‘वृद्धावस्था विमर्श’ : नए विषय पर एक रोचक कृति [पुस्तक समीक्षा] : डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा

21वीं सदी की दुनिया जिन चुनौतियों और समस्याओं का सामना कर रही है उनमें तेजी से बढ़ती हुई वृद्धों की जनसंख्या से उत्पन्न समस्या बड़ी तेजी से विकराल रूप धारण करती जा रही है. इस समस्या के दैहिक, मनोवैज्ञानिक, पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और मूल्य आधारित अनेक आयाम हैं. चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने अपनी पुस्तक ‘वृद्धावस्था विमर्श’ (2016) में इन तमाम आयामों पर सटीक और सोदाहरण चर्चा की है.


स्वर्गीय चंद्रमौलेश्वर प्रसाद (7 अप्रैल, 1942-12 सितंबर, 2011) व्यवसाय से बैंककर्मी थे और अभिरुचि से साहित्य सेवी. हिंदी और अंग्रेजी साहित्य के प्रति उनका गहरा रुझान था. उन्होंने विश्व साहित्य की अनेक कहानियों का अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद किया. वे सक्रिय ब्लॉग लेखक थे. विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित उनकी समीक्षाओं के साथ-साथ, हास्य-व्यंग्य, संस्मरण, पैरोडी, रेखाचित्र, आलोचना, पत्र, कविता, हाइकु आदि को पाठकों ने खूब सराहा. ‘वृद्धावस्था विमर्श’ पुस्तक के रूप में प्रकाशित उनकी पहली कृति है. यह वस्तुतः अस्तित्ववादी दार्शनिक सिमोन द बुआ की पुस्तक ‘ओल्ड एज’ का हिंदी में सार-संक्षेप है. भले ही यह पुस्तक छोटी है लेकिन शोधार्थियों एवं शोध निर्देशकों के लिए दिशासूचक का काम करेगी.


इस पुस्तक में वृद्धावस्था विमर्श की पीठिका का निर्माण करते हुए यह सही कहा गया है कि बुढ़ापे को एक नई दृष्टि से देखने की आवश्यकता है – एक ऐसी दृष्टि से जिसमें संवेदना हो और बूढ़ों के लिए आदर व सम्मान प्राप्त हो. जीवन देने की आकांक्षा हो. (पृ. 20). आगे जीवविज्ञान और नृवंशविज्ञान के संदर्भ में बूढ़े व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक स्थितियों पर चर्चा करते हुए प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक समाजों में उनकी दशा का तुलनात्मक आकलन किया गया है. इसमें संदेह नहीं कि आज “एकल परिवार, शहरीकरण, कम आय और घरों की कमी – कुछ ऐसे कारण हैं जिन्हें लेकर इंग्लैंड, अमेरिका, जापान, जर्मनी, कनाडा जैसे देश भी जूझ रहे हैं. चूँकि जापान और जर्मनी में अब भी बूढ़े माता-पिता के अपनी संतान के साथ रहने की प्रथा है, समस्या कुछ हद तक स्थिर है. परंतु जहाँ युवक गाँव या नगर छोड़कर शहर जा रहे हैं, परिस्थिति गंभीर बनी हुई है. ऐसे गाँव और नगर बूढ़ों से बहरे हुए हैं.” (पृ. 50).


‘वृद्धावस्था विमर्श’ बुढ़ापे के भ्रम और सच की परतों को खोलते हुए शारीरिक, मानसिक क्रियाशीलता पर इस उम्र के असर का भी आकलन करने वाली पुस्तक है. इसके अलावा दैनिक जीवन के क्रियाकलाप किस प्रकार दैहिक शक्ति के क्षीण होने पर बदल जाते हैं इस पर भी दृष्टांतों की सहायता से प्रकाश डाला गया है और याद दिलाया गया है कि तिरस्कृत, अभावग्रस्त, निर्वासित और निराश्रित जैसा जीवन बिताता हुआ वृद्ध भी मनुष्य ही है. यह परामर्श भी दिया गया है कि वृद्धावस्था में अपने को किसी उद्देश्य से संबंधित रखने, किसी कार्य में व्यस्त रखने और एक ध्येय की बढ़ते रहने की कामना से ही वृद्ध व्यक्ति का भविष्य प्रकाशमय हो सकता है. वरना वह किसी ऐसी बीमारी का शिकार हो सकता है जिससे उभर पाना कठिन हो और परिवार के लिए अत्यधिक चिंता का विषय हो. (पृ. 81).


इस पुस्तक की एक बड़ी विशेषता इसकी शैली में निहित है. वस्तुतः यह एक शास्त्रीय विषय पर लिखी गई शोधपूर्ण कृति है. परंतु रोचकता से परिपूर्ण है. इस रोचकता का रहस्य इसकी किस्सागोई शैली में निहित है जिसके तहत बड़ी-बड़ी बातों को रोचक दृष्टांतों के सहारे प्रतिपादित किया गया है. वाल्टेयर, छटोब्रांड, स्विफ्ट, कार्नेरो, फोंटेनेल, विक्टर ह्यूगो, लियोनार्डो द विंची, नीत्से, रिल्के, फ्रायड और ला मार्टिन जैसी विश्वविख्यात हस्तियों की वृद्धावस्था के घटनाचक्रों को किस्से की तरह बयान करने के कारण यह किताब पाठक को बाँध लेती है. पुस्तक के अंत में सिमोन द बुआ के हवाले से यह कहा गया है कि “अब यह सामाजिक संस्थाओं और राजनीतिज्ञों का काम है कि किस प्रकार वे समाज के इस हताश वर्ग के लिए काम करें और उन्हें जीवन के अंतिम दिनों में ढाढ़स बंधाएँ. क्या हमारे सामजसेवी और नेता इसके लिए तैयार हैं? यह एक यक्ष प्रश्न है!!!” (पृ. 95).


इस कृति का महत्व बताते हुए इसके संपादक डॉ. ऋषभदेव शर्मा ने सही ही लिखा है कि “आज हमारी चिंता का विषय विशाल वृद्ध जन समुदाय के जीवन को सुखमय बनाने से संबंधित है – चाहे वे पुरुष हों या स्त्री. यही कारण है कि वृद्धावस्था से जुड़े सेवामुक्ति से लेकर वृद्धाश्रम तक के, अथवा देह से लेकर आयु तक के क्षीण होने के, मुद्दे चिंतन और सृजन के विविध मंचों पर छाए हुए हैं. यदि यह कहा जाए कि आज का मनुष्य बुढ़ापे और मौत से कुछ ज्यादा ही आतंकित है तो भी शायद गलत न होगा.” (पृ. 11). निःसंदेह यह कृति इन सब मुद्दों पर वैज्ञानिक ढंग से विमर्श करती है.


समीक्षित कृति : वृद्धावस्था विमर्श

लेखक : चंद्रमौलेश्वर प्रसाद

संपादक : ऋषभदेव शर्मा

प्रकाशक : परिलेख प्रकाशन, वालिया मार्केट, निकट साहू जैन कॉलिज, कोतवाली मार्ग, नजीबाबाद – 246763, मोबाइल : 09897742814, 09838120022, ईमेल – parilekhprakashan@gmail.com

संस्करण : 2016

पृष्ठ : 96

मूल्य : ₹ 100

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पुस्तक समीक्षक : डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा

सह-संपादक ‘स्रवंति’

प्राध्यापक, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान

दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा

खैरताबाद, हैदराबाद – 500004

ईमेल – neerajagkonda@gmail.com


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