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 आलोक कुमार सातपुते रचनाकार परिचय:-


आलोक कुमार सातपुते
832 हाउसिंग बोर्ड कालोनी सड्डू रायपुर छग
मोबाइल नं 09827406575



प्रेम-पत्र 

मेरी प्यारी बेटी, दीपिका,
तुमने मुझसे कई बार कहा था कि पापा आप मुझे लव लेटर लिखना सीखा दीजिए। आप तो एक राईटर हैं। भाषा पर तो आपकी जबरदस्त पकड़ है। आपके लिये तो लव लेटर लिखना बांए हाथ का खेल है। तुम्हे तो याद होगा कि हम दोनों के बीच दोस्ताना सम्बन्ध रहे हैं। मैं जब तुमसे पूछा करता था। कि तुम लव लेटर लिखना सीखने के बाद किसे लिखा करोगी तो तुमने बडे़ ही खिलंदड़पन के साथ कहती थी कि पापा मेरे सबसे बडे़ प्रेमी तो आप ही हैं। मैं आपसे ही लव लेटर लिखने की शुरूआत करूंगी, और खिलखिला पड़ी थी। मैंने कहा था- बेटी अपने ब्वॉयफ्रेण्ड्स को लिखो तो कुछ सार्थक होगा, इस पर तुम शरमा सी गई। दीपिका, जब तुम कहती थीं कि मेरे लिये इस तरह का लव लेटर लिखना या किसी को लिखना सिखाना बाँये हाथ का खेल है तो मुझे भी लगता था कि वाकई में यह तो मेरे लिये आसां है। पर जब लिखने बैठा तब समझ आया प्रेम एक अथाह समुद्र की भांति होता है। इसमें हम जितना गहरे उतरते जायेंगे, उतने ही हमें नये-नये दुर्लभ रत्न मिलेंगे। हम भ्रमित हो जायेंगे कि हम अपने अंक में क्या समेटे और क्या छोड़ दे। यह हो सकता है कि हम मूंगे-मोतियों की चाह में समुद्र में उतरें और हमारे हाथ सिर्फ़ कौड़ियाँ ही लगें। तमाम तरह के समुद्री ख़तरों को उठाते हुए हम उसकी गहराइयाँ नापें और कौड़ियाँ उठाकर ले आयें तो यह हमारी नादानी होगी। मैंने तुमसे बार-बार कहा है कि बेटी सपनों के मर जाने का सोचकर सपने देखना नहीं छोड़ते। तुम्हारे पास उड़ने को खुला आसमान है, सिर्फ तुम्हें अपने पास पंख होने की जानकारी नहीं है।
बेटा प्रेम और आकर्षण के बीच एक झीनी सी रेखा होती है, जो कई-कई बार तो हमें नज़र भी नहीं आती है, और साधारण से दैहिक आकर्षण को हम प्रेम समझ बैठने की भूल कर बैठते हैं। बेटा प्रेम सोशल मीडिया में चलने वाला कोई जोक नहीं है, जिसे हम पढ़ते साथ कहीं और फारवर्ड करने बैठ जायें। प्रेम एक जिम्मेदारी का नाम है। यदि मैं तुमसे प्रेम करता हूँ तो यकीं मानों मैं तुम्हारे प्रति पूरी तरह जिम्मेदारी निभाने के लिए कटिबध्द और प्रतिबध्द हूँ। और मैं तुमसे भी यही अपेक्षा करता हूँ कि तुम चाहे जिससे भी प्रेम करो, जिम्मेदारी समझते हुए शुचिता बनाये रखकर करो। कई बार प्रेम अपराधबोध का कारण बन जाता है। बेटा अपराधबोध हमारे व्यक्तित्व को खोखला कर देता है, इसलिए इस बोध से यथा-संभव बचने की कोशिश करो।
दरअसल बेटा हमने अपनी चारों ओर संस्कारों का जाल सा बुन रखा है और हम उसी में फँसकर छटपटाते रहते हैं। वास्तव में प्रकृति में जो भी घटता है वह सारा कुछ प्राकृतिक ही होता है, इसलिये घटित घटनाओं को लेकर अपराध बोध न हो। मुझे दरअसल तुम्हारी चिन्ता इसलिए भी रही है कि तुम इंटरनेट युग की लड़की हो, जहाँ एक किल्क में दुनिया जहाँ की चीज़ें हमारे सामने आ जाती हैं। बेटा जिस तरह प्रेम ओर आकर्षण में बारीक सा विभेद हैं, बस उसी तरह सूचना और ज्ञान में अंतर है। हमें डाटा कलेक्शन सेण्टर नहीं बनना है, बल्कि हमें ज्ञानी बनाना है। हमें सूचनाओं को ज्ञान में ढालना आना चाहिये। बेटा तुम दूसरी कक्षा में पढ़ती थी,जब हमने तुम्हे गोद लिया था। गुजरात भूंकप में एक मासूम सी बच्ची। आज तुम पूरी तरह समझदार हो गई हो। तुम्हें याद पड़ता होगा या तुमने महसूस किया होगा कि तुमसे बिछड़ने के पहले तक जब हम जब भी सड़क क्रास करते थे तो मैं तुम्हारा हाथ थाम लेता था। मेरे लिये तो तुम आज भी दूसरी कक्षा में पढ़ने वाली सात-आठ साल की बच्ची हो। तुम चाहे जितनी भी बडी़ हो जाओ, मेरे लिए तुम बच्ची ही रहोगी। तुम मेरी आत्मा तक गहरे उतरी हुई हो। तुम्हे याद होगा तुम्हारी मम्मी के जाने के बाद मैं आध्यात्मिक होकर वैरागी की तरह जीवन जीने लगा था। फिर मैंने वैराग्य से बचने के लिए आध्यात्म छोड़ दिया, क्योंकि आध्यात्म मुझे स्वार्थी बनाने लगा था। मैं तुमसे ही दूर होने लगा था। मैं भला ऐसे आध्यात्म से वास्ता क्यों रखूं जो मुझे उससे दूर रखे जिससे मैं बेहद प्यार करता हूं। बेटा हर बाप के लिए उसकी बेटी खूबसूरत होती है, लेकिन मैं तो तुम्हे दुनियाँ की सबसे ख़ूबसूरत रचना मानता हूँ। और ईश्वर को इस बात के लिए रोज धन्यवाद भी देता हूँ, कि उसने मुझे तुम्हें पालने का सौभाग्य प्रदान किया। जब तुम मेरे सामने होती तो यकीन मानां मुझे लगता है कि कोई महिला देवदूत बनकर परी की शक्ल में मेरे आस-पास है। लेकिन जब तुम सामने नहीं होती तो मैं आशंकित हो जाता हूं। शायद मैं तुम पर एकाधिकार चाहता हूं। यहां पर तुम मुझे स्वार्थी कह सकती हो। यकीन मानां मैंने हर तरीके से तुम्हें खुश रखने की कोशिश की है, सीमाएं लांघकर, मर्यादाएं लांघकर भी। तुम मेरे जीवन का उद्देश्य रही हो। तुम मेरे जीवन में रेगिस्तान में पानी की तरह हो। मैंने तुम्हारे साथ का हर लम्हा अपनी यादों में संजोकर रखा है। बेटा तुमसे बात करके मेरा सारा तनाव दूर हो जाता है। तुम मेरे लिए एक औषधि हो। ऐसा मैं इसलिए नहीं कह रहा हूं क्योंकि मैं तुमसे बेहद प्यार करता हूं। लाईफ में तुम कुछ बनो या न बनो, एक अच्छी इंसान तो तुम बचपन से हो ही, इसलिये तो मैं तुम्हें बेहद प्यार करता हूं। मैंने सच में एक बेटी की कामना की और तुम आदर्श रूप में माजूद हो। तुम्हारी तमाम नादानियों के बावजूद तुम मेरी आदर्श बेटी थी और रहोगी। मैं हमेशा से चाहता रहा कि तुम मुझे दोस्त ही समझो और अपने तमाम निर्णयों में मुझे शामिल करती रहो, चाहे वे निर्णय सामाजिक रूप से जायज हों या न हों। इसमें बाध्यता वाली बात नहीं थी, बल्कि तुम्हारी मर्जी थी। तुम्हारा हर निर्णय मेरे सर-आंखों पर है। मैं एक तरह से अपनी बेटी का अंध समर्थक हूं।
तुमने संजीव के साथ ब्याह कर लिया और मुझे बताया तक नहीं। यह कैसा दोस्ताना रहा हमारे बीच। तुमने शायद सोचा होगा कि मैं संजीव से तुम्हारी शादी करने के लिए इनकार कर दूँगा। अगर तुम ऐसा सोचती हो तो इसका मतलब यह है कि तुमने अपने बाप को जाना नहीं है। मेरी बेटी की पसंद ही मेरी पसंद है। तुमने कम से कम एक बार कहा तो होता। तुम्हारे इस कदम ने मुझे आज अहसास कराया है कि तुम अब बड़ी हो गई हो। तुम्हें मेरी ऊँगलियाँ थामने की ज़रूरत नहीं रही। लेकिन बेटा मैं यह बार-बार भूल जाता हूँ कि तुम अब बडी़ हो गई हो, और मेरे साथ नहीं हो। अब जबकि तुमने ब्याह कर लिया है, तो मैं चाहूंगा कि अपने दाम्पत्य जीवन को हिमालय की उंचाईयां दो। मैं एक बहादूर बच्ची का बाप हूं। यह मेरे लिये गर्व की बात हैं। मैंने तुम्हारे कमरे को खुला ही रख छोड़ा है। पता नही क्यों तुम्हारा कमरा मुझे तुम्हारे होने का अहसास कराता है। साथ ही यह उम्मीद भी जगाता है कि कभी तो तुम अपने बाप से मिलने आओगी।
बेटा जब तक तुम मेरे साथ थी, मैं अपने-आपको बेहद एनर्जेटिक महसूस किया करता था और तुम्हारे जाने के बाद अचानक मैं अपने आपको बूढ़ा सा महसूस करने लगा हूँ। कभी-कभी मुझे लगता है कि हमारे बीच जो भी सम्बन्ध रहे हैं, वे सिर्फ़ और सिर्फ़ औपचारिक तो नहीं रहे हैं। दीपिका मुझे पता ही नही चला कि तुम अपने घर को एक पिंजरा समझती रहीं। संजीव से तुम्हारा कोर्ट मैरिज कर लेना इस बात को पुष्ट करता है कि तुम्हे घर में बंधन सा महसूस होता था। मुझे यह बिल्कुल भी समझ में नही आ रहा है कि मेरी परवरिश में आखिर चूक कहाँ रह गई । शायद मुझे तुम्हारे युवा होने का अहसास ही नहीं हो पाया। मैं समझ ही नहीं पाया कि युवाओं की अपनी इच्छाएँ, आकांक्षाएँ या तमन्नाएँ हो सकती हैं। तुम इस घर रूपी पिंजरे से बाहर निकलकर खुले आसमान में उड़ना चाहती थी। तुमने मुझे इस बात का जरा भी अहसास कराया होता तो मैं अपने हाथों से तुम्हें पंख फैलाकर उड़ने के लिए छोड़ देता। मैं आज तुमसे माफी माँगना चाहता हूँ। तुम्हें ना समझ पाने के लिए । मैं माफी माँगना चाहता हूँ एक लड़की का बाप होने के लिए। मैं माफी चाहता हूँ तुम्हारी तमन्नाओं का कत्ल करने के लिए। मैं माफी चाहता हूं अपने हर उस अपराध के लिए जो मेरे अनुसार परवरिश के लिए आवश्यक माने जाते हैं। मैं तुम्हारा अपराधी हूँ। बेटा तुम इस घर के रोम-रोम में महसूस की जा सकती हो। मुझे यह स्वीकार करने में जरा भी संकोच नहीं है कि मैं तुम्हे अपनी बेटी न मानकर, अपनी प्रेमिका मानता था। एक ऐसी प्रेमिका जो मुझसे ही सीखकर मुझे ही लव लेटर लिखे। मुझे लगता है मेरे द्वारा लिखे गये इस पत्र को लोग कभी नही मानेंगे कि ये किसी पिता द्वारा अपनी पुत्री को लिखे गये हैं।
तुम्हें अपने कृत्य पर किसी तरह का अपराधबोध पालने की जरूरत नहीं है। तुमने कोई अपराध नहीं किया है। तुम यदि सही हो तो सही ही हो और यदि तुम गलत भी हो, तो भी मेरे लिए सही ही हो। मैंने फेसबुक की कव्हर पिक्चर में तुम्हारी फोटो डाल रखी है। साथ ही व्हाट्सअप की डीपी में भी वही फोटो है, जिसमें तुम्हारी मोनालिसा की तरह रहस्यमयी मुस्कान है। साथ ही है एक कविता। मेरी अपनी कविता। मेरी बेटी नाम की इस कविता में मैने लिखा है-नदी है मेरी बेटी/उद्गम पर पतली/पहाडो़ं पर दहाड़ती/मैदानों पर मंथर गति से बहती/झरनों पर वेगवती/नदी है मेरी बेटी।
मैं तुमसे सिर्फ और सिर्फ इतनी ही उम्मीद करता हूँ कि तुम एक बार आ जाओ फिर हम दोनो एक दूसरे से लिपटकर फूट-फूट कर रोयेंगें। बस यूँ ही रोयेंगे अकारण।
तुम्हारे इंतजार में
तुम्हारा पापा

आलोक कुमार सातपुते
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