दिनेश चन्द्र पुरोहित रचनाकार परिचय:-





लिखारे दिनेश चन्द्र पुरोहित
dineshchandrapurohit2@gmail.com

अँधेरी-गळी, आसोप री पोळ रै साम्ही, वीर-मोहल्ला, जोधपुर.[राजस्थान]
मारवाड़ी कहानी “आख़ा ख़िलक़त में भांग न्हाख्योड़ी...?” का हिंदी-अनुवाद
लेखक और अनुवादक -: दिनेश चन्द्र पुरोहित


रशीद भाई पहले दफ़्तर जाते थे, तब उनका वक़्त आराम से कट जाता था! मगर अब सेवानिवृत हो जाने के बाद, वक़्त काटना उनके लिए एक भारी समस्या बन गयी! मगर, रशीद भाई ठहरे..मियां हारून के भाई ! झट उन्होंने जुगत लड़ा ली, और अच्छी ख़ासी वक़्त काटने की योजना बना डाली ! योजना काम में लेने के बाद, तो मियां पूरे दिन व्यस्त हो गए..अब तो अपना जनाब खाली वक़्त, आराम से काट लिया करते यार-दोस्तों के दफ़्तर में ! वहां वक़्त भी आराम से कट जाता, और ऊपर से लज़ीज़ नाश्ता भी उनको मिल जाता ! वह भी ...यार दोस्तों के, पैसों से ! अरे जनाब, क्या कहें..? मियां हफ़्तवात हांकते-हांकते, चुटकियों में यार-दोस्तों की प्रोब्लम्स [हर्ज मुर्ज] भी सोल कर दिया करते ! इस कारण इधर हर्ज मुर्ज निपटती, और उधर उनके यार-दोस्त खुश होकर उनकी मनपसंद कलाकंद की मिठाई व बामज़ मिरची बड़े शौक से मंगवा दिया करते ! इससे बेचारी उनकी खातूनेखान हो गयी, परेशान ! घर का खाना खाते नहीं, ऊपर से तोहमत अलग लगा देते अलग के “अरे शहज़ाद की अम्मी, क्या खाएं..? यहाँ तो तुम रोज़ बनाती हो पतली दाल, और लुकी रोटियां ! आज़कल, दाल-रोटी हलक़ से नीचे उतरती नहीं ! अब तुम बताओ, बेग़म ! आख़िर, क्या करूं...?” अरे जनाब, हमारे रशीद भाई इस ख़िलक़त के दहुम तालीफ़े कुबूल दबीर [मुंसी] ठहरे ! जिस दफ़्तर में मियां पहले काम किया करते थे, वहां के मुलाज़िम इन्हें “दबीर साहब” यानि “मुन्सीजी” कहकर बुलाते थे ! दफ़्तर के मुलाज़िमों की दफ़्तरी शरअी हर्ज मुर्ज निपटाते-निपटाते, ख़िताब पा गए जनाब, दबीर साहब का ! तब से इन्हें शौक हो गया, वे हर किसी मुलाज़िम की दफ़्तरी शरअी हर्ज मुर्ज में अपनी टांग फंसाने की !

इस तरह अब तो वे एक क़दम आगे बढ़ गए, अब तो जनाब अपने सगे-सम्बन्धियों से उनके दफ्तरों में जाकर मुलाक़ात करने लग गए ! अजी, क्या कहें..? ख़ुदा ने उनको शीरी ज़बान जो दे रखी थी, उसका फ़ायदा अगर मियां न उठाये..तो उनका जैसा कोई मूर्ख इस ख़िलक़त में नहीं होगा..? बस यही वजह है, वे अपनी शीरी ज़बान इस्तेमाल करते हुए उन लोगों के पास हफ़्तावत हांकने बैठ जाया करते, फिर चाय-वाय का लुत्फ़ उठाते हुए उनकी मुश्किलों को हल करने के लिए बिना मांगे मश्वरा दे दिया करते..अब ये सारी गतिविधियां, उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गयी !
मगर इस बन्दे के ऊपर, अल्लाह पाक की रहमत हमेशा रही है ! उनके बताये मश्वरों से, मग़मूम मुलाज़िमों के चेहरों पर मुस्कान छा जाती ! फिर क्या..? जिस दफ़्तर में जनाब जाते थे, वहां के मुलाज़िम इनके आरिफ़ बन जाते ! अस्तागफिरुल्लाह झूठ नहीं बोलूँगा, इनकी इसी सिफ़त के कारण ये अल्लाह के बन्दे इनकी मनुआर में बाज़ार से इनकी मनपसंद मिठाइयां व बामज़-नमकीन मंगवाकर, इनके लिए दस्तरख्वान सजा दिया करते !

एक दिन की बात है, ये भाईजान सबाह-सबाह मुंडेर पर चहलक़दमी कर रहे थे ! तभी ख़ातूने ख़ान की पुकार सुनाई दी, वह कह रही थी के “अरे, ओ शहज़ाद के अब्बा ! ज़रा नीचे उतरकर आइयो !” सुनकर रशीद मियां वहीँ से ज़ोर से कहने लगे “आ रिया हूँ, बेग़म !” इतना कहकर, वे सीढ़ियां उतरकर नीचे आ गए ! फिर, नाराज़गी के साथ बोले “क्या करती हो, बेग़म ...? डाक्टर साहब ने आंचे बोलने से मना किया था, फिर भी तुम आंचे बोलकर दमे की बीमारी को क्यों बढ़ाती जा रही हो ?

यह सुनना, उनकी बीबी हसीना बी को कहाँ पसंद..? फिर, क्या...? बेग़म बिफ़र पड़ी और आपे से बाहर होकर, ज़ोर-ज़ोर से दुल्हन को पुकारती हुई कहने लगी, के “अरी, ओ दुल्हन ! इधर आय के देखियो, तेरे ससुर को ! तेरे मामूजान के इन्तिकाल पे, सबाह नौ बजे क़ब्रिस्तान पहुंचे नहीं ! अब तो ये उनके रिहाईसगाह पे, ताज़ियत की बैठक में हाज़री भी देने नहीं जा रहे हैं ! अब हम सब, न्यात में भूंडे लगेंगे ! अरी दुल्हन, की सुण्या कै नहीं...?” अब रशीद भाई को कहाँ पसंद, के उनके भूलने की आदत को बहू बेग़म के सामने रख दे..? बेचारे डरे हुए धीमी आवाज़ में बेग़म से बोले के “क्या कर रही हो, बेग़म..? की तो ससुर की इज़्ज़त, दुल्हन के सामने रहने दो !”

इतने में बरतन गिरने की आवाज़ सुनायी देती है, बाद में दुल्हन की आवाज़ कानोँ में सुनायी देती है, के “बरतन धो रही हूँ, अम्मी ! मैंने कुछ सुण्या नहीं...ज़रा आंचे से बोल कर, कह दो !” इतना कहकर, दुल्हन वापस बरतन धोने लग जाती है ! आख़िर, अब शौहर के सिवाय कौन हसीना बी की बात सुनें..? यहाँ तो हर कोई, अपने-अपने काम में मशगूल है वहां बेचारा शौहर ही ऐसा प्राणी ठहरा, जो चुप-चाप अपनी बीबी की हर बात सुन लेता है ! आख़िर चौकी को सीधी रखकर हसीना बी उस पर बैठ गयी, फिर वह कहने लगी के “शहज़ाद के अब्बा, अब शान्ति से सुनो ! अजी, तुम क्या जानते हो..? कुछ पता नहीं रखते, कल शाम को रशीदा की सास लुगाइयों की बैठक में जाकर आयी थी ! वह कह रही थी, के “बैठक में बैठी औरतों ने, नीबंङे की तरह बाड़ी बोल कर उसका माथा दूका दिया ! वे लुगाइयां सबको सुना रही थी, के “मामू के एक ही इकलौती भाणजी है, उसके ससुराल से कोई नहीं आया!” आगे क्या कहूं, तुझको शहज़ाद की अम्मी..? उनकी तो, कतरनी की तरह ज़बान चल रही थी ! अब शहज़ाद की अम्मी तुम ही सोचो, अब ताज़ियत की बैठक में कोई नहीं गया तो न्यात में भूंडे लगोगे !” इतना कहकर, हसीना बी तो चुप हो गयी, मगर उन्होंने रशीद भाई के दिल में उथल-पुथल ज़रूर मचा दी ! उन्होंने तो पहले ही सोच रख था, के “आज़ इतवार की छुट्टी के दिन दीनजी भा’सा और सावंतजी को पब्लिक पार्क बुलाया है, ताकि वहां बैठकर हम सभी अपने सुख-दुःख की बातें करेंगे !” ये दोनों मुअज्ज़म इनके रिटायर होने के पहले इनके साथ, रेलगाड़ी से “पाली-जोधपुर” के बीच रोज़ का आना-जाना करते थे ! अभी कल ही उन्होंने फ़ोन करके, इन दोनों को वहां मिलने के लिए बुलाया था ! मगर अब लूणी जाने की, बीच में बाधा आ गयी ! फिर, क्या..? रशीद भाई को अपना इरादा बदलना पड़ा, और झट उठकर उन दोनों को फ़ोन कर डाला और समझा दिया, के “आज़ पब्लिक पार्क नहीं आ सकते, बाद में..फिर कभी मिलेंगे !” फ़ोन करने के बाद, रशीद भाई कहने लगे, के “अरे, ओ शहज़ाद की अम्मी ! अब मैं घुसलखाने में स्नान करने जा रहा हूँ ! वापस आऊँ तब-तक, चाय-नाश्ते की तैयारी कर लेना ! हसीना बी तो पहले से ही नाराज़ थी, इनका घर से बाहर दोस्तों के दफ़्तर में जाकर पेट-पूजा करना उन्हें कतई पसंद नहीं ! इसलिए हसीना बी कह बैठी “नाश्ता क्यों, शहज़ाद के अब्बा..? अब तो, खाना खाकर ही जाना !” मगर ऐसी अनचाही बात, रशीद भाई क्यों सुनन चाहेंगे..? उनका यहाँ खाना खाने का, कोई इरादा नहीं..उनके अनुसार, उनके लिए इस घर में बनता क्या..? इस नामाकूल डॉक्टर की सलाह पर, ख़ाली लूकी रोटियाँ और पतली दाल...और, क्या..? अब कुछ भी बना हो, घर में..मगर रशीद भाई की समझ में एक ही बात घर कर गयी के “यहां तो घर की मुर्गी, दाल बराबर ! ये तो रोज़ खाना ही है, बाहर तो कभी-कभी निकलते हैं..अब तो जीमेंगे तो यार-दोस्तों के यहाँ जीमेंगे माल-मसाला !” इतना सोचकर, वे बेग़म से कहने लगे, के “बेग़म, तुम तो मुझे ऐसा-वैसा, क्या खिला देती हो..? जिससे, मेरा पेट तो कुङ-बुङ करता रहता है ! अब तुम, क्यों तकल्लुफ़ करती हो ? लूणी में, हमारे कई यार-दोस्त है..कहीं जीम लेंगे, बस तुम फ़िकर मत किया करो...!” इतना कहकर रशीद भाई तो झट कपड़े लेकर, घुसलखाने में जा पहुंचे..फिर वहां टूटी खोलकर नहाने लग गये ! भले, पीछे उनकी बेग़म क्या बक-बक करती हो..? उससे इनको, कोई लेना-देना नहीं ! इधर बेग़म गुस्से से काफ़ूर होकर बक-बक करती रही, के “या ख़ुदा ! ख़ुद मियां जिद्दी हो, एक नम्बर के ! बनवाते ख़ुद, तीखी-मसालेदार सब्जियां ! तेल की तरी न देखते ही थाली छोड़कर, झट उठ जाते हो..!” रशीद भाई को क्या, मतलब..? उनकी बीबी पीछे से, क्या बोलती जा रही हो..चाहे बैठी-बैठी दीवारों को सुनाती रहे..! बस बेग़म साहिबा की आवाज़ दीवारों से टकराकर वापस लौटती जा रही थी, के “हाय अल्लाह ! अइसा खाविंद पान्ने पड़िया मेरे, अब क्या करूं...क्या नहीं करूं ?”s
इधर पड़ोसी ने दड़बे से मुर्गियां बाहर निकालकर, दड़बे की सफ़ाई करने बैठ गया....जिससे हवा में धूल और मुर्गियों के पंख उड़ने लगे ! अब यह खंक उड़ती हुई हसीना बी के नासा-छिद्रो में पहुंच गयी, फिर क्या..? बेचारी हसीना बी को, लगातार छींकें आने लगी ! एक तो हसीना बी ठहरी दमे की मरीज़, ऊपर से उनको झकड़ रखा था इस मौसमी बुखार ने ! खांसती-खांसती जाकर उन्होंने दरवाज़ा खोला, ताकि ताज़ी हवा खा सके ! मगर दरवाज़ा खोलते ही उन्हें, बाहर चबूतरे पर बैठी एक रोवणकाळी औरत के दीदार हो गए ! वह इन्हें देखते ही, ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी ! हसीना बी से नज़रें मिलते ही, वह उनके पांवो में गिर पड़ी ! हसीना बी के पाँव पकड़कर, वह रुदाली की तरह रोने लगी..ज़ोर-जोर, से ! बड़ी मुश्किल से अपने पाँव छुड़ाए, हसीना बी ने ! फिर रहम खाती हुई, उसके सर पर हाथ रखकर हसीना बी कहने लगी “बाई, अन्दर चल !” बरसाली में आते ही, वह अज़नबी औरत कुर्सी पकड़कर बैठ गयी ! और फिर, वह मुफ़लिस और महज़ून औरतों की तरह जार-जार रोने लगी ! हसीना बी पानी का ग्लास भर कर ले आई, फिर पानी पिलाकर उससे पूछा “बाई, तू क्यों रो रही है..?” अब हिचकिया खाती हुई कहने लगी, के “आपा, मैं बड़े घर की बेटी हूँ ! मेरा भाई नासिर अहमद भदवासिया अस्पताल के पास ही रहता है ! अभी दिल का दौरा पड़ने से, वह एम.जी.एच अस्पताल में भर्ती है ! मेरे पास उसके इलाज़ के लिए एक भी पैसा नहीं है, हाय अल्लाह अब क्या करूं..? डाक्टर साहब ने, क़रीब पांच हज़ार की दवाइयां लिखी है ! अब कहाँ से लाऊं, इतने सारे रुपये..? बिना दवाइयां वह मर गया, तो मैं किसी को मुंह दिखाने के लायक नहीं रहूंगी ! इससे अच्छा तो, मैं ख़ुद मर जाऊं !” इतना कहने के बाद, वह वापस रोने लगी ! उसको इस तरह से रोते देखकर, हसीना बी का दिल पसीज़ गया ! मगर, दूसरी तरफ़ यह चिंता भी होने लगी के “कहीं यह रोवणकाळी, रशीद भाई के रुख़्सत होने की वेला शगुन ख़राब नहीं कर दें..? इतना सोचकर हसीना बी कमर में खसोली हुई थैली निकालकर, यह सोचती हुई रुपये गिनने लगी के “देते वक़्त, रुपये तो कम तो नहीं पड़ेंगे..?” हसीना बी को रुपये गिनते देखकर, वह रोवणकाळी रोना-धोना बंद करके चुप-चाप बैठ गयी !

स्नान से निवृत होकर, रशीद भाई घुसलखाने से बाहर निकले ! बाहर आकर जा पहुंचे, साळ में ! वहां पहुंचकर, उन्होंने आळे से तेल लेकर अपने बालों में डाला ! फिर कंघा लेकर, बाल ओछते-ओछते कहने लगे के “अरी बेग़म, नाश्ता फटा-फट लगा दो, बस दो मिनट में आ रिया हूँ !” अपने शौहर का, इस तरह बोलने का तरीका...हसीना बी को काहे पसंद आये..? इसे देखकर, हसीना बी नाराज़ होकर कहने लगी “देखो शहज़ाद के अब्बा, एक बात कह देती हूँ...यहीं बैठकर, आराम से खाना खा लो ! ना तो फिर तुम अपने यार-दोस्तों के दफ़्तर में जाकर खाओगे, अल्लाह कसम कह देती हूँ..तुम भूंडे लगोगे ! लोग कहेंगे, के इसकी लुगाई घर पर पर रोटी घालती नहीं होगी..जो यह यह भूखमरा, ठौड़-ठौड़ खाता फिरता है !”

इतनी देर, अब वह रोवणकाळी.. कैसे, चुप-चाप बैठे..? वह गेलसफ़ी, उचकलट्टू की तरह उचकने लगी ! उसकी यह दशा देखकर, हसी बी आँखें तरेरकर उसे कह बैठी “अरी, गेलसफ़ी फूटी झालर ! चुप-चाप बैठी रह, इनके रुख़्सत होने के बाद दूँगी तूझे ! तू अभी वहीं बैठी रह, बरसाळी में !” इतना कहकर हसीना बी उठी, और जाकर थाली में नाश्ता ले आयी ! चौकी पर थाली रखकर, पास में आसन बिछा दिया ! फिर रशीद भाई से बोली “आ जाओ, शहज़ाद के अब्बा! दस्तरख्वान लगा दिया है !” अब बुशर्ट और पतलून पहनकर, रशीद भाई ने अपनी लूंगी करीने से समेटकर मेज़ पर रख दी ! फिर, तल्ख़ आवाज़ में कह बैठे “आ रहा हूँ, उतावली काहे करती हो..? मैं जानता नहीं, मेरे रुख़्सत होने के बाद तुम यहीं बैठी-बैठी हफ़्वात करने बैठ जाओगी..!” फिर बरसाली में बैठी उस रोवणकाळी औरत पर जैरीली निग़ाह डालते हुए, अपने दिल में बेग़म के प्रति ऐसा सोच बैठे के “मेरे जाने के बाद, यह मेरी फातमा बेग़म ज़रूर इस औरत से हफ्वात करने बैठ जायेगी..? फिर, क्या..? कुछ नहीं बोलकर, चुप-चाप जाकर बैठ गए आसन पर ! फिर दोनों हथेली आगे करके बुदबुदाने लगे “बिस्मिल्लाहि रहमान रहीम..!” इतना बुदबुदाकर, नाश्ता करने लगे ! जैसे ही वे नाश्ता करके वे उठे, दीवार घड़ी टन-टन की आवाज़ निकालने लगी ! सबाह के नौ बज चुके, झट रशीद भाई वासबेसीन के पास जाकर अपने हाथ धोकर कुल्ले किये ! फिर तणी पर लटकते अंगौछे को उतारकर हाथ-मुंह पौंछे ! फिर उसे उसे वापस तणी पर लटकाते हुए, हसीना बी से कहने लगे “अरी, बेग़म ! बरसाळी में किस मोहतरमा को लाकर, बिठा दिया तुमने...? पहचान नहीं पा रहा हूँ इसे, कौन है यह..?” पुलिस की तरह, इनका इस तरह तहकीकात करना..बेग़म को, कहाँ पसंद...? रशीद भाई की बात सुनकर, आँख-भौं चढ़ाती हुई बेग़म बोली “तुम्हारे देर नहीं हो रही है, क्या..? क्यों लुगाइयों की बातों में अपनी टांग अङा रहे हो, मियां..?” अब तो बेचारे रशीद भाई की, ख़ैर समझो ! वह सोचने लगे “कहीं इस बेग़म ने, बकते-बकते उन्हें “बाईरोंडिया” का ख़िताब दे दिया...तो, ख़ुदा कसम, इस पराई औरत के सामने इज़्ज़त खराब हो जायेगी..?” फिर, क्या..? झट गांखड़े पर रखा बेग उठाया, और चल दिए बरसाळी में! वहां रखे जूत्ते पांवो में डालकर हसीना बी को सुनाते हुए कहते रहे “जा रिया हूँ, लारे से बोलकर शगुन ख़राब मती करना !” रशीद भाई को जाते हुए देखकर, हसीना बी उन्हें वापस याद दिलाते हुए कह बैठी “अरे, शहज़ाद के अब्बा ! ज़रा ध्यान रखियो, सीधे दुल्हन के ननिहाल जाना ! इधर-उधर, किसी के दफ़्तर में भटका मती मारना ! मुझे इतनी गेलसफ़ी मती समझना, मैं सब ध्यान रखती हूँ..के तुम किधर गए, या किधर नहीं गए..!” यहाँ बेग़म की बात, कौन सुने..? अपने मतलब की बात ही सुनना, रशीद भाई की फ़ितरत रही ! वे तो बस, तेज़ क़दम बढ़ाते हुए जा पहुंचे...भदवासिया रेल्वे फाटक के पास, जहां सामने सड़क पर खड़ी थी सिटी-बस ! फाटक पार करके झट चढ़ गए, सिटी-बस के अन्दर ! थोड़ी देर बाद, सिटी-बस रवाना गयी ! कुछ मिनटों में ही, वह सिटी-बस जा पहुंची रेल्वे स्टेशन! सिटी-बस से उतरते ही उन्हें उदघोषक की घोषणा कानोँ में सुनायी दी, वह कह रहा था “मालानी एक्सप्रेस शीघ्र ही प्लेटफ़ॉर्म छोड़ने जा रही है...” इसके आगे, रशीद भाई क्यों सुनें..? उनके दिल में मचने लगी, हलबली..के, “कितनी जल्दी उतरीय-पुल की सीढ़ियाँ चढ़कर प्लेटफ़ॉर्म संख्या दो पर जा पहंचू...! बस तो कैसे ही, झट मालानी एक्सप्रेस में चढ़ जायें..तो अच्छा होगा, नहीं तो अब इस बुढ़ापा में चलती गाड़ी में चढ़ना मौत को बुलाना है ! फिर दुल्हन के मामू की ताज़ियत की बैठक में जाना तो दूर, मेरे ख़ुद की ताज़ियत की बैठक भदवासिया फाटक के पास हो जायेगी !” बस, फिर क्या...? इतना सोचकर रशीद भाई ने अपने क़दमों को रफ़्तार दी, फ़टाफ़ट पुलिया चढ़कर उतर गये प्लेटफ़ॉर्म संख्या दो पर ! उतरते ही, गाड़ी के अंजन ने सीटी मार दी ! सीटी की आवाज़ सुनकर, बेचारे रशीद भाई की हालत पतली हो गयी ! इस बुढ़ापे में, दौड़कर अब गाङी पकड़ना उनके लिए सहज नहीं रहा ! अचानक उन्हें देखकर, एक हरार्फ़ किन्नर, जिसका नाम था रशीदा जान...लपक पड़ा उनकी तरफ़ ! फिर जनाब का रास्ता रोक कर, उनके सामने आकर खड़ा हो गया ! और उनकी बलाइयां लेता हुआ कहने लगा, के “खम्मा घणी समधीसा, कहाँ पधार रहे हो..? आज़कल आप और आपके दोस्त जनाबे आली फुठर मलसा, गाड़ी में दिखायी क्यों नहीं दे रहे हैं...? कहीं जनाबे आली फुठर मलसा की तबीयत, नासाज़ तो नहीं है..?” जब रशीद भाई जोधपुर-पाली के बीच रोज़ का आना-जाना करते थे, तब वे इस रशीदा जान को खुश होकर थमा देते थे एक-दो रुपया ! मगर अब उसका यहाँ आना, उन्हें बहुत अखरने लगा...बेचारे पछताने लगे, “क्यों इस किन्नर को, इतना मुंह लगाया..? यह तो ऐसा गधा है, जो कभी आदमी का देखता नहीं वक़्त..और धमक पड़ता है, मूसल लेकर...कैसे अब, उससे शीरी ज़बान में बोलें..? अगर बोलें, तो यह कम्बख़्त बेकार की हफ़्वात करता हुआ..नालायक, गाड़ी चुका देगा !” फिर, क्या..? वक़्त की नाज़ुकता भांपकर, रशीद भाई ने मारा एक धक्का उस रशीदा जान को ! बेचारा किन्नर आया था, रशीद भाई से कड़का-कड़क नोट लेने..मगर बेचारे को अनायास मिल गया, एक ज़ोरदार धक्का ! रशीद भाई तो फटा-फट घुस गए, डब्बे के अन्दर ! इधर वह खन्नास किन्नर जा पड़ा, उधर गुज़र रहे वेंडर के ठेले के ऊपर ! गिरते दौरान उसने धक्का दे डाला, उस वेंडर को ! गिरते दौरान बेचारा वेंडर, अपने कमज़ोर बदन को सम्भाल नहीं सका ! फिर, क्या..? एक धक्के में ही, बेचारे वेंडर का मुंह जा घुसा चाय के पतेले के अन्दर ! जिसमें उबल रही थी, गरमा-गरम चाय ! इस वक़्त बेचारा वेंडर ग्राहक न आने से, अपने लिए चाय बना रहा था !

अब वह वेंडर, पहले क्या बोले...? उसके पहले रशीदा जान फटा-फट उठकर, अपनी हैयत कज़ाई को झाड़ते हुए कह बैठा के "खम्मा घणी सा, ठाकुर साहब ! अन्नदाता अकेले-चाय पीते हो, कभी इस ग़रीब को याद किया नहीं ! इसलिए आज़ ख़ुदा ने आपको, पतेली भर करके चाय पिला दी है ! आगे से जज़मान, भूलना मत हमें !” अब इधर गार्ड साहब ने हरी झण्डी दिखा दी, उधर यह रशीदा जान काहे सुने..के, वेंडर वापस क्या जवाब दे रहा है...? वह तो बतूलिया की तरह अगले डब्बे में जा चढ़ा, जहां उसके दूसरे किन्नर साथी चढ़े हुए थे ! रफ़त: रफ़त: गाङी ने जोधपुर स्टेशन छोड़ दिया, थोड़ी देर बाद वह नज़रों से ओझल हो गयी ! अब गाड़ी में बैठे रशीद भाई को, थकावट के मारे नींद आने लगी ! बस, फिर क्या ? खिड़की पर माथा टिकाकर, वे झपकी लेने लगे !

लूणी स्टेशन पर पहुंचते ही, गाड़ी की रफ़्तार कम हो गयी ! गाड़ी के रुकते ही, प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ा कुलियों का झुण्ड तेज़ी से डब्बों में घुस गया ! इधर डब्बों की बारियों के निकट आकर वेंडर और चाय वाले, ज़ोर-ज़ोर से ग्राहकों को आवाज़ लगाते जा रहे थे ! इनकी हलचल से रशीद भाई की नींद टूट गयी, सुनहरे सपने आने बंद हो गए ! खिड़की से झांका, रशीद भाई ने...बाहर लूणी स्टेशन के प्लेटफार्म को देखते ही, झट बेग उठाकर डब्बे के दरवाज़े की तरफ़ बढ़े ! मगर, इन उतावली करने वाले इन कुलियों ने उनका रास्ता रोक दिया ! बेचारे मियां के सर पर आ गयी आफ़त, कैसे नीचे उतरें..? आख़िर ज़ोर लगाकर कुल्लियों को धक्के मारते हुए दरवाज़े के पास आ गये ! जैसे ही उन्होंने नीचे उतरने के लिए पाँव बढ़ाया, और उसी दौरान एक जवान कुली उनको धक्के मारकर डब्बे के अन्दर चढ़ गया ! ख़ुदा रहम, बेचारे रशीद भाई के हाथ-पाँव की हड्डी टूटी नहीं ! वे तो ख़ुदा के फ़ज़लो करम से, नीचे खड़े रशीदा जान के ऊपर जा गिरे ! बेचारा महजून रशीदा जान अपने ऊपर बोझे की तरह पड़े रशीद भाई को दूर करके, भौम से उठा ! अब रशीदा जान, क्या कर पाता..? यहाँ रशीद भाई ठहरे, उसके रोज़ के जजमान..उनसे मुख़ासमत रखने की वह जुरअत कैसे करता..? अपनी हैयत कज़ाई को झाड़कर, ज़राफ़त से बोला के “फ़हवुल मुराद है, समाधीसा ! आज़ तो आप धक्कों की सौगात देते जा रहे हो ! एक धक्का मारा, जोधपुर में तो दूसरा मारा लूणी में ! अब तो इन धक्कों की एवज़ में रुपयों की बरसात कर दीजिये, मालिक !” मगर, यह क्या..? उसके ऊपर रुपये-पैसों की बरसात करने वाले रशीद भाई, दूर-दूर तक कहीं दिखायी नहीं दे रहे थे..? बेचारे किन्नर, को क्या मालुम..? जनाबे आली सोर्ट कट वाले दरवाज़े से बाहर निकलकर, सड़क पर आ गए ! वास्तव में देखा जाय, तो बात यह थी के “उसके समाधीसा डर गए थे ! आख़िर, इन किन्नरों से कौन नहीं डरता...? ख़ुदा ने इन लोगों को, सम्मानित लोगों के सम्मान की बख़िया उधेड़ने के लिए..इतनी लम्बी ज़बान, जो दे रखी है...जो, कतरनी की तरह चलती है ! रशीद भाई भी जानते थे, अगर यहाँ से नहीं गए तो यह कुचामादी का ठीईकरा सरे आम उनकी इज़्ज़त नीलाम कर देगा...?

इसलिए रशीद भाई फटा-फट फाटक पार करके, सड़क पर आ गए ! अचानक उन्हें S.B.I. के बैंक मैनेजर साहब जनाब क़ाज़ी साहब, उनसे कुछ आगे चलते हुए दिखायी दिए ! इनके दीदार पाते ही, रशीद भाई का रोम-रोम खिल उठा ! ये क़ाज़ी साहब तो ठहरे उनके ख़ास दोस्त जनाब सईद अहमद सिद्दकी के छोटे भाई ! बस, अब तो मियां को नाश्ता-पानी लेने की ठौड़ साफ़-साफ़ नज़र आने लगी ! फिर क्या..? झट उनको आवाज़ लगा बैठे “अरे, छोटे भाई ! कहाँ जा रिया हो..?” मैनेजर साहब ने पीछे मुड़कर देखा, फिर हाज़िजा [याददास्त] पर ज़ोर देकर सोचा, “कहीं ये भाईजान के अज़ीज़ रफ़ीक [मित्र], रशीद भाई तो नहीं है..?”

बस, उनको पहचानते ही, पीछे मुड़े और जाकर रशीद भाई से गले मिले ! फिर, कहने लगे “अरे भाईजान आप तो आज़कल ईद के चांद बन गए हो, अरे जनाब कभी-कभी तो दीदार दे दिया करो ! आज़ मैं ऐसे जाने नहीं दूंगा, आपको मेरी कसम, मिठाई-नमकीन चखकर ही जाना होगा आपको !”

रशीद भाई को और क्या चाहिए, यहाँ तो अनायास ही aaआ गया एक मुर्गा..ख़ुद हलाल होने..! फिर, क्या..? लबों पर मुस्कान लाकर, रशीद भाई बोल पड़े “छोटे भाई, आज़ तो हम आपके यहाँ डीनर लेकर ही जायेंगे ! सस्ते में, आपको मैं छोड़ने वाला नहीं !” मैनेजर साहब ने झट रशीद भाई का बेग थाम लिया, फिर कह दिया “चलिए, भाईजान ! अपनी बैंक तो, पास ही है !”

अब मैनेजर साहब आगे-आगे चलने लगे, और पीछे-पीछे रशीद भाई ! बैंक के बाहर उनका चपरासी खड़ा था, उनको देखते ही आदाब बजाकर झट दोनों के बेग अपने हाथ में थाम लिये ! फिर अन्दर आकर मैनेजर साहब का चेम्बर खोला, पंखें का स्वीच ओन करके बाहर चला आया ! दोनों मुअज्ज़मों के बैठने के बाद, उन दोनों को आबेज़ुलाल पिलाकर ख़ुद काम से फ़ारिग़ हो गया ! फिर जाकर, वह आराम से बैंच पर बैठ गया !

आराम से बैठने के बाद, मैनेजर साहब ने हाथ ऊँचे करके अंगड़ाई लेते हुए रशीद भाई से कहा के “भाई जान, आपको क्या बताऊँ..? आज़कल बैंकों में मैनेजरों के ऊपर बहुत ज़्यादा काम लाद दिया गया है, हाय अल्लाह.. अब तो सबाह से शाम तक, हमारा सर ऊँचा नहीं होता ! बस काम करते ही जाओ..करते ही जाओ..ख़त्म होने का सवाल ही पैदा नहीं होता !” तभी चपरासी आबेज़ुलाल से भरे ग्लास और जग, उनकी मेज़ पर रखकर चला गया ! उसके जाने के बाद, रशीद भाई बोले “छोटे भाई, काम होगा, तब ही सरकार आप लोगों को नौकरी देती है! फिर काम बढ़ गया, ऐसी बात क्यों करते हो..?” सुनकर, मैनेजर साहब बोले “अरे भाईजान, आप समझे नहीं ! अभी इन दिनों इन सरकारी स्कूलों के चल रहें है, पे-डे ! और इधर टी.ओ. साहब फटा-फट तनख़्वाह के बिल पास नहीं कर रहे है, फिर क्या..? ज़्यादा वक़्त निकल जाने के बाद, तनख़्वाह के धनादेश [ चैक ] एक साथ पास कर देते हैं ! अब, आपको कैसे समझाऊं..? इधर हम इन ढेर सारे तनख़्वाह के धनादेशों को निपटाएं या फिर रोज़ आने वाले कस्टमर्स को हेंडल करें..? फिर इधर तो यह लूणी की आवाम करती है तंग, उधर ये शिक्षा विभाग के बाबूड़े..हम लोगों का बढ़ा देते हैं, सर-दर्द !”

इतनी बात सुनकर, रशीद भाई ने अपने लबों पर मुस्कान छोड़ी...फिर मुस्कराते हुए कहने लगे “छोटे भाई, काहे आप परेशान होते हैं, ये धनादेश देरी से आते है तो आपका इसमें फ़ायदा ही है ! इन तनख़्वाह के बिलों को टी.ओ. साहब अच्छी तरह से जांच कर लेंगे, तब तक !” रशीद भाई की यह बात, मैनेजर साहब को पसंद आयी नहीं ! वे बिना बोले, कम्प्युटर में भुगतान होने वाले बिलों का ब्यौरा देखने बैठ गए ! इनका जवाब नहीं मिलने पर, रशीद भाई वापस बोले “आप लोग पहले तो करते हो, भुगतान ! फिर बाद में करते हो पोस्टिंग ! इसमें आप लोगों का, काम कैसे बढ़ गया..? बिल के साथ ही ऑथोरिटी लेटर आता है, उसमें पूरी-पूरी डिटेल लिखी हुई है के “दिए हुए खाते में कितने रुपये डालने है, आपको..?” फिर, क्या..? ख़ाली उसे देखकर पोस्टिंग ही करनी है, इसमें आप लोगों को कितना टाइम लगता होगा....? अब बताओ, के इसमें आपका कौनसा काम बढ़ गया..?”
इतना सुनते ही, मैनेजर साहब का मूड उखड़ने लगा ! फिर वे भौंवे चढ़ाते हुए ऐसे बोले के “यह क्या कह दिया, आपने..? इधर देखिये भाईजान, यह मोनिटर क्या बोलता है..? इस एलिमेंटरी दफ़्तर ने इतनी सारी स्कूलों के बिल एक साथ बनाकर ट्रेजरी से पास करवा दिये ! अब देखिये इधर, इन ५००-६०० अध्यापकों की तनख़्वाह का भुगतान करना कोई हंसी-खेल है.? एक-एक अध्यापक के खाते की जांच करना, उसमें पैसे डालना और फिर उन भुगतानों की पोस्टिंग करना कोई आसन काम है..?”’ मगर, रशीद भाई जैसे हाज़िर जवाब इंसान का चुप बैठे रहना इतना सहज नहीं ! बस वे तो, जलती आग में घी डालने का काम कर दिया करते हैं ! झट कह बैठे, के “अरे छोटे भाई, इतना बड़ा स्टाफ़ आपके पास मौज़ूद ! लगाओ भय्या, उनको काम में..काहे निठ्ठला बैठा देते हो..? इनको ख़ाली बैठे मक्खी मारने की तनख़्वाह देती है, यह सरकार..?”

अब मैनेजर साहब थोड़े शांत हुए, चढ़ी हुई नाक-भौं की कमानी को सही करके फिर कहने लगे के “भाईजान, यह राष्ट्रीयकृत बैंक है,..कोई निजी बैंक नहीं है ! यहाँ बैंकों के अफ़सरों की हालत, धोबी के कुत्ते से भी बदतर है...अरे जनाब, शीरी ज़बान से इस लिपिक वर्ग को खुश रखकर ही हम इनसे काम ले सकते हैं ! इस लिपिक वर्ग की यूनियनों के बारे में, आप कुछ नहीं जानते !” मैनेजर साहब की बात सुनकर, रशीद भाई मुस्कराकर कह बैठे “नहीं जानता हूँ, छोटे भाई...तब अब, आप बता दीजिये !”

अब मैनेजर साहब शांत रहकर, उन्हें समझाने लगे “भाईजान इस मैनेजर की कुर्सी पर कांटे बिछे हैं, सहजता से बैठ नहीं सकते ! आप यह ही समझ लीजिये, के इस सरकार ने हम अफ़सरों को इतना कमज़ोर बना दिया है के..ये बाबू की पोस्ट की लीन रखने वाले, इन लोगों के सेक्रेटरी या अध्यक्ष....हम अफ़सरों से, ऐसे सवाल पूछते हैं..जैसे, ये कम्बख़्त हमारे अफ़सर हों..?” इतना कहकर मैनेजर साहब लम्बी-लम्बी सांसें लेने लगे ! उनके चेहरे की रंगत को देखकर, रशीद भाई ने एक सवाल दाग दिया, वे कहने लगे “मगर ऐसी समस्याएँ तो हर विभाग में मिल जायेगी, आप तो यह बताइये..के, समस्या की जड़ आख़िर है क्या..? वह बात कहिये, बाकी तो बेफुजूल की बकवास है !”

लम्बी-लम्बी साँसें लेने के बाद, मैनेजर साहब बोले “आप क्या जानते हो इन्हें, ये ठोकिरे असल में होते तो हैं..बाबू! मगर बन जाते हैं सेक्रेटरी या अध्यक्ष, कोई तो बन जाता है, जिले का तो कोई बन जाता है प्रांत का..आगे क्या कहूं, आपको..? और फिर यूनियन देती है, इनको बहुत सारी सुविधाएं! फिर ये ठोकिरे घूमते रहते हैं, एयर कंडीसन वाली कारों में ! वह भी भाईजान, पूरे हिन्दुस्तान में ! मर्जी आवे जब बना लेते हैं, ठौड़-ठौड़ के टूर ! अरे जनाब, मुफ़्त में भारत-भ्रमण कर लेते हैं !” अब तो रशीद भाई को हफ़्वात का चट-पटा मसाला मिलने लगा, इसलिए अब वे मैनेजर साहब की बातों में दिलचस्पी लेने लगे ! अब वे मुज़हाक उड़ाते हुए उनसे कहने लगे, के “इसमें आपको क्या तकलीफ़, छोटे भाई..? वे घूमते रहें, वह है उनकी क़िस्मत ! आप अपना कलेज़ा, काहे जलाते हो..?” इतना सुनते ही, मैनेजर साहब भड़क गए, और तल्ख़ आवाज़ में कहने लगे के मालुम है, के “शकिस्ता दिल का ज़ख्म कहाँ है..? ‘क़दर दां वे होते हैं, जो क़ुरूद को कुरेदते है, इनसे बहतर तो वे हैं...” कहते-कहते मैनेजर साहब हांप जाते हैं..फिर थोड़ा रुक कर कहने लगे, के “दूसरो की थाली में पड़ा घी, कुछ ज़्यादा ही दिखायी देता है, भाईजान ! ऐसे लोग क्या जान सकते हैं, इस शकिस्ता दिल के हाल..? यह कम्बख़्त जो असल में तो होते हैं, लिपिक ! मगर अपने साथियों की मदद से बन गये हैं, यूनियन के अधिकारी ! यह रंगा सियार, जब कभी हमारे बैंक में तशरीफ़ रखता है...तहलका मचा देता है ! अरे जनाब, हम जैसे अफ़सरों को सलाम करना पड़ता है....बाबू के पद की लीन रखने वाले, इन कमबख्त युनियन वाले को ! अरे साहब जहां हमसे नीची पोस्ट वाले हमको करते हैं सलाम, वहां हमें ऐसे निम्न लोगों की ख़िदमत करनी पड़ती है....जो आदमी, पोस्ट में हमसे काम हों ! अरे भाईजान इन लोगों की ख़िदमत नहीं करें, तो ये नामाकूल इन लिपिकों को हमारे खिलाफ़ भड़काकर..हमारे ही ख़िलाफ़, हेड ऑफ़िस में सच्ची-झूठी शिकायतें दर्ज करवा देते हैं ! हमारे खिलाफ़ एक्शन होने पर, ये नामाकूल बैठे-बैठे मज़ा लेते हैं ! अब, आपको कैसे समझाऊं..? यह हमारी बैंक का हितंगिया चेयरमैन थोड़ी सी क्या भनक पा लेता है, बस यह कम्बख़्त बिना सोचे-समझे हमें लताड़ पिला देता है ! के, हम इन लिपिकों को बात-बात में मां-बहन की दिश्नाम [गाली] देते रहते हैं, या इनके साथ अमानवीय व्यवहार कर रहे हैं...? अरे भाईजान और क्या कहूं आपको, थोड़ा सा ज़्यादा बैंक का काम इन लोगों को दे दूं ...बस, फिर तो हमारे ऊपर चार्ज लगा दिया जाता है के हम इनसे ओवर-टाइम काम ले रहे हैं ! आपको कैसे समझाऊं, भाईजान ? के सभी लगाए गए आरोप, भले झूठे हो..मगर इन बड़े अफ़सरों की क़लम, हमेशा हमारे ख़िलाफ़ ही चलती है !”

मैनेजर साहब का इतना बड़ा प्रवचन सुनकर, रशीद भाई के कान पक गए ! आख़िर जब्हा [ललाट] पर छाया पसीना पौंछकर, वे बोले के “छोटे भाई, आप जैसे अफ़सरों पर ऐसे बड़े-बड़े आरोप लगा दिए जाते हैं..फिर आप बैठे-बैठे, करते क्या हो..? मक्खियाँ मारते हो, क्या..? अपने बचाव के लिए, सबूत ढूंढे नहीं जाते आप लोगों से..?” अब रशीद भाई से ज़िरह करनी, ओखली में मुंह देने के बराबर ! रशीद भाई जैसे हाज़िर दिमाग़ रखने वाले इंसानों से से ज़िरह करना नहीं, अपना सर खपाना है ! इनकी ख़ुराफ़त का जवाब, ख़ाली ख़ुराफ़ती इंसान ही दे पाते हैं ! फिर भी हिम्मत जुटाकर मैनेजर साहब बोले, के “क्या करें, जनाब..? क्या कहें, इन बाबू लोगों को..? ये सारे मुलाज़िम, चोर-चोर मौसेरे भाई हैं ! ये तमाम लोग काम-चोर है, अजी क्या कहूं आपको..? इनमें से कोई खाता है, गुटका..पीक थूक कर कर देता है, सारी दीवारें सत्यानाश ! कोई गाय की तरह दिन-भर चरता रहता है, पान ! और किसी को दिन-भर रहती है, चाय की तलब ! कोई मोबाइल लेकर, दिन-भर विडिओ गेम खेलता रहता है ! अजी किसी को ऐसे शौक रखने पर, खज़ालत [शर्म] महसूस नहीं होती ! फ़हवुल मुराद, जनाब अब आप इन लोगों के महामत [गुण] जान गए..? अब तो जनाब, मैं “अल्हम्दोलिल्लाह” न कहकर, यह कहूँगा के सारी तारीफ़ इन बैंक के बाबूओंके लिए है !” बैंक मैनेजर साहब की बात सुनकर, रशीद भाई कलाम पढ़ते हुए कहने लगे के “बड़े आक़िल बड़े दाना ने निकाला है यह दाम, खूब देखा तो खुशामद ही की आमद है तमाम !” शाइर इमरान-उल-हक़ चौहान का क़लाम सुनते ही मैनेजर साहब मुस्करा उठे, फिर कहने लगे “सच्च कहा, भाईजान! काम कराने के लिए बस एक ही हथियार है, वह है “खुशामद” ! देख लीजिये इन लोगों की खुशामद करती हुई लूणी की आवाम [जनता] ने इनको लूणी के सस्ते रसगुल्ले खिलाकर इनकी आदतें बिगाड़ दी ! कम्बख़्त सभी बन गए, चटोखरे ! क्या कहूं, अब आपको..? अब इन रसगुल्लों में, खाने का कहाँ लुत्फ़ रहा....? रसगुल्ले कहाँ है, जनाब..? इसमें तो ख़ाली, फानीज़ [शक्कर] की चासनी का वज़न है!”

अब रशीद भाई की सुनने की शक्ति ने जवाब दे दिया, फिर भी जबरदस्ती की मुस्कान लबों पर लाकर कह बैठे “अरे भाई, रसगुल्ले की सिफ़त को समझो ! आप भी खाओ, और हमको भी खिलाओ..समाजवादी चीज़ है, भय्या ! अमीर भी खाता है, और ग़रीब भी खाता है ! बस छोटे भाई मैं तो आपसे यही गुज़ारिश करूँगा, के आप अपना खून मत जलाया करें ! खून जलाने से, आपको क्या मिलेगा..?” रशीद भाई की तकरीर सुनकर, मैनेजर साहब थोड़े गंभीर हो गए ! फिर शकिस्ता दिल के दर्द को बाहर निकालते हुए कहने लगे, के “भाईजान, क्यों नहीं जलाऊं अपना खून..? सबाह बैंक आने के डेड या दो घंटे तक इन लिपिकों का काम करने का मूड नहीं बनता, तब-तक ये लोग चाय-काफ़ी लेते रहेंगे...और बैंक का बकाया काम गया चूल्हे में..? अरे भाईजान कोई काम करता नहीं, बैठे-बैठे हफ्वात हांकते रहेंगे ! फिर बढ़े हुए सारे काम मुझे ही सँभालने होते हैं, अब बताओ आप.. के, अब मेरे पास कितना रहा वक़्त..? ताकि उस दौरान, मैं अपने बचाव के सबूतों को इकत्रित करूं..? आदमी हूँ, भाईजान! मशीन नहीं हूँ ! जो एक ही वक़्त, बीस काम पूरे करटी हो ! अब आप यह बताएं, के अफ़सर की मदद करने वाला कौन है..? जनाब अब तो हमारी मज़बूरी बन गयी, इन लोगों की खुशामद करके ही बैंक के काम निकलवाये जा सकते हैं !”
अब दिल का दर्द बाहर निकल जाने के बाद, मैनेजर साहब पछताने लगे के “क्यों भावावेश में आकर उन्होंने कई लोगों की बखिया उधेड़ दी ! अब इन नामाकूलों ने सुन लिया तो ज़रूर ये बदला लेने की फ़िराक में, न जाने उनके खिलाफ़ आगे क्या करेंगे..?” सोचते-सोचते, मैनेजर साहब का सर-दर्द बढ़ने लगा ! आख़िर चपरासी को आवाज़ देकर चाय लाने का हुक्म दे डाला ! उधर कम्प्युटर पर बिलों का ब्यौरा देख रहे बाबू मानमलसा के कानोँ में, मैनेजर साहब की आवाज़ सुनायी दी..जो चपरासी को चाय लाने का कह रहे थे ! सुनते ही बीच में बोलकर, मैनेजर साहब से कह बैठे “अरे साहब, इस कम्बख़्त शहनवाजिया के खाता नंबर नहीं मिल रहे हैं! इसकी खाता संख्या ढूंढते-ढूंढते, मेरा सर दर्द बढ़ गया हुज़ूर ! अब तो आप मेरे लिए भी, एक कप चाय मंगवा लीजिये ! चाय के साथ, एनासिन की एक गोली ले लूँगा !” तभी उनके पड़ोस में बैठे बाबूजी सिरेमलसा अपनी मुरली अलग बजाने लगे, कहने लगे “अरे साहब, इनके लिए चाय मंगवाकर जुल्म मत कीजिये, ये जनाब मानमलसा नहीं हैं..ये मुअज़्ज़म पानमलसा है, पूरे दिन पान की गिलोरी चबाते रहते हैं ! बस हुज़ूर, इनके लिए तो आप चाय की जगह पान की गिलोरी चेतना ज़र्दा वाली मंगवा दीजिये !” इनकी बातें सुनकर आख़िर, मैनेजर साहब को कहना पड़ा के “आप सभी सरदार मिलकर, सारा बकाया काम वक़्त पर निपटा दीजिये ! फिर आप चाय-पान तो छोडिये, आप अपनी मनपसंद यानि आप सब जो कुछ मंगवाना चाहें..मंगवा सकते हैं, कलाकंद, बामज़ मिरची-बड़े जो आप चाहें !” इतना कहकर मैनेजर साहब ने अपने जब्हा पर आये एक-एक पसीने के कतरे को साफ़ किया, फिर सभी के लिए मिठाई-नमकीन वगैरा लाने का हुक्म चपरासी को दे डाला ! चपरासी उनसे रुपये लेकर, रुख़्सत हुआ !

चपरासी को रुख़्सत देने के बाद, मैनेजर साहब ने निगाहें ऊपर उठायी...सामने मानमलसा को खड़े देखकर, मैनेजर साहब हाथ जोड़कर उनसे कहने लगे के “हुक्म अन्नदाता, और कुछ मंगवाना बाकी रह गया क्या..? जनाब हुक्म दीजिये इस बन्दे को, आपकी ख़िदमत में कौनसी चीज़ अब हाज़िर करनी है..?” मैनेजर साहब का इस तरह ज़राफ़त [नम्रता] के साथ पेश आने की अदा पर, मानमलसा उन पर फ़िदा हो गए ! मुस्कराते हुए वे कहने लगे, के “बाद में मंगवा लेंगे, हुज़ूर! बस, आप हम बच्चों पर अपना मेहर बरसाते रहना ! अभी तो आप इस ओथोरिटी-लेटर पर अपनी निग़ाह डालें, और दीजिये हमें अपना मार्ग दर्शन..के इस शहनवाजिया के बचत खाते में, कैसे सरेंडर बिल की राशि डालें..? अरे जनाब, इस ओथोरिटी लेटर में नाम देखता हूँ तो खाता संख्या नहीं मिलती ! खाता संख्या देखता हूँ, तो नाम नहीं मिलता ! अब आप यह बताइये, के यह क्या खेल चल रहा है..? मुझे तो जनाब यह लगता है, इस डफोल ने उतावली के अन्दर ग़लत खाता संख्या भर दी है !” अब मैनेजर साहब ने ओथोरिटी-लेटर हाथ में लेकर, अच्छी तरह से जांच करने लगे ! फिर कई बार, कम्प्युटर में पिछले हुए भुगतानों को देख डाला ! जैसे ही शहनवाजिया के खाते पर निग़ाह डाली, और इधर मैनेजर साहब के हाथों के तोते उड़ गए ! यह शहनावाजिया तो मिस्टर नटवर लाल, यानि चार्ल्स शोभ राज निकला ! इस नालायक ने, एक बार क्या..? कई बार अध्यापकों की सरेंडर राशि को, यह हरार्फ़ अपने बचत खाते में डलवाता हुआ भारी गबन करता रहा ! यह शैतान सीनियर हायर सैकंडरी स्कूल के कई अध्यापकों व प्रिंसिपल की आँखों में ख़ाक डालता आया है, मगर हाय अल्लाह इसकी असलियत किसी के सामने नहीं आयी....?

रफ़त: रफ़त: सारी जानकारी सामने आने लगी, अब मैनेजर साहब का चेहरा मलिन हो गया ! उनका मुंह उतरा हुआ देखकर, मानमलसा मुस्करा कर कहने लगे के “साहब, पैसे खर्च करने से आपका दिल दुखता है, तो फिर रहने दीजिये, मत मंगवाइये मिठाई-नमकीन ! मगर आप मुंह न उतारे, हम आपका उतरा हुआ मुंह नहीं देख सकते !”

अब मैनेजर साहब का चेहरा ऐसा लगता था, जैसे कोई उन्हें थाप मार दी हो..? फ़िक्र की रेखाएं उनके जब्हा पर दिखाई दे रही थी, जेब से रुमाल निकालकर उन्होंने जब्हा पर आये पसीने को साफ़ किया...फिर, वे कहने लगे के “भाई मानमलसा, गज़ब हो गया ! इस दिन के उज़ाले में, इस शहनावाजिया ने सब लोगों की आँखों में ख़ाक डालकर तेबीस लाख रुपयों का गबन कर डाला !”

इतना सुनते ही, रशीद भाई झट उठे, और जाकर मोनिटर पर अपनी नज़र डालने लगे ! उनको मोनिटर के पास खड़े देखकर, मैनेजर साहब कहने लगे के “भाईजान, क्या कर रहे हो..? क्यों आपके दिमाग़ की उर्जा, ख़त्म करते जा रहे हो..? समझ में कुछ आने वाला नहीं, आपको !” सुनकर, रशीद भाई वापस कुर्सी पर बैठ गए !

इतनी देर में चपरासी मिठाई-नमकीन लेकर आ गया, उसके दीदार पाकर मानमलसा खुश हो गए.. मुंह खोलकर कह बैठे, के “अरे भले मानुष, पहले इधर आ ! आकर रख यहाँ, चेतना ज़र्दा वाली पान की गिलोरी ! फिर जाकर खोल देना, कलाकंद की छाब !” फिर क्या..? पान की गिलोरी मानमलसा की मेज़ पर रखकर, बड़ी मेज़ पर कलाकंद की छाब व बामज़ नमकीन रख दिए ! फिर पुराना अख़बार उठा लाया, और उसके कई टुकड़े करके, उन पर मिठाई-नमकीन रखता हुआ कई हिस्से बना डाले ! मैंनेजर साहब और रशीद भाई के लिए, मिठाई-नमकीन चीनी की प्लेटों में रखकर उनकी मेज़ पर रख आया ! फिर वापस आकर, स्टाफ़ के हिस्से उनकी मेज़ पर रख दिए !

अब चारों ओर, कलाकंद की खुशबू फ़ैल गयी ! सब लोगों ने मिठाई-नमकीन खाना शुरू किया, मगर फ़िक्र में डूबे मैनेजर साहब मिठाई-नमकीन का लुत्फ़ कैसे उठा पाते...? बरबस, वे मानमलसा को कहने लगे के “मानमलसा, अब आप देखो भुगतान हुए हर बिल को ध्यान लगाकर ! देखकर बताओ, के उस बिल के आगे सोर्ट में क्या लिखा है..? कहीं surrender या surr. शब्द तो नहीं लिखा है..? फिर बाद में आप यह सोचना, के एक मुलाज़िम एक साल में कितनी बार सरेंडर राशि उठा सकता है..?” मैनेजर साहब की यह बात सुनते ही, मानमलसा को फ़िक्र होने लगी.. कहीं उनके हाथ से, कोई बोगस भुगतान तो नहीं हो गया..? कहीं ये मैनेजर साहब, उन पर लापरवाही से काम करने का आरोप लगाने के लिए तो आमादा नहीं हो गये..? शायद वे ध्यान नहीं रख पाए हो, उनके ध्यान नहीं रख पाने का फ़ायदा शहनावाजिया ने उठा लिया हो..? फ़िक्र के मारे, मानमलसा की हालत बुरी हो गयी ! इतनी देर कतरनी की तरह चल रही उस ज़बान पर, अब जड़ गया अलीगढ का ताला !

अरे जनाब, हमारे रशीद भाई इस ख़िलक़त के दहुम तालीफ़े कुबूल दबीर [मुंसी] ठहरे ! जिस दफ़्तर में मियां पहले काम किया करते थे, वहां के मुलाज़िम इन्हें “दबीर साहब” यानि “मुन्सीजी” कहते थे ! दफ़्तर के मुलाज़िमों की दफ़्तरी शरअी हर्ज मुर्ज निपटाते-निपटाते, ख़िताब पा गए जनाब, दबीर साहब का ! तब से इन्हें शौक हो गया, वे हर किसी मुलाज़िम की दफ़्तरी शरअी हर्ज मुर्ज में अपनी टांग फंसाने का ! अब इस वक़्त ये दबीर साहब, चुप कैसे बैठ सकते थे..? झट उनकी ज़बान, कुछ न कुछ बोलने के लिए बाहर निकल पड़ी! ज़नाबे आली दबीर साहब “अंधों में काणा राजा की तरह” कहने लगे, के “मैं वही बात करूंगा, जो इस मामले के दरियाफ़्त सामने आ रही है ! अब मै तौल-मोल कर ही बोलूँगा, के सबसे पहले ओथोरिटी लेटर में उस अध्यापक का ही नाम लिखा होगा..और उसके पास ही, कटिंग एटेस्टेशन की सील लगा दी होगी ! आदत के मुताबिक़ उस भोले प्रिंसिपल ने उस पर दस्तख़त ठोक दिए होंगे..? दस्तख़त होने के बाद, उस माता के दीने ने उस अध्यापक का नाम व उसकी खाता संख्या काटकर...उसकी जगह, अपना नाम व अपनी खाता संख्या लिख दी होगी..? काम होने के बाद, किसको मालुम पड़े..?”

रहस्य का उज़ागर होते ही, मानमलसा रूंआसी आवाज़ में कहने लगे के “हां भाई साहब, बात तो सही है ! यह प्रिंसिपल ठहरा भोला, भले यह महात्मा जैसा है..मगर, मुझे तो डूबा गया !” उन्हें फिक्रमंद होते देखकर, मैनेजर साहब बोले के “मानमलसा, इस प्रिंसिपल को महात्मा काहे कहते हो..? वह तो पहले से ही, अपने नाम के पीछे “महात्मा” लगाता है !” रशीद भाई को कुछ कहना बाकी रह गया था, अब वे बीच में बोल पड़े के “भाई मानमलसा, शहनवाजिया इतना मूर्ख नहीं है, जो ऑफ़िस कोपी में कोई बदलाव लावे..? उसको तो इसने छेड़ा ही नहीं होगा, छेड़ता तो केस-बुक भरते वक़्त यह प्रिसिपल उसे पकड़ लेता !” इतने सारे साक्ष्यों का उज़ागर होते देखकर, मानमलसा घबराने लगे... झट आकर बैठ गए, अपनी सीट पर ! उनको तो शक हो गया, के अगर अब यहाँ खड़े रह गए तो ये मैनेजर साहब झट उन पर “गबन में साथ देने का आरोप” लगा देंगे ! फिर तो, हारुने फन भी वहां आकर उन्हें बचा नहीं पायेगा ! बस, फिर क्या..? झट वे, ओथोरिटियां ढूंढ़ने का काम करने लगे !

वक़्त बीतता जा रहा था, रशीद भाई बैंक में बैठे-बैठे मस्ती छान रहे थे..तभी, लंच का वक़्त हो गया ! बैंक के स्टोर-रम में जाकर, चपरासी चाय बनाने लगा ! थोड़ी देर बाद वह चाय बनाकर ले आया, सब मुलाज़िमों की मेज़ पर चाय के प्याले रखकर वह चाय के बरतन धोने चला गया ! अब मैनेजर साहब को छोड़कर, सभी मुलाज़िम चाय का लुत्फ़ लेने लगे ! मैनेजर साहब तो फ़िक्र के मारे अब तक, ना तो नाश्ता ले सके और ना वे चाय के प्याले को अपने लबों तक ले जा पाए ! यहाँ तो मैनेजर साहब, कम्प्युटर पर अपनी नज़रें गढ़ाते हुए मग़मूम होते जा रहे थे ! मगर रशीद भाई को, काहे का गम..? वे तो अपने हिस्से के मिठाई-नमकीन ठोकते ही जा रहे थे, अचानक उनकी निग़ाह मैनेजर साहब के मग़मूम चेहरे पर गिरी ! फिर, क्या..? जनाब ने एक निवाला कलाकंद का उठाकर झट उनके मुंह के पास ले गए ! वह निवाला गिटकर मैनेजर साहब नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए कहने लगे के “भाईजान, मैं छोटा बच्चा नहीं हूँ, जो आप मुझे इस तरह खिला रहे हैं..? आप फ़िक्र मत करो, मैं अपने-आप खा लूँगा !”
अब बेचारे मैनेजर साहब की फ़िक्र इतनी बढ़ गयी, के उनको अपने दोनों हाथ सर पर रखकर सोचने के लिए बाध्य होना पड़ा ! आख़िर, उन्हें अपनी हर्ज़ मुर्ज़ का सामाधान मिल गया ! झट उन्होंने क्रेडिल पर रखा चोगा उठा लिया, और कोष कार्यालय के नंबर डायल कर बैठे ! उनके कानोँ में घंटी सुनायी देने लगी, थोड़ी देर बाद कोषाधिकारी तेज़सिंगजी की आवाज़ सुनाई दी ! तेज़सिंगजी बोले, के “हैलो कौन..? मैं तेज़सिंग बोल रहा हूँ, आप कौन सरदार फ़रमा रहे हैं...?” तेज़सिंगजी की आवाज़ सुनकर, मैनेजर साहब के दिल की धड़कन सामान्य हुई ! हिम्मत बटोरकर, मैनेजर साहब बोल पड़े, के “शेखावत साहब, जय माताजी की ! मैं लूणी बैंक का मैनेजर क़ाज़ी बोल रहा हूँ, मालिक मेरे तो देण हो गयी ! यह कम्बख़्त शहनवाजिया...”

अब मैनेजर साहब की हिम्मत बढ़ाना तो दूर, यहाँ तो शेखावत साहब लगा बैठे, ज़ोर के हंसी के ठहाके ! अब फोन में, उनके ठहाके गुंज़ाने लगे ! आख़िर ठहाकों की गूंज़ बंद हुई, और शेखावत साहब किसी तरह अपनी हंसी दबाते हुए बोले “अरे मैनेजर साहब अभी तक तो देण हुई नहीं, देण तो अब होगी मालक ! और आप पाओगे, फोड़ा !” उनकी बात सुनते ही, मैनेजर साहब को आभास होने लगा, के उनके तले की ज़मीन खिसकती जा रही है ! वे घबराते हुए, फ़ोन पर शेखावत साहब से कहने लगे, के “क्या आपको गबन का प्रकरण मालुम हो गया, क्या..?” इतना सुनते ही शेखावत साहब अपनी रोकी हुई हंसी, को अब रोक नहीं सके ! जनाब, अब तो वेs खुलकर हंसने लगे ! आख़िर किसी तरह, हंसी को दबाकर वे कहने लगे “अरे जनाब काज़ी साहब, क्या आपको भी इस शवनवाजिया हरामी पर शक हो गया क्या..? क्या कहें, क़ाज़ी साहब..? यह इंसान तो ऐसा कमीना निकला, के इसने तो सबकी आँखों में धूल झोंक कर तेबीस लाख रोपयों का गबन कर डाला ! अब क्या कहूं आपको, क़ाज़ी साहब..? आप तो बन गए हो, नवाब साहब ! आज़कल आपने तो अख़बार पढ़ना ही छोड़ दिया, जनाब ! पढ़िए आज़ का अखबार, फिर करना हमसे बात !” इतना सुनकर बेचारे मैनेजर साहब, बिन जल मछली की तरह, तड़फते हुए कहने लगे “फिर अब आप इज़ बता दीजिये, मालिक ! क्या करें, जनाब...बीच मझधार में छोड़कर हमें, मत जाइये हुज़ूर !”

तभी शेखावत साहब की मुधरी-मुधरी आवाज़ सुनाई देने लगी, वे कहने लगे “फ़िक्र काहे करते हो, क़ाज़ी साहब...? बस आप तो लूणी के दो किलो रसगुल्ले लेकर, पधार जाइये हमारे दफ़्तर ! अब पहले सुन लो, मेरी बात ! हम लोग ऐसे बेवकूफ़ नहीं, जो ग़लत भुगतान हो जाय और हमें पता नहीं रहे ! अजी साहब हमें अपनी तारीफ़ करवाने का शौक नहीं, हम तो हमेशा की तरह अब भी यही कहेंगे, “अलहम्दोलिल्लाह”..यहाँ तो दूसरे या तीसरे दिन तक, हमें भुगतान होने की फ़ेहरिस्त केग को भेजनी होती है !” तभी मैनेजर साहब फ़ोन में, बीच में बोलकर कह बैठे “फिर, आपने कुछ किया होगा..?” इनकी बात सुनकर, कहने लगे “अरे जनाब, हमने दस लाख रुपये तो इस शहनवाजिया से वसूल कर लिए हैं, और बकाया रुपये भी वसूल कर लेंगे ! ना तो इस लंगूर को सरकारी गहने पहनाने में हमें कोई ज़्यादा वक़्त नहीं लगेगा !” इतना कहने के बाद, शेखावत साहब की हंसी फ़ोन में गूंज़ने लगी ! फिर बाद में, क्रेडिल पर चोगा रखने की आवाज़ सुनायी दी !

शेखावत साहब की बात सुनकर, मैनेजर साहब को संतोष हुआ ! चोगे को क्रेडिल पर रखकर, रशीद भाई से कहने लगे के “भाईजान! थोड़ी देर तो मेरा इंतज़ार कर लेते आप, तो आपका क्या जाता..? वाह भाई, वाह ! जनाब आप तो पूरे पेटू निकले, अरोग लिया हमारे हिस्से का कलाकंद ?” रशीद भाई ऐसी बिना काम की बातें सुना नहीं करते, इसलिए अपने लबों पर मुस्कान छोड़ कर कहने लगे के “छोटे भाई, कुछ समझा करो ! मुसाफ़िर अपने जोख़िम पर करता है ! सामने पड़ा कलाकंद, कोई बावला आदमी ही नहीं खाता ! कई दफ़े, परोसी हुई थाली को खाने वाले की आँखों के सामने ही बरतन मांजने वाली ले जाती है ! और बदक़िस्मती से वह इंसान, लोगों का मुंह ताकता रह जाता है !” इतना कहकर, रशीद भाई ने कलाकंद की खाली प्लेट में हाथ धो दिये ! और बाद में रुमाल से हाथ साफ़ करके, आगे कहने लगे के “अब देखो छोटे भाई, इस दूसरी प्लेट में रखे हैं, बामज़ नमकीन! उठा कर खा लो, नहीं तो इन फोर्थ क्लास अफ़सरों के पेट में चले जायेंगे ! बाद में जनाब, आप खाली इनका मुंह ताकते रह जाओगे !”

फ़ोन की घंटी बजने लगी, क्रेडिल से चोगा उठाकर मैनेजर साहब कहने लगे के “कौन बोल रहें हैं जनाब..?” फ़ोन में शेखावत साहब की आवाज़ सुनायी दी, वे कह रहे थे के “अजी बेटी का बाप, बैठे-बैठे मक्खियाँ मत मारो ! मैंने कल ही गुड़ा विश्नोई स्कूल का एक सरेंडर बिल पास किया है, कही भूलकर किसी दूसरे आदमी के बचत खाते में...उस बिल की राशि डालकर, ग़लत काम तो नहीं कर डाला आपने..? मुझे ऐसी खबर मिली है, वह हर्राफ़ शहनवाजिया...अपने बचत खाते में, रूपये डलवाने की साजिश रच रहा है ! सोच लो, क़ाज़ी साहब ! इसने पहले भी इसी तरह कई लोगों की आँखों में धूल डालकर, कई लाखों रुपयों का गबन किया था ! एक बार क़ाज़ी साहब आपको हिदायत दे देता हूँ, आप इस शहनवाजिया के बचत खाते में रुपये डालना मत, अगर भुगतान कर दिया, तो फिर आपको ओडिट से बचाने वाला कोई मिलेगा नहीं !” इतना कहकर, उन्होंने चोगे को क्रेडिल पर रख दिया! अब शेखावत साहब की आवाज़ आनी बंद हो गयी, आवाज़ न आने से मैनेजर साहब ने भी चोगा क्रेडिल पर रख दिया ! अब अंगड़ाई लेते हुए, मैनेजर साहब कहने लगे के “भाईजान, सामने रखी मिठाई-नमकीन का लुत्फ़ लेना बन्दे के हाथ में नहीं है ! खुदा की मर्जी से ही, बन्दा इस मिठाई-नमकीन का लुत्फ़ ले सकता है !” मैनेजर साहब ने इतना कहकर, मानमलसा को आवाज़ देकर कहा “मानमलसा, इस हरामी शहनवाजिया के बचत खाते में भुगतान करना मत ! कर दिया तो फिर, आप भुगतेंगे ! फिर कहना मत, के मैंने आपको याद दिलाया नहीं..! बस, आप तो यही करो...के गबन का प्रकरण बनाकर, कांट-छांट वाला ऑथोरिटी लेटर और चैक को सलंग्न करके शेखावत साहब के पास भेज दो !" इतना कहकर, मैनेजर साहब लम्बी-लम्बी साँसें लेने लगे ! और बाद में दोनों हाथ ऊपर ले जाकर, अंगड़ाई लेने लगे ! उनकी यह दशा देखकर, रशीद भाई मुस्कराते हुए उन्हें कहने लगे “छोटे भाई, अस्थमा का मरीज़ तो मैं हूँ, और इस वक़्त आप लम्बी-लम्बी साँसें लेते जा रहे हैं..? कहीं आपकी तबीयत, नासाज़ तो नहीं..? कहीं यह अलील बढ़ ना जाए, उसके पहले मैं आपको अस्पताल दिखाकर ला दूं..?” रशीद भाई की ऐसी बात, मैनेजर साहब को काहे पसंद आये...? सुनकर उनका दिमाग़ गरम होने लगा, अब वे जहरीली नज़रों से उन्हें देखते हुए सोचने लगे के “किस बावली पूंछ का सबाह-सबाह मुंह देखा, जिसके कारण ऐसे माथा-खाऊ इंसान के दीदार हुए..? शगुन तो खराब हुए, ऊपर से इस निक्कमें इंसान ने मेरा सर-दर्द अलग से बढ़ा दिया !”

उनको इस तरह अपनी ओर टाम्पते देखकर, रशीद भाई को लगा के “ख़ुदा की पनाह, अब यहाँ से चल दिया जाय तो अच्छा रहेगा !” फिर हाज़िरबाश ख़ुदा को शुक्रिया अदा किया और कहीं ज़्यादा ताखीर न हो..ऐसा सोचकर, वे कुर्सी छोड़कर उठ गए ! फिर तालीफ़े क़ुबूल शेवा को अपनाते हुए शीरी ज़बान में कहने लगे के “क्या करूँ, छोटे भाई..? काफ़ी वक़्त बीत गया, आपके दफ्तर में ! क्या बताऊँ, आपको.? दुल्हन के मामू जान के इन्तिकाल होने पर, उनके जनाजे में शराकत कर नहीं पाया ! अब आज़ है उनकी ताज़ियत की बैठक, अब नहीं गया तो हम न्यात में भूंडे लगेंगे ! इसलिए, अब आपका साथ छोड़कर जाना ही पड़ेगा ! ख़ुदा खैर करे, अब छोटे भाई रुख़्सत दीजिये ! ख़ुदा हाफ़िज़, फिर मिलेंगे !” यह सुनते ही, मैनेजर साहब के दिल में ख़ुशी हुई के “अच्छा हुआ, यह माथा-खाऊ ख़ुद ही उठकर जा रहा है !” फिर उन्हें आशंका हुई, के “कहीं यह बन्दा, वापस लौटकर नहीं आ जाय..?” ऐसा सोचकर मैनेजर साहब कहने लगे के “हुज़ूर, शाम को मैं भी ताज़ियत की बैठक शराकत कर लूँगा ! फ़िक्र ना करें, फिर वहीँ आप से मिलना हो जायेगा ! आदाब !” इतना कहकर कुर्सी छोड़कर उठे, और रशीद भाई को दरवाज़े तक पहुंचाकर वापस आ गए ! अपने चेंबर में आते ही, धड़ाम से बैठ गए अपनी कुर्सी पर ! फिर आलस मरोड़ते हुए, कहने लगे के “ख़ुदा की पनाह, इस आदमी ने पूरे दिन काम करने दिया नहीं..और ऊपर से बढ़ा दिया मेरा सर-दर्द ! लाख़-लाख़ शुक्र हो हो मेरे हाज़िर बाश ख़ुदा, आगे से इस बन्दे के दीदार कभी मत कराना !”

बैंक से बाहर आते ही, रशीद भाई को ऐसा लगा जैसे उनके पेट में चूहे कूद रहे हों..? तभी चलते-चलते, राह में एक नमकीन की दुकान दिख गयी ! जहां गरमा-गरम मिर्ची बड़े तले जा रहे थे ! स्वत: उनके क़दम उस दुकान की और बढ़ने लगे, मगर तभी उनकी जेब में रखा मोबाइल ज़ोरों से बजने लगा !
वैसे तो रशीद भाई अपनी जेब में कभी मोबाइल जेब में रखकर, बाहर निकला नहीं करते..और, लोगों से यह भी कह दिया करते के “यह मोबाइल तो गले की घंटी है, इसलिए इस घंटी को रखे कौन...?” क्योंकि जनाब की आज़ादी में आ जाती है, बाधा ! मगर, आज़ तो बेग़म ने जबरदस्ती उनकी जेब में रखवा दिया था..मोबाइल, ताकि बराबर उन पर नज़र रखी जा सके के “शौहर-ए-आलम, कहीं यार-दोस्तों के दफ़्तर में मिठाई-नमकीन खाने नहीं बैठ जाए..?” घंटी बजते ही उन्होंने मोबाइल जेब से बाहर निकालकर ओन किया, और उसे कान के पास ले जाकर कहने लगे के “अरी बेग़म, और कहीं किसी रिश्तेदार की ताज़ियत की बैठक में जाना है क्या..? अब, काहे कू फ़ोन घूमा रयी हो..?” इतने में फ़ोन पर बेग़म के रोने की आवाज़ आती है, और वह कहती है के “शहज़ाद के अब्बा, मैं किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रही !” इतना सुनते ही, रशीद भाई मोबाइल पर ज़ोर से कहने लगे के “अरी बेग़म, कहाँ तू काला मुंडा कराके आ गयी..? शर्म नहीं आती, जवान बेटे की मां होकर ऐसा कुकर्म कैसे कर डाला..? हाय अल्लाह, मेरे तो नसीब फूट गए इस बुढ़ापे में !” इतना सुनते ही बेग़म शेरनी की तरह दहाड़ती हुई फ़ोन में बकने लगी के “काला मुंडा हो, मेरे दुश्मन का ! मैं तो धोखा खा गयी, शहज़ाद के अब्बा ! मुझ बदनसीब को उस लुगाई ने लूट लिया, जो सबाह-सबाह हमारे घर की बरसाली में बैठी थी ! हाय अल्लाह, मुझे क्या पता था, के यह कलमुंही ठग होगी..? वह मुझ से, अपने भाई के इलाज़ के वास्ते पांच हज़ार रिपिया लेकर चली गयी !” अब तो बेग़म की आवाज़, नीम्बली सिसकियों में बदल गयी ! इसके अलावा कुछ सुनायी नहीं दे रहा था ! तभी ऐसा लगा, के “शहज़ाद ने चोगा अपने हाथों में रख लिया हो...?” वह कह रहा था, के “अब्बाजान, मालुम पड़ी है, के कोतवाली इलाक़ा में रहने वाली मोहम्मादिया की बीबी आयशा भदवासिया इलाके में आकर अपने-आपको किसी नामचीन आदमी की बहन बताती हुई अपने शौहर, सास या किसी नज़दीकी रिश्तेदार के अस्पताल में भर्ती होने की झूठी ख़बर देती है ! फिर अपनी ग़रीबी का रोना रोती हुई, लोगों से उसके इलाज़ के पैसे मांगती है ! इस तरह, उसने अपने इलाक़े के कई लोगों को ठग लिया है ! अरे अब्बूजान अपने भदवासिया इलाक़े के अशोक बालोटिया, रुपेश, राजू, मांगी लाल और राम लाल को बेवकूफ बनाकर उनके साथ ठगी की है ! वैसे यह मोहतरमा, दूसरे कई इलाक़ों में जाकर भी ठगी करती आई है ! क्या कहूं अब्बाजान, आपको..? इसने तो सबाह-सबाह हमारे घर आकर अम्मीजान को बेवकूफ बना डाला, और उनके भोलेपन का फ़ायदा उठाती हुई पांच हज़ार रुपये ठगकर चली गयी! दोपहर के वक़्त तो हद हो गयी, अब्बूजान ! यह बेवकूफ भदवासिया अस्पताल पास रहने वाले नासिर चाचा के घर पहुँच गयी, और वहां जाकर नासिर चाचा को ही कहने लगी के “मैं भदवासिया अस्पताल के पास रहने वाले नासिर मोहम्मद की बहन हूँ, इस वक़्त मेरा भाई नासिर एम.जी.एच. अस्पताल में भर्ती है, उसे दिल का दौरा पड़ा था ! अब डॉक्टर साहब ने पांच हज़ार रुपयों की दवाइयां लिखी है, और मुझ ग़रीब के पास एक भी पैसा नहीं है इलाज़ के वास्ते ! ख़ुदा के वास्ते, पांच हज़ार रुपये दे दीजिये..अल्लाहताला आपको खुश रखेगा ! अगर नहीं दिए रुपये, तो मेरा भाई मर जायेगा बिना इलाज़ लिए..! इतनी बात सुनकर, नासिर चाचा मुस्कराते हुए बोले के “बाई, तू नासिर को पहचानती है..?” उसने झट अपना सर हिला दिया और कहने लगी के “कैसे नहीं पहचानूगी..? वह तो मेरा सगा भाई है !” यह सुनते ही, नासिर चाचा तेज़ी खाकर कहने लगे के “गतगेली बावली, तेरी आँखें है या बटन..? यह सामने खड़ा छ: फुट का आदमी, दिखायी नहीं देता..? मैं ही नासिर मोहम्मद हूँ, जो भदवासिया अस्पताल के पास रहता है ! क़ाबुल की गधी, समझती नहीं और खड़ी-खड़ी बकवास करती जा रही है..?” यह सुनते ही उस मोहतरमा के होश उड़ गए, और इधर तेज़ आवाजें सुनकर मोहल्ले के कई लोग वहां आ गए ! उनमें से कई लोगों ने उसको पहचान लिया, वे कहने लगे के “अरे, यह तो साहबजादा मोहल्ले में रहने वाले मोहम्मदिया की बीबी है !” फिर क्या..? सब लोग उसे पकड़कर ले गए, महामंदिर थाने में ! वहां मौजूद ए.एस.आई. साहब पुरुषोतमजी के पास हाज़िर किया ! उन्होंने उस मोहतरमा से अच्छी तरह से पूछ-ताछ की, और बाद में इसके शौहर मोहम्मदिया को थाने में बुलाया ! आख़िर, दोनों मियाँ-बीबी ने जुर्म क़ुबूल कर लिया ! मगर अब्बाजान, जुर्म क़ुबूल करने से क्या होता है..? वे दोनों मुआफ़ी माँगते हुए, जोर-जोर से रोने लगे ! उन दोनों को इस तरह रोते देखकर, वहां मौज़ूदा लोगों को दया आ गयी..वे समझ गए, के “इन दोनों ने अपनी ग़रीबी की मज़बूरी में आकर यह जुर्म किया था ! अगर ग़रीब न होते, तो यह जुर्म क्यों करते..?” फिर, क्या..? ए.एस.आई. साहब पुरुषोतमजी कहने लगे के “अब रमजान का पाक महिना आने वाला है, अब आप यह ही समझ लो..के आपने मुफ़लिसी से महज़ून मोमिनों की मदद करके, आप ख़ुद अल्लाह पाक की रुयत के हक़दार बने हो !”

इतनी लम्बी दास्तान सुनाकर, शहज़ाद आगे कहता रहा के “इस तरह रहस्य से पर्दा उठते ही, अम्मीजान तो ज़ोर-ज़ोर दहाड़े मारकर रोने लगी ! अब मैं क्या करूँ, अब्बा हुज़ूर..? कैसे अम्मीजान को समझाऊं, उनको मेरी कोई बात समझ में नहीं आ रही है...बस एक ही बात बार-बार काहे जा रही है, के “शहज़ाद, तेरे अब्बा हुज़ूर पूरे दिन डिपो में काम करते हुए तले जा रहे हैं, तूझे क्या पता..? वे बेचारे सूख-सूख कर कांटे बने जा रहे हैं ! इस बारे में, शहज़ाद तू क्या जानता है..? हाय अल्लाह, ये पांच हज़ार रुपये उनकी खून-पसीना एक करके कमाई हुई गाढ़ी कमाई के थे ! मैं एक बदनसीब औरत हूँ, जिसने अपने शौहर के खून-पसीने की गाढ़ी कमाई, बरबाद कर डाली ! अब तो अल्लाह पाक भी, मुझे किसी हालत मैं मुआफ़ नहीं करेगा !” अब आप बताइये, के मैं अम्मीजान को कैसे समझाऊं..? अब आप घर आओ, तब आप अम्मीजान को ख़ुद समझा देना !”

शहज़ाद की इतनी लम्बी तकरीर सुनकर, बुझे दिल से रशीद भाई को कहना पड़ा के “शहज़ाद, ज़रा तू अपनी अम्मी को कह के “यही अल्लाह पाक की मर्ज़ी थी ! अल्लाह की मर्जी के खिलाफ़, हम कुछ नहीं कर सकते ! अब फ़िक्र नहीं करें, बस बैठकर अल्लाहताला की इबादत करें..इंशाअल्लाह, सब ठीक हो जाएगा !” इतना कहकर रशीद भाई ने अपना मोबाइल बंद किया, फिर उसे अपनी जेब में रखकर इतमीनान की सांस ली ! इतनी लम्बी-लम्बी बातें सुनकर, रशीद भाई की भूख..ख़ुदा जाने, अब वह कहाँ चली गयी...? अब कहाँ तो उनको आ रही है, मिर्ची बड़ों की सौरम..? कहाँ कूद रहें हैं, उनके पेट में चूहे..? ख़ुदा की पनाह, यह कम्बख़्त भूख तो न जाने कहाँ अल्लादीन के चिराग़-ऐ-जिन्न की तरह गायब हो गयी...?

इधर उनके घर में कोई औरत आकर ठगी करके चली गयी, और उधर लोगों की खुली आँखों के सामने यह ख़न्नास का बच्चा शहनवाजिया लाखों रुपयों की ठगी करता जा रहा है ! कहीं ख़ाली फ़ानिज़ की चासनी डालकर, रसगुल्ले कम तौले जाते हैं..और सरे-आम, उन्हें बेचा जा रहा है ! कहीं सरकारी दफ़्तरों में बैठे अफ़सर और बाबू लापरवाही करते जा रहे हैं, और उनकी आँखों के सामने ही लाखों रुपये के गबन होते जा रहे हैं..ये क्या कुचालें, इस ख़िलक़त में चल रही है..? अब तो जहां नज़र उठायी जाय, वहीँ घोटाले, ठगी, लापरवाही, रिश्वत, षङयंत्र, फरेब. छल, कपट, बेरुख़ी वगैरा के दीदार होते हैं ! कहीं भी हाज़िर बाश ख़ुदा की रुयत पाने के लिए साफ़ दिल से इबादत होती दिखायी नहीं दे रही है, ना कोई इंसान खून-पसीना एक करके कमाये गये पैसों का महत्त्व समझ पा रहा है..? भ्रष्ठाचार बढ़ता जा रहा है, कहीं भी मेहनत की कमाई करने वाले, सच्चे व ईमानदार इंसान के दीदार नहीं हो रहे हैं ! बस, अब ऐसा लगता है...यह दुनिया नहीं, कुआ है ! जिसके पूरे पानी में, भंग डाली हुई है ! बरबस, अब रशीद भाई के मुख से एक ही जुमला बाहर निकल जाता है, के “पूरे ख़िलक़त में, भंग डाली हुई है !”

लेखक – दिनेश चन्द्र पुरोहित
[ई मेल – dineshchandrapurohit2@gmail.com]


मेरी बात -:
यह कहानी, दैनिक भास्कर अंक डी.बी.स्टार, जोधपुर २५ जुलाई २०१३ के पहले समाचार को आधार बनाकर लिखी गयी है ! इसके लिखने के उपरांत, इस प्रकरण में काफी प्रगति हुई है ! आज़ के जायजे के अनुसार उपकोष, लूणी के कर्मचारियों की मिलीभगत से दो आरोपी लिपिक [ शहनवाज़ अली क.लि. रा.उ.मा.वि.गुड़ा विश्नोई और संदीप श्रीवास्तव क.लि. रा.बा.उ.मा.वि. लूणावास कल्ला, जोधपुर ] ने अपने विद्यालयों के अध्यापकों की समर्पित बिल राशि का भुगतान अपने खुद के बचत खातों में करवाकर कई लाखों रुपयों का गबन किया ! सित. २०१३ में, संदीप के खिलाफ़ फ़ौजदारी मामला दर्ज कर दिया है ! और दूसरे आरोपी शहनवाज़ अली को सह आरोपी बनाया गया है ! लूणी थाने के एस.एच.ओ. श्री कैलाश दान ने यह बताया है, आरोपी संदीप श्रीवास्तव के खिलाफ़ २५ लाख रुपये गबन करने का मामला दर्ज हो गया है ! इधर शास्त्री नगर के एस.एच.ओ. श्री सुभाष शर्मा का कहना है, के “पुलिस आरोपियों को पकड़ने के लिए, ठौड़-ठौड़ दबिस कर रही है !” कोषागार की सयुक्त निदेशक श्रीयुक्त अमिता ने पत्रकारों को यह बताया है के “यह मामला सीधा शिक्षा विभाग से जुङा हुआ है, इसकी सारी जिम्मेवारी शिक्षा विभाग की है, कोषागार से इसका कोई लेना-देना नहीं ! कोषाधिकारी [ग्रामीण] श्री तेज़ सिंग शेखावत का कहना है, के यह सारी ग़लती शिक्षा विभाग के इन लिपिकों की है..जिन्होंने यह गबन किया है ! क्यूंकि वे ख़ुद फर्जी बिल बनाकर लाये थे ! अत: इस प्रकरण में कोषागार का कोई लेना-देना नहीं ! [ डी.बी.स्टार, तारीख १३ सित. २०१३ ].
डी.बी.स्टार तारीख़ ०८ दिस. २०१३ के अनुसार पुलिस आयुक्त श्री नाज़ीम अली के द्वारा की गयी पूछ-ताछ के दौरान यह तथ्य सामने आया है, के “कोष कार्यालय व शिक्षा विभाग के कर्मचारियों की आपसी मिली-भगत थी, जिसके कारण ही यह गबन हुआ ! उन्होंने बताया है, के इन लिपिकों के नज़दीकी रिश्तेदार व मित्रों के शामिल होने के संकेत भी हमें मिले हैं ! उन लोगों से मुलाक़ात कर, उनसे भी पूछ-ताछ करेगी ! आरोपी लिपिकों के बताये अनुसार २३ लाख रुपये सरकारी कोष में जमा करवाए जा चुके हैं, इसलिए पुलिस ने सम्बंधित भुगतान सबंधित फाइलें कोष कार्यालय से मंगवाकर अपने कब्जे में ले ली है !” इस मामले के खुलासा होने पर सम्बंधित शिक्षा विभाग ने इन दोनों लिपिकों को निलंबित कर दिया है ! निलंबित होते ही, ये दोनों लिपिक भूमिगत हो गए ! गबन की राशि का आंकड़ा बढ़ जाने से, दोनों थाने में तीन मामले इनके खिलाफ़ दर्ज कर लिए गए हैं ! तब से ये दोनों लिपिक, करीब पांच महीनें तक भूमिगत रहे ! आख़िर, पुलिस इन दोनों को ढूंढकर इन्हें गिरफ्तार करके अदालत में हाज़िर किया ! अदालत में हाज़िर होने के बाद, सम्बंधित न्यायाधीश ने ०८ दिस. तक हिरासत में रखने का हुक्म दिया ! अभी तक, यह मामला निपटा नहीं है !
फौज़दारी मामले ज़्यादा लम्बे नहीं होने चाहिए, इससे गवाहों पर प्रतिकूल असर पड़ता है ! यह मुक़दमा सन २०१३ का है, और अब इस वक़्त सन २०१६ चल रहा है ! अत: प्रबुद्ध पाठक खुद सोच सकते हैं, के यह मामला अब किस तरफ जा रहा है...?
इस कहानी को रोचक बनाने के लिए, कई काल्पनिक किरदार जोड़ने पड़े ! उन किरदारों का किसी जीवित या मृत व्यक्तियों से कोई लेना-देना नहीं !
आपको यह कहानी कैसी लगी..? कृपया, आप अपने समालोचना और आलोचना के विचार ज़रूर प्रस्तुत करें!
आपके पत्र की इंतज़ार में
दिनेश चन्द्र पुरोहित
ई मेल dineshchandrapurohit2@gmail.com

 


 इस  मारवाड़ी कहानी को उसी भाषा मे पने के लिए यहाँ चटखा लगाए






1 comments:

  1. कहानी "आखा ख़िलक़त में भांग न्हाख्योड़ी" शिक्षा विभाग के लिपिकों द्वारा अध्यापकों की कई लाखों की समर्पित राशि का गबन करने के आधार पर बनी है, इसमें हास्य रस का पूट भी है ! आप रशीद भाई के किरदार की समीक्षा करते हुए इस कहानी का मूल्यांकन करें !
    dineshchandrapurohit2@gmail.com

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