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WRITER NAMEरचनाकार परिचय:-


कविता सिंह चौहान
एम्.ए.
नाट्यकला एवं फिल्म अध्ययन विभाग
महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा 442005 (महाराष्ट्र)


नाटक की सम्पूर्णता को उसकी प्रस्तुति में माना जाता है. नाट्य प्रस्तुति में सहायक तत्व के रूप में मौजूद जिन वस्तुओं का प्रयोग नाटक की आवश्यकता के अनुसार प्रयोग में लाया जाता है उसे नाट्य सामग्री कहते हैं. नाट्य सामग्री नाटक के विचार को संप्रेषित करने के लिए महत्वपूर्ण सहायक तत्वों में से एक है. नाट्य सामग्री अभिनय को सुदृढ़ आधार प्रदान करने में भी सहायक होती है. नाटक के मूल में निहित उद्देश्य को दर्शकों तक प्रभावी रूप से संप्रेषित करने के लिए मंच पर जिन वस्तुओं का प्रयोग की जाता है वह नाट्य सामग्री कहलाती है. अगर इसे सरल शब्दों में समझा जाये तो वह सभी वस्तुए जो नाटक के दौरान दर्शकों को मंच पर दिखाई देती है नाट्य सामग्री कही जाती है. नाट्य सामग्री नाटक के कथानक, उसके वातावरण, नाटक की मूल विचारधारा के अनुरूप मंच पर प्रयोग की जाती है. 

मंच पर उपयोग में लायी जाने वाली प्रत्येक नाट्य सामग्री के पीछे गहन अर्थ छिपा होता है. निर्देशक अपनी सृजनात्मक सोच के अनुसार इन नाट्य सामग्रियों को नाटक के स्वरुप में पिरोता है. जिन्हें हम रंग सामग्री कहते हैं मंच पर दो प्रकार की नाट्य सामग्री मानी गयी है 


 हस्त सामग्री
 मंच सामग्री 


आंगिक अभिनय के अंतर्गत सहायक रूप में अभिनेता अभिनय के दौरान जिन सामग्री का प्रयोग अपने अभिनय को प्रभावी रूप से संप्रेषित करने के लिए करता है उसे हस्त सामग्री कहते हैं. नाट्य प्रस्तुत में हस्त सामग्री वह सामग्री जिसे अभिनय के दौरान जिसका स्थान परिवर्तन किया जा सकता है. हस्त सामग्री अभिनेता के मनोभाव को प्रभावी रूप से दर्शकों तक संप्रेषित करने के लिए सशक्त माध्यम है. 


नाट्य इतिहास में विचारधारों के अनुरूप नाट्य सामग्री का प्रयोग विशेष रूप से देखने को मिलता है. यथार्थवादी नाटक में जहाँ दैनिक जीवन में प्रयोग आने वाली वस्तुओं को सीधे मंच पर प्रयोग में लाया जाता था तो वहीँ प्रतीकवादी नाटकों की प्रस्तुति में इन नाट्य सामग्रियों को प्रतिक के रूप में प्रयोग किया जाता था. प्रतीकात्मक रूप में नाट्य सामग्रियों का प्रयोग अधिकतर नाट्य प्रस्तुतियों में देखने को मिलता है. उदाहरणस्वरुप मंच पर अभिनेता द्वारा उपयोग में लायी जाने वाली रस्सी कई अर्थों को दर्शकों तक संप्रेषित करती है. अभिनेता हस्त सामग्री का प्रयोग अपनी सृजनात्मक क्षमता के अनुसार किस प्रकार करता है उसी के अनुसार दर्शक अपनी सृजनात्मक सोच से समझ सकता है कि अभिनेता अपने मनोभाव को प्रकट कर रहा है.


रंग सामग्रियों के चुनाव के दौरान प्रभारी को नाटक के काल, पात्र और सामग्री के प्रयोग की सुविधा का हमेशा ख्याल रखना चाहिए. जैसे चश्मा आदि के लिए केवल फ्रेम का इस्तेमाल करना आवश्यक है क्योंकि शीशे से प्रकाश परावर्तन के कारण प्रदर्शन में खलल पड़ता है. उसी प्रकार ड्रेसिंग टेबल या दीवार – आईने का इस्तेमाल हो तो उसे मंच पर ऐसी जगह रखना चाहिए कि प्रकाश परावर्तन ना हो या फिर साबुन पानी से शीशे के तल को हलके से धुंधला कर देना चाहिए. फनीचर आदि को नाटक की कथावस्तु की कालावधि के अनुरूप होने चाहिए. इन्हें बहुत अधिक चमकदार नहीं होना चाहिए. हमें याद रखना चाहिए कि मंच कि दीवारे और दरवाजे आदि कृत्रिम होने चाहिए. उससे उत्पन्न माहौल में मेल खाती चीजें ही सहज लगेगी. नई चमचमाती चीजें जैसे फर्नीचर या फ्रिज या और कोई सामान जहाँ तक संभव हो इस्तेमाल नहीं करना चाहिए इससे स्वभाविकता नष्ट होती है.


हमें सदेव मंच के आकर-प्रकार और क्षेत्रफल को देखते हुए ही मंच सामग्री का चयन करना चाहिए. हमें आवश्यकता से अधिक सामग्री मंच पर नहीं रखना चाहिए नहीं तो अभिनय के लिए उपयुक्त जगह नहीं होगी. इस परिस्थिति में नाटक की कथावस्तु के अनुसार मंच सामग्री का उपयोग करना जरुरी होता है. हमें केवल उन्हें ही रखना चहिये जो आवश्यक हैं तथा बांकी को छांट देना चाहिए .


मंच पर जब हम खाने पीने की सामग्री का इस्तेमाल करते हैं उस पर सावधानी बरतना आवश्यक है. संक्षेप में खाने का अभिनय महत्वपूर्ण है जिसे हम संकेतों के माध्यम से भी दिखा सकते हैं जैसे कप, ग्लास और में चाय या पानी कभी भी पूरा नहीं भरना चाहिए. तथा मंच पर चाक़ू जैसे धारदार हथियारों का प्रयोग ध्यान से करना चाहिए. क्योंकि नाटक का उद्देश्य यथार्थ का आभास करना है ना कि यथार्थ को हु-ब-हु प्रस्तुत करना है इसलिए ज्यादा से ज्यादा संकेतों पर निर्भर रहकर भी नाटक की कलात्मकता को बढ़ाया जा सकता है.


पाश्चात्य नाटकों के इतिहास पर गौर करें तो वहां मंच पर दैनिक जीवन की वस्तुओं का प्रयोग किया जाता था. उदाहरण के लिए ग्रीक नाटकों में युद्ध के दृश्य के दौरान अभिनेता हस्त सामग्री के रूप में असली भाले का प्रयोग करता था जिसके कारण दुसरे अभिनेता की मृत्यु भी हो जाती थी. इसी कारण नाट्य प्रस्तुति में प्रतीकात्मक सामग्रियों की आवश्यकता महसूस हुई. यथार्थवादी नाटकों के प्रदर्शन में अधिक से अधिक दैनिक जीवन की वस्तुओं को मंच पर प्रयोग में लाया जाता है. उदाहरण के लिए मंच पर बर्फ का दृश्य दिखाने के लिए कई टन नमक गिरा दिया जाता था. शेक्सपीयर रंगमंच जादुई दृश्य दिखाने के लिए अभिनेता के पीछे रस्सी बांधकर उसे एक छोर से दुसरे छोर तक उड़ाकर चमत्कार उत्पन्न किया जाता था,जो दर्शकों में रोमांच उत्पन्न करने के लिए किया जाता था. ऊँचे भवन इत्यादि दिखाने के लिए भारी भरकम सेट बनाये जाते थे तथा उसके अनुसार रंग सामग्रियों का प्रयोग किया जाता था. घर के दृश्य में मंच पर ही खाना बनाने का दृश्य दिखाया जाता था. मंच पर यथार्थ रंग सामग्री का चलन दर्शकों के समक्ष जीवन के सत्य को प्रदर्शित करना था इसलिए मंच पर प्रयुक्त होने वाली रंग सामग्री यथार्थवादी कथ्य के अनुसार होते थे. यथार्थवादी प्रदर्शनों का चलन आज भी है परन्तु आज यथार्थवादी प्रस्तुतियों में यथार्थ का आभास कराया जाता है. 


जब प्रतीकवादी नाटकों का प्रदर्शन हुआ तो मंच पर रंग सामग्रियों के स्वरुप में भी व्यापक बदलाव देखने को मिला. मंच पर उपयोग की जाने वाले रंग सामग्रियां प्रतीकात्मक होती थी. उदाहरण के लिए मंच पर महल, भवन इत्यादि दिखाना हो तो मंच के पीछे पर्दों पर चित्र के माध्यम से उसे दिखाया जाता था. उसी प्रकार हस्त सामग्री में भी प्रतीकों का प्रयोग किया जाता था. प्रतीकवादी रंग सामग्रियों का व्यापक प्रयोग हमें असंगतवादी नाट्य प्रस्तुतियों में देखने को मिलता है जहाँ मंच लगभग खाली होता है परन्तु एक वस्तु को विभिन्न अर्थों के रूप में प्रयोग में लाया जाता है. 


पश्चिमी रंगमंच में रंग सामग्रियों के अर्थ को लेकर काफी परिवर्तन देखने को मिलता है. विचारधारा के अनुसार मंच के पूरे स्वरुप में बदलाव आता रहा. मंच पर प्रयोग लायी जाने वाली रंग सामग्री अपने पूर्ण अर्थ को व्यक्त करती हो इसका विशेष ध्यान रखा जाता था. नाटक के मूल में जिस विचारधारा का प्रभाव देखने को मिलता है उसी के अनुरूप नाट्य प्रस्तुत में रंग सामग्रियों का प्रयोग किया जाने लगा. वर्तमान प्रस्तुतियों में प्रतीकात्मक रंग सामग्रियों का प्रयोग अधिक देखने को मिलता है, जिसका मुख्य कारण समय, स्थान, परिवेश के अनुसार रंग सामग्री के अर्थ का विस्तार करना भी है.


भारतीय परिप्रेक्ष्य में रंग सामग्री को लेकर प्राचीनकाल से ही कुछ वर्जनाएं रही जैसे संस्कृत रंगमंच में युद्ध का दृश्य, रोमांस का दृश्य, क्रीडा का दृश्य आदि मंच पर वर्जित थे जिसके कारण रंग सामग्रियों के व्यापक प्रयोग के ऊपर कम ध्यान दिया गया. आधुनिक भारतीय नाटकों पर जब पश्चिमी रंगकर्म का प्रभाव पड़ा तो रंग सामाग्रियों के प्रयोग को लेकर व्यापक बदलाव देखने को मिलता है. भारत में बड़े तौर पर यथार्थवादी, प्रतीकवादी, असंगतवादी नाटक खेले जाने लगे. रंगमंच पर इन विचारधाराओं के अनुरूप रंग सामग्रियों का प्रयोग होने लगा.


मंच पर प्रयोग होने वाली वस्तुओं के टेक्सचर और नाटक के मूल अर्थ के बीच तारतम्यता को समझा जाने लगा. रंग सामग्री का प्रयोग केवल अभिनेता वस्तु के तौर नहीं करता बल्कि उसके प्रयोग में छिपे अर्थ को समझने की कोशिश करने लगा. मंच पर प्रयोग होने वाली सभी सामग्री मंच को सम्पूर्णता प्रदान करती है.


समसामायिक नाटकों के प्रदर्शन पर ध्यान दे तो रंग सामग्री को लेकर विशेष सोच विकसित होती दिखती है. नाटक के कथ्य के अनुसार रंग सामग्रियों का प्रयोग होने लगा.


रंगमंच पर प्रयोग में आने वाली रंग सामग्री का नाटक की आवश्यकतानुसार ही प्रयोग होना चाहिए सिर्फ मंच पर उसका इस्तेमाल बेवजह न हो उसके पीछे उसका अर्थ मौजूद हो. अभिनेता हस्त सामग्री का प्रयोग करते वक्त यह ध्यान दे कि वह सामग्री उसके अभिनय में सहायक हो न कि बाधा उत्पन्न करे. कई बार देखने में आता है की यथार्थ का आभास कराने के लिए अभिनेता नाटक में असली की वस्तुएं प्रयोग में लाता है यह एक हद तो ठीक है परन्तु कई जगह यह नाटक की तारतम्यता को तोड़ता है और दर्शकों का ध्यान अभिनय से ज्यादा वस्तु के अधिकाधिक प्रयोग पर चला जाता है.


नाट्य सामग्री नाट्य प्रस्तुति को प्रभावी बनाने के लिए एक सहायक तत्व के रूप में प्रयोग में लायी जाती है परन्तु कई अभिनेता बिना इसकी उपयोगिया को समझे सिर्फ प्रयोग करने के लिए सामग्री का प्रयोग करते हैं पीने वाले व्यक्ति का अभिनय करना हो तो अभिनेता हाथ में बोतल प्रयोग कर सकता है परन्तु वह कांच ही की हो और वह भरी ही हो यह आवश्यक नहीं है दर्शकों को आपके अभिनय से लगाना चाहिए कि अभिनेता के हाथ में बोतल है और वह पी रहा है. मूलतः दर्शकों की कलानाशक्ति को बढाया जाए.


मंच पर प्रयोग होने वाली नाट्य सामग्री नाटक के कथानक के अनुरूप हो इससे नाटक की सम्प्रेषनियता विकसित होती है. उदाहरण के लिए मोहन राकेश के नाटक ‘आषाढ़ के एक दिन’ की नाट्य प्रस्तुति में मंच पर झोपड़ी और सुखा वृक्ष रखा गया जो नाटक के कथानक के अनुरूप है वहीं अंतिम दृश्य में टूटे बर्तन घर की जर्जता के प्रतीक के रूप में मंच पर रखे जाते हैं. इस तरह की नाट्य प्रस्तुति में मंच पर प्रयोग में आने वाली नाट्य सामग्री नाट्य प्रस्तुति को और अधिक प्रभावी बनाता है.


नाट्य सामग्री का नाट्य प्रस्तुति में प्रभाव इतना अधिक है कि कई बार दर्शक पर्दा उठाते ही मंच को देखकर नाटक का स्वरुप समझ जाता है. मंच पर प्रयोग होने वाली नाट्य सामग्री ही दर्शकों के साथ संवाद स्थापित कर सकती है बशर्ते मंच पर उनका प्रयोग गहन अर्थ के साथ और नाटक के कथ्य को बयां करता हो.


अतः नाट्य प्रस्तुती में नाट्य सामग्री की उपयोगिता को मुख्य बिन्दुओं के आधार पर समझा जा सकता है-


• नाट्य प्रस्तुति में नाट्य सामग्री नाटक के कथ्य को प्रभावी रूप से संप्रेषित करता है.
• नाट्य सामग्री अभिनेता के सहायक तत्व के रूप में नाटक में प्रयोग में लायी जाती है.
• नाट्य सामग्री मंच पर एक चरित्र के रूप में मौजूद रहता है जो बिना किसी संवाद के भी अपनी भूमिका निभाता है.
• नाट्य सामग्री अपने गहन अर्थ साथ नाटक की मूल विचारधारा को प्रभावी रूप से संप्रेषित करता है.
• नाट्य सामग्री द्वारा चरित्र का चरित्रांकन किया जा सकता है.
• नाट्य सामग्री नाटक के टेक्सचर को स्थापित करने में सहायक सिद्ध होता है.
• नाट्य सामग्री मूलभूत रूप से रंगमंच को पूर्णता प्रदान करता है.


 सन्दर्भ सूचि –
• नाट्य प्रस्तुति एक प्रक्रिया- रमेश राजहंस
• रंग दर्शन – नेमिचंद्र जैन





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