दिनेश चन्द्र पुरोहित रचनाकार परिचय:-





लिखारे दिनेश चन्द्र पुरोहित
dineshchandrapurohit2@gmail.com

अँधेरी-गळी, आसोप री पोळ रै साम्ही, वीर-मोहल्ला, जोधपुर.[राजस्थान]
मारवाड़ी कहानी “बैना रौ पाट ” का हिंदी-अनुवाद
लेखक और अनुवादक -: दिनेश चन्द्र पुरोहित


मंदिर के दरवाजे को ज़ोर से बंद करके, गुस्सेल डोकरी नाराणी बाई ख़ाकदान उंडेलने के लिए मंदिर से बाहर आ गयी! दस क़दम आगे जाकर, उसने ख़ाक दान का सारा कचरा नीम तले डाल आयी! वापस आकर उसने पुराने बरगद के पेड़ पर निग़ाह डाली, जहां पेड़ के नीचे सतभामा खड़ी थी! सतभामा के दीदार पाते ही, उसका गुस्सा उबल पड़ा और वह उसे कटु शब्द सुनाते हुए कहने लगी “रांड, तेरी जवानी को अंगारे लगे! क्यों आती हो यहाँ, अपना काला मुंह करने...? खोटे काम करने के लिए, यह मंदिर ही मिला तूझे ?”
अचानक सतभामा की नज़र, उस कचरे पर जा टिकी! उस कचरे में परिवार नियोजन के काम लिए हुए कंडोमों देखते ही, उसकी आँखें आश्चर्य से फैल गयी! अब सतभामा को समझ में आया, के “नाराणी बाई क्यों क्रोधित होकर, ऐसे कड़वे वचन बोलती जा रही है..?” अब वह आब-आब होने लगी, के “यह कम्बख्त डोकरी उसे ही, इस गंदे काम करने की दोषी समझ रही है...?” वह ऐसे आरोप को, कैसे सहन करें..? क्रोध के मारे, उसका बदन कांपने लगा! इधर एक शैतान उल्लू ने कौए के घोंसले से, उसके अंडे चुरा लिए! इन कौओं को उल्लू तो नज़र आया नहीं, मगर नज़र आ गयी सतभामा! उसको देखते ही, वे उसके सर पर चोंच मारते हुए उसके चारों ओर मंडराने लगे! बुरे काम कौन करे, और उसका नतीजा कौन भुगते...? कहावत है, “सूअर चारा चर जाते हैं, और पीछे से भैंसों की पिटाई होती है!” बस, इसी तरह बेचारी सतभामा पर दोहरी चोट लग गयी! बस, फिर क्या...? वह वापस उसी वक्त, उस डोकरी को सुना बैठी “मांजी सा आपके मंदिर में, पाँव रखे मेरी जूती!! कौन लड्डू बाँट रहा है जी, जो जाएँ आपके मंदिर में..? जो कलमुंही आपके मंदिर में जाती हो, उसका मुंह काला हो! मैं तो यहाँ खड़ी, अपने शौहर का इंतज़ार कर रही हूँ...वे अभी तक, घर लौटे नहीं है! समझ गयी, मांजी सा! आगे से, मंदिर के पाट ढक कर ही जाया करो! सिंझ्या वेला आ गयी कम्बख्त जंगजू, शगुन ख़राब करने..?”
कहने में तो नाराणी बाई भी कह सकती थी, के “वह रोज पाट ढक कर ही जाती है! मगर, करें क्या...? पाट पुराने हो जाने से टूट गए हैं, ख़ाली ढकने से काम नहीं चलता! थोड़ी सी तेज़ हवा चलने से ही, वे अपने-आप नीचे गिर जाते हैं! इन्हें मरम्मत की सख्त ज़रूरत है, और उसके लिए चाहिए पैसा!” यहाँ डोकरी अपनी अंटी ढीली करना चाहती नहीं, क्योंकि यह मंदिर उसके बाप का नहीं..यह तो समाज का मंदिर है! और समाज इस मंदिर की कदर करता नहीं, फिर मरम्मत का काम कराएगा कौन, और इस खर्चे को बरदास्त करेगा कौन..? कहते हैं “चमत्कार के बिना, कोई नमस्कार नहीं करता!” फिर, इसमें समाज का क्या दोष...? मंदिर में बिराजमान ठाकुरजी कभी चमत्कार दिखाते नहीं, और ना कभी उन्होंने, कोई परचा दिया हो..? तब इन भक्तों को कोई फायदा हुआ नहीं, फिर ये नादान भक्त क्यों करेंगे इस मंदिर की मरम्मत ? स्वार्थ के लिए खालसा ज़मीन पर कब्ज़ा करने के लिए नेता रूपी प्राणी, एक बड़ा पत्थर लाकर रख देता है! फिर उस पर सिन्दूर लीपकर, उसे भैरूजी का नाम दे देता है! फिर, लोगों के बीच अफवाह फैला दी जाती है, के “ज़मीन फाड़कर भैरूजी प्रगट हुए हैं!” कई दिन बाद वह पत्थर किसी को दिखायी नहीं देता! बस, उस ज़मीन पर आलिस्यान इमारतें दिखायी देने लगाती है! फिर क्या ? इमारतें बेचने का धंधा पनपने लगता है, और ये नेता रूपी प्राणी इसे अपना रोज़गार बना लेते हैं! जहां ऐसे स्वार्थी इंसानों का बसेरा हो, वहां भगवान भी उनके लिए पैसे कमाने का साधन बन जाता है...फिर, उनसे मंदिर के मरम्मत की क्या उम्मीद की जा सकती है..?
अचानक दीपक की लौ बड़ी हो गयी, चारों ओर तेज़ उजाला फ़ैल गया! दीपक का तेल ख़त्म होने जा रहा था, इसी चिंता से सतभामा परेशान हो गयी! अब नाराणी बाई के कटु वचन भूलकर, वह सोचने लगी के “कितना जल्दी भोजन तैयार करके, शौहर रूप सिंग को आवाज़ देकर भोजन करने के लिए बुला लूं... तो अच्छा रहेगा, ना तो यह तेल अब ख़त्म होने में ज्यादा देर नहीं लगेगी..! भोजन बनाते-बनाते वह सोचती जा रही थी, के उसकी जिन्दगी और दीपक में, कितना तेल बाकी रहा...? इतने दुःख उठाने के बाद सतभामा, अब इस गहरे रहस्य को अच्छी तरह से समझ गयी! जिन्दगी के इतने थपड़े खाकर, वह समझ गयी के “इस उजाले से तो अँधेरा ही अच्छा है, क्योंकि यह तेज़ उजाला बराबर टिकने वाला नहीं! तेल ख़त्म होते ही, दीपक उजाला देना बंद कर देगा! इसी तरह स्वार्थ दिखते ही सारे रिश्ते-नाते छोड़कर, यह स्वार्थी इंसान भी अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए निकल पड़ेगा! बस, पीछे छोड़ देगा.. अँधेरा व सूनापन! बस पहले भी इसी अँधेरे में सतभामा के दुःख दिखाई नहीं दिए, और आगे भी दिखाई नहीं देंगे! इसलिए, यह अँधेरा ही उसका साथी है!”
सतभामा अपनी गुज़री जिन्दगी के हर वाकये को याद करती हुई, यह अहसास करने लगी के “यह समाज हमेशा औरत को मर्द से निम्न और उसकी दासी समझता आया है! इससे और बदतर उसकी यह स्थिति है, के मर्द हमेशा अपनी औरत को अपने पाँव की जूती ही समझता आया है! इन मर्दों के लिए, जूती का क्या मोल...? वे जब चाहे, तब इसे बदल सकते हैं! मगर असल में, जूती की क्या कीमत है...? इसके बारे में समझदार इंसान ही भली-भाँती जानता है, के “यह जूती उसके पूरे बदन का भार उठाये रहती है, और उसे रेत, कंकर, पत्थर, कांटों, आदि से बचाये रखती है! मगर, क्या करें...? यह समाज इस जूती के महत्त्व को नहीं समझ पाता, वह तो हर ठौड़ लड़का अर लड़की में भेद रखता आया है, और लड़के को बढ़ावा देना व लड़की को दबाकर रखना...यही उसकी फ़ितरत बन चुकी है! लड़की के जन्म लेने पर यहाँ तक कह दिया जाता है, के “यह छोरी नहीं है, भाटा है! इसकी माँ गंडूरनी कहीं की, हर साल पत्थर पैदा करती रहती है!”
इस तरह यह सतभामा भी, इस समाज के शोषण का शिकार रही! सतभामा को, इस समाज ने आख़िर दिया क्या...? ख़ाली, तिरस्कार और उत्पीड़न! हर जगह उसे, क्रूरता और शोषण का शिकार बनना पड़ा! इन बातों को याद करती हुई सतभामा को याद आने लगा, के उसका पति किस तरह माँ के सीखाये-सिखाये उसको घर से बाहर निकाल दिया...? मगर सतभामा ठहरी, मज़बूत दिल रखने वाली! अपने खानदान के ऊँचे आदर्शों का मान रखती हुई, बराबर इन समाज के बुगला-भगत ठेकेदारों से लड़ती रही! छ: माह के बेटे को गोद में लिए, उसने अपनी दुनिया अलग बसा दी! उस नन्हें बच्चे के अन्दर अपने भविष्य को संजोकर, अपने स्वाभिमान की ज्योति को बुझने नहीं दी! ससुराल से निकाले जाने के बाद, कभी भी पीहर की तरफ़ मुंह नहीं किया! और ना आज की आधुनिक लड़कियों की तरह, दूसरा विवाह किया! उसने तो अपने अंतस में गांठ बांध ली, के “ये शादी-विवाह कोई गुड्डे-गुड्डी का खेल नहीं, के रोज़-रोज़ शादी करते रहें....जैसे पुराने कपडे उतारो, और नए कपड़े पहन लो...? आख़िर हम ठहरे, इंसान! तिरिया तेल हमीर हठ, चढ़े न दूजी वार!” इसके बाद वह दूसरी शादी कैसे करती...? इस उसूल को निभाती हुई, किसी के सामने अपने दुखों को व्यक्त करके अपनी कमजोरियां नहीं दिखलाई! गाँव वालों को कभी ऐसा मौका नहीं दिया, के वे उसकी कमजोरियों को गाँव की चौपाल में इसे चर्चा का मुद्दा बनाए! बस, फिर क्या...? वह अपने बल-बूते से, सरकारी स्कूल में अध्यापिका बनकर सभी दुखों से लड़ती रही!
इतने दुःख पाने के बाद भी, दुःख कम नहीं हुए! एक दिन उसने सुना, के “उसके पति ने दूसरा विवाह कर लिया है!” कहा जाता है, के “बे माता ने जो लेख लिख दिए हैं, वे मिटते नहीं!” लम्बे इंतज़ार के बाद भी, दूसरी पत्नी के कोई औलाद पैदा नहीं हुई! फिर, क्या..? उन दोनों माँ-बेटे ने उसको बाँझ औरत मान लिया, फिर ताना मार-मारकर उसको घर से बाहर निकाल दिया! अब रूप सिंग अपनी बढती उम्र के बारे में सोचने लगा, जवानी हमेशा रहती नहीं! दिन-प्रतिदिन शरीर कमज़ोर होता गया....अब वह, पहले जैसा रहा नहीं! अब उन दोनों माँ-बेटे को वंश आगे चलाने वाली अगली पीढ़ी की चिंता सताने लगी, अगर यही हाल रहा तो मरते वक्त इन दोनों माँ-बेटे को पानी देने वाला कौन होगा...? ऐसे वक्त, रूप सिंग को सतभामा की याद सताने लगी! आख़िर ऐसे वक्त याद आना भी बहुत ज़रूरी है, क्योंकि सतभामा तो पहले से ही उसके बच्चे की माँ थी! अब तो रूप सिंग ख़ानदान के चिराग को हासिल करने के लिए, सतभामा को वापस बुलाने का मंसूबा बनाने लगा...अब उसके लिए, सतभामा की कीमत बढ़ने लगी! मगर, उसको वापस लाना भी कोई हंसी-खेल नहीं! वह जानता था, उसके आने के बाद सास-बहू के बीच होने वाले वाक्-युद्ध का नतीजा क्या होगा ? उसका फल, उसे ही भुगतना है! होने वाली दुर्दशा का भान होते ही, उसने बुलाने का विचार छोड़ दिया और अपने झूठे घमण्ड को त्यागकर ख़ुद सतभामा के घर जाकर रहने लग गया! यह खिलकत का रिवाज़ है, के ख़ानदान को चिराग देने वाली घरवाली को सम्मान मिलता है, मगर जहां घरवाली ख़ाली लड़कियां ही पैदा करती रहे...उसे ये स्वार्थी लोग, बार-बार ताने मारते रहते हैं के “रांड गंडूरणी हर साल पैदा करती रहती है, पैदा करती-करती इन पांच पत्थरों को जन्म दे दिया...अब इस बार कौनसा बेटा पैदा होगा, जो ख़ानदान को रौशन करेगा...?”
बरतन गिराने की तेज़ आवाज़ सतभामा के कानोँ में गिरती है, इससे उसके विचारों की कड़ियां टूट जाती है! वह जल्द वर्तमान में लौट आती है! सामने क्या देखती है..? उसका लाडला बेटा गीगला मांजे हुए बरतनों को नीचे गिराकर, उस पर मूतता जा रहा है! सारी मेहनत बेकार गयी, अब वापस बरतन मांजने पड़ेंगे..? वह क्रोधित होकर, उस नन्हें बच्चे को सौ नंबर की फटकार पिलाने लगी “क्या करता है रे, हरामी ? अब तेरा बाप आकर मांजेगा, या तेरी दादी आकर मान्जेगी ये बरतन...?” बेचारा छोटा बच्चा इस तरह की फटकार सुनकर, सहम गया! मगर यों तो वह बेचारा मासूम, चलती धार को कैसे रोकता..? फिर, क्या..? वह कुचामादी छोरा, पास रखी कपड़ों की गांठ पर मूतने लगा! पास बैठा रूप सिंग अपने बेटे का यह कारनामा देखकर, मुस्करा उठा! मुस्कराकर कहने लगा “अरे गेलसफे, ठौड़-ठौड़ कैसे मूतता जा रहा है? तू इंसान है, या पशु..?
“तू ठौड़-ठौड़, कैसे मूतता जा रहा है? तू इंसान है, या पशु..?” “तू इंसान है, या पशु...?” रूप सिंग के बोले गए ये शब्द, सतभामा के कानों में गूंजने लगे! इन शब्दों ने उसको, पुरानी कटु यादों के सागर में ला डाला! उसका अतीत चित्रपट की तरह, आँखों के आगे छाने लगा! और कभी रूप सिंग का अतीत, फिल्म की तरह आँखों के आगे आने लगा! रूप सिंग का अतीत चित्र बनकर जैसे ही उसके सामने आया, उसकी आँखें सुलगते अंगारों के माफ़िक लाल सुर्ख हो उठी! उसके अंतस में ये विचार हिल्लोरे लेने लगे “यह वही हितंगिया निर्लज्ज इंसान है, जो कभी इस औरत का पति बनता है, तो कभी उस उस औरत का...? यह कैसी, इसकी मर्दानगी..? मर्दानगी दिखलाता हुआ, किसी भी बाड़ में मूतकर आ जाता है..? इसके ये कारनामें, समाज की आँखों में दिखाई नहीं देते...? अब यह रूप सिंग, क्या बोलता जा रहा है..’तू ठौड़-ठौड़, कैसे मूतता जा रहा है?’ फिर यह बदचलन इंसान, ख़ुद कैसा है...? इसका यह कथन, गले में उतरने लायक नहीं है!” यहाँ तो कथनी और करनी में, बहुत अंतर दिखाई दे रहा है! दरवाजे पर, किसी ने दस्तक दी! दस्तक की आवाज़ उसके कानोँ में सनाई दी, वह संभलकर उठी! और जाकर दरवाज़ा खोला...सामने अपनी नणंद सौदरा बाई को देखा, वह कह रही थी, “भाभी, माँजीसा की तबीयत ठीक नहीं है, वे आप दोनों को याद कर रही है!” नणंद की बात सुनते ही, पुराणी वे सारी बातें उसके मानस को परेशान करने लगी के “यह सासजी तो वही है, जो नीम की पत्तियों की तरह कड़वी बोलते थी..? और आख़िर उसे घर से बाहर निकालकर ही, उन्होंने दम लिया! आज़ अपने द्वारा किये गए, बुरे बर्ताव को इतना जल्दी वह भूल गयी...? फिर आज़, उनको कैसे याद आ रही है..? क्या उसका घरधणी उसके कहने में है, इसलिए..? या उसकी सास को, किये गए अपने हीन कृत का पछतावा हो रहा है..? अब वह मीठा बोल रही है, क्या अब मैं उसकी नज़रों में अच्छी बन गयी हूँ...? ये सब, वक्त वक्त की बातें है! अब मैं उसकी तरह बुरी बन गयी, तो इस खिलकत में औरत की विशालता का क्या होगा..?”
फिर क्या..? अपने अंतस की आवाज़ सुनकर झट दरवाज़ा बंद करके, नन्हें गीगले को अपनी बगल में डाला..फिर, सौदरा बाई व रूप सिंग के साथ रुख्सत हो गयी! रास्ते में आये कंकर, पत्थर, कांटे, गड्डे आदि से बचते हुए वे सभी आगे बढ़ने लगे! चलते-चलते वे लोग, नाराणी बाई के मंदिर के पास जा पहुंचे..यह वही ठौड़ है जहां संध्याकाळ के वक्त सतभामा, बरगद के नीची खड़ी रहकर अपने शौहर रूप सिंग का इंतज़ार किया करती! मध्य रात्रि का वक्त, अब चारो तरफ़ सांय-सांय की आवाज़ करती हुई तेज़ हवा बह रही थी! अब उल्लू, चमगादड़ जैसे कई निशाचर परिंदों के कलरव की आवाजें, बढती जा रही थी! अचानक तेज़ हवा के झोंके से, बरगद की डालियाँ व पत्ते खङ-खङ की आवाज़ करते हुए हिलने लगे! उधर सतभामा की नज़र मंदिर के पुराने पाट पर जा टिकी, जो इस वक्त हवा के झोंके से नीचे गिर गये थे! तभी मंदिर के अन्दर, किसी के चलने की आवाज़ सतभामा को सुनाई दी! तभी एक चमगादड़ों का झुण्ड उड़ता हुआ उनके ऊपर से गुजरा, उङने की फरणाटे की आवाज़ सुनकर सब के रोंगटे खड़े हो गए! कमज़ोर दिल वाली सौदरा बाई का तो पूरा बदन थर-थर कांपने लगा! वह डरकर अपनी भाभी से चिपक गई, और घबराई हुई कहने लगी “भाभी अब विलम्ब मत करो, मुझे इस गहन अंधकार से डर लगता है! जल्दी चलो, भाभी...जल्दी, चलो!” इतना कहकर, उसने सतभामा का हाथ जोर से पकड़ लिया! उसको दिलासा देती हुई, सतभामा कहने लगी “घबराओ मत! मैं हूँ ना, आपके साथ में!” अब थोड़ी देर तक कोई नहीं बोला, फिर अचानक पदचाप की आवाज़ सुनाई दी! ऐसा लग रहा था के “कोई एक इंसानी परछाई, दूसरी परछाई को झपटने के लिए उसके पीछे दौड़ रही है!” अब तो सतभामा को पक्का संदेह हो गया, के "कोई निरलज्ज मर्द-औरत खोटे काम करने के लिए, इस पावन मंदिर में घुस गए हैं!” सतभामा को लगने लगा, कहीं धरती कांप रही हो..सारी दुनिया घूम रही है! इस शरद-रात्रि को इतनी ठंड होने के बाद भी, उसका बदन पसीने से नहा गया, और इधर मद भरी चुम्मा-चुम्मी की आवाज़ें उसके कानोँ में सुनायी दी! अब तो सतभामा के लिए वहां खड़ा रहना मुश्किल हो गया! उसका सर चक्करी की तरह घूमने लगा, इधर उसकी फ़िक्र बढ़ने लगी, के ऐसे कौन वहशी लोग इस मंदिर में घुसकर खोटे काम कर रहे हैं...? अब उसे वह मंजर आँखों के आगे घूमने लगा, जब नाराणी बाई ने उस पर ताना कसा था के ““रांड तेरी आँखें फूटे, तेरी जवानी को अंगारे लगे! क्यों आती हो, यहाँ अपना काला मुंह करने ? खोटे काम करने के लिए, यह मंदिर ही मिला तूझे..?” फिर क्या...? उसने पक्का इरादा कर लिया, के “आज तो नाराणी बाई के लगाये इलज़ाम को झूठा साबित करना ही पड़ेगा, और असलियत को सामने लाना ही होगा!” इतना सोचने के बाद सतभामा, रूप सिंग से कहने लगी के “गीगला के बापू! मंदिर में कौन घुस गया है...? अन्दर क्या रोळ है, चलिए मंदिर के अन्दर देख आयें!”
मंदिर के अन्दर घुसते ही, ज़ोर से चिल्लाने की आवाज़ सुनाई दी! इन सबको अन्दर आते देखकर, एक मर्द पर लता की तरह लिपटी हुई नारी की परछाई...मर्द के बाहुपोश के जाल से निकलकर बैना की तरफ़ पाँव बढाने लगी! मगर उसके पहले, उसकी कलाई सतभामा के हाथ में आ गयी!
बादलों की ओट से चन्द्रमा बाहर आ गया, अब उसकी रौशनी उस नारी के चहरे पर गिरी! रौशनी में उस नारी का मुख देखते ही, सतभामा के मुंह से अचरच की चीख निकल गयी! सतभामा की आँखें फटी की फटी रह गयी, उस नारी का मुंह देखकर उसको विशवास नहीं हो रहा था...? उस नारी को पहचानते ही, सतभामा का गुस्सा सांतवे आसमान पर जा पहुँचा! वह गुस्से में, कहने लगी “बाईसा आप...ऐसे काम करती हो, नाराणी बाई का नाम डूबाकर...आप उनकी पौत्री बाईसा होकर, अपना नाम निकाल रही हो..?” आगे सतभामा उसे एक शब्द न कहकर, उसकी कलाई छोड़ दी! कलाई छोड़ते ही, वह डरी हुई हिरणी की तरह सरपट दौड़कर सबकी नज़रों से ओझल हो गयी! लम्बी सांस लेकर, सतभामा रूप सिंग से कहने लगी “अब चलिए जी, माँजीसा इंतज़ार कर रही है, जल्दी चलो! शायद, डॉक्टर साहब को बुलाना पड़े..!” थोड़ी देर बाद सभी मंदिर से बाहर निकलकर आ गए, और माँजीसा के घर की तरफ़ कदम बढा दिए!
दूसरे दिन, संध्या के वक्त सतभामा बरगद के नीचे खड़ी अपने शौहर का इंतज़ार कर रही थी, अचानक उसकी निग़ाह मंदिर के पाट पर जा टिकी! मंदिर के पाट को देखकर उसे अचरच होने लगा...के, मंदिर के नये पाट लग गए हैं! “नए पाट लग जाने से समस्या का समाधान हो गया या नहीं..?” इस मुद्दे पर, कई आशंकाएं उसके ह्रदय में जन्म लेने लगी! वह सोचने लग गयी के “नए पाट लगाने से इस समस्या का समाधान कभी नहीं होगा, जहां चढ़ती जवानी और बेलगाम हो चुके बच्चों को अब रोका नहीं जा सकता!” उसके मुंह से बरबस यह जुमला निकल उठा “खुला बैना में घुसने वाले चोरों का कालज़ा इतना पक्का हो गया है, अब वे चोरी नहीं...डाका ही डालेंगे! बैना के पाट, इनको कैसे रोकेगा...?”
लेखक दिनेश चन्द्र पुरोहित [निवास अँधेरी-गली, आसोप की पोल के सामने, वीर-मोहल्ला, जोधपुर.]
ई मेल dineshchandrapurohit2@gmail.com
मेरी बात - मारवाड़ के भवन, दूसरे प्रदेशों के भवन से विभिन्न है! इनमें दाखिल होने के बाद जो पहला स्थान आता है...उसे बरसाली, या बैना कहा जाता है! यहां दाख़िल होने के बाद, जूते खोले जाते है! इसके बाद ही, घर के दूसरे कमरों और चौक में जाया जा सकता है! धान की बोरी से थोड़ा धान निकालकर हथेली में लेते हैं, फिर उस धान की जांच करके हम आराम से बता सकते हैं के “इस बोरी के अन्दर, धान की किस्म कैसी है...?” इसके बाद, हमें अब पूरी बोरी के धान को देखने की कोई ज़रूरत नहीं! इसी तरह मकान का बैना देखने पर, पूरे मकान की स्थिति का जायजा लिया जा सकता है! बस यही तरीका है, ख़ानदान परखने का! इस कारण इस कहानी का शीर्षक रखा गया है “बैना रौ पाट” ! पाट का अर्थ है, दरवाज़ा! जो रखवाली करता है, चोरों से! वह मज़बूत होगा, तब ही घर में चोर दाखिल न हो पायेंगे! ख़ानदानी औरतें ख़ानदान की रस्मी रिवाज़ निभाती है, व उनकी आँखों में हया मौजूद रहती है! जिस तरह मकान का बैना देखकर मकान की मज़बूती देखी जा सकती है, उसी तरह अच्छे ख़ानदान की पहचान, औरत की आँखों में शर्म देखकर की जा सकती है!



लेखक का परिचय
लेखक का नाम दिनेश चन्द्र पुरोहित
जन्म की तारीख ११ अक्टूम्बर १९५४
जन्म स्थान पाली मारवाड़ +
Educational qualification of writer -: B.Sc, L.L.B, Diploma course in Criminology, & P.G. Diploma course in Journalism.
राजस्थांनी भाषा में लिखी किताबें – [१] कठै जावै रै, कडी खायोड़ा [२] गाडी रा मुसाफ़िर [ये दोनों किताबें, रेल गाडी से “जोधपुर-मारवाड़ जंक्शन” के बीच रोज़ आना-जाना करने वाले एम्.एस.टी. होल्डर्स की हास्य-गतिविधियों पर लिखी गयी है!] [३] याद तुम्हारी हो.. [मानवीय सम्वेदना पर लिखी गयी कहानियां].
हिंदी भाषा में लिखी किताब – डोलर हिंडौ [व्यंगात्मक नयी शैली “संसमरण स्टाइल” लिखे गए वाकये! राजस्थान में प्रारंभिक शिक्षा विभाग का उदय, और उत्पन्न हुई हास्य-व्यंग की हलचलों का वर्णन]
उर्दु भाषा में लिखी किताबें – [१] हास्य-नाटक “दबिस्तान-ए-सियासत” – मज़दूर बस्ती में आयी हुई लड़कियों की सैकेंडरी स्कूल में, संस्था प्रधान के परिवर्तनों से उत्पन्न हुई हास्य-गतिविधियां इस पुस्तक में दर्शायी गयी है! [२] कहानियां “बिल्ली के गले में घंटी.
शौक – व्यंग-चित्र बनाना!
निवास – अंधेरी-गली, आसोप की पोल के सामने, वीर-मोहल्ला, जोधपुर [राजस्थान].
ई मेल - dineshchandrapurohit2@gmail.com


 


 इस  मारवाड़ी कहानी को उसी भाषा मे पने के लिए यहाँ चटखा लगाए






1 comments:

  1. प्रिय पाठकों,
    साहित्य शिल्पी पत्रिका में, मेरी लिखी गयी कई राजस्थानी [मारवाड़ी] भाषा की कहानियां हिंदी-अन्नुवाद सहित पढ़ी होगी ! आपको विदित है, रेल गाड़ी से रोज़ आना-जाना करने वाले एम.एस.टी. होल्डर्स की हास्य गतिविधियों पर दो हास्य-नाटक लिखे थे ! अब इस दौरान आज़कल मैं आपके "कठै जावै रै, कडी खायोड़ा" का हिंदी अनुवाद कर रहा हूँ ! इसके पहले भाग "कहाँ जा रिया है, कड़ी खायोड़ा" कुछ अंश प्रस्तुत कर रहा हूं, आपको अच्छा लगे तो आप अपनी स्वीकृति भिजवावे ! मगर याद रखना, यह पूरा नाटक १५ भागों में लिखा गया है जो सिलसिलेवार ही प्रस्तुत किया जा सकता है ! आपको, धीरज रखना भी होगा ! अब आप पढ़िए, वाक्यांश -:
    [इस तरह बड़बड़ाते हुए फुठरमलसा, बार-बार अपने तकिया-क़लाम ”कहाँ जा रिया है, कङी खायोड़ा” को बोलते जा रहे हैं, और बदहवाशी में चलते-चलते जा पहुंचे....उतरीय पुल के मध्य समतल हिस्से पर ! जहां से दूसरे कई प्लेटफार्मों पर उतरने की सीढियां लगी है ! वहां चलते-चलते, वे आगे चल रहे सरदार निहाल सिंग से टक्कर खा बैठते हैं! टक्कर लगते ही बेचारे सरदारजी ओंधे-मुंह जाकर गिर पड़ते हैं, पास चलते किन्नर गुलाबो के ऊपर ! बिचारा गुलाबा किन्नर, चलता-चलता अरोग रहा था केला ! केला खाकर जैसे ही वह छिलके को नीचे गिराता है, बस तभी सरदारजी धड़ाम से आकर गिरते है उस उस पर ! वह बेचारा कोमल बदन वाला हिंज़ड़ा, कैसे सरदारजी का वज़नी शरीर को संभाल पाता ? बस, फिर क्या ? चिल्लाता हुआ आकर गिरता है, उस केले के छिलके के ऊपर ! छिलके के ऊपर गिरते ही, वह ऐसे फिसलता है मानो वह बर्फ की शिला पर फिसल रहा हो..? उठते वक़्त वह अपना पाँव वापस रख देता है, उसी केले के छिलके के ऊपर ! बस, फिर क्या...? किस्मत का मारा, बेचारा गुलाबा एक बार और गिरता है फ़र्स पर ! अब इस मंजर को देख रहे, फुठरमलसा ठहाके लगाकर हंसते हैं ! उनका ठहाका लगाकर हंसना, गुलाबा को काहे पसंद आवे..? बस वह कुचमादिया का ठीईकरा, फुठरमलसा के गले पड़ जाता है ! और उन्हें बाहुपोश में झकड़कर, उनके तकिया-क़लाम की यूं के यूं नक़ल कर बैठता है !]
    गुलाबो – [तकिया-क़लाम की नक़ल करता हुआ] – कहां जा रिया रे, कङी खायोड़ा म्हारा सेठ..? [फुठरमलसा को अपने बाहुपोश में झकड़ लेता है] अबै मैं तो कहीं नहीं जा रयी हूँ, म्हारा सेठां ! खम्मा घणी सेठां, हमै खोल दो नोटां की थैली...नहीं तो नाड़ो खोल दूं, थाणी चड्डी को..?
    [इतना कहकर, गुलाबा तो उनके चारों और ताली बजा-बजा कर नाचने लगा ! इतने में सीढ़ियां चढ़कर आ रहे उसके दूसरे साथी हिंज़ड़े भी, नाच में शामिल हो गए ! इन हिंजङो को नाचते हुए देखकर, सरदारजी का दिल भी नाचने के लिए उतावला होने लगा ! इतने सारे तमाशबीन को खड़े पाकर, सरदारजी अपने दिल को काबू में नहीं रख पाते हैं ! और पंजाबी गीत गाते हुए, सरदारजी भांगड़ा डांस कर बैठते हैं !]
    निहाल सिंग – [नाचते हुए, गाते हैं] – अरी कुड़ी पंजाबण आ गयी, मेनु दिल को चुरा कर ले गयी..हाय हाय रबा अब क्या करूँ, ना इधर का रहा न उधर का रहा ! अरी कुड़ी पंजाबण आ गयी, मेनु दिल को चुरा कर ले गयी !”
    कहिये जनाब, वाक्यांश कैसा लगा ?
    दिनेश चन्द्र पुरोहित [लेखक व अनुवादक]
    dineshchandrapurohit2@gmail.com

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साहित्य शिल्पी, हिन्दी और साहित्य की सेवा का मंच, एक ऐसा अभियान.. जो न केवल स्थापित एवं नवीन रचनाकारों के बीच एक सेतु का कार्य करेगा अपितु अंतर्जाल पर हिन्दी के प्रयोग और प्रोत्साहन का एक अभिनव सोपान भी है, अपने सुधी पाठको के समक्ष कविता, कहानी, लघुकथा, नाटक, व्यंग्य, कार्टून, समालोचना तथा सामयिक विषयो पर परिचर्चाओं के साथ साहित्य शिल्पी समूह आपके समक्ष उपस्थित है। यदि राष्ट्रभाषा हिदी की प्रगति के लिए समर्पित इस अभियान में आप भी सहयोग देना चाहते हैं तो अपना परिचय, तस्वीर एवं कुछ रचनायें हमें निम्नलिखित ई-मेल पते पर प्रेषित करें।
sahityashilpi@gmail.com
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