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 अर्जुन सिंह नेगीरचनाकार परिचय:-







अर्जुन सिंह नेगी
नारायण निवास, कटगाँव
तहसील निचार, जिला किन्नौर
हिमाचल-172201



‘यत्र: नार्यौ पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:’ इस सूक्ति को समझने वाले आज भी बहुत कम हैं | आज तक भी हम नारी को वो सम्मान नहीं दे पाए जिसकी वो हकदार है | भले ही आज कानून कन्या भ्रूण हत्या को अपराध मानता है लेकिन कन्या भ्रूण हत्या के कई मामले सामने आते हैं | बेटी को पैदा होने से पहले ही मार दिया जाता है | पैदा हो भी जाती है तो हमारा कठोर समाज उन्हें सुख से जीने भी नहीं देता | पुरुष तो पुरुष, औरतें स्वयं बेटी के पैदा होने पर खुश नहीं होती |
रमेश के घर की भी कुछ ऐसी ही कहानी है | सुधा कमरे मे बैठी आँखों मे आंसू लिए अपने भाग्य को कोस रही है | उसके मन मे आत्महत्या करने का ख्याल आता है | अचानक उसकी छोटी बेटी राधा उसे पुकारती हुई कमरे मे प्रवेश करती है | राधा बोली- माँ, बाहर चूड़ियोंवाला आया है | दीदी ने कहा माँ से कह दो |
सुधा अपनी बेटी को देख आंसू पोंछ देती है | वो मन ही मन सोचती है ,’मैं न रहूँ तो मेरी बेटियों का क्या होगा’ | वो आत्महत्या करने का ख्याल भुलाकर बाहर चली जाती है | सुधा अपनी दोनों बेटियों राधा और चन्दा को चूड़ियाँ खरीदकर देती है | दोनों बहने चूडिया पहनकर अठखेलियाँ करती हैं |
सुधा का विवाह दस बरस पहले रामपुर के रमेश से हुआ था | आज उसकी दो बेटियाँ, सात बरस की राधा और नौ बरस की चन्दा हैं | रमेश एक नौकरी पेशा व्यक्ति है | रमेश के पिता स्वाभाव से भोले- भाले हैं | माँ यूँ तो अच्छी है पर पुराने ख्यालातों की महिला हैं | रमेश की माँ अपनी बहू से बहुत प्यार करती थी | लेकिन जबसे राधा पैदा हुई है, वो सुधा को देखना भी पसंद नहीं करती | वो चन्दा और राधा से भी दूर ही रहती है | सुधा की दोनों बेटियां बाहरी दुनिया से अनजान अपना बचपन व्यतीत कर रही हैं | चन्दा तो माँ के सभी कामो मे हाथ बंटाती है | वह तो छोटी होकर भी सयानी है | राधा का भी ख्याल रखती है | राधा भी माँ के साथ कम दीदी के साथ ज्यादा रहती है | दोनों पढने मे भी होशियार है | दोनों बहने नहीं जानती की दादी उनसे नफरत करती है |
आज रमेश को दफ्तर से लौटने मे थोड़ी देर हो गई | सुधा मोबाइल से फोन तो लगाती है पर फोन मिला नहीं | सुधा घरवालों को खाना खिलाकर, चन्दा और राधा को सुला देती है | रात को 12 बजे के करीब रमेश नशे की हालत मे घर लौटता है | सुधा ने देर से आने का कारण पूछा तो रमेश ने उसे पीटना शुरू कर दिया | सुधा हैरान है की आज रमेश को क्या हो गया | झगडे का शोर सुनकर चन्दा जाग जाती है | उसने अपनी माँ को पिता से पिटते देखा | वह डरकर चुपचाप बिस्तर मे पड़ी रही | जैसे- तैसे रमेश बिना खाए-पिए ही सो गया | सुधा सारी रात नहीं सो पाई | वह अपने भाग्य को कोसती रही | रमेश अपनी पत्नी से प्यार तो करता है परन्तु बेटा पैदा न होने की वजह से रमेश की माँ ने तीसरे बच्चे की जिद लगा रखी है | इसी कारण घर मे तनाव का माहौल रहता है |
पढ़ी-लिखी महिला होने के कारण सुधा नहीं चाहती की उनका तीसरा बच्चा हो | उसके लिए तो दो बेटियां ही काफी हैं | उसने रमेश को भी समझा बुझाकर मना लिया था | लेकिन माँ ने ना जाने रमेश को कौन sasaसा पाठ पढ़ा लिया वो फिरसे तीसरे बच्चे की जिद करने लगा है | रमेश कहता है – ‘ हमें घर का वारिस चाहिए | चन्दा और राधा तो पराया धन हैं | वो कब तक हमारे पास रहेंगी | ‘ इस तरह घर मे खिचखिच होती रहती है | साथ ही सुधा के मन मे ये भय भी रहता है की तीसरा बच्चा भी बेटा न हुआ तो.... |
सुधा यह सोच सोच कर कमज़ोर होती जा रही है | सासु माँ भी उसे रोज़ ताने सुनाती है | कुछ दिनों बाद कुल्लू से उसकी मौसी आती है | सुधा अपना दुखड़ा मौसी को सुनाती है | सब सुनकर मौसी बोली- ‘ हमारे गाँव मे एक तांत्रिक है | वह नज़र उतारता है और बेटा पैदा होने की झाड फूंक भी करता है | उसके पास कई औरतें जाती हैं |’ नियति ने सुधा के साथ कैसा खेल खेला है | वो पढ़ी लिखी भी है और अंधविश्वास भी नहीं करती | लेकिन आज उसका मन तांत्रिक के पास जाने को कह रहा है | कुछ दिनों बाद वह मौसी से मिलने के बहाने तांत्रिक के पास जाती है | तांत्रिक झाड-फूंक कर उसे बेटा पैदा होने का आश्वासन देता है |
संयोगवश सुधा अगले ही महीने गर्भवती हो जाती है | अब तो सासु माँ बहू की सेवा शुरू कर देती है | जिस बहू की वह सूरत तक देखना नहीं चाहती , अब दिन- रात उसकी सेवा करती है | लेकिन चन्दा और राधा तो आज भी उसकी आँखों को चुभते हैं | यह सब देख सुधा को अच्छा नहीं लगता है | अब घर का माहौल भी शांतिपूर्ण है | ऐसी बदली हुई स्तिथि सुधा को और भी परेशान करती है | उसे तो यही ख्याल सता रहा है की तीसरी भी बेटी हुई तो क्या होगा | वह भगवान् का सुमिरन कर , सबकुछ उस पर छोड़ देती है | लेकिन वह कमज़ोर होती जा रही है | एक ओर घर्भावस्था और दूसरी ओर तीसरे बच्चे की चिंता |
लगभग नौ महीने बीत गए बच्चे के पैदा होने का समय आ गया | घर मे खुशियों का माहौल है | सुधा को अस्पताल ले जाया जाता है | वहीँ पर वह एक नन्हे बेटे को जन्म देती है | पूरा परिवार खुशियाँ मन रहा है | सासु माँ को पोता मिल गया | चन्दा और राधा को भाई मिल गया | रमेश तो यही सोचकर भगवान् का धन्यवाद कर रहा है की अब घर मे शान्ति रहेगी | लेकिन सुधा के चेहरे पर कोई भाव नहीं है | अभी सुधा को अस्पताल से छुट्टी भी नहीं मिली है |
बच्चे के पैदा होने के ठीक दो घंटे बाद सुधा अपनी सांसें छोड़ देती है | बेटे ने केवल एक ही बार स्तनपान किया था | अब उसके नसीब मे माँ का प्यार नहीं रहा | रमेश और चन्दा का रो रोकर बुरा हाल है | राधा गुमसुम सी सबको देख रही है | उसे लग रहा है जैसे माँ सोई है | सासु माँ भी अपने भाग्य को कोस रही है | जिद्द के कारण उसने एक सुशील बहु खो दी | बहु ने तो उसे पोता दे दिया लेकिन पोते के सर से माँ का साया ही उठ गया | आज उसे अहसास हो रहा है की उसने पाकर भी खो दिया |



2 comments:

  1. "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः। यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रिया:।" मनुस्मृति का वचन है। (देखें https://vichaarsankalan.wordpress.com/2009/09/11/) इस ग्रंथ में सामाजिक जीवन के कार्याकार्यों का लेखा-जोखा है। हम भारतीयों की यह विशेषता है कि "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।", "अतिथिदेवो भव", "सर्वे भवन्तु सुखिन:", "वसुधैव कुटुम्बकम्" सदृश वचनोंं को सही परिप्रेक्ष में नहीं देख पाते हैं। ऐसे वचन तत्कालीन दार्शनिकों, चिंतकों, उपदेष्टाओं, समाज-सुधारकोंं ने बोले थे ताकि समाज उन वचनों के अनुरूप ढले। ये वचन तत्कालीन समाज के स्वरूप का प्रतिबिम्बन नहीं करते। ऐसा कतई नहीं कि समाज इन आदर्शों के अनुरूप चलता था। परंतु अपनी प्राचीन संस्कृति को श्रेष्ठ दर्शाने के लिए अति उत्साह में हम कह बैठते हैं कि "प्राचीन भारतीय समाज की परंपराएं कितनी श्रेष्ठ थीं"। ये वचन तो महज यह बताते हैं कि तब के प्रतिष्ठित जन क्या होना चाहिए की बात करते हैं, न कि तब का समाज वास्तव में वैसा था यह बताते हैं। अपवाद रूप में नारियां तब भी सम्मानित होती थीं और आज भी होती हैं। लेकिन व्यापक तौर पर वे सदा ही तिरस्कृत रहीं हैं। पुत्र की कामना विश्व के प्रायः सभी सामाजोंं में लोग करते रहे हैं। बदलाव तो पिछले दो सदियों में आने लगा।

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