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 अनिरुद्ध सिंहरचनाकार परिचय:-



अनिरुद्ध सिंह
शिक्षक
22 उस्मान इन्क्लेव, अलीगंज, लखनऊ
मोबाइलः 92353 22962



‘शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009’ सरकार को देश के बच्चों को गुणात्मक शिक्षा प्रदान करने की ज़िम्मेदारियों से विमुख करता है!


भारतीय संविधान के 86वें संविधान संशोधन द्वारा देश के 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने के लिए संविधान में अनुच्छेद 21-ए के द्वारा इसे मौलिक अधिकार बना दिया गया। दुनियाँ भर में चिरस्थायी विकास के लिए 2030 तक ‘‘सभी के लिए समावेशी और गुणात्मक शिक्षा सुनिश्चित करने और आजीवन सीखने को बढ़ावा देने के लिए’’ चौथा लक्ष्य निर्धारित किया गया है। यदि भारत को शिक्षा में गुणात्मकता लानी है, तो उसे एक सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाना होगा, जो विकास के लिए आवश्यक है।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि देश की 67 प्रतिशत आज अभी गाँवों में निवास करती है। इसका मतलब यह है कि हमारे गाँव में अधिक संख्या में निवास करने वाले 6 से 14 वर्ष तक की आयु वाले बच्चों को गुणात्मक शिक्षा मिलनी चाहिए। आज सरकारों (केन्द्र और राज्यों) के सामने यह चुनौती है कि वे प्रत्येक बच्चे को न केवल निःशुल्क शिक्षा बल्कि सम्पूर्ण शिक्षा दें, व सभी विद्यार्थी ज्ञान व निपुणता प्राप्त करें जो कि निरन्तर विकास के लिए आवश्यक है, उनका जीवन यापन अच्छा हो, वे मानवीय अधिकारों का सम्मान करें, लिंग समानता हो, वे शांति व अहिंसा की संस्कृति में विश्वास रखें, वैश्विक नागरिकता हो और उनके मन में सांस्कृतिक व धार्मिक विविधिताओं के प्रति सम्मान हो। गुणात्मक शिक्षा को यही लक्ष्य प्राप्त करना है और तभी हम भारत के बच्चों का अच्छा भविष्य देख सकते हैं। यह आसान नहीं है।

मुफ़्त की किताबें, मुफ़्त की वर्दी, दोपहर का खाना व फीस में छूट ही ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करने वाले अभिभावकों को अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाने के लिए पर्याप्त नहीं है। सरकारी स्कूलों की खराब बुनियादी ढंाचे से लेकर, अयोग्य व अप्रशिक्षित शिक्षक और नौकरी पाने के अवसरों की कमी इत्यादि ऐसे कारण है जिसके कारण अभिभावक सरकारी स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाना नहीं चाहते। ग्रामीण क्षेत्रों में भी माता-पिता अपने बच्चों के अच्छे भविष्य के लिए उन्हें सरकारी स्कूलों में पढ़ाने की बजाय फीस देकर भी निजी असहायतित स्कूलों में पढ़ने के लिए भेजते हैं।

शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 को लागू करने के बाद से स्कूलों की मान्यता की कठोर शर्तों के कारण देश में बड़े पैमान पर निजी असहायतित गैर मान्यता प्राप्त स्कूल बंद हो चुकें हैं या बंद होने की कगार पर हैं। जबकि इस अधिनियम में स्कूल मान्यता के संबंध में निर्धारित बुनियादी ढांचों की शर्तों को पूरा न करने पर भी सरकारी व सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल चल रहें हैं।
‘शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009’ के अन्तर्गत निजी मान्यता प्राप्त असहायतित प्राइमरी स्कूलों को अपनी 25% सीटें कक्षा 1 से कक्षा 8 तक के गरीब बच्चों को मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने के लिए रिक्त रखने का प्राविधान किया गया है। यहाँ उल्लेखनीय है कि निजी स्कूलों की संख्या देश के कुल स्कूलों की केवल 15% है, जिसके कारण देश के केवल 4% गरीब बच्चे ही इन निजी असहायतित प्राइमरी स्कूलों में शिक्षा पाने के लिए प्रवेश पा सकेंगे। ग्रामीण क्षेत्रों में एक ही शिक्षक या एक ही कमरे मे चलने वाले सरकारी स्कूलों को बच्चों की अपर्याप्त संख्या के कारण बंद किया जा रहा है व इन बच्चों को किसी दूसरे बड़े सरकारी स्कूलों या निजी सहायता प्राप्त स्कूलों में दाखिला लेने के लिए कहा जा रहा है।

ऐसा लगता है कि ‘शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009’ न तो अपने देश की शैक्षिक आवश्यकताओं को पूरा करता है और न ही उन अभिभावकों की आशाओं पर ही खरा उतरता है जो अपने बच्चों के लिए एक बेहतर भविष्य चाहते हैं। यह अधिनियम सच्चाईयों से दूर है क्योंकि जब तक सरकारी ग्रामीण क्षेत्रों में, जहां देश की 67 प्रतिशत जनता निवास करती है, और अधिक सरकारी स्कूलों को नहीं स्थापित करती व पहले से चल रहे सरकारी स्कूलों को गुणवत्ता में सुधार लाती, तब तक देश को शिक्षित करने के उसके प्रयास कभी सफल नहीं हो सकते।
मानव संसाधन विकास मंत्रालय की प्रशंसा करनी होगी कि उसने सारे देश के नागरिकों से नई शिक्षा नीति के निर्धारण हेतु सुझाव मांगें। अब ग्राम पंचायत स्तर पर 2.5 लाख सभाएँ आयोजित की जा रही है, ब्लॉक स्तर पर 600 बैठक, जनपद स्तर पर 676 बैठक, राज्य स्तर पर 100 बैठक, राष्ट्रीय स्तर पर 12 बैठक आयोजित की जा रहीं हैं और राष्ट्रीय शिक्षा टास्क फोर्स नई शिक्षा नीति का एक ढांचा तैयार करने की आशा करती है। यह उम्मीद की जाती है कि मानव संसाधन मंत्रालय भारतीय लोगों की आशाओं को ध्यान में रखते हुए यह नीति बनायेगी क्योंकि उन्होंने एक ऐसी सरकार चुनी है जो भारत का भविष्य बदल सकती है।

सरकार को चाहिए वे जी.डी.पी. का 5 प्रतिशत शिक्षा पर व्यय करे। उसे ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों के बुनियादी ढाँचें को विकसित करने व सुधारने पर अपना ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। उसे स्कूल की इमारतों की मरम्मत व रख रखाव, फर्नीचर लगाने, बाथरुम टॉयलेट सुविधा, स्वच्छ पीने के जल, बिजली, लडकियों के हॉस्टल इत्यादि अन्य सुविधाओं को बच्चों की आवश्यकतानुसार खर्च करना चाहिये बजाए कि निजी सहायतारहित स्कूलों में पिछडे़ व गरीब बच्चों की फीस प्रतिपूर्ति के लिए कुछ धनराशि देने के। सन् 2015-2016 के बजट में केन्द्र सरकार पिछले वर्ष से 13 प्रतिशत अधिक धनराशि उच्च शिक्षा पर खर्च करने का उद्देश्य रखती है, स्कूली शिक्षा व पढ़ाई में 2014-2015 के मुकाबलें 9.79 प्रतिशत धनराशि में घटा है जो कि 4586 करोड रूपये होता है। ऐसा प्रतीत होता है कि निजी असहायतित स्कूलों को इस धनराशि के बराबर शिक्षा प्रदान करनी होगी।

वर्तमान केन्द्र सरकार को हमने आर्थिक विकास के वायदे पर चुना है, अतः उसे शिक्षा में जन निवेश बढ़ाने के लिए प्रयत्न करने चाहिए और यह तभी सम्भव है जबकि बेहतर वित्तीय नीतियाँ व आर्थिक विकास हो। सरकार को शिक्षकों की पढ़ाई व प्रशिक्षण पर खर्च करना चाहिए क्योंकि स्कूली शिक्षा की नींव यही हैं। दीर्घकालिक विकास के प्रयास के लिए प्राइमरी शिक्षा, स्वास्थ्य व पुष्टाहार सही होना चाहिये।

यदि सरकार शिक्षा अधिकार अधिनियम 2009 को सुधारने के लिए शीघ्र कदम नहीं उठाती है या इसे और अधिक व्यवहारिक और मजबूत ‘गुणात्मक शिक्षा का अधिकार अधिनियम’ से नहीं बदलती है जो उपयुक्त कानून द्वारा लागू किया जा सकता है, तो सरकार को वोट देने वालों की नाराज़गी झेलनी पडे़गी। सरकार भारत के बच्चों को गुणात्मक शिक्षा देने के अपने उत्तरदायित्व से विमुख नहीं हो सकती है। फिर व क्या करें। तो फिर क्या करें सरकार? शायद बेहतर यही होगा कि वह शिक्षा और सीखने की भिन्नता को समझे तो अच्छा होगा?



1 comments:

  1. रमेश कुमार11 जून 2016 को 10:24 am

    इस बारे मे और गहन विचार की जरूरत है...

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