए भी मुझे वेद, पुराण जैसे प्राचीन ग्रंथों और ज्योतिष के बारे में जानकारी हुई है । अब मै लोगों को समझाऊंगा कि मनुष्य अपनी मेहनत की बदौलत सब कुछ हासिल कर सकता है । वह एवरेस्ट पर चढ़ चुका ,चॉद पर चढ़ चुका और अब मंगल की खबर ले रहा है । मैकनिकल और इलेक्ट्रिकल के पश्चात आज कम्प्यूटर के युग में प्रवेश कर चुका है । क्या यह किसी की जन्मकुण्डली में लिखा था ?? यदि लिखा होता तो आज भी पर्वत पहाड़ों की तराइयों वाले गॉवों में आदिवासी बच्चे बकरियों को नहीं चरा रहें होते ?? क्या उनका जन्म शहरी क्षेत्रों के बच्चों के जन्म के समय से अलग समय में होता है ??

मैने धीरे-धीरे लोगों को अपनी बातें समझानी शुरु कर दी । एक-दो कानों से होती मेरी बातें पिताजी तक भी पहुंची । उन्हें मेरा यह रास्ता बिल्कुल अच्छा नहीं लगा । उन्होनें समझाया , 'तुम पढ़-लिखकर भी बिल्कुल गधेवाला काम कर रहे हो । एक पण्डित के घर जन्म लेकर पण्डितों के ही दुश्मन बन बैठे हो ।´ उन्होने परिवार के इज्जत की, भाई के भविष्य की, ऊंच-नीच की ढेर बातें समझाई ,पर मेरे कानों में जूं तक न रेंगी । मै तो फैसला कर चुका था । मैं लोगों के विश्वास से अपना उल्लू सीधा नहीं कर सकता । मैं समाज को पतन के रास्ते पर जाने नहीं दे सकता । मैं एक ऐसा साम्राज्य स्थापित करुगा ,जहॉ अंधविश्वास का धूल, धुऑ या अंधकार नहीं होगा । वैज्ञानिक दृष्टिकोण की रोशनी होगी, संसार में अब नया सवेरा होगा, अपने विचारों को फैलाने के लिए एक मेरा गॉव ही नहीं है , दूसरे गॉव भी हैं ,दूसरे शहर भी हैं ,जहॉ मै घूम-घूमकर लोगों को वैज्ञानिक दृष्टि से सोंचने को कहूंगा । रातभर चिन्तन करने के बाद मै सुबह होने से पहले ही अपनी प्यारी मॉ को ,अपने प्यारे घर ,गॉव ,गॉववासियों को छोड़ चुका था ।

चलते-चलते एक गॉव से दूसरे गांव तथा तीसरे-चौथे गॉव तक पहुंचते हुए दोपहर हो गए थे । अब अपने गॉववासियों द्वारा मुझे ढूंढ़ लिए जाने का मुझे कोई खतरा नहीं रह गया था । पसीने से लथपथ शरीर को ताजगी देने के ख्याल से मैने नदी में डुबकी लगायी और एक नई राह पर चल पड़ा । नदी से निकलते ही एक युवक पर मेरी निगाह गई । उसने मुझसे मेरा परिचय मॉगा । मैने उसे अपनी पूरी कहानी साफ-साफ बता दी । सुनील नाम का वह युवक नदी के किनारे के ही एक गॉव का रहनेवाला था और इसी वर्ष ग्रेज्युएशन की परीक्षा देकर शहर से गॉव वापस आया था । उसके गॉव में प्रचलित पारंपरिक ,धार्मिक और ज्योतिषीय भ्रान्तियॉ दूर हो जाए , अंधविश्‍वास दूर हो जाएं , इसके लिए उसने मेरा साथ देने का वादा किया । वह मुझे लेकर अपने गॉव पहुंचा , वहॉ के प्रमुख लोगों से मेरा परिचय करवाया । लोगों ने मेरे लिए रहने और खाने की व्यवस्था की । मै गहन चिन्तन मनन में लग गया । शाम को लोग मुझे घेरकर बैठ जाया करते थें । मैं उन्हें प्राचीन कथाएं तथा ज्ञान और नीति की अच्छी-अच्छी बातें बताता , ताकि उन्हें मुझपर पूरा भरोसा हो जाए और उसके बाद मै उन्हें वैज्ञानिक दृष्टि युक्त सोंच दे सकूं । पर यह मेरा वहम था । मैने पाया कि जबतक मेरी बातें प्राचीन ग्रन्थों और पूजा-पाठ तक सीमित होती , मेरे प्रति लोगों की श्रद्धा बढ़ती जाती । पर ज्योंहि मै अपनी वैज्ञानिक दृष्टि संयुक्त विचारों को रखता , लोगों की भौंहे तन जाती । उनका व्यवहार मेरे प्रति बदलता जाता । कुछ लोग मुझे फटकार लगाते और कुछ
दया दिखलाते , मानो ज्ञान प्राप्ति के बाद मेरी दिमागी हालत कुछ कमजोर हो गई हो । अकेला सुनील मेरी मदद क्या करता ? शायद काफी छोटे गॉव और कम पढ़े-लिखे लोगों में अक्ल की कुछ कमी है , यह सोंच मुझे क्रमश: बड़े कस्बों और गॉवो तक ले गई पर हर जगह मुझे कोपभाजन बनना ही पड़ा । इस क्रम में मुझे `पागल बाबा´ की उपाधि भी मिली । कहीं-कहीं लोग मुझे धर्मविरोधी मानते हुए मारपीट पर भी उतर आते थे । अन्त में मैने एक बड़े शहर की ओर अपना रुख किया ।

मै जिस शहर में पहुंचा था ,उस तक आने के लिए मुझे काफी लम्बी यात्रा करनी पड़ी थी । इसलिए थकावट और भूख से मेरा बुरा हाल था । मेरे शरीर और व्यक्तित्व मेरी सही परिभाषा नहीं पेश कर पा रहें थे । मेरे बाल , दाढी और मूंछे बढ गई थी । कपड़े गन्दगी और बदबू से भरे पड़े थे । किन्तु अपने व्यक्तित्व से अधिक मुझे खुद के पेट की चिन्ता थी । कुछ दाने खाकर ही तो अपनी लक्ष्य प्राप्ति में आगे बढ़ सकता था । मैने दो-चार घरों में भिक्षा के लिए आवाज भी लगायी , पर कहीं से झिड़की के सिवा कुछ न मिला । `जवान हो ,हटठे-कटठे हो , कुछ काम भी तो कर सकते हो । भीख मॉगने में शर्म नहीं आती ।´ सुनकर आत्मविश्वास को ठेस लगी । गॉवों, कस्बों में तो लोग इज्जत से खाना खिला दिया करते थें ,पर यहॉ तो पेट भरने को कुछ करना ही पड़ेगा ।

मैं एक वृक्ष के नीचे बैठ गया । घर से विद्रोह कर निकल पड़ने का तथा माता-पिता के वचनों का पालन नहीं करने का खेद तो हुआ , पर मैं स्वार्थ के वशीभूत होकर ये सब नहीं कर रहा , मै तो एक बड़े लक्ष्य प्राप्ति के लिए यह सब कर रहा हूं ,यह सोंचकर मैने अपने आत्मविश्वास को पुन: बढ़ाया । `किसी बड़े घर के लगते हो बेटे ´,अपने चिन्तन में मग्न होने की वजह से बगल में सुस्ताते हुए एक बुजुर्ग को मैने नहीं देखा था । `आपने किस तरह अनुमान लगाया ´ मेरे स्वर में उत्सुकता थी । `तेरी इस अंगूठी से । सोने में जड़ी माणिक की अंगूठी हर कोई तो नहीं पहन सकता ।´ बुजूर्ग ने कहा । `अरे हॉ ,जब कई जगहों से नौकरी में मुझे असफलता हाथ लगी थी , तो पिताजी ने मुझे पहनाया था । कहा था `इसे पहन लोगे तो जल्द ही नौकरी हो जाएगी ´, पर माणिक पहनने से भला नौकरी होती है´ ,सोंचकर मैं हंस पड़ा । `लेकिन भूख से मरने से तो यह माणिक मुझे बचा ही सकता है´ बची सारी शक्ति समेटकर एक गहने के दुकान को ढूंढ़ पाने में मुझे अधिक वक्त नहीं लगा । मेरे पास इतनी कीमती वस्तु को देखकर दुकान के मालिक को सन्देह तो अवश्य हुआ ,पर उसे पूरे पैसे कहॉ देने थे कि छानबीन की जरुरत होती । दस हजार रुपए मुझे देकर उसने यह अंगूठी रख ली । इस वक्त दस हजार रुपए मेरे पास बड़ी रकम थी
। मैने होटल में भरपेट खाना खाया , सैलून में जाकर बाल और दाढ़ी बनवाए , दुकान में जाकर नए कपड़े खरीदें । सार्वजनिक शौचालय में जाकर स्नान किया , नए-नए कपड़े पहने और कंघी की । मेरा व्यक्तित्व पुन: निखर गया था और अब मै शहर में रह सकता था , पर ठौर-ठिकाना ढूंढ़ने के बाद ही । गॉवों और कस्बों में तो मेरे बरामदे में पडे़ रहने से किसी को आपत्ति न थी , पर शहर में बरामदे में क्या , किसी के घर के सामने भी शायद किसी लाचार को कोई जगह मिल पाए । मैने एक अखबार खरीदा , नौकरी के लिए निकली जगहों पर गया । एक जगह आश्वासन मिलने पर मैने किराए पर एक छोटा सा कमरा लिया । फिर कुछ ही दिनों में नौकरी ज्वाइन कर ली , जिसमें मुझ अकेले का गुजारा भी आराम से नहीं हो सकता था । पर सर छुपाने की जगह तो मिल ही गई थी ।

काफी दिनों तक मैने अपने भीतर के ज्ञान को भीतर ही रखने की कोशिश की , पर मेरा महत्वाकांक्षी मन मेरे ज्ञान को यूं अन्दर घुटता नहीं देख सकता था । समय मिलते ही वह बाहर निकलकर बड़े-बड़े नापने को उद्यत होने लगा । `यह तो शहर है , यहॉ पढ़े-लिखे लोग हैं । सब आकाश की उंचाई छूने को तत्पर । यहॉ अंधविश्वास को बिल्कुल जगह नहीं मिलेगी । लोग परंपरा से बंधकर भले ही नियमों का पालन कर रहें हों, पर मेरी बातें वे ध्यान से सुनेंगे । मेरे विचारों का लोगों पर अच्छा प्रभाव पड़ेगा । ´ यह सोंचकर मैने अपने वैदिक ज्ञान, ज्योतिषीय अनुभव और वैज्ञानिक दृष्टिकोण की पोटली धीरे-धीरे लोगों के समक्ष खोलनी शुरु कर दी । पर यह क्या ? लोग इस वैदिककालीन विद्या का मजाक बिल्कुल सहन नहीं कर सकते थे । वे ख्यातिप्राप्त प्राचीन ऋषियों मुनियों का मजाक उड़ता नहीं देख सकते थे , वैसे उनका मजाक मैं भी कैसे उडा सकता था ??पर फिर भी मुझे खरी-खोटी सुननी पड़ती रही , पर मैने धैर्य नहीं खोया । जब भी ,जहॉ भी समय मिलता , अपने वैज्ञानिक नज़रिए को लोगों के सम्मुख रखता । मेरे तर्क-वितर्क की शक्ति से जब लोग हारने लगते , तो `पागल बाबा´ के नाम से मेरा उपहास करते । मै समझ नहीं पा रहा था कि आज इक्कीसवीं सदी में भी लोग किस मानसिकता से ग्रस्त हैं । इतने बड़े शहर के बुद्धिजीवी वर्ग भी मेरे वैज्ञानिक दृष्टियुक्त बातों को नहीं पचा पा रहें थे । शहर में भी मैने कई मुहल्ले बदल दिए ,पर लोगों की ऑखों से अज्ञान के चश्में को उतार पाने में असमर्थ ही रहा ।

मैने पाया कि इस दुनिया में दो तरह के लोग हैं , जो उच्‍च मानसिक स्‍तर रखते हैं , उनमें समन्वयवादी दृष्टिकोण की कमी है , मन में बैठे पूर्वाग्रह के कारण वे पुरानी बातो को सुनने में रूचि ही नहीं लेते हैं , और जो कम पढे लिखे हैं , वे पूरे अंधभक्त हैं, जो वैज्ञानिक नज़रिए की कमी के कारण वे नई बातो को सुनने में रूचि ही नहीं लेते हैं । मेरा समन्‍वयवादी दृष्टिकोण धरा का धरा ही रह गया , धीरे-धीरे मेरी पहचान एक पागल बाबा के रुप में ही बन गई । दुनिया को बदल देने का मेरा सपना साकार नहीं होता दिखाई पड़ने लगा । वैज्ञानिक दृष्टियुक्त संसार की कल्पना मन में धुंधली पड़ती गई । मैं आत्मविश्वास खोता चला गया । इस कारण ऑफिस से भी निकाल दिया गया । अब शहर में मेरा ठौर-ठिकाना पुन: खत्म हो गया था । दो वर्षों बाद निराश मन से मैं अपने प्यारे गॉव की ओर चल पड़ा , जहॉ मेरे इन्तजार में मेरे पिताजी , मेरी माताजी , मेरा भाई और मेरे गॉववासी-सब खड़े होंगे , इसका मुझे विश्वास था ।

स्टेशन पर उतरते ही मुझे अपने मुहल्ले के कई लोग मिल गए । सब के चेहरे पर खुशियों की लहर दौड़ पड़ी । मैं उनके साथ तांगे पर बैठ गया । रास्ते-भर मैं अपने छोटे भाई की प्रशंसा सुनता जा रहा था । `तेरा भाई तो तेरे पिताजी से भी बड़ा पण्डित निकल गया । अपने यज्ञ-जाप से उसने कितनों को नौकरी दिलवायी , कितनों के सन्तान हुए , कितनों की शादी करवायी । आज ही मुखिया जी के लिए जाप शुरु हुआ है । एक सप्ताह तक चलनेवाले इस यज्ञ से अगला चुनाव मुखिया जी ही जीत सकेंगे । ´मैं निर्विकार भाव से उनकी बातें सुनता जा रहा था । यज्ञ-जाप की ध्वनि सुनाई पड़नी आरम्भ हो गई थी । ज्यों-ज्यों घर निकट आता जा रहा था , ध्वनि तेज होती जा रही थी , जो मेरे कानों से अन्दर जाकर दिमाग पर तेज चोट कर रही थी । सहसा तांगेवाले ने तांगा रोक दिया । मेरा घर आ चुका था । `देखो ,यह घर तुम्हारे भाई ने पिछले वर्ष बनवाया है।´ मैंने नज़रें उठायी । हमारी खाली जमीन पर बना तीन-मंजिला मकान मुझे मुंह चिढ़ा रहा था । जहॉ सही तर्क ने किसी को जीरो बना दिया था वहीं गलत कर्म ने किसी को हीरो बनाने में भी कोई कसर नहीं छोडी थी , शायद कलियुग में धर्म के क्षय की यही कल्पना वेदों में की गई है, अब पैसे लूटने वाले बाबा को बाबा और सच्‍चे बाबा को पागल सिद्ध किया जा सकता है , मेरी अन्तरात्मा से चीख-सी निकल पड़ी ,पर मैने अपने पर काबू पाते हुए इसे अन्दर ही रोक लिया । इस चीख को मुंह से बाहर लाकर मैं अपने गॉव में भी `पागल बाबा´ नहीं बनना चाहता था। मुझे अपने ज्ञान के प्रचारप्रसार के लिए किसी और रास्ते की तलाश करनी थी , चिंतन करना था।

2 comments:

  1. कहानी बहुत अच्छी लगी । जड़ों को खोद कर नयी ऊर्जा भरना असंभव नहीं तो आसान भी नहीं है ।

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  2. रमेश कुमार2 मई 2016 को 3:11 pm

    दिखावे पर मत जाओ अपनी अक्ल लगाओ...पर हमारा समाज ऐसा कहा कर पाता है

    उत्तर देंहटाएं

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