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बदली छायी
 डा. महेंद्र भटनागर रचनाकार परिचय:-


डा. महेंद्रभटनागर
सर्जना-भवन, 110 बलवन्तनगर, गांधी रोड, ग्वालियर -- 474 002 [म. प्र.]

फ़ोन : 0751-4092908 / मो. 98 934 09793
E-Mail : drmahendra02@gmail.com
drmahendrabh@rediffmail.com

दूर-दूर तक छाया सघन कुहर-
कुहरे को भेद
डगर पर बढ़ते हैं हम।
चट्टानों ने जब-जब
पथ अवरुद्ध किये-
चट्टानों को तोड़
नयी राहें गढ़ते हैं हम।
ठंडी तेज़ हवाओं के वर्तुल झोंके आते हैं-
तीव्र चक्रवातों के सम्मुख
सीना ताने
पग-पग अड़ते हैं हम।
सागर-तट पर टकराता
भीषण ज्वारों का पर्वत-
उमड़ी लहरों पर चढ़
पूरी ताक़त से लड़ते हैं हम।
दरियाओं की बाढ़ें
तोड़ किनारे बहती हैं-
जल भँवरों / आवेगों को थाम
सुरक्षा-यान चलाते हैं हम।
काली अंधी रात क़यामत की
धरती पर घिरती है जब-जब-
आकाशों को जगमग करते
आशाओं के / विश्वासों के
सूर्य उगाते हैं हम।
मणि-दीप जलाते हैं हम।
ज्वालामुखियों ने जब-जब
उगली आग भयावह-
फैले लावे पर
घर अपना बेख़ौपफ़ बनाते हैं हम।
भूकंपों ने जब-जब
नगरों गाँवों को नष्ट किया-
पत्थर के ढेरों पर
बस्तियाँ नयी हर बार बसाते हैं हम।
परमाणु-बमों / उद्जन-शस्त्रें की
मारों से
आहत भू-भागों पर
देखो कैसे
जीवन का परचम फहराते हैं हम।
चारों ओर नयी अँकुराई हरियाली
लहराते हैं हम।
कैसे तोड़ोगे इनके सिर?
कैसे फोड़ोगे इनके सिर?
दुर्दम हैं,
इनमें अद्भुत ख़म है।
काल-पटल पर अंकित है-
‘जीवन-अपराजित है!’


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