दिनेश चन्द्र पुरोहित रचनाकार परिचय:-





लिखारे दिनेश चन्द्र पुरोहित
dineshchandrapurohit2@gmail.com

अँधेरी-गळी, आसोप री पोळ रै साम्ही, वीर-मोहल्ला, जोधपुर.[राजस्थान]
मारवाड़ी कहानी “हिंज़ड़ो कुण.. अै, कै वै..?” का हिंदी-अनुवाद
लेखक और अनुवादक -: दिनेश चन्द्र पुरोहित


अहमदाबाद-मेहसाना लोकल गाड़ी तेज़ रफ़्तार से पटरियों पर दौड़ रही थी, उस गाड़ी के शयनान डब्बे में रशीद भाई अपने मित्र सावंतजी और ठोकसिंगजी के साथ बैठे रोज़ की तरह पाली जाने की यात्रा कर रहे थे! इन मित्रों की गुफ़्तगू चल रही थी, उस दौरान रशीद अख़बार पढ़ते हुए कहने लगे “देखों भाईयों, ख़ुदा जाने कैसा ज़माना आ गया है..? आज़ इज्ज़तदार आदमी को आँखें नीची कर के इन असामाजिक-तत्वों के सामने से गुज़रना पड़ता है! क्या करें, जनाब..? किस गली या चौराये पर, अपनी नज़र रखें..? हर जगह, ये गुंडे-बदमाश खड़े मिलते हैं!”

“अरे भाई, खां साहब! इनके खिलाफ़ पुलिस कोई क़दम उठाती नहीं, इधर इन गुंडो का सीधा सम्बन्ध इन सत्ता-लोलुप्त नेताओं से बना रहता है! किस-किस आदमी के चरित्र का बखान करें..? सब के सब हमाम में नंगे हैं, बस अब तो रामसा पीर बचाएं, इन शातिरों से!” सावंतजी कह बैठे!

“अरे भाई साहब, क्या कहें..? आज़ घर की औरतें नौकरी पर क्या जाए बेचारी. इन औरतों की इज़्ज़त लूटने वाले ये काले और सफ़ेदपोश गुंडे हर दफ़्तर में मौज़ूद..! घर की बहू-बेटी जब तक सलामती से घर नहीं आ जाती..ख़ुदा रहम, ज़ब्हा पर फ़िक्र की रेखाएं छाई रहती है!” रशीद भाई, फिक्रमंद होकर कह बैठे!

“हाँ यार, रशीद भाई! इन इज़्ज़त लूटने वाले गुंडों का काला मुंह हो! इनके कारनामें सुनकर, मेरा मुंह का स्वाद कसेला हो जाता है, इधर मेरी आँखें भभकते अंगारों की तरह लाल-सुर्ख हो जाती है! गुस्सा इतना आता है, इन हरामज़ादों का क़त्ल कर बैठूं..मगर करूँ क्या...? ये सब असामाजिक-तत्व, इन राजनेताओं के आशीर्वाद से महफूज़ है! बस, कोई काण्ड हो जावो, हम कुछ कर नहीं पाते....बस पानी की मछली बन गए है, जो पानी नहीं मिलने से तड़फती हुई अपने प्राण छोड़ देती है!” सावंतजी कह उठे!

“कुछ भी बात आप बताना चाहो, तो आप खुलकर बोला करो..यह क्या है..भभकते अंगारे, बिना पानी की मछली..? अरे जनाब, मुहावरों से पेट नहीं भरा जाता...बात साफ़-साफ़ बताया करो! आख़िर, कहना क्या चाहते हैं, आप..?” ठोकसिंगजी बोले!

“बात आख़िर यह है, यार! पाली-शहर की सिन्धु नगर कोलोनी में एक सात साल की बालिका के साथ किसी हरामी ने बलात्कार करके, उसकी ज़िंदगी ख़राब कर दी! बस इसी घटना के तख़ालुफ़ में पूरी सिन्धी न्यात आन्दोलन पर आ खड़ी हुई, शहर की सारी दुकानें बंद करवा दी गयी! अब आप यह समझो, यह होती है न्यात की एकता!” रशीद भाई बोले!

“पुरानी बात का मंथन काहे करते जा रहे हो, रशीद भाई..? कुछ नवीनतम ख़बर रखा करो अपने इस बूढ़े दिमाग़ में! लो, सुनो! नयी ख़बर मैं बताता हू, आपको! पाली की महावीर नगर कोलोनी में एक शादी के मंडप में बाहर से आयी हुई एक ११ साल की बालिका को कोई कुकर्मी बहला-फुसलाकर जंगल में लेकर आ गया! वंहा उसे लिटाकर कुकर्म कर डाला, उसने!” ठोकसिंगजी बोले!

“फिर क्या हुआ, जनाब..?” रशीद भाई अपनी जिज्ञासा दिखलाते हुए कह बैठे!

“अरे जनाब, यह महावीर नगर वही है.. जहाँ पाली के धनाढ्य जैन रहा करते हैं! मैं जानता हूँ, अब यह दुष्कर्मी किसी हालत में बच नहीं सकता है! इसी समाज के सांसद जनाब गुमान मल लोढ़ा और विधान-सभा सदस्य सुश्री पुष्पा जैन दोनों इसके पीछे लग जायेंगे...अब, इसे छोड़ने वाले नहीं! इसके आगे, और क्या कहूं आपको..? ये धनाढ्य लोग पैसा पानी की तरह बहाते हुए, सभी राजनैतिक दबाव काम में ले लेंगे! यह है, न्यात की एकता! इस पाली शहर में न्यात की एकता देखनी है तो देखिये, इन जैनियों की, या फिर है इस मुस्लिम-समाज की एकता!” इतना कहकर, ठोकसिंगजी चुप हो गए! बस, ख़ुदा जाने वे आगे क्यों नहीं बोल पाए..?

“वाह, यार ठोकसिंगजी..चुप कैसे हो गए, बिल्ली की तरह..? अभी तो जनाब की बे-लगाम घोड़े की तरह ज़बान चल रही थी, अरे भाई मैं तो यहीं कहूँगा के आप भी फुठरमलसा की तरह भाष...भाषण..” आगे बेचारे रशीद भाई क्या बोले..? उनको इस केबीन में, न मालुम कौन आता हुआ दिख गया..? बस, ऐसा लगा मानो किसी ने यहाँ आकर ठोकसिंगसा के मुंह पर अलीगढ़ का ताला जड़ दिया हो..? उनको चुप पाकर रशीद भाई धीरे से कहने लगे “ठोकसिंगसा, मालिक आपको भी दीदार हो गए किसी के...वाह, जी वाह! जनाब की ज़बान, तालू पर चिपक गयी...?”

“क्या बोलूँ, रशीद भाई..? क्या, आपको आस-पास का नज़ारा दिखाई नहीं देता..? आपके मेहमान अज़ीज़ समधीजी जनाबे आली नाज़र-ए-आज़म “रशीदा जान” तशरीफ़ रख रहें हैं, तालियाँ बजाते हुए ...” बस इतना ही बोले, ठोकसिंगजी! आगे बोलने की जुरअत कर नहीं पाए, बेचारे! क्योंकि रशीदा जान काफ़ी नज़दीक आ चुका था, उन्होंने तो यही समझ लिया के यह रशीदा जान उनकी कही बात सुन चुका है! फिर क्या..? चुप-चाप बैठ गए मौनी बाबा की तरह!
ताली बजाता हुआ रशीदा जान उनके पास आकर खड़ा हो गया, और उनके गालों को सहलाते हुए कहने लगा “क्या बोल रहे थे, ठोकसिंगसा..? अब सुनो, मेरी बात! मैं मेहमान तो समधीजी रशीद भाई का बन जाऊंगा, मगर खर्चा करेंगे मेरे सेठ ठोकसिंगसा! क्या सेठ साहब, मंजूर है? काहे मुंह बना रहे हो जी, खर्च का नाम सुनकर..?” इतना कहकर रशीदा जान जाकर, रशीद भाई के पास जाकर बैठ गया! फिर उनका अख़बार दूर करता हुआ कह बैठा “समधीसा, मुंह मत छिपाओ जी! कहीं अख़बार में छपी ख़बरों को पढ़कर आपको शर्म आ रही है..?”

यह सुनते ही, रशीद भाई भोला मुंह बनाकर कहने लगे “यह बात नहीं हैं! मैं तो बस यही सोच रहा था, पहले लोग किस तरह औरतों की इज़्ज़त बचाने के लिए अपना सर कटा लिया करते थे..मगर आज़ ये लोग..” आगे कुछ नहीं बोलकर, निग़ाहें झुकाकर बैठ गए!

“अरे रशीद भाई, आप किन मर्दों की बात कर रहे हो...? ये आज़ के मर्द तो मर्द रहे ही नहीं, क्योंकि अपनी आँखों के सामने औरतों की इज़्ज़त लुटते देख रहे हैं और कुछ कर नहीं पाते! मैं तो इन लोगों को हिंज़ड़ा भी नहीं कह सकती..” बेचारा रशीदा जान इतना ही बोला था, और उसकी बात काटकर रशीद भाई बोल उठे “ऐसी क्या बात है, रशीदा बाई..? ऐसे लोगों को फिर हिंज़ड़ा ही कहेंगे, और क्या कहेंगे..?”

रशीद भाई की यह बात सुनते ही, रशीदा जान के चेहरे की रंगत बदलने लगी! फिर क्या..? वह भड़कते सांड की तरह, लाल-सुर्ख आँखें करके ताली बजा बैठा! उसकी ताली की आवाज़ सुनकर, पड़ोस के केबीन में खड़े किन्नर ने उसके जवाब में ताली बजा डाली! फिर वह ताली बजाता हुआ इधर इस केबीन में आता हुआ दिखायी देने लगा!

रशीदा जान के समीप आकर, उस हिंज़ड़े ने ताली बजाकर कहा “अरे उस्ताद, आप तो यहाँ बिराज़मान हैं..? हाय अल्लाह, मैंने आपको कहाँ-कहाँ नहीं ढूंढा...” कहते-कहते उसकी निग़ाह रशीद भाई पर जा गिरी, फिर ख़ुदा के फज़ल से न जाने यह क्या हो गया...? उस नाज़र ने घबराकर, निग़ाहें झुका दी! ऐसा लगने लगा, के अब तक चल रही कैंची की तरह उसकी ज़बान पर, अनायास अलीगढ का ताला जड़ दिया हो..?

अब नज़र गढ़ाकर, रशीद भाई उसका चेहरा अच्छी तरह से देखने लगे! उसका चेहरा कुछ जाना-पहचाना लगा, मगर गौर से देखने के बाद भी वे उसे पहचान नहीं सके! उन्हें इस तरह देखते पाकर, रशीदा जान मुस्करा कर उन्हें कहने लगा “रशीद भाई, क्या आपको हमारी सरदारी बाई पसंद आ गयी क्या..?” इतना कहकर रशीदा जान ठहाके लगाकर हंसने लगा! रशीदा जान की हंसी सुनकर, सरदारी बाई शर्मसार हो उठा! वह अपने दिल में सोचने लगा, के “अभी धरती-कंप हो जाय, तो वह झट उसमें समा जाय!” इधर किसी तरह अपनी हंसी दबाकर, रशीदा जान उससे कहने लगा “सरदारी बाई, नीचे क्यों देख रही हो..? नीचे लाल [बारुड़ी] चींटियां नहीं चल रही है, जो आपको काट जाएगी..? अब आप आगे चलो, बस, मैं आ ही रही हूँ! यहाँ तो हमारे समधीजी बैठे है, इनसे हम रुपये-पैसे लेंगे नहीं! इसलिए आप किसी दूसरे केबीन में जाकर कमाई करो, यहाँ कुछ मिलाने वाला नहीं!”

इतना सुनते ही, सरदारी बाई झट वहां से चला गया! उसके जाने के उपरान्त, रशीदा जान वापस ठहाके लगाकर हंसने लगा! हंसते-हंसते उसके पेट में दर्द होने लगा! आख़िर, पेट दबाकर उसने रशीद भाई से कहा “अरे समधीसा, अभी तक आपने इस सरदारी बाई को पहचाना नहीं..? जनाब, ज़रा अपने दिमाग़ पर ज़ोर देकर सोचिये...कहीं इसको आपने देखा हो..?” मगर, रशीद भाई झट दो किलो की घांटकी हिलाकर जतला दिया के “उसे कहीं नहीं देखा है!” अब रशीदा जान कहने लगा “आख़िर बता ही देती हूँ, के यह है कौन..? ये हैं आपके ससुरजी मज़ीद भाई के दोस्त, गुलाब खां साहब के ख़ास शागिर्द सुलतान खां है! ये आपके इलाक़े के नामी गुंडे रहे हैं, जिन्होंने मोहल्ले की कई बहू-बेटियों की इज़्ज़त लूटी है!” इतना सुनते ही, रशीद भाई मुंह में अंगुली डालकर कह बैठे “वाकई यह वही सुल्तानिया है, जिसने गुलाम खां साहब की बेटी नसीबा के साथ...” उनकी बात काटकर रशीदा जान बोला “जी हां, यह वही शैतान है! याद करो, एक दिन यह दुष्ट यतीमखाने के पीछे वाली सूनी गली में बेहोश पाया गया! पुलिस आयी वहां, और इसे ले जाकर अस्पताल में एडमिट करवाकर चली गयी! बाद में पुलिस ने बताया, के “इसको किसी ने, बधिया कर दिया है! अब यह आदमी नपुंशक हो चुका है!” अब बोलो, रशीद भाई..इस शैतान को यह सज़ा देने वाला है कौन..?”

बेचारे रशीद भाई कुछ समझ नहीं पा रहे थे, इस रहस्य का उज़ागर कैसे हुआ..? बस अब वे इतना ही बोल पाए, के “रशीदा बाई मुझे कुछ समझ में नहीं आया, अब, आप ही समझाएं!” रशीद भाई की बात सुनकर,रशीदा जान इस रहस्य को उज़ागर करता हुआ कहने लगा “उस पापी सुलतान खां को सज़ा देने वाला कौन है..? किसी मर्द ने उसको सज़ा नहीं दी है, उसको सज़ा देने वाला है, एक हिंज़ड़ा! वह है, रशीदा जान! तुम सब एक हिंज़ड़े से गए-बीते इंसान हो! मर्दानगी तुम लोगों में रही नहीं, तुम लोग क्या हिंज़ड़े की बराबरी करोगे..? जब उस पापी को सज़ा देनी थी, तब तुम सब बैठ गए चूड़ियाँ पहन कर अपने घर में! तुम लोगों की इन गुंडों से डरने की आदत के कारण ही, सरे-आम इन मज़लूम नारियों की मासूम की ज़िंदगी बरबाद हुई! आज़ तुम में से कोई एक ही उसका १तखालुफ़ करने की हिम्मत दिखाता, तो आज़ यह गुलाम खां साहब की बच्ची नसीबा उसका शिकार नहीं बनती!” इतना कहने के बाद, रशीदा जान अपने पर्स से एक चांदी की डिबिया निकाली, फिर उसमें से एक पान की गिलोरी निकालकर अपने मुंह में ठूंस दी! उसके बाद अपने एक-एक लब्ज़ पर ज़ोर देता हुआ उसने कहा “लीजिये, आपको पूरा किस्सा ही बयान कर दूँ..आख़िर हुआ क्या..? फिर, आपको हो जायेगी तसल्ली! सुनने के बाद आप ख़ुद कहोगे, के “आज़ के मर्द, हिंज़ड़े से गए बीते हैं! जो अपनी आँखों के सामने नारियों की इज़्ज़त लुटती हुई वे देख सकते हैं, मगर उनकी इज़्ज़त बचाने के लिए वे एक क़दम आगे नहीं बढ़ा पाते!” इतना कहने के बाद, रशीदा जान किस्सा बयान करने लगा! अब वह घटना, चल-चित्र की तरह सबकी आँखों के सामने छाने लगी!

माणक चौक के पास ही, पुराने रईस लोगों के मोहल्ले आये हुए हैं! जिसमें एक है, “लायकांन मोहल्ला”! इस मोहल्ले में इन पुराने रईसों की ऊँची-ऊँची हवेलियां नज़र आती है! देश की आज़ादी के बाद इन हवेलियों में रहने वाले रईस, राजकीय साहयता नहीं मिलने से धीरे-धीरे ग़रीब होते गए! कारण यह रहा, के “पुराने वक़्त राजा-महाराजों को संगीत और नाच-गाना देखने का बहुत शौक होता था, इस कारण उस दौरान इन्हें मदद मिला करती थी..! मगर देश की आज़ादी के बाद, इन राजा-महाराजों के पास सत्ता रही नहीं..इस कारण इन्हें आर्थिक-साहयता मिलनी बंद हो गयी!”

ये पुराने रईस अपने खर्चो पर लगाम लगा नहीं पाए, और रफ़्त:-रफ़्त: इनका संचित धन भी समाप्त हो गया! अब बेचारों को कहीं पैसों की आमद दिखायी नहीं दी, तब इन्होने कहीं नौकरी करना मंजूर कर लिया! मगर यह नौकरी कोई पेड़ पर लगे अनार तो है नहीं, जो जाकर तोड़कर खा लिए जाय..? उसके लिए भी जुगत लड़ानी, बहुत, जरूरी है! आख़िर, राजमहलों के रब्त को काम में लेकर किसी तरह इन्होंने....सरकारी या गैर-सरकारी दफ़्तर में, चपरासी या चौकीदार की नौकरी हासिल कर ली! इससे ऊँची पोस्ट इन लोगों को मिलने से रही, क्योंकि इन लोगों को तो केवल तबला-पेटी, सारंगी आदि की संगत करनी आती, या नाचना! इन सबका, दफ़्तर में क्या काम..? इस आधुनिक वक़्त में पैसों को पूछा जाता है, और पैसे कमाए जाते हैं..कल-कारख़ानों से! इन कल-कारख़ानों में काम करने के लिए तालीम चाहिए, मशीनों को चलाने की और साथ में चाहिए उनका तकनीकी इल्म! इस तुजुर्बे से मरहूम रहने से, इन लोगों की कोई क़दर नहीं रही इस युग में! इस तरह कम तनख्वाह से किसी तरह गुज़ारा करने के लिए ये बेचारे ये पुराने रईस मज़बूर हो गए...फिर वक़्त-वक़्त पर इन हवेलियों की मरम्मत कराने की हिम्मत जुटा नहीं पाए..! बगल में पुरानी धन-दौलत तो रही नहीं, जिसको ये लोग अपने पुराने नाच-गाने के शौक में ख़त्म कर चुके थे! इस कारण, इन हवेलियों को खँडहर होते देखना इनका नसीब बन गया!


इस मोहल्ले में, पुराने रईस गुलाम खां साहब रहते हैं! उनके वालिद उस्ताद अब्दुल अली साहब का निकाह, उस्ताद मुख्तार अब्बास साहब की नेक-दुख्तर नूरजहां के साथ हुआ था! मुख्तार साहब उस रजवाड़ा काल में किशनगढ़ महाराजा के दरबार में नामी ख्यातिप्राप्त तबलची थे! मुख्तार अब्बास साहब के ख़ास शागिर्द थे, लचका महाराज..! मुख्तार साहब ने, लचका महाराज और अपनी बेटी नूरजहां को साथ-साथ तालीम दी थी! इस वजह गुरु बहन होने के नाते, लचका महाराज ने नूरजहां के साथ धर्म-बहन का रिश्ता जोड़ लिया..! नूरजहां इस रिश्ते में बंधकर, वह हर साल राखी के त्यौंहार पर उन्हें राखी बांधा करती थी!

जवाहरखाने की हवेली में, इन किन्नर-मंडलियों को नाच-गाने की तालीम दी जाती थी! वहां लचका महाराज इन किन्नरों को नाच-गाने की तालीम दिया करते थे! इसी जवाहरखाने में, रशीदा जान इनसे नाच-गाने की तालीम लिया करता था! वह लचका महाराज को पिता-तुल्य माना करता, इसलिए कई बार वह इनके साथ इनकी गुरु-बहन नूरजहां से मिलने चला जाया करता! इस तरह इसने भी, नूरजहां के परिवार के साथ अपना रिश्ता जोड़ लिया! वह नूरजहां को अपनी मां, और उनके बेटे गुलाम खां साहब को अपना भाई बना लिया! इस तरह इस हवेली से रशीदा जान का रिश्ता हमेशा के लिए जुड़ गया!

कालांतर लचका महाराज श्रीजी शरण हो गए, मगर इस रशीदा जान ने इस हवेली के रिश्ते को बकरार रखा! जब कभी वह धंधे के लिए किन्नर-मंडली के साथ इस लायकांन मोहल्ले में आता, तब वह कभी भी गुलाम खां साहब की हवेली की तरफ़ नेग लेने हेतु अपने क़दम नहीं बढाता! क्योंकि उसके दिल में, लचका महाराज और नूरजहां के रिश्ते का बहुत सम्मान था...!

अब ये दोनों भाई-बहन इस ख़िलक़त में रहे नहीं, मगर वह इस रिश्ते को बराबर निभाता आ रहा है! इस लायकांन मोहल्ले में यह बात जग-चावी हो गयी, के “यह रशीदा जान गुलाम खां साहब की हवेली से गहरा रब्त है!” कई दफ़े इस मोहल्ले वाले कह दिया करते के “ओ रशीदा बाई, इतना ज़्यादा नेग मत मांगो, कुछ तो आप अपनी गुरु-बहन की हवेली का ख़्याल रखो!” बस इतनी सी गुज़ारिश करते ही वह झट नेग के रुपये कम कर देता..!


एक दिन का जिक्र है, हसन अली रंगरेज़ के पोते होने पर, रशीदा जान इसी मोहल्ले में नेग लेने के लिए मंडली के साथ आया! उनके घर के बाहर वह रंग जमाने लगा, कई मोहल्ले वाले और राहीगीर वहां तमाशबीन बनाकर वहां खड़े हो गए! अब रशीदा जान का शागिर्द मोत्या, जो बीस साल का युवक था...ज़ोर-ज़ोर से ढोलकी पर थाप देने लगा! उसकी थाप पर सभी किन्नर घूमर लेकर नाचने लगे! रशीदा जान नाचता भी जा रहा था और साथ में गीत गाता भी जा रहा था! उसके गीत के बोल थे “हमारे अंगने में तुम्हारा क्या काम है..!”

नाच-गाने से मची हुड़दंग की आवाज़ सुनकर, हसन अली रंगरेज़ की बीबी नुसरत बेग़म अपने पोते को गोदी में उठाये हुए बाहर आ गयी, उसके पीछे उसका पूरा परिवार इन किन्नरों का नाच देखने के लिए बाहर आ गया! नुसरत बेग़म और उनके पोते को देखते ही, रशीदा जान नाचता हुआ उनके पास जा पहुंचा! फिर बच्चे को गोद में उठाकर, उसकी बलैयां लेने लगा! नुसरत बेग़म ने झट कमर में खसोली हुई थैली से ५०० रुपये निकालकर, बच्चे के ऊपर वारे...फिर उसके हाथ में, थमा दिए! फिर बच्चे को वापस अपनी गोदी में उठाकर, नुसरत बेग़म कहने लगी “रशीदा बाई, आपको क्या मालुम..? आपकी गुरु-बहन के पोते का ब्याव हो गया है, ब्याव के वक़्त आप कहाँ थी..? आपको तो हमने, कहीं देखा नहीं..क्या आप, गुलाम भाईसाहब से नाराज़ हैं..? या आपको बुलाया नहीं, आपके गुलाम भाईसाहब ने..?” यह सुनते ही, रशीदा जान के दिल के एक कोने ख़ुशी हुई के “छोरे का घर मंड गया” मगर दूसरी तरफ़ उसे दख होने लगा के “इस ख़ुशी के मौक़े पर गुलाम खां साहब ने उसको याद क्यों नहीं किया..?” उसके दुःख की कोई सीमा नहीं रही, वह समझ नहीं पा रहा था..आख़िर, उसका भाई कूंकू-पत्री तो भेज सकता था..काहे नहीं भेजी..?” बस इस दर्द को लिए रशीदा जान के लिए बरदास्त करना मुश्किल हो गया! कैसे, वह अपने शिखिस्ता दिल को समझाएं..? जो सरल नहीं रहा, वह तो बस अब एक ही बात सोचने लगा के “अब तो वहां जाकर, खाली उलाहने देना ही बाकी रहा!” बस, फिर क्या..? झट अपनी मंडली के साथ, जा पहुंचा..गुलाम खां साहब की हवेली! हवेली में जाकर, इनकी मंडली सीधी चली गयी चौक में! चौक में पहुंचकर, सारे किन्नर तालियाँ पीटने लगे! तालियाँ पीटते हुए, रशीदा जान ज़ोर-ज़ोर से कहने लगा ”हाय हाय, छोरे को परणा दिया.. यह कोई मज़हाक नहीं! हाय हाय, हमको तो सगुन चाहिए, हाय हाय.. नेग लाओ, दो हज़ार रिपिया का नेग चाल रिया है..? अरे ओ भाभीजान, साड़ी-ब्लाउज़ ला दो! साथ में, मिठाई-विठाई लाना भूलना मत! धान तौ, थाणै को देना ही पड़ेगा! ओय ओय, यह कोई मज़हाक नहीं है!” उसके बोल सुनते ही, गुलाम खां साहब घबरा गए, झट अपने परिवार के साथ बाहर निकलकर चौक में आ गए! आकर रशीदा जान से कहने लगे “अरे मेरी बहन रशीदा तू तो जानती है, मेरी स्थिति! अभी-अभी बच्चे की शादी की है, हज़ारों रुपये ख़र्च हो चुके हैं इस शादी में! क़र्ज़ के नीचे दब चुका हूँ! अब ज़्यादा मांगकर, मेरी शान भिष्ट मत कर..तू तो..” आगे वे कहना चाहते थे, मगर रशीदा जान ने एक भी उनकी नहीं सुनी! बेचारे गुलाम खां साहब अपनी लाचारगी दीवारों को सुनाते रहे, मगर वह रशीदा जान टस से मस नहीं हुआ...वह तो दो हज़ार रुपये नेग के लेने के लिए अड़ गया!

यहाँ तो यह रशीदा जान हर त्यौंहार पर, इस मोहल्ले में आकर मोहल्ले वालों से नेग लिया करता है! चाहे वह मीठी-ईद हो, या बकर-ईद! उस वक़्त हमेशा की तरह, यह छोरा मोत्या इसके साथ रहता है! उस दौरान यह मोत्या, इसका साथ छोड़कर कहीं नहीं जाता!

कई सालों पहले इस मोहल्ले में एक हाफ-माइंड औरत ने आकर मोहल्ले की साळ में अपना बसेरा बना डाला! मोहल्ले के कई रहम-दिल इंसान उस औरत का ख़्याल रखते हुए, इसके खाने-पीने व वस्त्र आदि की ज़रूरत पूरी कर देते!

कुछ महीनों बाद, मोहल्ले में ख़बर फ़ैल गयी के “किसी निर्लज्ज आदमी ने अपनी हवस मिटाकर, इस बेचारी की ज़िंदगी मुश्की बना डाली! अब इस पागल औरत का पेट उभरकर ऊपर आ जाने से, मोहल्ले की औरतों को इसके गर्भवती होने की ख़बर हाथ लग गयी! बस, फिर क्या..? उस साळ से गुज़रते वक़्त ये औरते एक-दूसरे को सुनाती जाती के “वह कमबख्त कैसा निर्लज्ज इंसान था, जिसने इस औरत के साथ खोटे कर्म करके इसे गर्भवती बना डाला!” कोई औरत उस पागल औरत की सूरत देखती हुई, कह बैठती “हाय अल्लाह, वह कैसा गंदा बदबूदार इंसान रहा होगा, जो इस बदबू आती हुई इस औरत के साथ हम-बिस्तर हो गया..? मै तो यही कहूँगी, ख़ुदा की कसम वह सौ-फ़ीसदी सूअर से भी ज़्यादा बदबूदार होगा!” आख़िर किसी तरह, नौ महीने पूरे होने पर इस औरत ने एक ख़ूबसूरत लड़के को जन्म दिया! बच्चे के जन्म लेते ही वह पागल औरत उस बच्चे को बिलख़ता छोड़कर मर गयी, अब इसके पालन-पोषण की जिम्मेवारी कौन लेवें..? उल्टी यह हर्ज़ बुर्ज़, मोहल्ले वालो के सामने आकर खड़ी हो गयी!

बच्चे की ख़ूबसूरती का, इस मोहल्ले वालों को कोई लेना-देना नहीं! जिस बच्चे को “हराम का बच्चा” होने का खिताब मां के पेट में में ही मिल चुका था, अब उसकी ख़ूबसूरती का क्या मोल..? यतीम बच्चे को अपनाने का कलेज़ा रखने वाला इंसान ही रहम-दिल और बहादुर इंसान कहला सकता है! मगर यह हिम्मत, इस मोहल्ले के किसी इंसान में कैसे हो सकती है..? बस, यहाँ तो इन लोगों से सामजिक-सुधार मुद्दे पर बोलने को कह दिया जाय तो ये मुअज्ज़म बहुत बड़ा व्याख्यान दे जायेंगे! मगर ऐसे बच्चे को अपनाने के लिए, कोई आगे आया नहीं करता! सभी जानते हैं, के “अपनाने का अर्थ क्या होता है..?” अपनाने का अर्थ है, उस नाज़ायज़ बच्चे को अपना नाम देना..अपने खानदान का वारिस घोषित करना! वह इतना सरल नहीं, क्योंकि हर किसी की जुबान से कहे अवांछनीय जुमलों को सुनने की ताकत, हर किसी के जिस्म में नहीं! मोहल्ले के लोगों को कितना वक़्त लगता है, किसी इज़्ज़तदार आदमी की पगड़ी उछालने में..? बस मुंह में पड़ी लापा-लप करती हुई ज़बान को, बाहर निकालना और क्या..? जहां कहीं इन लोगों को हफ्वात करने का मसाला नज़र आया, और ये निक्कमें झट उसे बाहर निकालकर अपनी बहादुरी दिखा देंगे! फिर वे ही हंसी के ठहाके, कुटिल हांस्य-विनोद और क्या..? मगर यह ज़बान कभी किसी के आंसूं पोंछने के लिए बाहर नहीं निकलेगी, और न अल्लाह की इबादत करने के लिए! क्योंकि अल्लाहताला की इबादत करने से इनके घुटने घिस जाते हैं, चांदी चखनी पड़ती है..फिर ऐसा काम, जिससे इनके बदन को कोई तकलीफ़ होती हो.. ऐसा काम, ये लोग क्यों करेंगे..? जहां हफ्वात करने में क्या खर्च होता है..? बस खाली, लपा-लप करती हुई ज़बान को बाहर निकालना...जिससे इनका वक़्त भी आराम से कटे..?

इस वक़्त लचका महाराज जिंदा थे, और ये आजीवन कुवांरे रहे! इस किन्नर-मंडली को ही वे अपना परिवार मानते आये थे! जैसे ही उन्होंने इस बच्चे के बारे में सुना, सुनते ही उनके दिल में दया का सागर उमड़ पड़ा! वे झट उस मोहल्ले में जाकर, उस बच्चे को ले आये! और इस बच्चे को अपना बेटा घोषित कर दिया! अब वह बच्चा इस किन्नर-मंडली के हाथों पलने लगा! इस बच्चे को गोद लेने के थोड़े समय बाद, लचका महाराज चल बसे! अब यह किन्नर-मंडली ही उस बच्चे का परिवार थी, जिनकी देख-रेख में यह बच्चा बड़ा होने लगा! इन किन्नरों ने उस बालक को नाच-गाने में पारंगत कर दिया! रशीदा जान तो इस बच्चे को अपना बेटा मानने लग गया, वह इस बालक को ढोलक बजाने की तालीम देने लगा! कुछ समय बाद यह बच्चा उस्ताद रशीदा जान और उस्ताद लचका महाराज के सामान ढोलक बजाने में पारंगत हो गया! लचका महाराज ने इस बच्चे का नाम “मोती” रखा था, मगर यह किन्नर-मंडली इसे प्यार से “मोत्या” नाम से पुकारती रही!

अब इस वक़्त, यही मोत्या गुलाम खां साहब की हवेली में ढोलकी पर थाप दे रहा था, जिसकी थाप पर किन्नर मंडली नाच रही थी! अब रशीदा जान नाचते-नाचते गीत गाने लगा, गाने में उसका साथ सभी किन्नर देने लगे! रशीदा जान की मधुर आवाज़ में गीत के ये बोल सुनायी देने लगे “गुमाना हालीजी म्हारी मानौ मस्ताना हालीजी! रात अंधारी झुक रहीजी, कहां रे धरिया नाङा, जेवङा, हां रे हालीजी! कहां रे धरिया छै दांता-फ़ास, गुमाना हालीजी! म्हारी मानौ मस्ताना हालीजी, रात अंधारी आभा झुक रहीजी!!”

अब गुलाम खां की बरदास्त करने की हिम्मत ने ज़वाब दे दिया, दुखी होकर वे कहने लगे “मेरी बहन रशीदा, मुझे क्यों तंग कर रही है..? तेरे दिल की बात ज़ाहिर कर दे, इस तरह नाराज़ होकर यहाँ खेल मत कर, मेरी बहन! इस भाई पर, थोडा रहम खा!” अब रशीदा जान को गुलाम खां साहब की आवाज़ सुनायी दी, झट उसने नाच-गाना बंद कर सबको शांत रहने का इशारा किया! मोत्या ने ढोलकी पर थाप देनी बंद कर दी, सभी किन्नरों के नाच-गाने बंद हो गए! चारों तरफ़, शांतिपूर्ण वातावरण बन गया!

शान्ति छा जाने के बाद, गुलाम खां साहब कहने लगे “देख रशीदा, दो हज़ार बहुत ज़्यादा है! मेरी हैसियत तू अच्छी तरह जानती है, फिर तू मेरी हैसियत के अनुसार ही रुपये मांग!” रुपये कम हो या ज़्यादा..? इस बारे में सुनने की, रशीदा जान को आशा ही नहीं थी, यह तो एक भाई और बहन के रिश्ते से उलझा हुआ सवाल था..मगर यह कोदन इस बात को समझ ही नहीं रहा है..? मै इतने सालों से इस रिश्ते को निभाती आ रही हूँ, और यह नादान इस बात को समझ क्यों नहीं पा रहा है..? फिर, क्या..? उसका गुस्सा उबल पड़ा..और वह कटु लफ़्ज़ों में उनको सुना बैठा के “देखो गुलाम खां साहब, जितने रुपये हम अन्य लोगों से लेते हैं, उतने रुपये ही आपसे मांगे थे! अब रुपये कम करने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता!” इतना कहकर, रशीदा जान गुलाम खां साहब का चेहरा देखने लगा! उनका उतरा हुआ मुंह देखकर, रशीदा जान आगे सुनाने लगा के “लचका महाराज जब तक जीवित रहे थे, तब तक उन्होंने कभी इस हवेली की और नेग लेने के लिए क़दम नहीं बढाए..वे अम्मीजान को अपनी बहन मानते थे! यही कारण है, मैं भी इसी रिश्ते के कारण आपको भाई मानती आ रही हूँ! और, आज़ मैं रिश्ते को कैसे भूल गयी...? क्या गुलाम भाईजान, आप यही बात ज़ाहिर करना चाहते थे..?” इतना सुनकर, गुलाम खां साहब अपनी निग़ाहें झुकाकर कहने लगे “यह रिश्ता तो बहन रशीदा, तूझे निभाना चाहिए था!”

अब रिश्ता निभाने की बात आ गयी..? सुनते ही, रशीदा जान भड़कते सांड की तरह बोल उठा, के “आप अभी तक रिश्ता निभाते आ रहे हो, क्या..? मेरे भतीजे की शादी हो गयी, और मुझे बुलाया भी नहीं..? आज़ अम्मीजान होती, तो शादी में...मुझे बुलाना कभी नहीं भूलती! मगर आप ने तो हद कर दी, बुलाना तो दूर...हाय अल्लाह, कूंकूं-पत्री भी नहीं भेजी..? इसलिए, अब तो आपको भुगतना ही पड़ेगा!”

अब बेचारे गुलाम खां साहब बुरे फंसे, उनको कोई ज़वाब नहीं सूझ रहा..? फिर, क्या..? पिंड छुडाने के लिए कह दिया के “परसों आ जाना, उस दिन दुल्हन के पीहर वाले आयेंगे पग-फेरे की रस्म करने! उन लोगों से, रुपये दिला दूंगा!” सुनते ही रशीदा जान को बहुत बुरा लगा, उसे अभी भी समझ में नहीं आ रहा था के “यह क्यों नहीं समझ रहा है, मेरी बात..? यह इंसान धान खा रहा है, या घास..?” आख़िर, खीज़ता हुआ कहने लगा के “हम लोग दुल्हनिया के पीहर वालों से नेग के रुपये लेते नहीं, हमारे समाज के भी कुछ क़ायदे होते हैं! यह भी मत भूलो, गुलाम खां साहब..के आपके छोरे का निकाह हुआ है, ना कि दुल्हन के भाई का..!”

आख़िर, लाचारगी से गुलाम खां साहब कहने लगे के “बहन रशीदा, हमसे ग़लती हो गयी, अर अब मैं कसम खाकर कहता हूँ के अब कभी भी घर में अच्छा काम हो या बुरा तुम्हें बुलाना कभी नहीं भूलेंगे!” इतना कहकर गुलाम खां साहब ने रशीदा जान से मुआफ़ी मांग ली, फिर क्या ? झट उसने दुल्हन को अपने नज़दीक बुलाया, और उसकी खूब बलैयां ली! बाद में बोसा लेते हुए, खूब दुआएं दी और उसके हाथ में इक्यावन रुपये मुंह दिखायी के दिए! तभी पास खड़ी गुलाम खां साहब की जवान बेटी उसे दिखाई दी, उसे पास बुलाकर बोसा लेते हुए कहने लगा के “बाईसा, आपका नाम क्या है..?” वह शर्माती हुई कहने लगी, के “नसीबा...”

यह सुनते ही उसने दूसरा सवाल दाग दिया, के “आप कोलेज में पढ़ते हो, नसीबा बाईसा..?” उस शर्मीली युवती को कहां आशा थी, के कोई अगला सवाल पूछेगा..? बस झट चेहरे पर मुस्कान छोड़ती हुई, भागकर अपने कमरे में चली गयी!

इस वाकये को बीते, दो महीने हो गए! अब अगस्त का महिना आ गया, इन दिनों मानसून ज़ोरों पर था! सबाह-शाम या दोपहर, कभी भी बारिश हो जाती थी! एक दिन सबाह से बारिश की झड़ी लग गयी, रुकने का कोई नाम नहीं! सिंझ्या की वेला कुछ बरसात रुकी, तभी सायरी बाई नाम का किन्नर हड़बड़ाता हुआ हिज़ड़ो की हवेली में घुसा! आते ही उसने रशीदा जान से कहने लगा, के “रशीदा बाई..रशीदा बाई, कुछ सुना आपने...?”

“पहले आप आराम से बैठ जाओ, सायरी बाई! सांस ले लो, फिर तसल्ली से बात करना!” रशीदा जान २शीरी ज़बान में बोला!

शान्ति धारण करके आराम से सायरी बाई, घुटने से घुटना अड़ाकर राशीदा जान के पास बैठ गया...! जितने में मोत्या ठंडा पानी से भरा ग्लास ले आया, और अब पानी पीने के बाद सायरी बाई कहने लगा के “मैं गुलाम खां साहब के मोहल्ले से आ रही हूँ, वहां मैं यह सुनकर आयी हूँ के “आज़ दिन के उज़ाले में गुलाम खां साहब की छोरी नसीबा के साथ किसी दुष्ट आदमी ने गलत काम किया है!”

सायरी बाई की यह बात सुनते ही, मोत्या घबरा गया! वह धूज़ता-धूज़ता कहने लगा, के “दोपहर के ढाई बजे नसीबा को, यतीमखाने के पीछे वाली गली में घुसते देखा मैंने! उसके पीछे-पीछे दिलावर का भतीजा सुल्तानिया उस गली में घुस गया! मैं उस वक़्त अकेला था, क्या कर सकता था..?” यह सुनते ही, रशीदा जान का क्रोध आसमान को छूने लगा! झट उसने मोत्ये का गिरेबान पकड़कर, कहने लगा के “बता, और तूने क्या देखा..?” मोत्या घबराकर कहने लगा, के “कुछ नहीं, मैं तो उल्टे पाँव हवेली लौट आया!” अब ऐसी बात सुनते ही रशीदा जान के गुस्से का कोई पार नहीं, बस उसने तो एक झन्नाटे-दार थप्पड़ उसके ३रुख़सारों पर मारते हुए उसे कह बैठा के “अरे हिंज़ड़ा, तू तो सफ़ा-सफ़ कायर निकला..? जानता नहीं, गुलाम खां साहब की हवेली से हमारे किस तरह के रिश्ते हैं...? नसीबा हम सभी किन्नरों की भतीजी है, भूल गया तू..? अरे हितंगिया, उस सुल्तानिया के पीछे-पीछे बलता तो यह दुष्कर्म नहीं होता!” फिर सायरी बाई की तरफ मुंह करके कहने लगा के “गुलाम खां साहब समझदार है, मुझे भरोसा है...उन्होंने ज़रूर पुलिस-थाणे में सुल्तानिया के खिलाफ़ रिपोर्ट लिखा दी होगी! अब ज़रूर, यह सुल्तानिया मरेगा!”

“बीबी, मै यही बात आपको बताना ज़्यादा ज़रूरी समझती हूँ के “गुलाम खां साहब ने अभी-तक पुलिस-थाणे में रिपोर्ट नहीं लिखवाई है!” ग़मगीन होकर, सायरी बाई रुन्दती आवाज़ में बोला!

सायरी बाई की बात सुनते ही, रशीदा जान को बहुत रंज हुआ! झट मोत्या का हाथ पकड़कर जा पहुंचा गुलाम खां साहब की हवेली! वहां गुलाम खां साहब ग़मगीन हालत में, अपने परिवार के साथ हवेली के चौक में बैठे थे! उनके निकट ही, नसीबा घुटनों में मुंह डाली हुई रुदन करती हुई दिखायी दे रही थी! रशीदा जान नसीबा के पास आकर बैठ गया, और उसके सर सहलाते हुए सात्वना देने लगा! वह कहने लगा, के “नसीबा बेटी, सब ठीक हो जाएगा! तू तो बेटी यह बता, के यह पापी असल में सुल्तानिया ही था ना..?”

यह सुनते ही नसीबा झट हुँकारा भरती हुई, अपनी घांटकी हिला दी! मगर उसे वापस वही गुज़रा वाकया याद आते ही, वह वापस दहाड़े मारकर रोने लगी! किसी तरह रशीदा जान ने उसे समझा-बुझाकर शांत किया! उसके ४तिफ्लेअश्क को पोंछकर रशीदा जान गुलाम खां साहब से कहने लगी, के “भाईजान नसीबा को लेकर पुलिस-थाने चलो! सुल्तानिया के खिलाफ़ रिपोर्ट लिखाकर आ जाएँ, ज़रूरत पड़ी तो यह मोत्या सुल्तानिया के खिलाफ़ गवाही दे देगा!”

मगर, गुलाम खां साहब एक शब्द नहीं बोले! इस तरह उन्हें कायरों की तरह चुप-चाप बैठे देखकर, रशीदा जान का गुस्सा उबाल खाने लगा! गुलाम खां साहब बेचारे लाचार-मज़बूर इंसान की तरह अपने “शकिस्ता दिल” को समझा नहीं पा रहे थे, बस आँखों से तिफ्ले-अश्क गिराते हुए अपनी बेबसी ज़ाहिर करने लगे! थोड़ी देर बाद, रोते-रोते रुन्दते गले से कहने लगे के “देख रशीदा बहन, जो होना है वह हो गया..अब तो अल्लाहताला भी चाहे तो इस छोरी को पहले जैसा बना नहीं सकता..! फिर तू तो जानती है, इस सुल्तानिया को..? यह है, गुंडा नंबर एक! इसका हम लोग, कुछ नहीं बिगाड़ सकते! फिर, मेरी बहन तू क्यों मेरी जग-हंसाई कराना चाहती है अब, पुलिस-थाणे में रिपोर्ट लिखवाकर...?”

रशीदा जान काफी देर तक, गुलाम खां साहब को समझाता रहा, मगर कुछ फ़र्क नहीं पड़ा! फिर क्या..? गुलाम खां साहब तो टस से मस नहीं हुए, आख़िर पाँव पटकता हुआ रशीदा जान मोत्या का हाथ पकड़कर वापस चला गया! इस घटना को बीते, पांच दिन बीत गए! छठे दिन सिंझ्या की वेला, यतीमखाने की पीछे वाली गली में लोगों को सुल्तानिया बेहोश पड़ा दिखायी दिया! थोड़ी देर बाद, वहां पुलिस आयी तहकीकात करने! तहकीकात करके, पुलिस ने उस सुल्तानिया को अस्पताल में भर्ती करवा दिया!

अच्छी ख़बरें तो लोगों को अकसर मालुम होती नहीं, मगर ऐसी सनसनी-खेज़ ख़बरें जिसमें किसी आदमी की कमी, कमजोरी, या उसकी कोई बुराई उज़ागर होती हो....बहुत जल्दी फैलती है! इस कारण सुल्तानिया के बधिया होने की ख़बर इस इलाक़े में बहुत जल्दी फ़ैल गयी...के, किसी ने इस पापी को बधिया करके यतीमखाने की पिछली गली में फेंक आया! बस अब तो इस ख़बर चारों और फ़ैल गयी! इस तरह, इस पापी का दबदबा स्वत: ख़त्म हो गया! थोड़े दिन बाद, सुल्तानिया अस्पताल ले छुट्टी पाकर बाहर आ गया! अब लोगों ने, इस पापी को मज़हाक करने का साधन बना डाला! अब ये लोग उस पापी को उसके ख़ुद के सामने ही, हिंज़ड़ो..हिंज़ड़ो कहकर चिढाने लगे! इस तरह इस पापी की इतने सालों से जमाई गयी साख़, ख़ाक में मिल गयी! अब तो बात सफा-सफ़ उल्टी हो गयी, पहले लोग इस पापी से डरा करते थे..मगर, अब यह पापी इन लोगों से डरने लगा! फिर क्या..? यह सुल्तानिया जिधर भी निकलता, लोग इसके सामने ही इसको चिढ़ाने लिए कोई न कोई कोमेंट बोल देते! कोई कह देता के “यह देखिये जनाब, कल के केसरी सिंह नाहर और आज़ बन गए हैं सियार..? वाह क्या चाल है, इनकी..?” तभी पास बैठा कोई बकवादी बोल उठता, के “अरे जनाब, चल रहें हैं, हिंज़ड़े की तरह..वाह क्या चाल है, इनकी..?” जैसे ही ये जनाब निग़ाहें ऊपर उठाते, तभी कोई बोल देता के “भाईयों इससे दूर रहना, यह तो हिड़किया कुत्ता है...अभी काट खायेगा!” पास बैठने वाला तमाशबीन काहे चुप बैठता, वह झट अपनी चोंच खोल देता..कहता. के “अरे भाईजान यह हिड़किया कुत्ता नहीं है, यह तो है..खूबसूरत नाज़र, बुला देना इसे अपनी बेटे की शादी में..नाच-नाच कर आपका दिल खुश कर देगा..!” बेचारे सुल्तानिया को तब ज़्यादा दुःख होता, जब कोई उसका ख़ुद का शागिर्द या चमचा ताना मार देता...तब जनाब को ऐसा लगता, जैसे कोई उन पर ५घड़ों पानी डाल दिया हो..? फिर, क्या..? बेचारे मियाँ लाचारगी से, नीची निग़ाहें करके वहां से गुज़र जाते!

इस तरह मोहल्ले वाले रोज़ इसको चिढाते रहते, बेचारे की स्थिति बड़ी नाज़ुक हो गयी! अब बेचारा, किस व्यक्ति से बात करे...? यहाँ तो हर कोई उसकी मज़ाक उड़ाता जा रहा था, बच्चे, बूढ़े, जवान कोई इसको पसंद करता नहीं! अब उसकी स्थिति एक समाज से निष्कासित इंसान की तरह बन गयी, इस मोहल्ले में रहते हुए उसको अपना कोई हमदर्द दिखायी नहीं दे रहा था! आख़िर बधिया होने के चार रोज़ बाद, उसने हिंज़ड़ों की हवेली की तरफ अपने क़दम बढ़ा दिए! आख़िर यह सच्च है, कोई इंसान बिना समाज के ज़िंदा नहीं रह सकता! दूसरे दिन ही मोहल्ले में यह ख़बर फ़ैल गयी, के “सुल्तानियो असल ज़िंदगी में हिंज़डा बन गया है, और उसका गुरु बना है, रशीदा जान! अब सुल्तानिया, “सरदारी बाई” के नाम से पहचाना जाने लगा!”

गाड़ी पटरियों पर तेज़ रफ़्तार से दौड़ती दिखायी दी, जिसके शयनयान केबीन में बैठा रशीदा जान किस्सा ख़त्म करके अब लम्बी-लम्बी साँसे लेने लगा! थोड़ा विश्राम करने के बाद, रशीदा जान बोला के “समधीसा, यह बात आप अच्छी तरह से समझ लो...के, अब संवेदना और तख़ालुफ़ करने की करने की हिम्मत अब उन इंसानों में रही है, जिनको ख़ुदा ने आधा-अधूरा बनाकर ही इस ख़िलक़त में भेजा है! जो बेचारे अपना पेट भरने के लिए आप लोगों का मनोरंजन करने के लिए नाच-गाना करते आये हैं! सत्य बात यह है, के वास्तव में ये समाज के सम्मानित आदमी इन गुंडो और बदमाशों से डरते जा रहे हैं, अनजाने में इन असामाजिक-तत्वों को बढ़ावा देते आ रहे हैं! जिसका परिणाम बहुत बुरा होता है..इनके बढ़ावा देने से भुगतना पड़ता है, इनकी बहू-बेटियों को! अब बोलिये समधीसा, हिंज़ङे कौन है..ये, या वे..?”

इतना कहकर, रशीदा जान रुख़्सत हो गया! थोड़ी देर बाद, दूसरे कबीन में उसकी तालियाँ बजाने की आवाज़ सुनाई देने लगी! इस केबीन में, सन्नाटां छा गया! और इधर रशीद भाई, ठोकसिंगजी और सावंतजी, इस सवाल का जवाब सोचने के लिए मज़बूर हो गए.. के, “हिंज़ङे कौन..ये या वे..?”


कठिन शब्द -: [१] तख़ालुफ़ = विरोध जताना [२] शीरी ज़बान = मघुर आवाज़ [३] रुख़सार = गाल [४] तिफ़्लेअश्क = आंसूओं की झड़ी लगाना [५] घड़ों पानी डालना = इज़्ज़त की बख़िया उधेड़ना.

 


 इस  मारवाड़ी कहानी को उसी भाषा मे पने के लिए यहाँ चटखा लगाए






5 comments:

  1. संवेदना को स्पंदित करती है आपकी कहानी ।

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  2. संवेदना को स्पंदित करती है आपकी कहानी ।

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    1. सुशिलजी,
      बहुत बहुत धन्यवाद ! आज़कल मैं मारवाड़ी नाटक "कठै जावै रै, कडी खायोड़ा" का हिंदी-अनुवाद नियमित करता जा रहा हूं ! इस नाटक के कुल १५ खंड है ! पहला खंड "कहाँ जा रिया है, कड़ी खायोड़ा" का हिंदी अनुवाद अभी साहित्य शिल्पी में प्रकाशित हुआ है ! आप इस खंड को अवश्य पदें, और अपने विचार ज़रूर लिखें ! इसके बाद मैं दूसरा खंड "धामा-धपाड़ा" प्रेषित करने वाला हूं ! आशा है, आपका सहयोग मुझे बराबर मिलाता रहेगा !
      दिनेश चन्द्र पुरोहित dineshchandrapurohit2@gmail.com

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  3. रमेश कुमार11 जून 2016 को 10:33 am

    दिनेश जी..आपकी कहानी लम्बी होती है पर पढ कर मज़ा आ जाता है..

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    उत्तर
    1. रमेशजी,
      आपने मेरी कहानी को सराहा, बहुत बहुत धन्यवाद ! जनाब एक बात कहता हूं, वक़्त है, वक़्त काटना है..तब पाठ्य-सामग्री भी तो बड़ी हो तभी लम्बे समय तक लुत्फ़ लिया जा सकता है ! ज़िंदगी में रोना-धोना, वाद-विवाद देखते ही आयें है, मगर ख़ुशी कहाँ नज़र आयी ? इसलिए आप पढ़ते रहिये "हास्य कहानियां, हास्य नाटक वगैरा ! हर पल आपकी ज़िंदगी का, सुखद हो जाएगा.. हास्य को पढ़कर ! पढिये अभी पहला खंड "कठै जावै रै, कड़ी खायोड़ा" का "हिंदी-अनुवाद" ! उसके बाद में आपकी सेवा में हाज़िर है - "धामा-धपाड़ा" खंड दो ..!
      दिनेश चन्द्र पुरोहित dineshchandrapurohit2@gmail.com

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