रचनाकाररचनाकार परिचय:-


नाम: नीतू सिंह ‘रेणुका’
जन्मतिथि: 30 जून 1984
प्रकाशित रचनाएं: ‘मेरा गगन’ नामक काव्य संग्रह (प्रकाशन वर्ष -2013), ‘समुद्र की रेत’ कथा संग्रह (प्रकाशन वर्ष -2016)
ई-मेल: n30061984@gmail.com
गरम मक्खन में जैसे मक्के के दाने ख़ुशी से उछलते-कूदते हैं वैसे ही आज रमेश का मन उछल-कूद रहा था और वह हवा से बातें करती अपनी साइकिल पर दनदनाता हुआ घर जा रहा था। केक मुंह का स्वाद बढ़ाता है लेकिन उसके ऊपर की आईसिंग जैसे आखों का स्वाद बढ़ाती है वैसे ही वेतन रोज़मर्रा की ज़रूरतों का स्वाद बढ़ाता है और बोनस त्योंहारों का। फिर इस महीने तो कोई त्यौहार भी नहीं है; हुआ न यह बोनस पर बोनस; पिज़्ज़ा पर डबल स्कूप फ्री। रमेश नाक की सीध में यह सोचते हुए घर जा रहा था कि दो हज़ार का बोनस अब बस सीधे घर ले जाकर रमणी के हाथ में रख देगा।
दूध उबाला तब मक्खी नहीं पड़ी; उसे बिना ढके रसोई में इतनी देर छोड़ा, तब भी नहीं पड़ी; ग्लास में डाला तब भी नहीं; बस पीने वाले के हाथ में देने ही जा रहे थे कि मक्खी पड़ गई। रमेश भी घर पहुँचकर पैसे देने ही वाला था कि मक्खी पड़ गई। घर की गली से पहले वाली गली में बड़े बाबू का बंगला था जहां किसी बच्चे का जन्मदिन मनाया जा रहा था। जिसे देख रमेश साइकिल को जबर्दस्त ब्रेक देकर ठिठक गया और घर जाने की बजाए बाज़ार की ओर मुड़ गया। सुबह जब रमणी इतनी सुंदर लग रही थी तब याद नहीं आया; उसने खीर-पूड़ी बनाई तब भी याद नहीं आया; काम पर बोनस मिला तब भी याद नहीं आया; अब जब सारी दुकाने बंद हो गई होंगी तभी मक्खी पड़नी थी; तभी याद आना था कि आज शादी की सालगिरह है। गधा कहीं का।
कुकर में चावल चढ़ा कर; उसका ढक्कन बंद करने के बाद सीटी खोजने में जो व्यग्रता पाई जाती है वही व्यग्रता इस समय साड़ी की दुकान ढूंढते रमेश के चेहरे पर नज़र आ रही थी। पूरे मार्केट में केवल शोरूम ही खुले हैं। अब क्या किया जाए? अमीर गृहणियाँ पति को ख़ुश करने के लिए संजीव कपूर की मंहगी से मंहगी रेसेपी बुक ख़रीद लाती हैं और रमणी जैसी गरीब रमणियाँ काग़ज़-कलम लेकर पड़ोसन से नया व्यंजन सीखती हैं वैसे ही रमेश अपनी हैसियत कि मामूली दुकान ढूँढने की चेष्टा कर रहा था। चीनी ख़त्म होने पर न चाय पी जा सकती है न दूध; मामूली दुकानें बंद होने पर रमेश न तो बिना साड़ी के घर जा सकता था न महंगी साड़ी के साथ। वह जानता था कि बिना तोहफा लिए घर गया तो भी रमणी नाराज़ होगी क्योंकि सुबह से इतनी ख़ुश लग रही थी कि मानो आज त्यौहार हो और वह अपनी पत्नी के कंजूस स्वभाव को भी जानता था कि मंहगी साड़ी ले गया तो भी वह फट पड़ेगी; जैसे दूध नीबूं डालने से भी फटता है और सिरका डालने से भी। मगर मेहमान को ख़ुश करने के लिए पनीर न मिले तो मछली भी बनानी पड़ सकती है; यही सोच रमेश शोरूम में घुसा कि सालगिरह मनानी हो तो कभी-कभी मंहगी साड़ी भी ख़रीदनी पड़ सकती है। और यह ज़रूरी भी तो नहीं की शोरूम की सारी साड़ियाँ महंगी हों; कभी-कभी कम लागत से भी स्वादिष्ट व्यंजन बनते हैं जैसे मटर की घुघुनी।
हलीम की ख़ुशबू सड़क पर चल रहे उपवासियों को अपनी तरफ खींच लेती है वैसे ही शोरूम की चकाचौंध रमेश को अपनी ओर खींच ले गई। एक से एक साड़ियों के काउंटर लगे हुए थे और रमेश उन्हें आँखों ही आँखों में तोल-मोल कर देख रहा था जैसे नन्हा हामिद जेब में तीन पैसे रख मिठाइयों की दुकान देखा करता था। सिल्क, जड़ाऊ, जार्जेट, शिफॉन, क्रेप, कॉटन, बांधनी, सब तो है। जो व्यंजन खाना न हो उसकी रेसेपी पढ़ने में क्या हर्ज़ है; रमेश ने सोचा क्यों न चलकर सिल्क देखें भले ही ख़रीद पाना बस में न हो।
बनारसी, शालू, चँदेरी, कोसा या टसर सिल्क, राजशाही सिल्क, मूंगा सिल्क, मुर्शिदाबाद सिल्क, बालूचारी सिल्क, कंथा, संबलपुरी, सोनपुरी, ब्रह्मपुरी, बाफ़ता, मथा, पैठणी, पटोला इक्कत, मैसूर सिल्क, कांचीपुरम, पोचमपल्ली मिक्स में, वेंकटगिरी सिल्क,…. सेल्समैन जैसे फाइव स्टार होटल का मेनू पढ़ रहा हो और रमेश को जैसे भूख ही न लगी हो। सेल्समैन ने रमेश का भाव ताड़ कर पूछा “कौन सी दिखाऊँ?” किसी माँ ने जैसे बरसों की दीक्षा लेकर लौटे बेटे के लिए ढेरो पकवान और स्वादिष्ट मिठाइयां बनाई हों लेकिन उसके रसोई घर में घुसने पर माँ कहे “बेटा क्या खिलाऊं?” और वह कहे कि “मैं तो फलाहार ही करता हूँ।“
ठीक वैसे ही रमेश ने जवाब दिया “कॉटन साड़ी ......”
“अरे जनाब यह तो सिल्क का काउंटर है। कॉटन आपको वहाँ मिलेगा”।
“ओह माफ़ कीजिएगा” रमेश जान बचाकर कॉटन वाले काउंटर पर गया; अरे जब घर में फल और मेवे नहीं थे तो कश्मीरी पुलाव बनाने ही क्यों चले थे?
यहाँ एक ठिगने क़द के आदमी ने रमेश को ध्यान से देखा और अपनी परंपरा के अनुसार अपने ढाबे का मेनू रमेश के आगे पढ़ डाला। बंगाल की तांत की साड़ी, मसलिन, धनियाखली, कंथा कॉटन, संबलपुरी कॉटन, तांत, फुलिया, बांधनी, कोटा, कोयंबटूर कॉटन,…. सेल्समैन ने आगे बोलने से पहले रमेश के चेहरे को ध्यान से देखा कि कहीं सुन भी रहा है जैसे चावल को चुटकी से पीस कर देख लिया जाता है कि पका भी है या हम योंही उसे चूल्हे से उतारने पर उतारूँ हैं। प्याज़ जब तेल छोड़ने लगे तो पता चलता है कि भुन गया है और रमेश ने जब एसी शोरूम में पसीना छोड़ना शुरु किया तो सेल्समैन समझ गया कि यह परेशान है। अपनी कड़की जेब के कारण रमेश ऐसे पसीज रहा था जैसे इडली भाप से पसीजती है। इडली में चाकू घुसाकर जिस तरह उसके पकने की जांच की जाती है उसी तरह सेल्समैन ने अपने सवाल का चाकू दाग़ कर रमेश की नब्ज़ टटोलनी चाही “आपको किस रेंज में दिखाऊँ?” पड़ोसिनें जैसे रसोई की ख़ुशबू से ही पहचान लेती हैं कि नया पड़ोसी शाकाहारी है या मांसाहारी। सेल्समैन भी यह सवाल कर ग्राहक का चेहरा भाँप लेते हैं और उसकी हैसियत समझ जाते हैं।
रमेश की जेब में तो बोनस के बस दो हज़ार रुपए ही थे, तनख़्वाह तो वह कल ही रमणी के हाथ पर रख आया था; सारे बेसन की तो कढ़ी में डालने वाले पकौड़े बना दिए अब पंजाबी कढ़ी कैसे बने। रमेश ने पूरा दम लगा कर कहा “दो हज़ार?” जैसे बता नहीं रहा हो बल्कि निकाल कर दे रहा हो। सेल्समैन ने सोचा कि आदमी तो हमारे जैसा ही लगता है क्यों न मदद की जाए। एक ही आकार की कटी सब्ज़ी आसानी से पक जाती है और एक की तबके के लोग परस्पर आत्मीयता उत्पन्न कर लेते हैं। उसने पूछा “किस के लिए साड़ी ख़रीद रहे हैं? किस अवसर के लिए चाहिए?” जब रेसेपी पढ़ कर सब्ज़ी न बन पा रही हो तो सीधी-सादी सब्ज़ी बना देनी चाहिए। रमेश जब ख़ुद से साड़ी न ख़रीद पाया तो उसने सेल्समैन के सामने सीधे-सीधे अपनी समस्या रख दी।
“क्या बताऊँ भाई? सारी दुकाने बंद होने के बाद याद आया कि आज शादी की सालगिरह है और पत्नी को साड़ी देनी है। नहीं ले गया तो बेचारी दुखी होगी। बाज़ार में इस वक़्त सिर्फ़ आपकी ही दुकान खुली थी सो घुस गया। अब समझ नहीं आ रहा कि क्या लूँ?”
कभी-कभी जब अपनी रेसेपी से पति को ख़ुश न कर पाओ तो पड़ोसन से मांगी रेसेपी भी आज़मानी चाहिए। सेल्समैन भाई से मांगी मदद काम आ गई।
“तुम टेंशन क्यों लेते हो भाई? दो हज़ार में तो झकास साड़ी आ जाएगी। अभी तुम्हें एकदम लालो-लाल फुलकारी साड़ी दिखाता हूँ। भाभी जी देखते ही ख़ुश हो जाएंगी। मेरी गारंटी है। माँ कसम! डिजाइनर पीस है और मार्केट में एकदम नया आया है। लेकिन ओ वाले काउंटर पर भाई.... ए तो कॉटन का है।“
सेल्समैन ने दूसरे काउंटर पर ले जाकर एक साड़ी का पैकेट खोला और साड़ी रमेश के आगे हवा में लहरा के बिछा दी जैसे लस्सी की दुकान वाले सधे हुए हाथों से दो ग्लासों के बीच हवा में लहराते हुए लस्सी बनाते हैं। किसी शानदार केक की दुकान में बार्बी डिजाइन वाले केक को देख जैसे बच्चे मचल जाते हैं वैसे ही सामने बिछाई हुई लाल रंग की जार्जेट साड़ी पर फुलकारी का बेहतरीन काम देख रमेश तुरंत मचल गया।
जबरदस्‍त भूख लगी हो और रसोई में ख़ुशबू भी बढ़िया आ रही हो तो तुरंत खाना परोसने के लिए कहना चाहिए । रमेश ने भी तुरंत साड़ी पैक करने को कहा । सही समय पर आकर अगर कोई उफने हुए दूध को गिरने से बचा ले तो उसका शुक्रिया अदा करना तो बनता है । रमेश ने भी सैल्‍समैन के प्रति कृतज्ञता प्रकट की और दूध बच जाने पर चैन की सांस ली ।

अब क्‍या था गरम तेल में तैर रही फूली पूड़ी की तरह हवा में तैरता हुआ रमेश घर पहुँच गया । क्‍यों न पहले कड़वा करेला परोसा जाए ताकि पालक पनीर परोसने पर मेहनत की उचित प्रशंसा हो। यही सोचकर रमेश ने साड़ी साइकिल के कैरियर में छोड़कर खाली हाथ ही घर में प्रवेश किया । आम को कई दिनों तक भूसे में दबाकर रखने के बाद जिस प्रत्याशा से उसे भूसे के बाहर निकाला जाता है उसी प्रत्‍याशा से रमणी ने घर में घुसते रमेश को देखा । कई दिनों तक साड़ी का राग अलापने के बाद भी आम पका नहीं बल्कि सड़ गया है और रमेश का हाथ तो खाली है। सूरन काटते समय हाथों का जो हाल होता है वह रमणी के दिल का हो रहा था।
चुपचाप रसोई में जाकर खाना निकाल लाई। बुझे हुए चूल्हे से जैसे धुंआ उठता है वही धुंआ रमणी के मलिन चेहरे से निकल रहा था जिसे देख रमेश मंद-मंद मुस्कुरा रहा था। रमेश को खिला चुकने के बाद रमणी अपनी थाल लेकर बैठी तो रमेश को लगा कि अब बोलने का वक़्त आ गया है जैसे एक तार बनने पर चाशनी तैयार हो गई हो।
“अरे! यह क्या? केवल एक रोटी?”
“हाँ! आदमी को कम खाना चाहिए! इससे देह में चुस्ती-फुर्ती बनी रहती है।“
”तुम्हें दिनभर काम करना पड़ता है। एक रोटी से क्या होगा। क्या मेरी तनख़्वाह पूरी नहीं पड़ती जो तुम्हें पेट काट-काटकर गुज़ारा करना पड़ रहा है। अगर ऐसा है तो मैं कोई दूसरी नौकरी देखता हूँ। ऐसी नौकरी से क्या फ़ायदा जिससे तुम्हें भर पेट रोटी भी नसीब न हो। “
“नहीं-नहीं ऐसी बात नहीं है। पिछले महीने आधी से ज़्यादा तनख़्वाह मैंने बचा ली।“
रमणी तुरंत अपनी खाने की थाली वहीं ज़मीन पर छोड़ रसोई में घुस गई और हंडी में से रूपए निकाल कर रमेश को उस गर्व से दिखाने लगी जो किसी नए प्रकार के पकौड़े का शोध पूरा होने पर पड़ोसन को नमूना चखाने में महसूस होता है ।

"यह देखो पिछले महीने की बचत ।"

रमणी की आंखों में आत्‍मप्रशंसा की वैसी ही चमक थी जैसे बेने डोसा पर घी की होती है। रसगुल्ला बनाने के लिए गरम तेल में डाले गए मैदे के गोलों की तरह लाल चेहरे के साथ रमेश झल्लाया "क्या करोगी ? इस पैसे को रोटी बनाकर खाओगी ? " फिर संयमित होकर अपने शब्‍दों को चाशनी में डुबाकर रमेश बोला - "रमू ! ये नोट तुम्‍हारी थाली में रोटी की जगह नहीं ले सकते । दो रोटी और ज्‍़यादा खाने के लिए इन्‍हे ख़र्च करना पड़ेगा । खाई हुई दो रोटी तुम्हारे अधिक काम आएगी, यह हुंडी में छुपाए हुए नोट नहीं ! "
पाव-भाजी का आलू जिस तरह से मसल दिया जाता है रमेश की बातों ने रमणी की आत्मप्रशंसा को मसल दिया । फिर तो वह मलाई कोफ्ते में छुपे काजू-किशमिश की तरह अपनी थपथपाई हुई पीठ को रसोई में छुपाकर बर्तन माजने लगी ।
हालात बिगड़ते देख रमेश ने तेज़ नमक वाली सब्ज़ी पर नींबू निचोड़ने की सोची और बाहर जाकर साड़ी ले आया । साड़ी उसने तकिए पर ऐसे सजा दी जैसे दाल मक्खनी के ऊपर धनिया और मक्खन सजाया जाता है ।
किचन से बाहर निकलते ही हाथ पोंछती हुई रमणी ने साड़ी को ऐसे देखा जैसे किसी डाइनिंग टेबुल पर वाज़वान के छत्तीसों व्‍यंजन सजा दिए गए हों ।
रमणी ने चमकती आंखों से पूछा "कितने की है?" रमेश को ऐसा लगा कि करंजी खाते समय इलायची की जगह काली मिर्च का स्‍वाद आ गया हो ।
"तुम्‍हें क्‍या करना है । साड़ी देखो ना "
"ओफ्फो ! बोलो भी कितने की है ? "
जैसे टेमेटो ओमलेट में अंडा नहीं होने पर भी वह पूरा स्‍वाद देता है वैसे ही साड़ी का गलत दाम बताकर भी ख़ुशी बरक़रार रखी जा सकती है ।
"एक हज़ार"
"एक हज़ार ? सच्‍ची ? यह तो बहुत ख़ूबसूरत साड़ी है ।"
मटन कीमे का प्रेमी जैसे ही मटन कीमे पर टूटने वाला हो और उसे याद आ जाए की उसका हाज़मा खराब है, वह ठिठक जाता है। रमणी भी अचानक ठिठकी और बोली “एक हज़ार की साड़ी की क्या ज़रुरत थी? सौ-दो-सौ की भी चल जाती थी। इतना ख़र्चा क्यों किया मेरे पास साड़ियों की कोई कमी है क्या? “
"क्‍यों? नहीं है? मैं जानता नहीं हूँ क्‍या कि तुम्‍हारे पास कुल छ: साड़ियां हैं । और एक हज़ार तो तभी वसूल हो गए जब साड़ी देखकर तुम्‍हारी आंखें चमक उठी थीं ।“
शाही पनीर की ग्रेवी में काजू का पाउडर क्यों डाला, जबकि रमणी की कंजूस प्रवृत्ति के अनुसार तो मूंगफली का पाउडर भी चल जाता। रमेश तो काजू के पक्ष में अपनी दलीलें देकर शांत हो गया। रमणी कैसे हो जाती?
"छ: साडि़यां क्या कम है ? अरे हमारी दादी-परदादियों ने तो दो साड़ियों में जीवन गुज़ार दिया । एक बदन पर डालने के लिए दूसरी सूखने के लिए डालने के लिए । और भी अगर बहुत मन था तो सौ-दो-सौ की कोई सस्ती साड़ी ही ले आते ।“ यह तो वही हुआ कि मुर्गा जान से गया और खाने वाले को मज़ा भी न आया ।
“बस...बस अब बिस्तर से साड़ी हटाओ मुझे नींद आ रही है ... कल काम पर भी जाना है ।"
****

दांतुन की जब तक चूसे हुए सहजन सी हालत नहीं हो गई रमणी ने फेंका नहीं । फिर सुबह की शुरुआत की याने चाय पी और पिलाई । रमेश ने चाय पीते ही ऐसे मुंह बनाया जैसे कोई भी बनाता जब चाय में चीनी न पड़ी हो ।
"ये क्‍या ? इसमें चीनी के जगह गुड़ क्‍यों डाला है ?"
"गुड़ सेहत के लिए अच्छा होता है । बहुत दिनों से सोच रही थी चीनी छुड़वाने की। आज शुरु कर ही दिया ।"
"अच्छा! तो कल से चाय ही मत बनाना । चीनी के साथ-साथ चायपत्ती और दूध भी बच जाएगा ।"
"लेकिन आपको तो चाय की आदत है । बिना चाय सिर दर्द करता है आपका ।"
"कल से बाहर ही पी लिया करूँगा ।"
"धत्‍त ! फिर क्‍या फ़ायदा । बात तो वही हो गई ।"
"तुम नहीं सुधरोगी न !"
स्वादिष्ट व्यंजनों का शौक़ीन बीमार आदमी जैसे मूंग की खिचड़ी आधी-अधूरी छोड़ दे वैसे ही प्याली में आधी-अधूरी चाय छोड़ रमेश काम पर निकल गया ।
सारा दिन रमेश यही सोचता रहा कि उस लाल फुलकारी वाली साड़ी में रमणी कितनी प्यारी लगेगी । अब तक तो उसने वह साड़ी दस बार पहन कर देख ली होगी जैसे कोई भारत में बैठा-बैठा यह सोच रहा हो कि अफ़गान के पुलाव, कोरमा, कबाब भारत के पुलाव, कोरमा, कबाब से ज़्यादा स्वादिष्ट होंगे । दिन तो किसी तरह कट गया मगर शाम को किसी व्रती की तरह भोजन पर टूट पड़़ने के लिए बेक़रार रमेश घर के लिए जल्दी निकल गया। सिर्फ़ फोटो देखकर व्यंजन आर्डर करने पर जैसे उसके स्वादिष्ट होने की केवल कल्पना ही की जा सकती है वैसे ही रास्ते भर वह कल्पना ही करता रहा कि रमणी उस सुंदर साड़ी में सज-धज कर दरवाज़े पर खड़ी उसकी राह देख रही होगी ।
लेकिन घर जाकर देखा तो न तो दरवाज़े पर कोई खड़ा था न ही रमणी ने वो साड़ी पहनी थी । रमेश की हालत ऐसी थी जैसे भोज तो तैयार किया हो मगर मुहल्लेवालों को बुलावा न दे पाएं हो। ख़ैर, घी की जगह डालडे से ही काम चला लेते हैं ।
"अरे वाह । आज तो आप जल्‍दी आ गए । "
"हूँ"
"चाय पिऐंगे ? "
"हाँ! लाओ "
जिस तरह एक ख़राब रसोईया मालिक का धंधा मंदा करवा सकता है वैसे ही रमणी की गुड़ वाली चाय ने रमेश के चाय पीने के उत्‍साह को मंद कर दिया था ।
चाय की चुस्‍की लेते हुए रमणी ने पूछा -
"क्‍या बात है ? मुंह क्‍यों लटका रखा है ? काम पर कुछ हुआ क्‍या ? "
"नहीं"
"कुछ तो हुआ ज़रुर है ।"
"वो...मैं"
"हूँ ... मैं सुन रही हूँ "
"मैं सोच रहा था कि तुम कल वाली साड़ी पहनकर दिखाओगी ।"
रमणी के गालों में शर्म से ऐसे गड्ढे पड़े जैसे भरवा पराठें बनाने के लिए लोई में बनाए जाते हैं ।
झेंप मिटाती हुई रमणी ने कहा -
"अरे तुम्‍हारी साड़ी ने तो कमाल कर दिया"
"क्‍यों क्‍या हो गया । तुमने वो साड़ी पहनी थी क्‍या ? "
"अरे नही़ं । मैंने वह साड़ी अपनी सखियों को दिखाई थी ।"
"तो इसमें कमाल क्‍या हो गया ।"
"कमाल ये हो गया कि तुम्‍हारी साड़ी ने मुझे दो सौ रुपए का फ़ायदा करा दिया।"
कप खाली करते हुए रमेश ने पूछा "वो कैसे ? "
"वो ऐसे कि जया को मेरी साड़ी इतनी पसंद आई, इतनी पसंद आई कि वो मुझे इस साड़ी के बारह सौ देने के लिए तैयार हो गई ।"
रमेश के कान ऐसे खड़े हो गए जैसे मुड़े हुए साबुदाना के पापड़ तेल में डालने पर खड़े हो जाते हैं । उसने फटी आंखों से पूछा - "फिर? "
"फिर क्‍या था ? दो सौ रूपए का फ़ायदा मैं कैसे छोड़ सकती थी ? मैंने फट से उसे साड़ी दे दी ।"
यह सुनकर रमेश के दिलो-दिमाग़ की वही हालत हुर्इ जो सोनपापड़ी बनाते हुए बेसन के लोई की होती है ।
................




2 comments:

  1. बहुत बढ़िया, ये तो हर आम आदमी की कहानी हैं अपने परिवार से बहुत प्यार करता हैं उन्हें बस किसी तरह खुश देखना चाहता हैं.

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