Ishq-Faiz

रचनाकार परिचय:-



नवीन विश्वकर्मा (गुमनाम पिथौरागढ़ी)
अखबार में कहीं जला कोई घर न था

पर बस्ती में सलामत कोई बशर न था



तू था जिंदगी का मेरे रतन एक कीमती

सिवा तेरे जिंदगी में कोई भी गुहर न था





मुझसे मिले सफर में थे ऐसे भी हमसफ़र

रहजन तो थे बहुत इक भी रहगुजर न था



इन सरहदों ने बाँट दिए देखो सबके दिल

इस बात का परिंदों पे कोई असर न था



कटती रही ये उम्र हो ज्यूँ रात पूस की

अफ़सोस याद की तेरी कोई शरर न था




वो ही मेरी शब सहर थी वो ही मेरी सांस थी

उसकी गली में फिर भी हमारा गुजर न था

1 comments:

  1. नविन विश्वकर्मा जी, "सिवा तेरे जिंदगी में कोई भी गुहर न था" दिलचप्स गझल

    उत्तर देंहटाएं

आपका स्नेह और प्रस्तुतियों पर आपकी समालोचनात्मक टिप्पणियाँ हमें बेहतर कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करती हैं.

पुस्तकालय

~~~ साहित्य शिल्पी का पुस्तकालय निरंतर समृद्ध हो रहा है। इन्हें आप हमारी साईट से सीधे डाउनलोड कर के पढ सकते हैं ~~~~~~~

डाउनलोड करने के लिए चित्र पर क्लिक करें...

आइये कारवां बनायें...

साहित्य शिल्पी, हिन्दी और साहित्य की सेवा का मंच, एक ऐसा अभियान.. जो न केवल स्थापित एवं नवीन रचनाकारों के बीच एक सेतु का कार्य करेगा अपितु अंतर्जाल पर हिन्दी के प्रयोग और प्रोत्साहन का एक अभिनव सोपान भी है, अपने सुधी पाठको के समक्ष कविता, कहानी, लघुकथा, नाटक, व्यंग्य, कार्टून, समालोचना तथा सामयिक विषयो पर परिचर्चाओं के साथ साहित्य शिल्पी समूह आपके समक्ष उपस्थित है। यदि राष्ट्रभाषा हिदी की प्रगति के लिए समर्पित इस अभियान में आप भी सहयोग देना चाहते हैं तो अपना परिचय, तस्वीर एवं कुछ रचनायें हमें निम्नलिखित ई-मेल पते पर प्रेषित करें।
sahityashilpi@gmail.com
आइये कारवां बनायें...

Followers

Google+ Followers

Get widget