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पद्मा मिश्रारचनाकार परिचय:-
पद्मा मिश्रा का०हि०वि०, वाराणसी में पात्रता प्राप्त व्याख्याता हैं। आप कई विधाओं में रचना करती हैं, यथा - कविता, कहानी, ललित निबन्ध, पुस्तक समीक्षा आदि। आपकी कई रचनाओं का प्रकाशन कादम्बिनी, परिकथा, वर्तमान साहित्य, स्वर मंजरी, मधुस्यंदी, पुष्पगंधा, हिंदी चेतना, सृजक, विश्वगाथा [नव्या] आदि पत्रिकाओं तथा हिंदुस्तान, दैनिक जागरण [कानपुर, जम्शेदपुर], प्रभात खबर, दैनिक भास्कर, न्यू इस्पात मेल आदि पत्रों में हुआ है। 
"साँझ का सूरज" [कहानी संग्रह] तथा ''सपनों के वातायन" [काव्य संग्रह] आपकी प्रकाशित कृतियाँ हैं। काव्य संकलन "जो दिल में है" तथा कहानी संकलन "पठार की खुशबू" में भी आपकी रचनायें प्रकाशित हैं। बहुभाषीय साहित्यिक संस्था ''सहयोग'' तथा ''अक्षर-कुम्भ'' की आप सक्रिय सदस्य हैं।
आपको ''अक्षर कुम्भ अभिनन्दन सम्मान", "किशोरी देवी साहित्य सम्मान" तथा बाल साहित्य परिषद की ओर से "जय प्रकाश भारती सम्मान" से सम्मानित किया जा चुका है।
शिक्षक हैं हम समाज को जगाते रहेंगे.
ये जिन्दगी का मंत्र है ,सिखाते रहेंगे,
शिक्षक हैं हम, समाज को जगाते रहेंगे.
अज्ञान के अंधेरों में लिपटी हुई दुनिया,
हम ज्ञान के सूरज को, जगमगाते रहेंगे.
अंकुर नई उम्मीद के हमने उगाये हैं,
आँखों में उनके सपनो को सजाते रहेंगे.
शिक्षक हैं हम समाज को जगाते रहेंगे.
जब स्वार्थ,भ्रष्टाचार,और अन्याय पला था,
तब बन चुनौती,चाणक्यसाशिक्षक ही लड़ा था.
जब देश ने अशिक्षा की जंग लड़ी थी.
तब' कृष्णन' के नाम शिक्षक दिवस की नींव पडी थी.
हम ही नई पीढी के नव निर्माण की सुबह,
सोये हुए सपनों को हम साकार करेंगे
शिक्षक हैं हम समाज को जगाते रहेंगे.
हमने दिया इतिहास को गौरव का सिलसिला,
अब वर्तमान को ऊंचाईयों पर लाके रहेंगे.
बुझने न देंगे ज्ञान का अविराम यह दिया,
हम आँधियों के गर्व को हिला के रहेंगे.
शिक्षक हैं हम समाज को जगाते रहेंगे.

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